जीवनसाथी-3 भाग -147

जीवनसाथी -3 भाग -147


   कली राजा और बांसुरी के सामने सकुचाई सी खड़ी थी, उसकी समझ से परे था कि क्या बोले क्या नहीं ?
लेकिन बांसुरी उसे यहाँ देख कर खुश हुई..।

“मालूम तो था कि तुम यहाँ रहती हो, लेकिन ऐसे मुलाकात हो जाएगी, ये सोचा न था !”

कली सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी.. उसके लिए आज भी ये दो चेहरे किसी सेलेब्रेटी से कम नहीं थे..।
वो अपनी बढ़ी हुई धड़कनो को संतुलित करने के प्रयास मे थी कि राजा साहब बोल पड़े..

” अगर आपको दिक़्क़त न हो तो, आप सब चलिए हमारे साथ डिनर के लिए !”

राजा साहब की बात टालनी उसके लिए मुश्किल थी, लेकिन अपने पिता की इजाजत लेना उससे भी मुश्किल था..।


” मुझे पहले घर पर बताना होगा !”



कली के मासूम जवाब पर बांसुरी हल्के से मुस्कुरा उठी…



“हाँ हाँ क्यों नहीं, तुम अपने घर पर बात कर लो, या फिर अपनी माँ से मेरी बात करवा दो !”


कली संकुचित हो गयी..



“माँ नहीं हैं ! एक मौसी है सरु, लेकिन वो तो मुझसे भी ज़्यादा ड़रपोक है !”

कली की बात पर बांसुरी और राजा दोनों ही जरा गंभीर से हो गए…

“सॉरी मुझे नहीं पता था, कि तुम्हारी माँ..


“कोई बात नहीं, आप परेशान न हो.. मेरी मौसी भी माँ जैसी ही हैं,  लेकिन बताया न वो मुझसे भी ज़्यादा ड़रपोक है !”

बांसुरी उसकी बात सुन कर हंस पड़ी..


“कौन है वो हिटलर, जिससे हमारी छोटी सी कली डरी सहमी बैठी है !”


“नहीं डैडा हिटलर नहीं है, असल मे तो वो कुछ कहते ही नहीं, ज्यादातर तो खामोश ही रहते हैं। लेकिन उनकी ख़ामोशी ही इतनी वजनदार होती है कि हम सब उनसे डर कर रहते हैं.. ।
उन्हें हर काम अनुशासन में पसंद है.. और अगर कुछ भी अपनी परिपाटी से बिगड़ा तो नाराज हो जायेंगे ऐसा हमे लगता है !”

“कभी नाराज हुए हैं तुम पर ?”

“नहीं, मुझ पर तो कभी नहीं हुए। लेकिन कभी नाराज न हो जाये ये डर भी तो है !”



बांसुरी हल्के से मुस्कुरा उठी..



“लाओ बात करवाओ, तुम्हारे डैडा से हमारे साहब बात कर लेंगे !”


“नहीं नहीं.. सिर्फ डिनर के लिए वो मना नहीं करेंगे, चलिए चलते हैं !”..


“आर यू श्योर ?”


“जी !”..


राजा और बांसुरी के साथ कली और निशा आगे बढ़ गए, उनकी तीसरी सहेली को घर जाना था, सो वो निकल गयी..।


रास्ते भर कली का दिल तेज़ी से धड़कता रहा।
आज जाने कितने दिनों के बाद वो शौर्य से मिलने वाली थी..


क्या कहेगी उससे ? क्या पूछेगी ? सबसे बड़ी बात कैसे देख पायेगी इतने दिनों बाद, इतने लोगो के बीच..।
उसने तो पलट कर उसकी सुधि ली नहीं, वो ही अकेली मरी जा रही उसके लिए।


हुंह भाड़ में जाये..!
उसे भी क्या लेना देना..। तनी खड़ी रहेगी..
अगर उसने कुछ पूछा तो सामान्य जवाब दे देगी, अगर नहीं पूछा तो वो भी ऐसे नजरअंदाज कर देगी, जैसे उसे जानती ही नहीं।


प्रिंस होगा अपनी रियासत का, लेकिन उससे इतनी अकड़बाजी दिखाने का क्या तुक..?

जाने कब से उसे फ़ोन नहीं किया..।
उसके किये फ़ोन उठाये नहीं, मेसेज देखे तक नहीं।
इतनी क्या नाराज़गी.. डैडा ने ऐसा भी क्या बोल दिया जो अचानक ऐसे रुठ गया..?

बताने की ज़रूरत तक नहीं समझी !


मन ही मन कुढ़ती बैठी कली अब तक शौर्य के साथ हुई दुर्घटना के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी !
वो लंदन था। शौर्य भले ही प्रिंस हो, लेकिन लंदन के लिए वो एक साधारण सा भारतीय युवक था। इसलिए उसके साथ हुई भीषण दुर्घटना भी वहाँ के अखबारों का हिस्सा नहीं बन पायी थी।

कुछ देर में ही शौर्य का घर आ गया..।


बाहर की ऊंची ऊंची दीवारों और ऊँचे काले से गेट के कारण बाहरी लोगो को अंदर का नजारा नजर नहीं आता था..।


गेट के ऊपर एक स्कैनर था, जो घर की गाड़ियों के नंबर और अंदर बैठे लोगो को स्कैन कर के ऑटोमेटिक तरीके से गेट को खोल देता था..।

गेट के अंदरूनी तरफ एक छोटा सा कॉटेज था, जहाँ गार्ड बैठा सबकुछ अपनी स्क्रीन पर देख सकता था..।


गाड़ी के अंदर आते ही, वो अपने केबिन से बाहर आया और एक झटके से तन कर खड़ा हुआ और गाड़ी में बैठे लोगो को सैल्यूट ठोंक गया..।

कली के साथ बैठी निशा भी एक अच्छे परिवार से थी.. उसके पिता वहाँ की पार्लियामेंट में मंत्री थे, लेकिन ये नजारा उसके लिए अद्भुत था !


“वाह! कली, सच कहूं जब ये अकड़बाज फिरंगी किसी इंडियन को सैल्यूट मारते हैं न कसम से मज़ा आ जाता हैं !”

निशा का परिवार लंदन का रहने वाला नहीं था..।
उसके पिता ज़रूर बीस बाईस साल पहले लंदन चले आये थे, लेकिन उसकी पैदाइश, प्रारम्भिक पढाई लिखाई सब उत्तरप्रदेश के बरेली में हुई थी…।


संयुक्त परिवार की चक्की में पिसती उसकी माँ जब अपने जीवन से थक गयी, तब उन्होंने अपने साल में एक बार बरेली आकर अपने कर्तव्यों की इति कर लेने वाले पति के सामने अनशन कर दिया की अब या तो वो उसे और उसकी लड़की को साथ के जाये, या वो अन्न जल त्याग कर यही देह त्याग देंगी..।


अकड़बाज बलवंत सिंह को अपनी पत्नी की बात माननी पड़ी..।


उसे अपनी पत्नी में कोई विशेष गुण नजर नहीं आता था। उसकी पत्नी बरेली के घर के रसोई से उठते धुँए में लिपटी,  सुस्वादिष्ट थाली पकड़ी तो उसे सुघड़ लगती थी, लेकिन अपने लंदन के पार्लियामेंट्री मित्रों मित्राणियों के सामने उसके सुलटे पल्ले और अठन्नी बराबर टिकुली लगायी पत्नी का परिचय देना उसके लिए आसान नहीं था।

और बस इसीलिए वो इतने सालों से निर्विघ्न अपना दोहरा जीवन जी रहा था।


पत्नी की कमी पूरी करने के लिए उस शहर में उसके पास कमी नहीं थी, लेकिन इस मामले में वो अपनी आन का था..।

आज तक दोस्ती भले ही की हो, जान पहचान के परिवार उसके घर आते जाते भी थे। जिनमे उसके मित्र और मित्र पत्नियों की संख्या भी बहुत थी, लेकिन उसके शयनकक्ष की परिधि लाँघ सके इतनी स्वतंत्रता उसने अपनी किसी महिला मित्र को नहीं दी थी।

इसलिए जब उसकी पत्नी साथ आने के लिए अड़ गई, तब थोड़ी ना नुकुर के बाद वो भी मान गया..
उस समय निशा उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला से दंसवी पास कर चुकी थी।


उसके लिए लंदन के स्कूल में पढाई उतनी ही दुरूह थी, जितनी किसी उत्तर भारतीय के लिए दक्षिण के किसी गांव में खुद को स्थापित करना।
और वहाँ उसकी टेबल में उसकी साथिन बनी कली !



कली ने बाकी बच्चों की तरह निशा को उसके तेल सने चपटे बालों के लिए चिढ़ाया नहीं, और न ही उसके कुर्ते पर पिन से सधे दुपट्टे को लेकर उसका मखौल उड़ाया..। बल्कि बाकी बच्चों के चिढ़ाने पर वो सबको डपट कर निशा के आंसू पोंछने लगी..
और यही से शुरुआत हुई कली और निशा की दोस्ती की। जिसमे एक एक कर बाकी लोग भी शामिल होते चले गए.।
डेरिक ही वो दूसरा व्यक्ति था, जिसे निशा के परिधान या हिंदी बोलने से आपत्ति नहीं थी..।


कली और डेरिक ने बड़े संयम से निशा को सीखा पढ़ा कर उसकी कायापलट कर दी, और दो ही साल में निशा फर्राटेदार अंग्रेजी के साथ ही स्पेनिश भी सिख गयी…

अब वो जगह देख कर बातें करने लगी थी लेकिन आज भी कली के साथ वो बिलकुल बेतकल्लुफ हो उठती थी। और बहुत बार जब कुछ उसके एकदम मनपसंद हो तब उसकी खड़ी बोली स्वतः उसके मुहं से निकल पड़ती थी..

आज भी राजा साहब का टशन उसे बड़े उत्साह से भर गया..।

“मानना पड़ेगा कली, तेरे प्रिंस के जलवे हैं… इन लोगो ने सारे ही नौकर अंग्रेज ही रखें हैं !”

बगीचे में फूलो को पानी देते माली और एक तरफ नौजूद डॉग हाउस की सफाई करते आदमी को देख निशा चहक उठी..

“तू जरा कम उत्साह दिखा, वो लोग तेरी बात सुन न ले !”

लम्बी सी लिमोजिन में एक तरफ राजा और बांसुरी बैठे थे और उनके सामने की तरफ कली और निशा..
निशा बहुत धीमे से कली के कान में फुसफुसा रही थी। लेकिन सामने बैठे उस शाही जोड़े के सामने ऐसे कानाफूसी कली को अच्छी नहीं लग रही थी।
जल्दी ही गाड़ी पोर्टिको में जाकर खड़ी हो गयी..।


सीढ़ियों के पास काले रंग के सूट में खड़ा दरबान दौड़ कर गाड़ी का दरवाजा खोलने आ गया।


निशा ने मुस्कुरा कर कली को कुहनी मार दी..
वो सारे लोग नीचे उतर गए..


सीढ़ियों से ऊपर चढ़ कर घर था।

लेकिन बगीचे में एक तरफ बहुत सुंदर और बड़ा सा कॉटेज दिख रहा था..
निशा से रहा नहीं गया..

“रानी साहेब.. वो क्या हैं ?”

वो पूछ बैठी..

“वो किचन हैं !” बांसुरी ने मुस्कुरा कर कहा..

“ओह्ह.. किचन घर के अंदर नहीं हैं ! हमारे यहाँ तो किचन घर में ही हैं.. और उसके सामने क्या आप लोगो ने प्लांटेशन किया हैं ?”

“हाँ ! ये हमारे इण्डिया वाले महल में भी हैं..।
किचन से लग कर मौसमी सब्जियों का प्लांटेशन कर दिया जाता हैं।
हमारे यहाँ बड़ी रानी साहेब यानि रूपा भाभी को घर में उगी ताज़ी सब्जियां ही पसंद आती हैं..।
तो बस जहाँ भी हमारे घर बनते हैं, वहाँ गार्डन में किचन अलग से बनायीं जाती है, और उसके साथ ही किचन गार्डन भी !”

“वॉव… ये तो बड़ा बढ़िया तरीका हैं..।
आपको पता हैं, हम पहली बार किसी राजा साहब के बंगले में जा रहे हैं..
इसके पहले जाने कितनी बार प्रिंस से मिल चुके हैं, लेकिन उनके एटिट्यूड से कभी लगा ही नहीं कि वो राजकुमार हैं..।
वैसे आप दोनों भी बहुत डाउन तो अर्थ हैं.. !”

बांसुरी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गयी..
कली निशा का हाथ दबा कर उसे जरा चुप रहने का इशारा कर उसे साथ लिए आगे बढ़ गयी..

क्रमशः

   कली राजा और बांसुरी के सामने सकुचाई सी खड़ी थी, उसकी समझ से परे था कि क्या बोले क्या नहीं ?
लेकिन बांसुरी उसे यहाँ देख कर खुश हुई..।

“मालूम तो था कि तुम यहाँ रहती हो, लेकिन ऐसे मुलाकात हो जाएगी, ये सोचा न था !”

कली सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी.. उसके लिए आज भी ये दो चेहरे किसी सेलेब्रेटी से कम नहीं थे..।
वो अपनी बढ़ी हुई धड़कनो को संतुलित करने के प्रयास मे थी कि राजा साहब बोल पड़े..

” अगर आपको दिक़्क़त न हो तो, आप सब चलिए हमारे साथ डिनर के लिए !”

राजा साहब की बात टालनी उसके लिए मुश्किल थी, लेकिन अपने पिता की इजाजत लेना उससे भी मुश्किल था..।

” मुझे पहले घर पर बताना होगा !”

कली के मासूम जवाब पर बांसुरी हल्के से मुस्कुरा उठी…

“हाँ हाँ क्यों नहीं, तुम अपने घर पर बात कर लो, या फिर अपनी माँ से मेरी बात करवा दो !”

कली संकुचित हो गयी..

“माँ नहीं हैं ! एक मौसी है सरु, लेकिन वो तो मुझसे भी ज़्यादा ड़रपोक है !”

कली की बात पर बांसुरी और राजा दोनों ही जरा गंभीर से हो गए…

“सॉरी मुझे नहीं पता था, कि तुम्हारी माँ..

“कोई बात नहीं, आप परेशान न हो.. मेरी मौसी भी माँ जैसी ही हैं,  लेकिन बताया न वो मुझसे भी ज़्यादा ड़रपोक है !”

बांसुरी उसकी बात सुन कर हंस पड़ी..

“कौन है वो हिटलर, जिससे हमारी छोटी सी कली डरी सहमी बैठी है !”

“नहीं डैडा हिटलर नहीं है, असल मे तो वो कुछ कहते ही नहीं, ज्यादातर तो खामोश ही रहते हैं। लेकिन उनकी ख़ामोशी ही इतनी वजनदार होती है कि हम सब उनसे डर कर रहते हैं.. ।
उन्हें हर काम अनुशासन में पसंद है.. और अगर कुछ भी अपनी परिपाटी से बिगड़ा तो नाराज हो जायेंगे ऐसा हमे लगता है !”

“कभी नाराज हुए हैं तुम पर ?”

“नहीं, मुझ पर तो कभी नहीं हुए। लेकिन कभी नाराज न हो जाये ये डर भी तो है !”

बांसुरी हल्के से मुस्कुरा उठी..

“लाओ बात करवाओ, तुम्हारे डैडा से हमारे साहब बात कर लेंगे !”

“नहीं नहीं.. सिर्फ डिनर के लिए वो मना नहीं करेंगे, चलिए चलते हैं !”..

“आर यू श्योर ?”

“जी !”..

राजा और बांसुरी के साथ कली और निशा आगे बढ़ गए, उनकी तीसरी सहेली को घर जाना था, सो वो निकल गयी..।

रास्ते भर कली का दिल तेज़ी से धड़कता रहा।
आज जाने कितने दिनों के बाद वो शौर्य से मिलने वाली थी..

क्या कहेगी उससे ? क्या पूछेगी ? सबसे बड़ी बात कैसे देख पायेगी इतने दिनों बाद, इतने लोगो के बीच..।
उसने तो पलट कर उसकी सुधि ली नहीं, वो ही अकेली मरी जा रही उसके लिए।

हुंह भाड़ में जाये..!
उसे भी क्या लेना देना..। तनी खड़ी रहेगी..
अगर उसने कुछ पूछा तो सामान्य जवाब दे देगी, अगर नहीं पूछा तो वो भी ऐसे नजरअंदाज कर देगी, जैसे उसे जानती ही नहीं।

प्रिंस होगा अपनी रियासत का, लेकिन उससे इतनी अकड़बाजी दिखाने का क्या तुक..?

जाने कब से उसे फ़ोन नहीं किया..।
उसके किये फ़ोन उठाये नहीं, मेसेज देखे तक नहीं।
इतनी क्या नाराज़गी.. डैडा ने ऐसा भी क्या बोल दिया जो अचानक ऐसे रुठ गया..?

बताने की ज़रूरत तक नहीं समझी !

मन ही मन कुढ़ती बैठी कली अब तक शौर्य के साथ हुई दुर्घटना के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी !
वो लंदन था। शौर्य भले ही प्रिंस हो, लेकिन लंदन के लिए वो एक साधारण सा भारतीय युवक था। इसलिए उसके साथ हुई भीषण दुर्घटना भी वहाँ के अखबारों का हिस्सा नहीं बन पायी थी।

कुछ देर में ही शौर्य का घर आ गया..।

बाहर की ऊंची ऊंची दीवारों और ऊँचे काले से गेट के कारण बाहरी लोगो को अंदर का नजारा नजर नहीं आता था..।

गेट के ऊपर एक स्कैनर था, जो घर की गाड़ियों के नंबर और अंदर बैठे लोगो को स्कैन कर के ऑटोमेटिक तरीके से गेट को खोल देता था..।

गेट के अंदरूनी तरफ एक छोटा सा कॉटेज था, जहाँ गार्ड बैठा सबकुछ अपनी स्क्रीन पर देख सकता था..।

गाड़ी के अंदर आते ही, वो अपने केबिन से बाहर आया और एक झटके से तन कर खड़ा हुआ और गाड़ी में बैठे लोगो को सैल्यूट ठोंक गया..।

कली के साथ बैठी निशा भी एक अच्छे परिवार से थी.. उसके पिता वहाँ की पार्लियामेंट में मंत्री थे, लेकिन ये नजारा उसके लिए अद्भुत था !

“वाह! कली, सच कहूं जब ये अकड़बाज फिरंगी किसी इंडियन को सैल्यूट मारते हैं न कसम से मज़ा आ जाता हैं !”

निशा का परिवार लंदन का रहने वाला नहीं था..।
उसके पिता ज़रूर बीस बाईस साल पहले लंदन चले आये थे, लेकिन उसकी पैदाइश, प्रारम्भिक पढाई लिखाई सब उत्तरप्रदेश के बरेली में हुई थी…।

संयुक्त परिवार की चक्की में पिसती उसकी माँ जब अपने जीवन से थक गयी, तब उन्होंने अपने साल में एक बार बरेली आकर अपने कर्तव्यों की इति कर लेने वाले पति के सामने अनशन कर दिया की अब या तो वो उसे और उसकी लड़की को साथ के जाये, या वो अन्न जल त्याग कर यही देह त्याग देंगी..।

अकड़बाज बलवंत सिंह को अपनी पत्नी की बात माननी पड़ी..।

उसे अपनी पत्नी में कोई विशेष गुण नजर नहीं आता था। उसकी पत्नी बरेली के घर के रसोई से उठते धुँए में लिपटी,  सुस्वादिष्ट थाली पकड़ी तो उसे सुघड़ लगती थी, लेकिन अपने लंदन के पार्लियामेंट्री मित्रों मित्राणियों के सामने उसके सुलटे पल्ले और अठन्नी बराबर टिकुली लगायी पत्नी का परिचय देना उसके लिए आसान नहीं था।

और बस इसीलिए वो इतने सालों से निर्विघ्न अपना दोहरा जीवन जी रहा था।

पत्नी की कमी पूरी करने के लिए उस शहर में उसके पास कमी नहीं थी, लेकिन इस मामले में वो अपनी आन का था..।

आज तक दोस्ती भले ही की हो, जान पहचान के परिवार उसके घर आते जाते भी थे। जिनमे उसके मित्र और मित्र पत्नियों की संख्या भी बहुत थी, लेकिन उसके शयनकक्ष की परिधि लाँघ सके इतनी स्वतंत्रता उसने अपनी किसी महिला मित्र को नहीं दी थी।

इसलिए जब उसकी पत्नी साथ आने के लिए अड़ गई, तब थोड़ी ना नुकुर के बाद वो भी मान गया..
उस समय निशा उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला से दंसवी पास कर चुकी थी।

उसके लिए लंदन के स्कूल में पढाई उतनी ही दुरूह थी, जितनी किसी उत्तर भारतीय के लिए दक्षिण के किसी गांव में खुद को स्थापित करना।
और वहाँ उसकी टेबल में उसकी साथिन बनी कली !

कली ने बाकी बच्चों की तरह निशा को उसके तेल सने चपटे बालों के लिए चिढ़ाया नहीं, और न ही उसके कुर्ते पर पिन से सधे दुपट्टे को लेकर उसका मखौल उड़ाया..। बल्कि बाकी बच्चों के चिढ़ाने पर वो सबको डपट कर निशा के आंसू पोंछने लगी..
और यही से शुरुआत हुई कली और निशा की दोस्ती की। जिसमे एक एक कर बाकी लोग भी शामिल होते चले गए.।
डेरिक ही वो दूसरा व्यक्ति था, जिसे निशा के परिधान या हिंदी बोलने से आपत्ति नहीं थी..।

कली और डेरिक ने बड़े संयम से निशा को सीखा पढ़ा कर उसकी कायापलट कर दी, और दो ही साल में निशा फर्राटेदार अंग्रेजी के साथ ही स्पेनिश भी सिख गयी…

अब वो जगह देख कर बातें करने लगी थी लेकिन आज भी कली के साथ वो बिलकुल बेतकल्लुफ हो उठती थी। और बहुत बार जब कुछ उसके एकदम मनपसंद हो तब उसकी खड़ी बोली स्वतः उसके मुहं से निकल पड़ती थी..

आज भी राजा साहब का टशन उसे बड़े उत्साह से भर गया..।

“मानना पड़ेगा कली, तेरे प्रिंस के जलवे हैं… इन लोगो ने सारे ही नौकर अंग्रेज ही रखें हैं !”

बगीचे में फूलो को पानी देते माली और एक तरफ नौजूद डॉग हाउस की सफाई करते आदमी को देख निशा चहक उठी..

“तू जरा कम उत्साह दिखा, वो लोग तेरी बात सुन न ले !”

लम्बी सी लिमोजिन में एक तरफ राजा और बांसुरी बैठे थे और उनके सामने की तरफ कली और निशा..
निशा बहुत धीमे से कली के कान में फुसफुसा रही थी। लेकिन सामने बैठे उस शाही जोड़े के सामने ऐसे कानाफूसी कली को अच्छी नहीं लग रही थी।
जल्दी ही गाड़ी पोर्टिको में जाकर खड़ी हो गयी..।

सीढ़ियों के पास काले रंग के सूट में खड़ा दरबान दौड़ कर गाड़ी का दरवाजा खोलने आ गया।

निशा ने मुस्कुरा कर कली को कुहनी मार दी..
वो सारे लोग नीचे उतर गए..

सीढ़ियों से ऊपर चढ़ कर घर था।

लेकिन बगीचे में एक तरफ बहुत सुंदर और बड़ा सा कॉटेज दिख रहा था..
निशा से रहा नहीं गया..

“रानी साहेब.. वो क्या हैं ?”

वो पूछ बैठी..

“वो किचन हैं !” बांसुरी ने मुस्कुरा कर कहा..

“ओह्ह.. किचन घर के अंदर नहीं हैं ! हमारे यहाँ तो किचन घर में ही हैं.. और उसके सामने क्या आप लोगो ने प्लांटेशन किया हैं ?”

“हाँ ! ये हमारे इण्डिया वाले महल में भी हैं..।
किचन से लग कर मौसमी सब्जियों का प्लांटेशन कर दिया जाता हैं।
हमारे यहाँ बड़ी रानी साहेब यानि रूपा भाभी को घर में उगी ताज़ी सब्जियां ही पसंद आती हैं..।
तो बस जहाँ भी हमारे घर बनते हैं, वहाँ गार्डन में किचन अलग से बनायीं जाती है, और उसके साथ ही किचन गार्डन भी !”

“वॉव… ये तो बड़ा बढ़िया तरीका हैं..।
आपको पता हैं, हम पहली बार किसी राजा साहब के बंगले में जा रहे हैं..
इसके पहले जाने कितनी बार प्रिंस से मिल चुके हैं, लेकिन उनके एटिट्यूड से कभी लगा ही नहीं कि वो राजकुमार हैं..।
वैसे आप दोनों भी बहुत डाउन तो अर्थ हैं.. !”

बांसुरी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गयी..
कली निशा का हाथ दबा कर उसे जरा चुप रहने का इशारा कर उसे साथ लिए आगे बढ़ गयी..

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Archana Singh
Archana Singh
1 month ago

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Shanu singla
Shanu singla
7 months ago

💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫

Radhika Porwal
Radhika Porwal
8 months ago

Wow superb episode

Manu Verma
Manu Verma
8 months ago

लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️🤗❤️❤️❤️❤️❤️❤️🤗🤗🤗🤗❤️❤️🤗🤗❤️❤️❤️❤️❤️🥳🥳🥳

Kalpana
Kalpana
8 months ago

Nice I am waiting for new part

Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
8 months ago

Sharya ki mistry kab khulgi..pata hi nahi kabhi kabhi dil kehta he yahi sharya he..aur kabhi lagta he sharya nahi he… very interesting story 😍 bahut hi badhiya story 😍 eagerly waiting for new part 💓

Seema Kawatra
Seema Kawatra
8 months ago

कभी राजा और वासुकि का आमना सामना होगा
तब कली को पता चलेगा उसका ये नाम बांसुरी का ही दिया हुआ है

Nirmala
Nirmala
8 months ago

Mam ji humsafar saat janmo ka ka link share kijiye please

Pinki Arora
Pinki Arora
8 months ago

Good nice part without adds कम से कम center में नहीं आ रहे

Arjumand khan
Arjumand khan
8 months ago

Koi overlapping nhi
But aparna ji abto prince ka bhed khol dijye
Hamare shourya babu se milna kb hoga