जीवनसाथी-3 भाग -130

जीवनसाथी -3 भाग -130

रूपा अपने कमरे में खिड़की से लग कर खड़ी बाहर बिखरती ओस को देख रही थी..
जाने क्यूँ आज उसका मन बड़ा घबरा रहा था..
उसने हर्ष की ज़िद में उसका कहा रिश्ता मान तो लिया था, लेकिन अब रह रह कर जैसे संकेत मिल रहे थे, उसका रूढ़िवादी दिल बैठा जा रहा था..

हर्ष छोटा था, तब से उसने हर्ष के लिए एक ही सपना देखा था, उसके लाड़ले की शादी वो किसी राजकुमारी से करवायेगी।
        लेकिन हर्ष के बड़े होते होते उसका सपना टूटने सा लगा था…
हर्ष का मीठी की तरफ झुकाव हमेशा से ही था, ये वो जानती थी..।
मीठी में ऐसी कोई बुराई भी नहीं थी..
लड़की सुंदर थी, स्वभाव की भी शांत सरल थी।
आज के ज़माने में ऐसी लड़की मिलनी मुश्किल ही थी… हर किसी का लिहाज करती थी..।
उससे तो कुछ ज्यादा ही दबती थी..।

देखा जाये तो एक आदर्श बहु के सारे ही गुण खुद में समेटे थी वो, पर फिर भी उसकी एक कमी उसके हर गुण पर भारी पड़ जाती थी..
की वो किसी राजसी परिवार का रक्त नहीं थी !

हालाँकि अब जैसे तैसे रूपा ने खुद को समझा लिया था, लेकिन मन के किसी कोने में विश्राम करता ये सुखस्वप्न कभी कभी अंगड़ाई लेता किसी जिद्दी बालक सा उसके सम्मुख आ खड़ा होता था, और वो वापस उसे डांट डपट कर अपने हृदय के किसी निभृत एकांत कोने में पटक देती थी..

लेकिन रह रह कर जैसी घटनाये घट रही थी, उससे उसके मन का अशांत हो उठना स्वाभाविक था..।

पहले फूफू साहब के राजगुरु का हर्ष और मीठी की कुंडली पर मंतव्य और फिर एक के बाद एक दुर्घटनाओं का होते चले जाना..।

उस दिन शाम के वक्त जब वो रात के खाने में क्या बनना है, बताने के लिए स्वयं रसोई में पहुँच गयी थी,  तब उसे ऐसे एकाएक रसोई में देख वहाँ उपस्थित परिचारकों में सबसे अच्छा काम कर दिखाने की होड़ सी लग गयी थी..।

रोज़ शाम पांच बजे एक परिचारक क्या बनेगा लिखने के लिए उसकी चाय की टेबल पर स्वयं उपस्थित होता था। लेकिन जाने क्या सोच कर पांच के कुछ पहले ही वो वहाँ चली आई थी..

रसोई में सारे आदेश देकर वो बाहर निकल रही थी कि उसकी नजर रसोई की बाहर की तरफ खुलने वाली खिड़की पर पड़ गई।

खिड़की खुली हुई थी, और बाहर सुबह के बर्तन एक साथ धोने के लिए बड़े से टैंक में रखे थे। उस तरफ बड़ी-बड़ी बर्तन धोने वाली दो मशीने लगी थी।
      जिनमें परिचारक बर्तनों को उस टंकी से निकाल कर जमा देते थे, और फिर बर्तन धुल कर स्टरलाइज होकर निकलते थे…।

लेकिन रूपा की नजर वहीँ टहलती बिल्ली पर चली गयी..।

रूपा लपक कर खिड़की पर पहुँच गयी..
उसने देखा, एक बिल्ली बर्तनो के आसपास लगातार चक्कर लगा रही थी।
  उसके आश्चर्य की सीमा न रही क्यूंकि वो हिस्सा चारों तरफ से बंद था..!
ऊंची ऊंची दीवारों से तीन तरफ से घिरा वो अहाता एक तरफ के बड़े गेट से लगभग सीलबंद सा था.. न बाहर का कोई जीव अंदर आ सकता था न अंदर का कोई जीव बाहर..
फिर ये खानाबदोश सी बिल्ली कहाँ से घूमती बागती यहाँ चली आई थी..
रूपा को बिल्लियों से इतनी चिढ थी कि उसे अपने राजमहल के बगीचों तक में बिल्ली का दिखना गंवारा न था !
आज महल के इस हिस्से में बिल्ली का दिखना कुछ अजीब सी मनोदशा बना गया था उसकी..

उस हिस्से में सिर्फ राजमहल में प्रयोग किये जाने वाले बर्तन बड़ी साफ़ सफाई से रखे और साफ किये जाते थे.. !

रूपा जोर से चीख पड़ी..

“उत्तम.. !, उत्तम कहाँ हो तुम ?”

वहाँ काम करने वाला मुख्य परिचारक जो रूपा के पास ही खड़ा था, फौरन उस तक चला आया..

“जी महारानी सा !”

“ये बिल्ली कैसे अंदर आ गयी !”

कहाँ हुज़ूर !”

उसने झांक कर देखा और बिल्ली को भगाने के लिए लोगो को हांक लगा दी..

“लगता है गलती से दरवाज़ा खुला रह गया रानी सा !”

“ऐसे कैसे, इतनी बड़ी गलती कर दी आप लोगो ने ? अब बिल्ली के जूठे किये बर्तनो में हम लोग खाएंगे ?”

“नहीं हुकुम, अभी सब साफ करवाए देता हूँ !”

“बिलकुल नहीं.. ये सारे बर्तन जो इस वक्त वहाँ फैले है, उन्हें उठा कर फेंक दो.. या किसी ज़रूरतमंद को दे दो। लेकिन अब इन बर्तनो का उपयोग महल के लिए नहीं होगा !”

“जी हुकुम !”

रूपा वहाँ से तमतमाती हुई निकल गयी थी, लेकिन इस बात ने उसे रात भर सोने नहीं दिया था..।

ये कैसा अजूबा घट रहा था…।

सशस्त्र पहरेदारी और ऊंची ऊंची मीनारों की चानमारी  के बीच आखिर ये भूखी बिल्ली कहाँ से टपक पड़ी..? इसका तो यहाँ आने का न कोई सुगम मार्ग था न प्रयोजन !

सोचते सोचते रूपा के सर में दर्द होने लगा था…।

इतने सब के बाद कुलगुरु के आश्रम से लौटते वक्त होने वाली दुर्घटना ने उसे झकझोर कर रख दिया था..।

मन में बार बार एक ही बात सर उठा रही थी कि, कहीं फूफू साहब का कथन सत्य तो नहीं ?
कहीं मीठी के कदम वाकई अशुभ तो नहीं.. ?

वो खिड़की पर खड़ी खड़ी सोच में डूबी थी कि उसी समय एक उल्लू आवाज़ करता हुआ वहाँ से उड़ क़र निकल गया..
वो उल्लू के बोलने की आवाज़ सुन वापस आशंकित हो गयी..

****

   विक्रम तैयार होकर शौर्य का रास्ता देख रहा था, लेकिन शौर्य न जाने कहाँ व्यस्त था..।

शौर्य और विक्रम को भदौरिया के पास पहुंचना था, जहाँ से वो लोग उसके पर्सनल विमान में अकरा के लिए निकलने वाले थे..।
विक्रम नीचे कुछ देर रास्ता देखने के बाद शौर्य को लेने उसके कमरे में पहुँच गया….।

शौर्य के कमरे का दरवाज़ा खुला था..
विक्रम ने हलके से दस्तक दी और दरवाजे को ठेल कर अंदर दाखिल हो गया.. शौर्य की दरवाज़े की तरफ पीठ थी.. ।
वो एक आरामकुर्सी पर अधलेटा सा लेटा हुआ सामने लगी दीवार के कद की टीवी पर खोया सा कुछ देख रहा था..
विक्रम ने पीछे से आवाज़ दी, लेकिन शौर्य का ध्यान नहीं था…
विक्रम ने टीवी की तरफ देखा, उस पर कली की तस्वीरें आ जा रही थी..।

ढेर सारी तस्वीरें, किसी में वो अपनी बालकनी में खड़ी कॉफ़ी पी रही है, तो किसी में चाँद को निहार रही है..। किसी में कॉलेज की केंटीन में अपनी सखियों संग बतिया रही है, तो किसी में लेक्चर बड़े ध्यान से सुन रही है।

किसी तस्वीर में झील किनारे दोस्तों के साथ बैठी होकर भी अकेली सी है, तो किसी में अकेली कहीं बैठी भी किन्ही यादो में खोयी सी है..।

विक्रम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई..

“लिटिल मास्टर.. !” विक्रम ने धीमे से उसके कंधे पर हाथ धर दिया, और शौर्य जैसे किसी दिवास्वप्न से चिहुँक कर जगा..

.”हम्म क्या हुआ ? तुम यहाँ कैसे ?”

“हमे अकरा निकलना है लिटिल मास्टर !”

जानबूझ कर विक्रम ने उसे लिटिल मास्टर बोल कर छेड़ा, वो जानता था आजकल इस शब्द से शौर्य बिदकने लगा था।
इसीलिए उसने जानबूझ कर ये बोला, लेकिन उसे आश्चर्यचकित करता हुआ शौर्य आज बिना कुछ बोले ही एकदम से टीवी बंद कर खड़ा हो गया..

“हम्म चलो.. !”

विक्रम के दिमाग में खलबली सी मची थी..
कुछ तो बहुत गहरा राज़ छिपा था इस राजकुमार के हसीन चेहरे की मुस्कान के पीछे..।

लेकिन वो राज क्या था ?

विक्रम ने खुद ही से ये संकल्प ले लिया कि अब उस राज़ से वो पर्दा हटा कर रहेगा !

शौर्य को साथ लिए विक्रम निकल पड़ा..

वो लोग तेज़ी से गाड़ी भगाते भदौरिया के पास पहुँच गए…

भदौरिया उन्ही लोगो का इंतज़ार कर रहा था,उनके देर से आने के लिए उन्हें आँखों से भस्म करता भदौरिया  उन्हें अपने विमान में बिठा कर रवाना हो गया..

कुछ घंटो में वो लोग अकरा की धरती पर उतरने वाले थे..
सुदूर दक्षिणी अफ्रीका का ये भाग नितांत अकेला और जनविहीन नजर आ रहा था..।

चारों और ऊँचे ऊँचे गहन वृक्षों से घिरा ऊपर से देखने पर किसी बेलीगारद सा गहन अरण्य दिख रहा था, जहाँ की धरती बिलकुल किसी कुंवारी कन्या सी सूर्य स्पर्श से अस्पृश्य धरी रखी थी…

ऐसे गहन अरण्य में भदौरिया किस जन समुदाय का भला करने की मंशा से आया था, ये विषय विचारणीय था… !

शौर्य सोच ही रहा था कि उसे कुछ दूरी पर हवा में उड़ता एक अन्य विमान भी नजर आ गया..

ये भी किसी का व्यक्तिगत विमान सा दिख रहा था, कुछ करीब आने पर विमान में बना नाग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा था…

विक्रम भी झांक कर उसी विमान को देख रहा था..

“अब ये कौन आ गया ?” विक्रम के मुहं से निकल गया..

“मेरा ससुर !” शौर्य ने चुटकी ली और अपने लैपटॉप पर दिखाई देने वाली बेलेंस शीट को बंद कर के मुस्कुराते हुए रख दिया..

क्रमशः  

5 27 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

45 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

अक्सर ऐसा होता है कि जब हमारा मन किसी बात को लेकर असमंजस में होता है तो फिर आसपास होने वाली घटनाओं को भी हम उसी से जोड़ कर देखने लगते हैं और हर चीज में हमें कुछ ना कुछ अजीब लगा ही लगता है ऐसा ही कुछ रूप के साथ हो रहा है क्योंकि अगर उसके दिमाग में मीठी के लिए बुरे विचार नहीं आ रहे होते तो यह साधारण सी होने वाली घटनाएं भी उसे परेशान नहीं करती।
कहीं यह सब छोटी-छोटी बात है मीठी और हर्ष के लिए कोई बड़ी परेशानी ना बन जाए क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा है जैसे रूपा रानी सा इन बातों से परेशान होकर कहीं इन दोनों का रिश्ता ही मना ना कर दें।😔😔😔😔
और इन सब में बुआ जी का भांडा फूटना भी बहुत जरूरी है जब तक सारी बातें सामने नहीं आएंगे रूपा रानी के दिमाग का भ्रम भी कभी खत्म नहीं होगा

Arun Kumar
Arun Kumar
1 year ago

🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
1 year ago

Very interesting story 😍 bahut hi badhiya story 😍

Nisha
Nisha
1 year ago

Vikram ye jaan payega ki sachhayi kya hai ab chinta ho rahi hai mujhe bhi.rupa ka man vichlit toh hoga hi aakhir sazish bhi waisi hi ki ja rahi hai.super part 😘😘😘😘

Priya patel
Priya patel
1 year ago

Rupa ke man me shanka hona lazmi hai itni ghatnao ke baad to koi v sochne pr majboor ho jayega.isme Rupa ka dosh nahi hai lekin ab in sab baaton ka meethi or harsh ke rishte pr jane kya asar hoga ..
Dusri taraf ye shourya ka raaz to humko v Janna hai kya khichdi pakk rahi hai.

Jyoti
Jyoti
1 year ago

Very nyc part 👌
Waiting for next part

Meera
Meera
1 year ago

Wow आज लग रहा है कि ये हमारा ही शौरी था , कली को देखते हुए खोया हुआ , ओर लिटिल मास्टर कहने पर भी चिढ़ा नहीं , ओर नाग वाला चिन्ह देख , मेरे ससुर बोलने वाले ,🤩🤩🥰🫶🏼🫶🏼😂😂
ओर ये भदौरिया कहा ले कर आया है इन लोगों को 🤔🤔
👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼

जागृति
जागृति
1 year ago

वाह क्या कमाल जवाब दे रहे हैं प्रिंस मेरे ससुर 😊👌👌

Chanda Thakur
Chanda Thakur
1 year ago

Nice part Aparna ji 🙏🌹🌹