
मायानगरी -2 भाग -15
सबरवाल परिवार में भी एक नया सूरज उदित हो गया था.. एक रात पहले की मनहूसियत धुल पुंछ कर साफ हो गयी थी.. सुबह से सभी अपने अपने कामों में लग गए थे.. !
और ऐसे ही एक एक कर दिन बीतते चले गए..
पार्टी में पद के प्रत्याशी पूरी तरह चुनाव की तैयारियों में लग चुके थे..
भुवन भी वापस पहले की तरह अपने हित को परे रख कर पार्टी हित के लिए खुद को झोंक बैठा था..
घर में एक तरह से सभी सामान्य हो चले थे…
लेकिन भुवन की माँ आनन्दिनी को अब किसी काम में आनंद नहीं आ रहा था..
भुवन की जगह जिस प्रौढ़ नेता को टिकट दिया गया था उसकी सच्चाई से सारा घर वाकिफ था..।
उनका नाम सज्जन राणा था। वो अपनी युवावस्था से ही राजनीति में सक्रिय था…
उसके पहले उनके पिता विनय सिंह राणा का राजनीति में खूब नाम था, उन्होंने राजनीति में दाम के साथ नाम भी कमाया, उनके बाद उनकी विरासत सज्जन राणा को मिली थी और इसका उसने भरपूर लाभ उठाया था..।
कॉलेज के समय से ही इसके चारित्रिक पतन की शुरुवात हो चुकी थी।
कई लड़कियों को झांसा देकर उसने अपने जाल में फंसाया था।
राजनीति में आने के बाद उसने बहुत सी महिलाओं का अपनी पार्टी में अच्छा पद देने के नाम पर शोषण किया और बाद में उन्हें उठा क़र बाहर फेंक दिया..।
उस वक्त कुछ महिलाओं के अचानक गायब हो जाने पर मिडिया ने जब इस मामले में शोर मचाया, तब ये बात भी सामने आई थी कि सज्जन राणा ने अपना काम निकल जाने के बाद उन्हें मरवा कर कहीं फिंकवा दिया या, अपने देश से बाहर कहीं बेच दिया था।
लेकिन जो भी था, मामला तूल पकडे, उसके पहले पैसे और पहुँच के दम पर अखबारनवीसों का मुहं बंद कर दिया गया था..।
हालाँकि जानकार लोगो का मानना था कि सज्जन के पिता उसकी इन हरकतों पर बेहद नाराज़ थे। और उन्होंने उसे राजनीति और अपनी विरासत से बेदख़ल करने की धमकी भी दी थी।
लेकिन इसके कुछ समय बाद ही नैनीताल से लौटते वक्त उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी और उस गाडी में मौजूद मंत्री जी समेत घर के बाकि सदस्य और ड्राइवर की भी मृत्यु हो गयी थी..।
इसके बाद सज्जन के प्रति लोगो की नाराज़गी उसके प्रति दया में बदल गयी थी।
इतने बड़े हादसे में पूरे परिवार को खोने के बाद सज्जन अकेला ही रह गया था…।
दूर दराज़ के रिश्तेदार उसे संभालने दौड़े चले आये थे, लेकिन उसने सिरे से सबको नकार दिया था..
कहीं न कहीं ये रिश्तेदार भी उसी के जैसे थे, जिन्हे सिर्फ सज्जन की मिलकियत और पैसों का ही लोभ था..
अपने पूरे परिवार को खोने के बाद सज्जन वापस खड़ा हुआ और अपने राजनैतिक कैरियर को उसने वापस शुरू किया था।
उसने उस हादसे में मिली सहानुभूति को अपने लाभ के लिए बखूबी भुनाया और इस तरह पहली बार वो किसी चुनाव को जीतकर मुख्य धारा में शामिल हो गया था।
राजनैतिक परिवार के ही सिसोदिया जो सज्जन के पिता के अभिन्न मित्र थे, ने सज्जन का हर जगह साथ दिया और अपनी बेटी से उसकी शादी करवा दी..।
शादी के बाद वो एकदम से अपनी छवि पारिवारिक दिखाने में लग गया, और इसका उसे फायदा भी मिला।
पार्षद के चुनाव में जीत कर उसने जो सफर शुरू किया था वो महापौर तक पहुंचा और उसके बाद विधायक के पद को भी उसने प्राप्त कर लिया था..।
लेकिन उस सब में उसका सारा जीवन लग गया..
इतने सब के बीच भी सज्जन के अंदर छिपा बैठा दुर्जन पूरी तरह शांत नहीं हुआ..
जब तब महिलाओं के साथ उसका नाम उछाला जाता रहा..।
अलग अलग विभागों में मनमाना पैसा वसूलना, फ़र्ज़ी डिग्री के नाम पर पैसे वसूलने के अलावा कभी नौकरी के नाम पर तो कभी किसी सरकारी योजना के नाम पर उसने खूब रुपया बनाया..।
अपने बेटे बहु को उच्च प्रशासनिक पदों पर बैठाने के आरोपों को भी उसने जड़ से उखाड फेंका..।
इतना सब करते हुए भी जब कभी सबरवाल जी उसे टोकते वो उनके सामने अपना दुखड़ा रोकर किसी न किसी तरह उन्हें अपने खेमे में कर लेता..
लेकिन इस बार उसने सबरवाल की पीठ में छुरा घोंपा था..
उसने साफ तौर पर जब ये महसूस किया कि अब उसे सबरवाल की पार्टी में महत्व नहीं दिया जाएगा, और शायद इस बार विधायक के पद के लिए उसका चुनाव भी नहीं किया जाएगा, तब उसने खुद को पार्टी से बर्खास्त किए जाने के पहले ही विरोधी पार्टी से हाथ मिला लिया था।
विरोधी पार्टी से हाथ मिलाने के साथ ही उसने सबरवाल की पार्टी के कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों को विरोधी पार्टी को भी सौंप दिया था ।
ऐसी महत्वपूर्ण बातें और जानकारियां जो सिर्फ पार्टी के कुछ चुनिंदा दिग्गजों को ही मालूम थी, उन बातों को भी उसने विरोधी पार्टी के समक्ष प्रस्तुत कर दिया था। और इस सब के बारे में भुवन ने सारी जानकारी एकत्र कर अपने बड़े पापा को सौंप दी थी, इसके बावजूद जब सबरवाल जी ने भुवन के नाम की जगह सज्जन राणा के नाम पर मुहर लगाई, तब भुवन की माँ का कलप जाना स्वाभाविक था..।
सज्जन का पारिवारिक जीवन भी कोई बहुत सुखद नहीं था। दुनिया की नजरो में भले ही वो एक भरा पूरा सुखद परिवार नजर आता था, लेकिन भीतरघात बहुत ज़्यादा था।
सज्जन की पत्नी भी अपने पति के लक्षणों से वाकिफ थी.. इतने बुढ़ापे में भी उसकी रंगीनियों में कोई कमी नहीं आई थी..।
अब तक पता नहीं कितनी बार वो पति से लड़ झगड़ कर हरिद्वार के आश्रम रहने जा चुकी थी, लेकिन गृहस्थी का मोह इतनी आसानी से नही छूटता..
नाती पोते बेटे बहु से भरा घर किसे काटता है आखिर? इसीलिए महीना डेढ़ महीना आश्रम में बिता कर वह वापस लौट आया करती थी। लेकिन सही मायने में देखा जाए तो पति से उनकी बोलचाल बंद ही थी।
इस बार भी जब सज्जन को सबरवाल की पार्टी का टिकट मिला तो सज्जन के कार्यकर्ताओं जानने वालों में खुशी की लहर दौड़ गई, एक अकेली उनकी पत्नी ही थी जो इस बात से ज़रा भी खुश नहीं थी..।
इसका एक कारण यह भी था कि सज्जन की पत्नी सरोज और भुवन के माँ आनंदिनी कभी स्कूल के जमाने में एक साथ पढ़ा करती थी। और सिर्फ पढ़ा ही नहीं करती थी, दोनों में अच्छी दोस्ती भी थी। ब्याह होने के बाद दोनों अपने-अपने ससुराल चली आई। यहां भी सज्जन सबरवाल की पार्टी से जुड़ गया और इस तरह आनंदिनी और सरोज की दोस्ती छूटी नहीं बल्कि और प्रगाढ हो गयी…
सरोज के दोनों बेटों का ब्याह हो चुका था, लेकिन उसकी बेटी का ब्याह होना बाकी था, जो अपने भाइयों की तरह ही प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती थी।
और उसके लिए पढ़ाई भी कर रही थी।
सरोज के मन में दबी छिपी सी एक ख्वाहिश थी कि आनंदिनी के बेटे भुवन से अगर उसकी बेटी श्रद्धा की शादी हो जाये तो उसकी और आनंदिनी ने की दोस्ती रिश्तेदारी में बदल जाएगी। सबरवाल परिवार देखा भाला था, और वह उस परिवार को बहुत करीब से जानती थी।
जितना वह परिवार के लोगों की इज्जत करती थी उससे कहीं ज्यादा भुवन उसके दिल दिमाग में रचा बसा था। कहीं ना कहीं उसकी भी भीतरी इच्छा थी कि भुवन को इस बार विधायक का टिकट मिले और वह चाहती थी जैसे ही भुवन को यह टिकट मिलेगा वह आनंदिनी से श्रद्धा के लिए बात कर लेगी।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और उसके पति को वापस टिकट मिल गई इसके बाद उसका मन इस सारे परपंच से उखड़ गया था…।
उसकी आनंदिनी से बात करने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी। अच्छा था कि घर पर श्रद्धा मौजूद नहीं थी। क्योंकि इस पूरे घर में एक मात्र वही लड़की थी जो अपने पिता के काले कारनामों से बेहद दुखी रहती थी। उसके दोनों बड़े भाई अपने पिता के पद के प्रभाव से प्रशासनिक सेवा में आ चुके थे और इसलिए उन्हें अपने पिता के कारनामों से कोई शिकवा या शिकायत न थी। लेकिन श्रद्धा अपने बलबूते कुछ करना चाहती थी, और इसीलिए वह अपने घर परिवार से दूर दूसरे शहर में रहकर पढ़ाई कर रही थी..।
बहुत सोच समझ कर आखिर सरोज ने आनंदिनी को फोन लगा ही दिया..
अपने मोबाइल पर सरोज का नाम देखकर आनंदिनी ने फोन को उल्टा करके रख दिया और दूसरी तरफ मुंह फेर कर बैठ गई।
उसका किसी से बात करने का मन नहीं था।
वह चुपचाप अपने कमरे की खिड़की से बाहर देख रही थी कि तभी दरवाजे पर दस्तक देकर भुवन भीतर चला आया..।
“माँ यहाँ अकेली बैठी क्या कर रही हो? सब तुम्हारा नाश्ते पर नीचे इंतजार कर रहे हैं..।”
“हमें भूख नहीं है भुवन, हम बाद में खाएंगे।”
“यह क्या बात हुई, आप तो बिल्कुल बच्चों जैसी जिद लेकर बैठ गई है मां।”
भुवन अपनी मां के सामने जमीन पर घुटने टेक कर बैठ गया। उसने अपनी मां के दोनों घुटनों पर अपने हाथ रख दिये और अपने हाथ पर अपना माथा टेक कर बैठ गया।
“ऐसा मत करो मां, इतनी नाराजगी ठीक नहीं है। ताऊ जी ने अगर कोई निर्णय लिया है तो सोच समझ कर ही लिया होगा। उन पर विश्वास तो करो।”
” हम नहीं कर सकते, अब हम किसी पर विश्वास नहीं कर सकते। हमें पता चल गया कि यह सारे रिश्ते नाते दोस्त सब मतलब के हैं। एक तरफ तुम्हारे ताऊजी है जो शुरुआत से तुम्हारी सारी मेहनत देख रहे हैं, इसके बावजूद उन्होंने तुम्हें ही तुम्हारी मेहनत का फल नहीं दिया।
मलाई का कटोरा उठाकर उस आदमी के हाथ में थमा दिया।”
” यह वही आदमी है जिसे आज से दस साल पहले जीजा जी जीजा जी कहते थकती नहीं थी आप।
“लेकिन उस समय, इसके कारनामे तो नहीं पता थे ना।”
” आपको सब पता था मां, बावजूद आप अपनी सहेली के पति से सारे रिश्ते निभा रही थी। लेकिन अब जब आपके बेटे की जगह उन्हें टिकट दिया गया तब आपको उनकी सारी बुराइयां नजर आने लगी। लेकिन आज से दस साल पहले जब मैं उनकी प्रतियोगिता में नहीं खड़ा था, तब आपको उनकी किसी बात से कोई शिकायत नहीं थी।”
भुवन की बात सुनकर उसकी मां तड़प कर रह गई। कहीं न कहीं बात सच थी, इसलिए मर्मस्थान पर चोट कर गयी थी..।
भुवन भी अपनी आन का लड़का था। अपनी माँ का दिल भी उसने सिर्फ इसीलिए दुखाया था कि मधुमेह पीड़ित माँ को कुछ खिला कर समय पर दवा दे सके, वरना अपनी माँ के ख़िलाफ़ जाकर वो कुछ कह दे ऐसा उसका स्वभाव ही नहीं था…..।
उसने आलू के पराठे का एक निवाला तोड़ कर अपनी माँ की तरफ बढ़ा दिया और नाराज़गी से मुहं फुलाए बैठी जिद्दी बालिका सी उसकी माँ ने फिर बिना नानुकुर किये निवाला मुहं में ले लिया..।
दवा की गोली और पानी अपनी माँ की तरफ बढ़ा कर भुवन सामने कुर्सी खीँच कर बैठ गया..।
एक एक निवाले अपनी माँ को खिला कर वो बाहर जाने लगा कि उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया..
“किस मिट्टी का बना है रे तू भुवन.. क्या तू सच में सुख दुख से परे हो चला है ?”
अपनी माँ का चेहरा प्यार से अपनी हथेलियॉं में समेट क़र उसने उनके सर पर अपने होंठ रख दिए..
“आज जो भी हूँ तुम्हारे ही कारण हूँ माँ.. मेरा धैर्य मेरा स्वभाव सब कुछ तुम्हारी ही देन है..।”
वो अभी वापस मुड़ने को था कि उसका सबसे खास कार्यकर्ता भागता हुआ वहाँ चला आया..
“भुवन भैया गज़ब हो गया? आपने सुना ?”
“क्या हो गया भोला ?”
“आपको नहीं पता चला क्या ?”
“नहीं.. बता तो सही !”
“सज्जन बाबू कल किसी क्लब गए थे, टिकट मिलने की पार्टी करने.. सुना है रात उन्होंने खूब पी ली.. शायद और भी कुछ नशा किया था!
ओवर डोज़ सा हुआ होगा.. सुबह वो जब लौट रहे थे तब उनकी गाडी संतुलन खो कर पलट गयी…”
“क्या… ऐसा कैसे हो सकता है ? उन्होंने नशा किया भी होगा तो उनका ड्राइवर तो सही सलामत रहा होगा ?”
“पता नहीं, जानकारों से मालूम चला है कि ड्राइवर उनके साथ नहीं था.. उस वक्त गाड़ी में वो अकेले ही मौजूद थे.. ।”
“अरे ये तो गलत हो गया.. चलो उन्हें देखने अस्पताल जाना होगा..।”भुवन तेज़ी से कमरे से बाहर निकलने को हुआ और उसकी माँ होंठों ही होंठों में बुदबुदा उठी
“अच्छा ही हुआ, जैसा बोयेगा वैसा ही काटेगा इंसान..।”
न चाहते हुए भी आनंदिनी के मुहं से ये निकल गया और अपनी माँ को एक नजर देख कर भुवन अस्पताल के लिए निकल गया..।
क्रमशः

सभरवाल जी का सज्जन जैसे दुराचारी को टिकट देने के पीछे कोई सॉलिड रीजन ही होगा
👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏👍
Sach me bhuvan kis mitti ka bana he…ved ko bhi bhuvan k liye bura laga… very interesting story 😍 bahut hi khubsurat part 💓 superb story 😍 eagerly waiting for new part 💓
Sajjan Singh ke sath achha hi hua.nakli chehra liye ghumne wala kamina neta tha wo toh uski yahi gati honi chahiye thi.
भुवन को लीना के लिए ही रखना इस बार🤭
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
Interesting…as always
please ab mayanagri aur jeevansathi 3 ke parts continue dijiye na
kya bhuvan ki jodi shraddhase banegi ya leena se?
bahut dino baad mayanagri ka part aaya, padhkar bahut acha laga, story itni pyari hai ke lambe gap ke baad padhne par bhi sab kuch recall ho jata hai. ek bar aur kahna chahungi🙏 aapne jab atithi start ki thi to aapne kaha tha ki ye story jyada lambi nahi jayegi aur aap ise jaldi khatm kar dengi to mere hisab se please use aur mat latkaiye . wo story bhi bahut pyari hai aap use agar lamba likhengi to bhi bahut acha rahega lekin agar aap agar kam part me khatm karna chahti hai to please use pahle khatm kar dijiye. aur jivansathi ka part bhi chahiye🤗🤗🤗
राजनीति सच में माया नगरी ही है, कब कहां क्या हो जाए नहीं पता, गाड़ी का एक्सीडेंट दुर्घटना है या षडयंत्र ये तो अपर्णा जी की माया है, पर भुवन का संयम सच में उसे उसकी मां से मिला है
nice part👌