
जीवनसाथी -3 भाग -149
अब तक आपने पढ़ा….
शौर्य के अनमने बर्ताव के कारण हर्ष की शादी की तैयारियों को बीच में ही छोड़ कर बांसुरी राजा के साथ लंदन आ जाती है, वो शौर्य को अपने साथ लेकर जाना चाहती है.. ।
यहाँ भी शौर्य बांसुरी की बात काट नहीं पाता और उसके साथ जाने के लिए तैयार हो जाता है..।
बांसुरी अपने साहब के साथ झील किनारे घूमने गयी होती है, जहाँ उसे कली नजर आ जाती है। और बातों बातों में वो कली को अपने साथ इण्डिया चलने को कहती है..
चाहती तो कली भी है, लेकिन वो जानती है कि उसके पिता अब उसे इण्डिया जाने नहीं देंगे.. वो इसी पसोपेश में रहती है कि बांसुरी उसे अपने साथ घर ले जाती है..।
जहाँ शौर्य से कली का बहुत दिनों बाद आमना सामना होता है, कली भावुक हो जाती है लेकिन शौर्य बिलकुल सामान्य बना रहता है..।
बांसुरी जब भी कली से मिलती है, उसे हमेशा उस के लिए मन में एक कोमल भावना सी महसूस होती है, इसलिए वो हर्ष की शादी में उसे साथ चलने की ज़िद करती है..।
कली के मना करने पर वो उसके डैडा से मिल कर उनकी अनुमति लेने की बात करती है, और उसे साथ लिए उसके घर की तरफ निकल जाती है !
अब आगे….
वासुकी के ऑफिस में वासुकी अपने सामने बैठे दर्श को देख रहा था, दर्श किसी से फ़ोन पर गंभीरता से बात कर रहा था।
कुछ देर बाद उसने फ़ोन रखा और वासुकी ने इशारे से पूछा की क्या हुआ, दर्श ने काम हो गया है कह दिया..।
वासुकी ने राहत की गहरी सी साँस ली..
“अनिर एक बात पूछूं ?”
“हाँ !”
“तुमने उस घटिया इंसान को जेल से क्यों छुड़वाया ? सड़ने देना था उसे..
तिल तिल कर घुटता तब सही होता !”
“यहाँ की जेल में उसे वो सजा नहीं मिल सकती जिसका वो हक़दार है..।
यहाँ की जेल में कैदियों के गुनाह के मुताबिक उन्हें सजा दी जाती है।.
हमारी नजर में भदौरिया का गुनाह बड़ा है, लेकिन शायद यहाँ के कानून में नहीं। बस इसलिए उसे वहाँ से छुड़वाया है, जिससे उसे अपने हिसाब से सजा दे सकूं… इसके अलावा एक और बात भी है..।”
“वो क्या ?”
” भदौरिया के ह्यूमन ट्रैफिकिंग वाले काम का भी पूरा पता करवाना है.. ।
वो किन लोगो से जुड़ा है, वो कौन है जिनके लिए वो लोगों को सप्लाई करता है ?
ये सब पतासाजी करके ही भदौरिया को सजा दी जाएगी..।
अगर अभी वो जेल में बंद रहा तो ये सारी बातें छिपी रह जाएँगी और हम कभी नहीं जान पाएंगे कि वो कौन लोग है, और न ही उनका काम रोक पाएंगे !”
“हम्म ये तो सच है.. !”
वासुकी जहाँ बैठा था, उसकी टेबल के एक तरफ की दीवार पर एक बड़ी सी टीवी स्क्रीन लगी थी.. जिस पर उसके घर और बाहर लगे सीसीटीवी कैमेरा नजर आते थे..
बाहर वाले गार्डन और घर के मुख्य दरवाजे पर टहलते हुए बाउंसर नजर आ रहे थे..।
लेकिन तभी उनके मुख्य गेट पर एक बड़ी सी गाडी आकर रुकी।
गेट पर लगे क्लोज़ सर्किट कैमेरा में ड्राइवर का चेहरा नजर आने लगा..
बाहर केबिन में बैठा गार्ड भी अपनी स्क्रीन पर उस अनजान ड्राइवर को देख तुरंत अपनी गन संभाले बाहर निकल आया..।
गेट के दूसरी तरफ खड़े दो गार्ड्स भी दौड़ते हुए गाड़ी की तरफ चले आए।
वासुकी बड़े ध्यान से अपनी स्क्रीन को देख रहा था। ड्राइवर ने अपना शीशा नीचे उतारा और चेहरा बाहर करके उन गार्ड्स से कुछ बात करने लगा।
गार्ड्स ने पीछे के शीशे को खुलवाकर अंदर झांका, और तुरंत मुस्तैदी से खड़े हो गए।
अंदर बैठा वासुकी समझ गया कि जरूर कोई ऐसा परिचित है जिसे गार्ड जानता है।
गार्ड्स एक तरफ हो गए और ऑटोमेटिक गेट अपने आप खुल गया।
वह अनजान गाड़ी पोर्टिको तक चली आई। पोर्टीको में भी कैमरा लगा था, और वासुकी बड़ी शिद्दत के साथ इंतजार कर रहा था कि आखिर इस गाड़ी से कौन उतरता है।
गाड़ी खड़ी करते ही ड्राइवर और ड्राइवर के साथ बैठा दूसरा आदमी तेजी से गाड़ी से उतरे और उन्होंने पीछे की तरफ के दोनों दरवाजे खोल दिए।
घर की सीढियों के पास वाले दरवाजे से कली उतरी। उसे देखते ही वासुकी के चेहरे पर राहत चली आई ।
लेकिन उसी पल उसके दिमाग में यह बात भी आई कि अपनी गाड़ी छोड़कर कली किसकी गाड़ी में यहां तक आई है?
कली बड़ी नफासत से एक तरफ होकर खड़ी हो गई। और उसके पीछे से कोई और उतर कर वहां खड़ी हो गई। वासुकी कुछ पल के लिए स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए देखता रह गया ।
जैसे बड़े ध्यान से पहचानने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन उसे जरा भी दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि यह चेहरा आज बीस साल बाद भी बिल्कुल वैसा ही नजर आ रहा था, जैसे उस समय था…।
वासुकी के साथ-साथ दर्श भी स्क्रीन पर नजर जमाए बैठा था। उसने जैसे ही बांसुरी को गाड़ी से उतरते देखा, वह अपनी जगह से खड़ा हुआ और तुरंत वासुकी के पास चला आया।
” अनिर यह ….”
दर्श कुछ बोल नहीं पाया, वासुकी के चेहरे के बनते बिगड़ते रंग उसे सब बता गए थे।
वासुकी हैरानी से कली के साथ खड़ी बांसुरी को देख रहा था। आज इतने सालों बाद अचानक वह सब कुछ उसके सामने चला आया जिसे भूलने की कोशिश में वह इंडिया कभी लौट कर ही नहीं जाना चाहता था…।
एक-एक कर वह सारी बातें, वह सारी यादें, उसके मानस पटल पर आतंक मचाने लगी..।
दुनिया में लोग किसी से प्यार करते हैं, और उस प्यार के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं।
लेकिन उसने किसी की आराधना की थी। बिल्कुल ऐसे जैसे वह कोई देवी हो, जो उसके छूने से मैली हो जाएगी। और बस उस देवी की आराधना के लिए उसने उस लड़की के प्राणों की आहुति दे दी जो उसे उतना ही प्रेम करती थी जितना उसने किया था किसी और से।
लेकिन उसके जीवन ने उसका खुद का तमाशा बना कर रख दिया था। जिससे उसने प्यार किया, उसके लिए उसने कभी नही चाहा कि वह उसे मिल जाए।
क्योंकि वह जानता था कि वह नहीं मिल सकती।
और जिसने उसे प्यार किया, उसे उसने कभी पाना चाहा ही नहीं। लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ते बढ़ते जिस दिन उसे लगा कि अब उसे अपनी जिंदगी से भागने की जगह ठहर जाना चाहिए , अपना आशियाना बसा लेना चाहिए, उसी दिन नेहा उसे छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए चली गई, और वह अकेला रह गया उस दर्दनाक अतीत के साथ।
जिस अतीत में उसके हाथ में कुछ भी नहीं था। कोई तो मीठी याद ऐसी होती जिसके सहारे वह मुस्कुरा कर दिन काट पाता।
जितनी यादें थी, उनमें कहीं ना कहीं एक दर्द छुपा था, और शायद यही वह दर्द था जो उसे मुस्कुराने नहीं देता था।
अपनी प्यारी सी बेटी को देखकर, पालकर, उसे प्यार करके भी वह मुस्कुरा नहीं पाता था, क्योंकि कहीं ना कहीं उसके दिल में यह बात बैठी हुई थी कि उसने नेहा को उसका हक नहीं दिया।
नेहा उसके पीछे पागलों की तरह घूमा करती थी, उसका प्यार पाने के लिए रात दिन तड़पा करती थी, तरसा करती थी, लेकिन उसने कभी पलट कर नेहा से प्यार नहीं किया, और उसे महसूस भी तब हुआ जब देर हो गई थी।
इसी अपराध बोध ने उसे इंसान से पत्थर बना कर छोड़ दिया था। उसे अपने आसपास के समाज से, लोगों से, हर किसी से नफरत सी हो गई थी। अब बस वह पैसे कमा रहा था, काम कर रहा था, भाग रहा था, एक रेस में जिसका कोई अंत नहीं था।
वह क्यों इतने पैसे कमाता था? क्यों बिजनेस कर रहा था? इसका कोई जवाब उसके पास नहीं था। बहुत बार दर्श उसे कहता था, कली को आजीवन हम अपने पास नहीं रख सकते, कभी ना कभी उसकी शादी करनी होगी और तब उसकी इस बात को हवा में उड़ा दिया करता था।
क्योंकि नेहा को खोने के बाद अब वह यह कल्पना भी नहीं कर सकता था, कि कली भी उसके जीवन से कभी जा सकती है। जब कली और शौर्य के बारे में उसे मालूम चला तो ऐसा लगा था जैसे जिंदगी ने एक बार फिर उसका मजाक बना दिया है।
वक्त ने एक जोर का घूंसा उसके सीने में मारा था। उसे लगने लगा था, अगर कली इस घर से गई, तो अब वह जी नहीं पाएगा।
नेहा के बिना तो उसे जीना पड़ा क्योंकि कली सामने थी, लेकिन कली के जाने के बाद अब कोई कारण नहीं बचेगा उसके जिंदा रहने का।
बस ऐसे ही खुद को संभालते हुए जैसे तैसे वह आगे बढ़ रहा था, लेकिन आज अपने ही घर के दरवाजे पर खड़ी बांसुरी को देखकर उसकी सारी कायनात जैसे पलट कर रह गई थी।
वासुकी अपनी सीट से उठकर खिड़की पर चला आया। बांसुरी कली के साथ धीरे-धीरे उसके घर की सीढ़ियां चढ़ती हुई उसके बंगले के दरवाजे तक चली आई थी। खिड़की से वह सामने खड़ी बांसुरी को देख पा रहा था। वह मुड़ा, उसने दर्श की तरफ देखा, उसकी लाल गहरी आंखें देख कर दर्श सब समझ गया..
“तुम रुको, मैं देखता हूं।”
दर्श कमरे से बाहर निकल गया, और वासुकी सोफे पर ढह गया। उसने आंखें बंद कर ली।
ऐसा लग रहा था उसे बड़ी मुश्किल से सांस आ रही है। उसका शरीर कांप रहा था ।एक साढे छह फुट का महा मानव इतने पिद्दी से कलेजे वाला होगा यह कौन जानता था…?
पूरी दुनिया को अपनी बंदूक की नोक पर रखने वाला यह भूतनाथ एक औरत से ऐसे हार जाएगा, अपनी मैडम जी को देखकर उतनी ही श्रद्धा से, उतनी ही आस्था से, नतमस्तक हो गया था, जितना 20 साल पहले था।
यही तो अंतर था सामान्य लोगों के प्रेम और वासुकी के प्रेम में।
उसका प्रेम उम्र और समय का अनुयाई नहीं था। उसके प्रेम में संघर्षों से निखार आता था, समय के साथ उसका प्रेम कम होने की जगह बढ़ता चला गया था…।
बांसुरी के लिए उसके मन में जो प्रेम था, उसमे श्रद्धा का अंश अधिक था, वासना से रहित बिलकुल दैवीय प्रेम। जैसा कोई इंसान अपने आराध्य से करता है।
और इसलिए उसे पाने की इच्छा भी वासुकी में नहीं थी..।
लेकिन नेहा से जो प्रेम हुआ था, वो एक प्रतिदान था। नेहा के प्रेम से उपजा प्रतिफल था, इसलिए उसकी भी जड़े गहरी थी..
नेहा के प्रति उसने जो अन्याय किया था, वो उस प्रेम के साथ मिल कर एक ऐसी पीड़ादायक अनुभूति बन कर टीसने लगा था जिसने वासुकी को आपादमस्तक बदल दिया था…..।
अगर आज भी कहीं से नेहा चली आये तो उसके बदले वो अपना पूरा साम्राज्य लुटा देगा !
वासुकी अपने विचारो में गुम था, उसने सामने दराज़ से अपनी डायरी निकाली, हवा से उसके पन्ने फड़फड़ाये और सामने लिखी कुछ पंक्तियाँ उसकी आँखों के आगे नाचने लगी..
तुझे मै याद करता हूँ,
हाँ अक्सर याद करता हूँ..!!
कहीं कोई दुपट्टा हौले से
जब यूँ फहरता है …
कोई भंवरा यूँ ही फूलों से,
होकर जब टहलता है …
कोई भीनी सी खुशबु साँस में,
जब जब महकती है ….
कहीं मद्धम सी लौ जब बुझ के,
धीरे से मचलती है …..
कोई ख्वाहिश दिलो में जब कभी,
चुपके से चलती है ….
के जैसे ये धरा उस आसमा से,
आके मिलती है..
कहीं कोने में आकर मै खड़ा, चुप सोचा करता हूँ
की ऐसा क्या है तुझमे जो, तुझे मैं याद करता हूँ…
हाँ अक्सर याद करता हूँ, तुझे मै याद करता हूँ…
कि जब डोली कोई आंगन,
उतरते देखा करता हूँ ….
नयी खनखन वो कंगन की,
कहीं सुन कर तरसता हूँ …
वो गीली मेहंदी की खुशबु,
वो ज़ुल्फ़ों का झटक जाना ….
वो तेरा बेसबब सा रुठ कर,
यूं ही मटक जाना….
याद आता है मुझको,
तेरी बातों का वो रेला …
सुहाने दिन थे सारे और
सुहानी रातों का मेला.. ..
कि अब जाने कहाँ किस ठौर
जाकर तू है बस गयी ….
मेरी नींदे मेरा सारा सुकूं भी
संग ले गयी…
कि सोचा करता हूँ इससे तो,
मै तुझसे नही मिलता….
फिर लगता है कि ऐसे में कहां मैं
खुद से भी मिलता…..
उन बातों में, उन यादो में, मै जीवन खोजा करता हूँ ..
हाँ अक्सर याद करता हूँ, तुझे मै याद करता हूँ….
क्रमशः

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫
Nice
Vasuki kaise samne aayega 😓😓.uski bhawnaon ko khud uske liye rok pana muskil hai
आज का भाग पढ़ते पढ़ते नेहा की वो शरारते आँखों के आगे घूमने लगी कैसे वासुकी के आगे पीछे घूमती रहती थी और वाकई उस लड़की ने बड़ी शिद्दत से प्रेम किया था वासुकी को पर वासुकी को जबतक समझ आता नेहा उसे छोड़कर बहुत दूर चली गई।
बांसुरी ने भी नेहा का बलिदान समझा था इसलिये तो नन्ही कली के लिए महल छोड़ दिया पर मासी माँ से उसकी कली अलग हो गई पर इंसान से ज्यादा ईश्वर की योजनाए बेहतर होती है और देखो कैसे फिर सब मिल रहे एक दूसरे से। बेशक आज वासुकी.. बांसुरी से ना मिले पर नियति का चक्कर चल चुका है उसे बांसुरी के सामने आना ही आना है आज नहीं तो कल।
बेहद खूबसूरत कविता और भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।
Basuki jab tak Bansuri se nahi milega use pata nahi chal payega ki Neha jivit hai aur Raha aur Bansuri ke sath hai
Bahut badhiya part 👌,kali aur Rani sa ye shaurya ko pehchan jati to achha lagta,baki shaurya ka pata anir ko to hona chahiye..
Superb part.❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
👌👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏👏👏
Nice part