अतिथि-48

अतिथि

अतिथि -48

  आखिर घंटे दो घंटे की औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद पूरा परिवार वहाँ से वापस लौट गया..
पुलिस अधिकारी ने मंजरी का बयान रिकॉर्ड करने के साथ ही लिखित में उसके हस्ताक्षरों के साथ नामजद कर लिया कि आगे जहाँ भी उसकी ज़रूरत हो, उसे आकर अपने इस बयान की पुष्टि करनी होगी..।
  मंजूरी देने के अलावा मंजरी के पास कोई और चारा भी न था..।

वो सभी लोग वहाँ से सीधे सगाई वाले भवन ही पहुंचे..।
   वहाँ के ज्यादातर मेहमान वापस जा चुके थे, जो इक्का दुक्का बचे थे वो भी लौट ही रहे थे.. ।
केदार ने अपने दो तीन मातहत और कुछ खास रिश्तेदारों को वहाँ बता दिया था कि मेहमानों से माफ़ी मांग कर उन्हें विदा कर दे..

उन सभी का मन अभी बहुत ख़राब था…सुलोचना के आंसू नहीं थम रहे थे।
  उसे समझ नहीं आ रहा था कि इन छोटे छोटे बच्चों के मन में कब इतनी खिचड़ी पक गयी..
वहाँ मौजूद हर एक के लिए ये सब कुछ बहुत चौंकाने वाला था..
सब के बैठने के बाद केदार ने ही सबसे पहले सवाल किया..

“ये सब क्या है ? मैं जान सकता हूँ ?”

उन्होंने माधव की तरफ देखते हुए पूछा, माधव जो पूरी दुनिया को अपने बुद्धिकौशल से चुप करवा लेता था अपने माता पिता के सामने गूंगा हो जाता था..
वो चुप बैठा रहा !
केदार ने डिंकी और मंजरी की तरफ देखा..

“तुम दोनों कुछ बोलोगी ?”

डिंकी अब तक सदमे ने थी, उसे लग रहा था किसी तरह वो अपने घर पहुँच जाए !
उसने अपनी माँ का हाथ थाम रखा था !
डिंकी का उड़ा उड़ा सा रंग देख कर केदार को उस पर तरस आने लगा।
बेचारी इतनी छोटी सी उम्र में कहाँ थाने कचहरी के चक्कर में फंस गयी !

“डिंकी तुम घबराओ मत बेटा, अभी हम सब तुमसे कुछ नहीं कहेंगे..! तुम्हारी कोई गलती नहीं है बेटा, तुम्हे झूठा फंसाया गया है !”

केदार की बात पूरी होते ही दबी सी आवाज़ में विनोद बोल पड़ा..

“डिंकी तू जॉब कब से कर रही है? तूने कभी कुछ बताया नहीं बेटा ?”

विनोद ने बहुत धीमी सी आवाज़ में डिंकी की पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा और डिंकी भरभरा कर रो पड़ी..

“आई एम सॉरी पापा.. मैं आप लोगो को बताने ही वाली थी, लेकिन.. !”

डिंकी आगे कुछ कह पाती उसके पहले ही माधव की माँ बोल पड़ी..

“ये तो बहुत गलत किया डिंकी तुमने? अपने माता पिता को बिना बताये नौकरी कर ली..!
   अभी तो तुम्हारी पढाई भी पूरी नहीं हुई, ऐसे ही जिद्दी बच्चे अपने माता पिता का सर झुकने पर मजबूर कर देते हैं !
खैर अब जो हुआ सो हुआ, मैं बस ये कहना चाहती हूँ कि ये सब भूल कर हम लोगो को भी आगे बढ़ जाना चाहिए ! क्यों आपका क्या कहना है उस बारे में ?”

सुलक्षणा ने अपने पति की तरफ देख कर पूछा..
हालाँकि इस सवाल में आदेश ही छिपा था !
केदार ने एक गहरी सी साँस भरी और कहने लगा..

“हाँ तुम सही कह रही हो, मैं भी यही सोच रहा था कि हमें आगे बढ़ना चाहिए !
मैं यही आप सब से कहना चाहता था कि अब मंजरी के ऐसा करने के बाद माधव और मंजरी की सगाई तो सम्भव नहीं है।
  दूसरी बात हम सब को पता भी चल गया है कि माधव मंजरी को नहीं डिंकी को पसंद करता है, तो मेरा प्रस्ताव यही था कि माधव की सगाई क्यों न हम लोग डिंकी से कर दे…?
जैसे ही डिंकी की पढाई पूरी होगी उन दोनों की शादी कर देंगे ?
आप सब की इस बारे में क्या राय है ?”

“नहीं ऐसा कैसे संभव है? आपने अचानक ही फरमान सुना दिया! मंजरी और उसके परिवार से बिना पूछे आप ऐसे कैसे मंजरी और माधव की सगाई तोड़ सकते हैं?”

माधव की मां तुरंत बोल पड़ी। उसने पास बैठी विमला का हाथ पकड़ लिया। केदार इस बात को समझते थे की मंजरी की माँ विमला, उनकी धर्मपत्नी की बचपन की सहेली थी, लेकिन अभी के हालात जैसे बन रहे थे उससे उन्हें साफ समझ में आ गया था कि माधव मंजरी से शादी करने का इच्छुक नहीं है।

“नही मैं अपने विचार थोप नहीं रहा ! मैं किसी पर भी दबाव नहीं डालना चाहता, मैंने तो बस एक बात रखी है, और उस प्रस्ताव पर आप सब की सहमति या  असहमति जानना चाहता हूं।
   क्यों विनोद तुम्हारा क्या कहना है?”

केदार ने अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर सवाल कर दिया।
विनोद और सुलोचना तो अब तक गहरे सदमे में थे। बहुत सारी बातें उन्हें मालूम ही नहीं थी। उन्हें तो आज तक यही लगता आया था कि उनकी छोटी सी गुड़िया अब भी सिर्फ अपनी पढ़ाई और उन दोनों के बीच ही मगन है। उन्हें पता ही नहीं था कि उनकी छोटी सी चिड़िया अब ऊंचे आसमान में उड़ने के लिए तैयार हो चुकी है।
    विनोद कुछ भी कहने सुनने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने सुलोचना की तरफ देखा। सुलोचना का रोना अब बंद हो चुका था, लेकिन वह खुद भी पसोपेश में थी। उसे जितना गुस्सा डिंकी पर आ रहा था, उससे ज्यादा गुस्सा मंजरी पर था।
   उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी सगी बहन विमला की बेटी मंजरी डिंकी को ऐसे फंसाने को तैयार होगी। लेकिन उसके बावजूद वह एकदम से केदार के प्रस्ताव पर सहमति भी नहीं दे पाई।
    सुलोचना ने आंखें पोंछी और माधव की मां की तरफ देखने लगी।

” मुझे तो इस वक्त कुछ समझ में ही नहीं आ रहा, यह सब हो क्या रहा है? केदार भाई साहब आप बात तो ठीक कह रहे हैं, लेकिन इतनी बड़ी बात के लिए हमें सोचने का थोड़ा वक्त चाहिए।”

केदार खुशी से खड़ा हो गया। दोनों हाथ ऊपर उठाकर उसने जैसे घोषणा कर दी ।

“बिल्कुल भाभी जी, आप पूरा वक्त लीजिए। आपकी इकलौती बेटी है, ऐसे कहीं भी थोड़ी ना उसे बहा देंगे। वैसे हमारा बेटा इतना बुरा भी नहीं है कि आपको सोचने के लिए अधिक वक्त लगे। मैं तो यही कहूंगा कि जितनी जल्दी आप लोग सोच विचार कर हमें जवाब दे उतना अच्छा होगा।
    और मैं आप सब से एक बार फिर कहना चाहूंगा कि इन्हे बच्चे समझ कर इनकी भूलों के लिए माफ कर दीजिए।
   विनोद! मैं जानता हूं, तुम्हें आज बहुत बड़ा झटका लगा है। वह आदमी जो आज तक बेईमानी का एक पैसा तक घर नहीं लेकर गया, उसके लिए उसकी बेटी का थाने में कुछ घंटे बैठ जाना ही बहुत बड़ी बात है। लेकिन आज का जमाना हमारे जमाने से बहुत अलग है दोस्त।
    अब हमारे जमाने वाली बदनामियां और रूसवाइयां मायने नहीं रखती।  हमारे समय में जो बातें बहुत बड़ा प्रलय ला सकती थी, उन बातों को आज के बच्चे यूं ही हवा में उड़ा देते हैं। और फिर डिंकी तो बेकसूर थी, यह साबित हो चुका है, उसे जबरदस्ती फंसाया गया था। इसलिए तुमसे और भाभी जी से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि डिंकी को जरा भी डांट मत लगाना। वह खुद बहुत घबराई हुई है।”

केदार ने अपनी बात कहने के बाद मंजरी के माता-पिता की तरफ रुख किया, और उनके सामने भी हाथ जोड़ दिए।

” मैं आप दोनों से भी हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि मंजरी ने जो भी किया, उसके लिए उसे माफ कर दीजिएगा। बच्चों में यह सब बचपना न हो तो वह बच्चे कैसे ?
     मंजरी के मन में जो भी रहा हो, है तो वह भी हमारी बच्ची ही। अगर डिंकी का खत सामने नहीं आता तो हमें मालूम नहीं चलता कि माधव और डिंकी एक दूसरे को पसंद भी करते हैं। और अगर ऐसा नहीं होता तो मैं आज वापस आप लोगों से हाथ जोड़कर मंजरी माधव की सगाई की ही बात करता। लेकिन मैं जान चुका हूं कि माधव के मन में कोई और है, तब ऐसे में उसकी बिना मर्जी के मंजरी से उसकी शादी कर देना, मंजरी के साथ नाइंसाफी होगी।
    मंजरी, बेटा तुम भी अपना अच्छा बुरा समझती हो, तुम्हारे सामने एक लंबी जिंदगी और एक सुनहरा भविष्य खड़ा है। मैं तुमसे वादा करता हूं कि माधव से भी अच्छा लड़का तुम्हारे लिए ढूंढ कर लाऊंगा।”

केदार ने बड़ी समझदारी से अपनी बात कही और अपनी बात ख़त्म कर दी..

“अब ऐसा करते हैं कि हम सब अपने घर के लिए रवाना होते हैं, बहुत देर भी हो गई है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि पूरे दिन की भाग-दौड़ के बाद अंत भला तो सब भला..।”

थोड़ी बहुत बातचीत के बाद सभी लोग उठकर अपने-अपने घर चले गए। डिंकी अपने घर पहुंचते ही अपने कमरे में चली गई, और उसने दरवाजा बंद कर लिया।
     अपने कमरे में पहुँचते ही उसे वापस सब कुछ याद आ गया और वो सिसक उठी..
    लेकिन इन आंसुओं में भी एक आनंद छिपा था! उसे इतनी बड़ी मुसीबत से निकालने वाला उसका तारणहार बन गया था माधव।
      वह जो इतने दिनों से नहीं कह पा रही थी, आज अपने आप हो गया था। माधव के सामने यह बात खुल गई थी कि वह माधव को पसंद करती है। उसकी लिखी उस चिट्ठी को वहां मौजूद हर किसी ने पढ़ लिया था।
     हालांकि इस बात पर उसे बहुत शर्म आ रही थी, और वह बार-बार चादर में अपना चेहरा छुपा ले रही थी। कितनी बड़ी बेवकूफी की थी उसने, उस चिट्ठी को नष्ट न करके।
   पता नहीं कब मंजरी दी के हाथ में चिट्ठी लग गई। और उन्होंने उसे गलत समझ लिया। इसीलिए तो उन्होंने उसे फंसाने की कोशिश की। मंजरी दी की भी कहां इतनी गलती है? उनकी जगह वह खुद भी होती तो शायद यही करती। लेकिन इस सब के बीच एक बात तो अच्छी हो गई।
   केदार अंकल ने खुद ही आगे बढ़कर माधव और उसकी सगाई का प्रस्ताव रख दिया।
     गहरे बहते आंसुओं के बीच, उसके चेहरे पर मुस्कान चली आई।

      इधर सुलोचना अपने कमरे में आईने के सामने बैठी अपने जुड़े की एक-एक पिन खोलती हुई बड़बड़ाती जा रही थी…

” ऐसे कैसे केदार भाई साहब ने कह दिया कि माधव और डिंकी की सगाई कर देते हैं।”

” क्यों इसमें बुराई क्या है ?तुम्हें माधव पसंद क्यों नहीं है ?”

भरी हुई आंखों से सुलोचना विनोद को देखने लगी।

” क्या आपको सच में नहीं समझ में आता कि मुझे माधव क्यों नहीं पसंद है?”

” अब वह पागल है यह वाला राल अलापना मत शुरू कर देना। वह लड़का तुम्हें कहां से, किस एंगल से पागल लगता है?”

” मैं जानती हूं माधव पागल नहीं है, लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि उसकी मां नहीं चाहती कि हम जैसे मध्यमवर्ग परिवार की लड़की उनके घर की बहु बने।
     केदार भाई साहब का एक स्टेटस है, और उनके स्टेटस से मैच करती लड़की ही सुलोचना भाभी को अपने बेटे के लिए चाहिए।
    क्या आज आपने गौर नहीं किया, केदार भाई साहब और विम्मी दी के परिवार के सामने हमारा परिवार कितना गरीब और असहाय सा नजर आता है! उनके कपड़े और हमारे कपड़ों में कहीं कोई समानता नहीं।
       हम अपनी तरफ से कितना भी खर्च करके डिंकी के लिए कुछ भी कर दें, लेकिन उन लोगों के लिए कुछ भी मायने नहीं रखता।
   सिर्फ सगाई में देने के लिए माधव की मां पंद्रह लाख का सेट लेकर आई थी, मैं तो अपनी डिंकी को शादी के चढ़ाव में भी दो लाख तक का सोना दे दूं, गनीमत है।
    मुझे समझ में आ गया है कि केदार भाई साहब की पत्नी नहीं चाहती कि हमारी डिंकी और माधव की शादी हो।”

” तो यह बात है, यह तुमने पहले क्यों नहीं बताया? हर वक्त माधव की बुराई क्यों करती रही?”

” जिससे डिंकी के मन में माधव के लिए कोई भावना ना आ जाए। लेकिन मैं फेल हो गई। डिंकी और माधव एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं, और अब डिंकी को समझाना बहुत मुश्किल होगा।”

” सुलोचना, जमाना बहुत बदल गया है। हमारी बेटी को माधव के साथ रहना है, और तुमने देखा नहीं, वह कैसे उसकी फिक्र करता है।
    पुलिस थाने में तुमने नोटिस किया, डिंकी को जब हमारे सामने लाया गया  तो उसे कुर्सी नहीं दी गई थी। वह चुपचाप हाथ बांधे खड़ी थी। माधव ने एक बार वहीं मौजूद कांस्टेबल से कुर्सी लाने की अपील की, पर उस कांस्टेबल ने माधव की बात पर ध्यान नहीं दिया। तब माधव में दोबारा उसे कुछ कहे बिना चुपचाप उठकर अपनी कुर्सी ले जाकर डिंकी के पास रख दी।    डिंकी बैठने को तैयार नहीं थी, माधव ने उसके कंधे पड़कर उसे बैठा दिया।
      उस समय मुझे लगा कि हां मुझे वह लड़का मिल गया है, जिसके हाथ में मैं अपनी जीवन भर की पूंजी थमा सकता हूं।
     मेरी बेटी मेरा खजाना है। और उसे मैं ऐसे ही किसी के भी हाथ तो नहीं दे सकता ना।
   सुलोचना, मैं जानता हूं सुलक्षणा भाभी अपने स्टेटस और रूपए पैसे पर बहुत गर्व करती हैं। सच कहूं तो केदार से उन्होंने शादी ही रूपयों की खातिर ही की थी। और उनकी किस्मत थी कि उनसे शादी के बाद केदार की किस्मत चमक गई।
      मुझे मेरी बेटी पर पूरा भरोसा है, डिंकी अपने प्यारे व्यवहार से अपनी होने वाली सास का दिल जीत ही लेगी।”

विनोद की बात सुनकर सुलोचना तड़प कर रह गई।

” चाहती तो मैं भी यही हूं, और जानती भी हूं, लेकिन साथ ही यह भी जानती हूं कि बहू अपनी सास को खुश करने के लिए कितना कुछ कर ले, वह कभी सफल नहीं हो सकती।
   वो कहते हैं ना कि अगर बहू अपनी गर्दन भी काट कर रखेगी तो सास उसमें भी कमियां गिना देगी। वैसा ही कुछ हाल सुलक्षणा जी का है।”
  
” चलो कोई बात नहीं, अभी इतना परेशान मत हो। कल सोचते हैं, क्या करना है..।”

विनोद ने अपनी तरफ की बत्ती बुझाई और चादर गले तक खींच कर आंखें मूंद ली। लेकिन सुलोचना की आंखों से नींद दूर, बहुत दूर थी…।

क्रमशः

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Savita Agarwal
Savita Agarwal
9 months ago

Dinky ke pita bahut khus hai apni beti ke haath Madhav ke haath me denaya ko,Sulocha ji Prashant hai ki Madhav ki ma khush nahi hogi ,waiting for the next part.

Anjali
Anjali
10 months ago

Mam app bich bich me itna gap kyu de dete ho story me phle Pritilipi pr to regular part aate the

Nisha
Nisha
10 months ago

Wo ma hai aur ma ki chinta toh beti ke liye hoti hi hai.madhav bahut hi achha hai par uski ma ke sawbhav se darr lag raha hai .ab toh upar wale ki itchha j ki wo jo karenge achha karenge bas dinki nirdosh sabit ho gyi yahi kafi hai

Savita Agarwal
Savita Agarwal
10 months ago

Bahut hi Khubsurat and Shandaar n Jaberdast part

Vandana Bairagi
Vandana Bairagi
10 months ago

Bahut hi sukun mila😄😄

Aruna
Aruna
10 months ago

👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👏

Shanu singla
Shanu singla
10 months ago

👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻

Geeta Prasad
Geeta Prasad
10 months ago

Behtreen part👌
Khushi ki bt h ki Dinki ko Madhav ne bcha liya or Manjri ki pol patti sabke samne aagyi…
Ye Madhav apne parents k samne bolta kyon nhi h…kb bolega??

Jagruti
Jagruti
10 months ago

Bahut badhiya part,dinki ka Madhav se rista ho jaye to Manjari kuchha to karegi.

Kanchan Choudhary
Kanchan Choudhary
10 months ago

Sulochana sahi samajh gayi Madav ki maa Din ki ko middle class hone ke karan bahu nahi banana chati hai