
मायानगरी -2 भाग -14
गौरी उन लोगो को साथ लिए मेडिकल जनरल वार्ड की तरफ बढ़ गयी..
वहाँ एक लम्बी सी डोरमेट्री में आमने सामने लगभग तीस बेड बिछे थे.. ।
आजू बाजू लगे पलंग में पर्दो का झीना सा भी आवरण नहीं था..।
मायानगरी वैसे तो बड़ा और महंगा अस्पताल था, लेकिन उसका ये हिस्सा उन ज़रूरतमंदो के लिए था, जिनके पास किसी अस्पताल की महंगी फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे…।
गौरी डोरमेट्री के बाहर ही खड़ी रह गयी.. उसके साथ ही भुवन और वेदांत भी खड़े रह गए..
“उसे देख रहे हैं आप लोग !” उसने एक पलंग की तरफ इशारा कर दिया..
वेदांत और भुवन की नजर भी उस पलंग की तरफ उठ गयी..
‘”उस आदमी की बात कर रही हो जो… !” कहते कहते वेदांत रुक गया ..
दरसल वो आदमी मरीज़ के साथ उसी के पलंग पर बैठा मरीज़ यानि अपनी पत्नी को ब्रेड चाय में डूबा डूबा कर खिला रहा था..
“हाँ वहीँ.. इसका नाम उमेश है और इसकी पत्नी राधा ! कुछ समय पहले पता चला कि इसकी पत्नी हड्डियों की ऐसी लाइलाज बीमारी से ग्रस्त है, जिसका अब तक कोई इलाज साइंस नहीं खोज पाया है…
पहले पहल जब ये अपनी पत्नी को लेकर आया, तब डॉक्टर ने दर्द और बाक़ी लक्षणों के लिए लाक्षणिक चिकित्सा कर दी..
शुरुवात में उसे कुछ थोडा बहुत आराम हुआ, लेकिन फिर कुछ समय बाद ये लोग इसी परेशानी के साथ वापस आ गए… ।
एक बार फिर उसे सभी दवाये दे कर भेज दिया गया।
इसके बाद ये लोग चार पांच महीने नहीं आये..
असल में गांव के भोले लोगो के साथ ही क्या हम जैसे पढ़े लिखे जानने समझने वाले लोगो के साथ भी यही होता है..।
यहाँ की दवा से आराम नहीं हुआ तो ये लोग झाड़ फूंक, बैगा जादू मंत्र पीर फ़कीर सब के पास हो आये..।
किसी ने ताबीज बांधा, किसी ने कोई सिद्ध पानी पिलाया, किसी ने गले पे लपेटने की राख दी तो किसी ने मंत्र बांधा कवच पहनाया।
पर हालत में कोई खास सुधार नहीं आया..।
असल में जब कभी राधा कोई नयी दवा या टोटका करती उसे कुछ समय के लिए तो आराम मिलता, लेकिन जैसे ही वापस अपनी दैनिक दिनचर्या में आती, उसे वापस तकलीफ पड़ जाती थी।
उसके लिए रोज का चलना फिरना भी कठिन होने लगा था। उसकी हड्डियां इतनी भंगुर होने लगी थी कि उसका खड़ा होना भी दूभर होने लगा था..।
एक बार फिर ये दोनों यहाँ चले आये… अब की बार जब सारी जाँच हुई तब इसकी रिपोर्ट्स को डॉक्टर जय के पास ले जाया गया..
उन्होंने देखते ही इसकी बीमारी परख ली..।
उन्होंने बता दिया कि इसकी हड्डियों को, जो विषाक्त असाध्य रोग घुला रहा है, उसके तोड़ के लिए आज तक कोई संजीवनी नहीं बनी..।
उसका एक ही उपाय है की सपोर्टिव ट्रीटमेंट के साथ उसे पूरा आराम दिया जाये..।
लेकिन फिर हम लोगो के सामने यह समस्या आई कि इसका पति रोज़ी वाला आदमी था, ये दोनों रोज कमाते और खाते थे..
लेकिन इसके पति ने ये सब सुन हमारे सामने हाथ जोड़ दिए..।
उसने कहा.. – वो कैसे भी कमा लेगा, अकेले सब कर लेगा बस उसकी पत्नी को यहाँ जगह दे दी जाए.. !
भुवन और वेदांत गौरी के साथ अंदर की तरफ बढ़ गए..
अब तक कुछ गौरी के साथ इंटर्नशिप करने वाले और भी लोग वहाँ चले आये थे..।
सभी राधा से रोज़ की पूछताछ करने लगे..।
“अभी कैसा लग रहा? खाना खाया? भूख सही लग रही या नहीं? नींद आयी या नहीं..?”
राधा धीरे धीरे उनका जवाब देती जा रही थी..
उनमे से दो तीन लड़के उमेश को घेर कर खड़े हो गए… दरअसल ये वो लड़के थे जो सुबह से मढ़रिया की दूसरी शादी की तैयारियों में भाग दौड़ रहे थे….।
वेदांत और भुवन वहीँ खड़े सब सुन रहे थे…
“भाई उमेश एक बात बताओ.. घर कैसे चला रहे हो अभी ?”
“बस भैया अब का बताएं… घर हम जब से इसे यहाँ लाये हैं एके दुइ बार गए होंगे, बाकी अब घर जाना कहाँ होता है.. यही तो हम भी पड़े रहते हैं !”
“घर पर और कौन कौन है ?”
“बस हमी दोनों जने हैं साहब, अम्मा बाबूजी तो रहे नहीं अब। एक बड़े भैया भाभी है वो गांव खेड़ा में रहते हैं.. थोड़ी सी ज़मीन है, उसी में खेती किसानी कर गुजर बसर कर लेते हैं.. !”
“ओह्ह.. शादी को कितना समय हुआ ?”
“साहब ये पन्द्रह की थी, और हम सत्रह के, जब ब्याह हो गया था हमारा… बीस बरस हो गए ब्याह को.. !”
“बच्चे ?”
” नही है। पता नहीं साहब, काहे नही हुए? शायद भगवान भी जानते रहे कि माँ की जिन्नगी ज्यादा लम्बी नहीं है.. बच्चा लोग को कोन अकेले पाल सकता है साहब.. एक बाप कितना भी कर ले कभी माँ नहीं बन सकता !”
“उमेश एक बात सच सच बताओगे ?”
“पूछिए न साहब !”
“कभी एक पल को भी मन में ये बात नहीं आई कि
.एक बीमार औरत की तीमारदारी में अपनी जवानी क्यों खटानी.. ?
क्यों न इसे यही छोड़ कर अपने रास्ते निकल लिया जाए,
वैसे सच बोलूं तो तुम इसे यहाँ छोड़ कर चुपके से चले जाते तो हम लोग तो तुम्हे ढूंढ भी नहीं पाते.. !”
उमेश के चेहरे पर फीकी सी मुस्कान चली आई..
“साहब ये बस पन्द्रह की थी जब हमारे जीवन और हमारे घर में आई, कुछ नहीं आता था इसे.. सब कुछ हमारी अम्मा ने सिखाया..।
सुबह-सुबह आंगन धोने से लेकर घर को लीपना पोतना चूल्हा जलाना,भाजी तोडना, साग बहोरना, रोटी थापना सब कुछ..
हमारी अम्मा ने उसमें और हम लोगों में कभी कोई भेदभाव नहीं किया। हमारी बहन को जो काम सिखाए, वह इसे भी सिखाया। हम दोनों साथ-साथ बड़े हुए हैं साब, एक दूसरे को देखते हुए।
हम दो ही साल तो बड़े हैं। हमारा भी स्कूल छूट गया था, पढ़ने लिखने में मन लगता नहीं था।
इसने भी कभी से सिलेट पेंसिल नहीं पकड़ी।
गांव की खेती थी, उससे घर का अनाज पानी चल जाता था। लेकिन बहन की शादी में हमारे बाबू ने बहुत कर्जा ले लिया और उस कर्ज के लिए सारे खेत रेहन रख दिए।
बापू कर्ज नहीं चुका पाया ,और इस कर्ज के बोझ से दबे दबे ऊपर चले गए।
उनके जाने के बाद अम्मा भी चली गई। हम दोनों भी अब समझदार हो चुके थे। बङके भैया और भौजी बचे हुए थोड़े से खेत में अनाज उगाने लगे।
लेकिन उतना अनाज हम सबके लिए पूरा नहीं पड़ता था। हमें लगा शहर जाकर काम करेंगे तो घर चला लेंगे। और बस इसलिए हम दोनों शहर आ गये। दोनों ही मेहनत मजदूरी में लग गए।
हम दोनों साथ थे, इसीलिए खुश थे। एक दूसरे का सहारा थे।
जब दस साल बीत गए तब हम नींद से जागे कि हमारा अपना कोई बच्चा नहीं है। और तब डॉक्टर के चक्कर शुरू कर दिए। लेकिन धीरे-धीरे समझ में आ गया कि भगवान शायद हम दोनों का ही साथ रखना चाहता है। बस दो-चार साल के प्रयास के बाद हमने उस बारे में भी विचारना छोड़ दिया….।
उसने हमेशा हर कदम पर हमारा साथ दिया है साहब..
जब भी हम कमज़ोर पड़े उसने मुझे संभाल लिया.. देखा जाये तो शादी के बीस साल वही हमे संभालती रही।
पत्ती खेलने की लत लग गयी थी, कमाए सारे पैसे वहीँ उड़ा दिया करते थे, लेकिन उसने पूरे धैर्य से हमारा साथ दिया और हर वक्त हमें समझाती रही.. खूब पैसे उड़ा दिए, उधार लें लेकर शौक पूरा करते रहे हम और एक दिन जिन का रुपया खाया था उन लोगो ने पकड़ कर तोड़ फ़ोड़ दिया… ।
पन्द्रह दिन बिस्तर पर पड़े रहे,वो बाहर काम के साथ रात दिन हमारी भी सेवा करती रही..।
बस एक ही बात कहती थी, “जैसे भी रहो बस तुम बने रहना..”
उसकी बात दिल छू गयी थी.. ठीक होने के बाद हमने अपनी उस बुरी लत से छुटकारा पा लिया..।
जी तोड़ मेहनत की और एक एक कर सबका कर्ज़ा चुका दिया..
साहब जिन्नगी भर यही हमारी सेवा करती रही, अब जाकर तो भगवान ने हमें मौका दिया है, हम इसे कैसे हाथ से जाने दे..
जब तक इसके जीने की आस बाकी है हम ये जंग लड़ते रहेंगे.. न खुद हारेंगे और न इसे हारने देंगे !”
एक ऐसा आदमी जिसे सब साधारण समझ रहे थे, अपनी जीवनसंगिनी के प्रति अपने असाधारण प्रेम और समर्पण को कितने सरल शब्दों में समझा गया था…।
“उमेश भाई हम लोग कोशिश करेंगे कि तुम्हारी राधा की दवाएं और उसका इलाज निशुल्क करवा सके,हालाँकि ये ज़रा मुश्किल काम है.. देख तो रहे हो यहाँ का मैनेजमेंट..
फिर भी हम सब मिल कर कुछ न कुछ करने की कोशिश करेंगे.. “
वो लड़के उमेश से बात कर के आगे बढ़े ही थी कि भुवन ने उन्हें रोक लिया..
“सीनियर मैनेजमेंट से इन लोगो को यहाँ से निकालने के लिए अब बहुत प्रेशर आ रहा है.. !” वो लोग आपस में बात कर रहे थे और भुवन लोगो के साथ खड़ी गौरी ने उन लड़को से पूछ लिया..
“क्यों.. ? इन्हे हटाना क्यों चाहते हैं मैनेजमेंट वाले ?”
“पहली बात कि इस फाइव स्टार सुविधा वाले अस्पताल के नरम मुलायम महंगे कालीन में ये गरीब पैबंद से नजर आते हैं, दूसरी बात इनका इलाज निशुल्क चल रहा है। और हॉस्पिटल मैनेजमेंट चाहता है, जिस मरीज़ से पैसे बने वहीँ ज्यादा दिन तक यहाँ का मेहमान रहे। बाक़ी फ्री फण्ड वालो को हफ्ते भर बाद चलता कर दिया जाये.. वैसे भी इसकी बीवी की हालत देख लगता तो नहीं है कि सुधरेगी !”
“हम्म… वो तो है.. हम सब एक बार निरमा मैडम तक ये बात क्यों नहीं पहुंचाते कि ये सब हॉस्पिटल में चल रहा है !”
“निरमा मैडम यूनिवर्सिटी की सीओ हैं, हॉस्पिटल मैनेजमेंट देखना तो उन्होंने दो साल पहले ही छोड़ दिया था..
अभी फ़िलहाल मढ़रिया के हाथ ही सब कुछ है.. और देखो क्या मस्त आयरनी है..।
इतने बड़े हॉस्पिटल का प्रेजिडेंट मढ़रिया अपनी पहली बीमार पत्नी की बीमारी से तंग आकर उसे तलाक देकर दूसरी शादी करने जा रहा है। और उसी रईस आदमी के अस्पताल में एक रिक्शा वाला हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी रोज़ शाम को अस्पताल में आकर अपनी पत्नी के पैरो में तेल लगाता है, उसे अपने हाथ से खाना खिलाता है, और रोज़ रात उसके कान में चुपके से कहता है ‘तुम बस बनी रहना, बाक़ी सब मैं देख लूंगा’.. !’
“इस आदमी के लिए हम सब को मिल कर कुछ करना होगा ?” उनमे से एक ने कहा
“नहीं उसकी ज़रूरत नहीं… इनकी आगे की दवा और इलाज की जिम्मेदारी आज से हमारी.. !”
.भुवन ने वहाँ खड़े डॉक्टर से कहा और गौरी की तरफ देखने लगा..
गौरी ने उन सब से उसका परिचय करवा दिया..
“ये मेरे जेठ हैं, मिस्टर भुवन सबरवाल !”
“लेकिन भैया.. ?” गौरी ने भुवन की तरफ चिंता जताई..
“लेकिन वेकिन की कोई बात नहीं गौरी..।
इनका महीने का कितना खर्चा बैठता है, हमें बता देना.. पार्टी फंड से नहीं, अपनी तनख्वाह में से पैसे देंगे हम.. !”
मुस्करा कर भुवन आगे बढ़ गया और जाते जाते वेदांत के चेहरे पर भी हलकी सी मुस्कान छोड़ गया..
क्रमशः

Bhuvan ne us Gariba jodaya ka kharcha khud udhanaya ko taiyar ho gya waiting for the next part eagerly.
Awesome part 💓 superb story 😍 bhuvan jisa aur koy hi hi nahi sakta.. superb character.. bahut bahut bahut hi behtrin story 😍 eagerly waiting for new part 💓
Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
Bhuvan ka kya kehna… bahut hi badhiya character he…..sab k liye sochta hai..par kabhi apne liye nahi socha…. superb story 😍 bahut hi khubsurat part 💓 lajwab story 😍 eagerly waiting for new part
साधारण लोगों की असाधारण प्रेम कहानी , उमेश को 🫡🫡🫡🫡 है , ओर पता ही था कि भुवन का जवाब ऐसा ही कुछ होगा , बेस्ट हो आप डॉ साहिबा 🫡🫡 कहा कहा से ऐसे किस्से लाते हो कि प्रेम में ओर विश्वास बैठ जाता है , बेस्ट लाइन : तुम बस बनी रहना बाकी मै सब संभाल लूंगा 🫶🏼🫶🏼🫶🏼❤️❤️❤️👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼
भावनाओं में जहाँ पढ़े लिखे फेल है वही गरीब अनपढ़ बाजी मार ले जाते हैं
इन भावनाओ को वो कोई नाम भी नहीं दे पाते
ये प्यार मोहब्बत जैसे भारी शब्द नहीं पता उन्हें
पर सात जन्मो का जो वचन दिया को निभाना आता है उन्हें
भुवन जैसा भी विरला बंदा ही होगा
हर जगह मदद के लिए हमेशा तैयार
बहुत ही सुंदर कहानी है
🥰🥰🥰🥰🫠🫠🫠💔💔💔❤️🔥❤️🔥❤️🔥💞💞💞💞💞
कहते है दिल से सोचना साहस का सबसे बड़ा रूप है,क्योंकि इसमें दिमाग़ से ज्यादा आत्मा की गहरी समझ होती है और राधा का पति दिल से सोच रहा है, वो गरीब रिक्शेवाला अपनी पत्नी की सेवा मे जी जान लगा रहा है और दूसरी तरफ वो मढरिया दिमाग़ से सोच रहा है, मढरिया ने दिमाग़ से सोचकर अपनी बीमार पत्नी को छोड़कर दूसरी शादी कर रहा।
पर शायद वो गरीब के मन मे सुकून जरूर होगा जो अपनी पत्नी की सेवा मे लगा है,यही सच्चा प्यार है।
आज फिर भुवन ने दिल जीत लिया 🥳🥳।
हर बार की तरह ये भाग भी बेहद खूबसूरत 👌👌👌👌👌🙏
Beautiful part
राधा और रमेश की कहानी… ऐसा ही होते हैं ना सच्चा प्रेम एक दूसरे के दुख में दोनों एक साथ खड़े होते हैं और यह शायद एक गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार ही कर सकता है क्योंकि पैसे वाले लोग तो पैसों के दम पर रिश्तों को रख जाते हैं।
राखी राधा और ऊमेश का प्रेम सच्चा है