मायानगरी-2 भाग-12

मायानगरी -2 भाग -12

सबरवाल परिवार के घर उस दिन सुबह से ही बेहद अफरा तफरी का माहौल मचा हुआ था। सभी को पता था कि आज टिकट आबंटन है। और इसलिए सब यह जानते थे कि मंत्री जी के ऊपर कितना ज्यादा दबाव है। इस सबके बीच पूरा दिन बीतने के बाद जब रात के समय पूरा परिवार एक साथ खाना खाने के लिए बैठा ही था कि पुलिस का फ़ोन धड़धड़ाता चला आया..।

यह सुनते ही कि नहर के पास किसी युवक की लाश मिली है। सबरवाल जी तुरंत सुकांत को साथ चलने का आदेश देते हुए खड़े हो गए, लेकिन उनके इतना बोलने तक में वेदांत वहां से अपनी गाड़ी निकाल कर नहर की तरफ निकल चुका था…।

पल भर पहले का माहौल एकदम से मनहूसियत में बदल गया। सबके चेहरों का रंग उड़ गया।
वैसे भी जब से भुवन की मां को यह पता चला था कि उसे टिकट नहीं दिया गया है, उनकी हालत बेहद खराब हो गई थी। वह कई सालों से भुवन को राजनीति में अपना स्थान बनाने के लिए परिश्रम करते देख रही थी। वह लड़का ऐसा था जिसे अपने खाने पीने, सोने जागने तक की चिंता नहीं होती थी। एक बार काम में पङने के बाद वह खुद को भूल बैठता था।

     ऐसे लड़के के साथ कैसे उसके सगे ताऊ जी ने इतना बड़ा अन्याय कर दिया था, यही सोच सोच कर वह गली जा रही थी। और इसलिए अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली थी।
    जैसे ही नहर वाली खबर आई पृथ्वीराज अपनी देवरानी को बताने के लिए उसके कमरे की तरफ बढ़ने लगी कि तभी वहां बैठी दादी ने उसका हाथ पड़कर उसे रोक लिया..

“क्या तेरे पास जरा भी दिमाग नहीं है पृथ्वीराज? अभी बस इतना पता चला है कि नहर के पास किसी युवक की लाश मिली। कौन है, क्या है, वह हमें नहीं पता। ऐसे में छोटी को परेशान करने जाने की कोई जरूरत नहीं। उसे बताने के लिए क्यों इतनी उतावली हुई जा रही है। चुपचाप यहीं बैठ..।”

पृथ्वीराज को खुद अपनी भूल समझ आई और वह वही एक मोढे पर बैठ गई। अपने माथे पर अपना हाथ टिकाए वह स्वगत भाषण में लग गई..।

“पता नहीं इन्हें भी क्या सूझी, अपने लड़के को टिकट देने की जगह जाने किस पराए बेवकूफ बूढ़े को टिकट दे दी? हम तो हमेशा से सोचते थे अम्मा जी कि इनका पद, इनकी प्रतिष्ठा, इनकी वसीयत को आगे भुवन ही आगे बढ़ाएगा… ।
हमारे बड़के को तो अब इस घर से कोई लेना देना ही नहीं। अमेरिका में हीरों का बिजनेस क्या शुरू किया, और उसके पास  यहां आने का समय नही बचा।
       हम बूढों को पल भर के लिए देखने का भी उसके पास वक्त नही।
    उससे क्या शिकायत करें?

    सुकांत पूरी तरह से बिजनेस मे रमा हुआ है। वेदांत को तो अपनी घरवाली से फुर्सत नहीं। बचा हमारा लाडला भुवन! बस उसी से उम्मीद थी कि अपने तायाजी की जागीर को, उनके राजनीतिक कैरियर को आगे बढ़ाएगा, लेकिन पता नहीं इन्होंने भी क्या सोचकर ऐसा किया..!”

पृथ्वीराज अपनी सास के बगल में मोड़े पर बैठी थी। उसके दुखी उदास चेहरे को देखकर उसकी सास को भी उस पर तरस आ गया। उसने अपने जीवन में शायद पहली बार अपनी बहू के सर पर हाथ रखकर उसके बालों को धीरे से सहला दिया।

“चिंता मत कर, इतने सालों के वैवाहिक जीवन में तू भले ही अपने पति की रग-रग से वाकिफ हो गई होगी, लेकिन मैंने उसे 9 महीने कोख में रखा है।
        मैं जानती हूं वह कोई भी निर्णय बहुत दूर की सोच कर लेता है…।
हमारे तुम्हारे जैसे सामान्य लोग उसकी सोच तक पहुंच नहीं पाते। अगर उसने ऐसा किया है तो जरूर इसका दूरगामी परिणाम कुछ और ही होगा। और मुझे पूरा विश्वास है कि यह लोग जो दौड़कर नहर पर गए हैं ना, वहां से खाली हाथ लौटेंगे, मेरा भुवन कभी आत्मघाती कदम नहीं उठा सकता..।”

उन दोनों औरतों की बातों के बीच जाने कब भुवन की मां पीछे आकर खड़ी हो गई, किसी को पता ही नहीं चला।
उन्होंने सारी बातें सुन ली और एक चीख मार कर वहीं बेहोश हो गई…।

गौरी और पारुल भी वहीं मौजूद थे..।
वह दोनों तुरंत अपनी काकी सास की तरफ दौड़ पड़ी। उन्हें उठाकर उन दोनों ने सोफे पर लिटाया और गौरी उनका बीपी चेक करने लगी.. ।

वैसे तो काकी ब्लड प्रेशर की मरीज नहीं थी, लेकिन आज उनका रक्तचाप उनके माथे पर हथौड़े बजाने लगा  था, और शायद इसीलिए वह अपनी चेतना खोकर गिर पड़ी थी।
    गौरी से उस वक्त जितना जो हो सकता था, वह अपनी तरफ से सारे प्रयासों में लग गई। पारुल ने तुरंत फोन उठाया और सुकांत का नंबर लगाने लगी कि तभी उन सभी को चकित करती हुई एक गहरी सी आवाज उनके कानों में पड़ी और वह सभी पलट कर घर के मुख्य दरवाजे की तरफ देखने लगी..।

” क्या हुआ आप सब यहाँ जमघट लगाये क्यों खड़े हैं?”

भुवन की आवाज सुनते ही सबके चेहरे पर राहत चली आई। पृथ्वीराज अपनी जगह से उठकर भुवन की तरफ दौड़ पड़ी और आगे बढ़कर उन्होंने उसे सीने से लगा लिया…

“कहां चला गया था तू बच्चे? घर में सबकी क्या हालत है तुझे पता भी है ?देख तेरी मां तेरे बारे में सोच सोच कर परेशान होती रही, और…।”

” अरे माँ को क्या हुआ?”

सोफे पर लेटी अपनी मां के पास पहुंचकर भुवन ने धीरे से उनका सिर अपनी गोद में रख लिया।
      पारुल का फोन सुकांत को लग चुका था। सुकांत के उधर से हेलो बोलते ही पारुल ने धीमी सी आवाज में उसे भुवन के घर लौटने की जानकारी दे दी। सुकांत ने उधर से दो एक बातें पूछी और फोन रख दिया।

    लगभग पंद्रह से बीस मिनट के बाद परिवार के सारे पुरुष सदस्य भी घर वापस लौट चुके थे। भुवन के पिता किसी काम से शहर से बाहर गए हुए थे। इसलिए उन्हें इन सब बातों की जानकारी नहीं हो पाई थी। आते ही विधायक जी अपने भतीजे पर बरस पड़े।

” कार्यालय से निकल कर अचानक तुम कहां गायब हो गए थे? हम सब कितने परेशान थे यहां, जानते भी हो? तुम्हारी मां की हालत देखो, रो-रोकर अलग परेशान हुई जा रही है। “

उनकी बात सुनकर पृथ्वीराज उबल पड़ी।

” वह रो-रो कर भुवन के कारण परेशान नहीं हो रही। आपके कारण परेशान हुई जा रही है। आज तक हमने आपके राजनीतिक मामलों में कभी कोई दखल नहीं दिया, लेकिन आज आपने जो निर्णय लिया है, वह हमें भी बिल्कुल पसंद नहीं आया।
     जाने आपने कौन से दूरगामी परिणाम सोचे जो भुवन को टिकट नहीं दिया।”

वह अभी आगे कुछ और कहती कि भुवन ने आगे बढ़कर उन्हें रोक दिया..

” ताऊजी ने अगर ऐसा निर्णय लिया है तो, उसके पीछे उन्होंने कुछ जरूर सोचा होगा। हम इस निर्णय के बाद परेशान जरूर हुए थे, लेकिन घर पर किसी से भी हमारी कोई नाराजगी नहीं है..।”

“आप मत होइए नाराज।
   आप बने रहिए श्री राम, लेकिन हमसे यह सब सहन नहीं होगा। कॉलेज के समय से ही आप सक्रिय राजनीति में उतर चुके हैं। कॉलेज में भी अपने चुनाव लड़ा था, और जीते थे। छात्र राजनीति से ही अपने बाबूजी के साथ उनकी पार्टी में काम करना शुरू कर दिया था। आपको उम्मीद नहीं रही होगी, लेकिन हम सबको बेहद उम्मीद थी कि आज का टिकट आपको मिलना चाहिए था…
अगर घर परिवार से ही करियर को आगे बढ़ाने में सहायता नहीं मिलेगी, तो किसी और से क्यों उम्मीद की जाए?
और उस पर तुर्रा यह कि हमें ही सुनाया जाता है कि आजकल के युवा मेहनती नहीं है। अपना समय फालतू कामों में जाया करते हैं।
     चलो मान लिया हम ऐसे हो सकते हैं। लेकिन भुवन भाई…”

वेदांत अपनी बात कहते-कहते भावुक हो गया। उसका गला भर आया, और वह अपनी पूरी बात नहीं कह पाया। लेकिन इन सारे लक्षणों के बीच सबरवाल जी चुपचाप बैठे विचार मग्न थे। उन्हें इस तरह बैठे देखा दादी ने आदेश सा सुना दिया…

“अब कोई किसी से कुछ नहीं कहेगा। जो होना था सो हो गया। आप सब लोग बैठो और शांति से खाना खाओ, भुवन चल बेटा तूने भी कुछ नहीं खाया है..। “

अब तक में भुवन की मां को भी होश आ चुका था। वह भी सब की बातें चुपचाप सुन रही थी। वह एकदम से खड़ी हो गई..

“हमसे एक निवाला भी नहीं खाया जाएगा। हो सकता है आप सबके लिए यह महज एक घटना है कि भुवन को टिकट नहीं दिया गया, लेकिन हमारे लिए यह कभी ना भूलने वाला लांछन है।
    हमारे बेटे को इस लायक भी नहीं समझ गया कि उसे घर की पार्टी में विधायक पद के लिए चुन लिया जाए। इससे तो अच्छा वह अपनी अलग पार्टी बनाकर काम कर लेता।
   हम घर की छोटी बहू हैं, ज्यादा कुछ कहेंगे तो सबको बुरा लग जाएगा। लेकिन क्या इस घर के बड़ों को यह नजर नहीं आता की कौन कितना योग्य है.. ?

अगर भुवन की जगह किसी सुपात्र को वह टिकट दी गई होती तो शायद हमें इतना बुरा नहीं लगता। हम इस बात पर समझौता कर लेते कि अभी भुवन की आयु कम है। कुछ समय बाद जब उसकी उम्र बढ़ेगी तब शायद उसकी योग्यता भी लोगों को नजर आने लगेगी। लेकिन भुवन के स्थान पर जिसे टिकट देने के लिए चुना गया है, आपको वाकई लगता है कि वह भुवन से कहीं ज्यादा सुयोग्य और लायक है..?

आज तक भुवन की मां ने कभी अपने जेठ के सामने अपने सर का पल्ला तक हटने नहीं दिया था। लेकिन आज उसके अंदर उबलते गुस्से ने सारे शर्म और संकोच को एक तरफ धकेल दिया था। वह आज अपने जेठ की आंखों में आंखें डालकर अपने पुत्र के भविष्य के लिए सवाल कर रही थी..।

“इस बारे में क्या हम से ज्यादा जानते है आप लोग.. ?”

इतनी देर से चुप बैठ कर सब की बात सुनते सबरवाल जी बोल पड़े और उनकी तेज आवाज सुनते ही फिर वहां मौजूद हर कोई चुप रह गया।

उन्होंने अपनी थाली सरका कर, हाथ जोड़े और अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। भुवन की माँ की आंखों के आंसू अब भी नहीं रुके थे। वह भी पलट कर अपने कमरे की तरफ चली गई…।

   वहाँ उस वक्त ऐसा माहौल बन गया कि लगा आज इस घर में कोई खाना नहीं खाएगा। पारुल को बहुत जोरों से भूख लग रही थी, लेकिन अपने ससुर जी को बिना खाए जाते देखा, वह सहम गई। उसने धीरे से अपने पति की तरफ देखा। सुकांत भी धीमे-धीमे कदमों से सीढ़ियां चढ़कर अपने कमरे की तरफ चला गया। गौरी इस बात को समझ रही थी कि  पारुल को भूख सता रही है, उसे अपने बच्चे को फीड भी करवाना है लेकिन अपनी दबंग सास के सामने उसकी भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी..

भुवन और वेदांत भी उठकर जाने वाले थे कि दादी ने एक जोर की हुडकी लगायी..

“यह क्या लगा रखा है सबने? अगर वह बिना खाए चला गया तो क्या तुम सब भी नहीं खाना खाओगे? अरे वह बूढ़ा हो गया है, उसे ब्लड प्रेशर है, कोलेस्ट्रॉल है, एक टाइम खाना नहीं खाएगा तो उसका कोई बुरा नहीं होगा बल्कि उसकी सेहत के लिए अच्छा ही है…!
    लेकिन तुम सब तो अभी जवान हो, और फिर पारुल तुम तो बच्चे को दूध पिलाती हो! तुम्हारा भूखा रहना ठीक नहीं बेटा! बैठो और सब खाना खाओ..!”

“अम्माजी कैसी बात कह रही है आप ? इन्होने खाया नहीं और हम सब खा लें ?”  वेदांत की माँ बोल पड़ी..

“तुझे नहीं कहा हमने पृथ्वीराज..! तू भी तो कोलेस्ट्रॉल की मरीज है! तू नहीं भी खायेगी तब भी तुझे नुकसान नहीं फायदा ही होगा। मैं इन लोगों की बात कर रही हूं..
चलो बच्चो सब खाने बैठो..।
गौरी चल सब की थाली परोस..।”

गौरी ने मुस्कुरा कर हामी भरी और टेबल की तरफ बढ़ गयी..
उसने सबसे पहले दादी की थाली परोसी और उनके पास ले आई..
उन्हें थाली पकड़ाने झुकी तो दादी ने धीमे से उसके कान में मंत्र फूंक दिया..

“ठीक किया न.. तुझे अपनी भूखी जेठानी की चिंता होने लगी थी न ?”

गौरी ने मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिला दी..

“दादी यू आर वैरी क्यूट !”

“यू टू बेटा !” दादी ने कहा और गौरी मुस्कुरा कर सबकी थाली परोसने लगी..
वेदांत भुवन पारुल के साथ वेदांत की माँ भी अपनी थाली परोस कर उन लोगों के साथ बैठ गयी..

एक बार फिर दिन भर की परेशानियों के बाद सबरवाल परिवार एक साथ हंसने मुस्कुराने लगा..
अलग अलग उमर अनुभव और व्यक्तित्व के होने के बावजूद वो सभी उस इंद्रधनुष की तरह एक होकर दमकने लगते थे, जो तेज़ बारिश के बाद सूर्य उदित होने पर आसमान में चमक आता है..।

क्रमशः

4.8 27 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

32 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

इतनी मेहनत के बाद भी टिकट ना मिलने पर भुवन निराश तो होगा ही पर इतना तो भुवन का पता था कि वो कुछ गलत कदम नहीं उठा सकता पर हो सकता है सभरवाल ने कुछ तो सोचा ही होगा भुवन के लिए
दादी बड़ी मस्त बंदी है 💃मजेदार किरदार 👌 इतने टेंशन भरे माहौल मे भी सबको खाना खिला ही दिया और जिन्होंने नहीं खाया उनका कॉलेस्ट्रोल कम करने का तरीका बता दिया।
हर बार कि तरह लाजबाब भाग 👌👌👌

Nisha
Nisha
1 year ago

Bhuwan ko dekhkar chain aaya.ticket us insaan ko kyun diya gya ye toh nahi pata par aaj dadi pe Tut ke pyar aaya.bina bole wo sab samjh gyi.ab pariwar me to matbhed hote rahte hain iska matlab dur ho jana thodi na hota hai

Jyoti
Jyoti
1 year ago

Very nyc part 👌

seema Kawatra
seema Kawatra
1 year ago

कुछ तो सोचा हुआ है ताऊ जी ने भुवन के लिए तभी ऐसा किया
शायद भुवन को इस हारजीत के खेल से आगे बढ़ाना चाहते हो

Jagruti
Jagruti
1 year ago

Bahut badhiya part

Arun Kumar
Arun Kumar
1 year ago

👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻

Siddharth Singh
Siddharth Singh
1 year ago

Very nice.. As always

Sofiya shaikh
Sofiya shaikh
1 year ago

Very nice ❤️❤️❤️

Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Bhuvan sahi hai ,thank God, Sabarwal parwar sub Bhuvan ke aanaya ke bad sabhi bahut khus thaya,waiting for the next part eagerly.