
जीवनसाथी -3 भाग -126
“क्या हुआ प्रिंस.. कुछ परेशान हैं क्या ?”
विक्रम ने पूछ ही लिया..
“हम्म.. नहीं.. तुमको क्या लेना देना मेरी परेशानी से ? तुम अपने काम पर ध्यान दो.. क्या काम है तुम्हारा ?”
“आपको प्रोटेक्ट करना, आपकी परेशानियों को दूर करना, आपके रूटीन का ख्याल रखना.. !”
“हम्म.. तो बस वही सब करो, मेरे मूड्स के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है तुम्हे.. !”
बेरुखी से विक्रम को जवाब देकर शौर्य वापस बाहर देखने लगा..
“कहाँ चलना चाहेंगे इस वक्त ?” विक्रम के सवाल पर बिना कुछ बोले शौर्य खोयी खोयी आँखों से बाहर देखता रहा..
विक्रम ने गाडी दूसरी तरफ घुमा ली, वो लोग घर के रास्ते पर काफी दूर निकल आये थे, फिर जाने क्या सोच कर विक्रम ने गाडी घुमा ली थी!
विक्रम समझ गया था शौर्य किसी बात पर परेशान है…! और उसका उस बात पर बिलकुल ध्यान नहीं है कि गाडी किस तरफ जा रही है..
कुछ देर बाद गाड़ी थर्टी वन स्ट्रीट पर खड़ी थी…
ठीक कली के घर के सामने..।
कली के घर पर नजर पड़ते ही शौर्य चौंक कर आँखे मलते हुए ध्यान से उस बिल्डिंग को देखने लगा..
वो लोग रास्ते के उस तरफ खड़े थे जहाँ से कली का कमरा साफ़ साफ़ नजर आ रहा था..।
कली अपनी बालकनी में झूले पर बैठी कुछ पढ़ रही थी….
शौर्य की जैसे ही उस पर नजर पड़ी, वो चौंक कर वापस उसे देखने लगा..
“ये कहाँ ले आये विक्रम ?”
“वो मुझे आपने आदेश नहीं दिया था तो मैं समझ नहीं पाया कि कहाँ जाना है ?”
“हम्म.. आजकल अपनी मर्जी ज्यादा ही चला रहे हो !” शौर्य ने उसे डपट दिया, लेकिन आजकल विक्रम को शौर्य की डांट खाने में भी मजा आने लगा था। बल्कि आजकल जानबूझ कर वो उसे लड़ने और चिल्लाने के मौके दिया करता था…
उसके डपटने के बाद विक्रम ने बड़े अदब से उससे पूछ लिया..
“सॉरी प्रिंस, घर ले चलूँ ?”
“नहीं.. अब आ ही गए हैं तो..
“तो.. क्या ? अंदर जायेंगे ?”
“नहीं.. बस कुछ देर रुको !”
विक्रम समझ गया, वो चुपचाप ड्राइविंग सीट पर बैठ गया…
उसने एक बार फिर अपनी पसंदीदा गानो की सीडी बजा दी..
बाहर हल्की सी बारिश हो रही थी..
मौसम में ठंडक थी…
शौर्य पीछे की सीट पर बैठा टकटकी लगाए कली को देख रहा था और गाडी में गाना चल रहा था..
मन ये साहेब जी, जाणे है सब जी
फिर भी बनाये बहाने
नैणा नवाबी जी, देखें है सब जी
फिर भी न समझे इशारे
मन ये साहेब जी, हाँ करता बहाने
नैणा नवाबी जी, न समझे इशारे
धीरे-धीरे
नैणों को धीरे-धीरे
जिया को धीरे-धीरे
भायो रे साएबो
धीरे-धीरे
बेगाना धीरे-धीरे
अपना सा धीरे-धीरे
लागे रे साएबो..
शौर्य खोया हुआ था कि वापस उसका फ़ोन बजने लगा.. उसने फ़ोन की तरफ देखा, बॉस लिखा हुआ आ रहा था.. शौर्य के चेहरे के भाव बिगड़ गए !
उसने खीझ कर फ़ोन उठा लिया..
“जिस काम के लिए बोला है बस उसी पर फोकस करो, बाकी ज्यादा इधर उधार ताकाझांकी करोगे तो सीधा ऊपर का टिकट कटेगा तुम्हारा !”
“यही बताने के लिए फ़ोन किया है क्या ?”
“हाँ क्यूंकि तुम्हे हर कदम मेरे हिसाब से रखना है.. मेरी डील साइन हो कर लॉंच हो जाये फिर चुप चाप यहाँ से इतनी दूर निकल जाना कि कभी गलती से भी तुमसे मुलाकात न हो !”
“समझ गया.. और कुछ ?”
“बस अब निकलो वहाँ से !”
“कहाँ से ?”
“थर्टी वन स्ट्रीट पर खड़े हो, सब जानता हूँ..।
वो कोई ऐसी कैसी लड़की नहीं है.. वासुकी की लड़की है.. उससे दूर रहने में ही तुम्हारी भलाई है !”
“लड़की कोई भी हो, ऐसी वैसी नहीं हो सकती। चाहे किसी की भी बेटी हो पर तुम्हे ये सब समझ नहीं आएगा !”
एक बार फिर शौर्य ने फ़ोन काट कर सीट की तरफ उछाल दिया….
विक्रम से शौर्य कुछ बोलता उसके पहले विक्रम ने गाडी वहाँ से निकाल कर उनके फ़्लैट की तरफ बढ़ा दी..
गाड़ी के वहाँ से जाते ही अब तक किताब में गहरी डूबी बैठी कली ने किताब से नजर उठायी और गाडी की तरफ देखने लगी..
उसने गाडी को जाते हुए देखा और खड़ी हो गयी.. उसके देखते देखते गाडी उसकी नजर से ओझल हो गयी..
हल्के से मुस्कुरा कर वो अंदर चली गयी..
उसकी प्लेलिस्ट में उसका पसंदीदा गाना चलने लगा था..
सुर्खियाँ है हवाओं में
दो दिलों के मिलने की
अर्ज़ियाँ है नज़ारों में
लम्हां ये थम जाने की
कैसे हुज़ूर जी ये लब दिखलाये
चुप्पी लगा के भी गज़ब है ये ढाये
धीरे-धीरे…
*****
मीठी खाने कि टेबल पर थी, और फू साहब किसी न किसी तरीके से उसके कान खाये जा रही थी..
फू साहब की बहु भी वहीँ थी, वो हॉरर फिल्मो की ज़बरदस्त शौकीन थी…
उसे जब मौका मिलता, वो कोई अच्छी हॉरर किताब पढ़ लेती या कोई मूवी देख लेती..
इसलिए वो बातें भी अजीब सी करने लगी थी..
फू साहब ने एक प्लेट उठा कर मीठी की तरफ बढ़ा दी..
“हमने सोचा जब आज मीठी बहु को हम ही परोस दे.. अब तुमको तो ये समझ नहीं आता कि बड़ो को कुछ परोस कर दे.. !”
“समझ तो सब कुछ आता है फू साहब, लेकिन अभी इस घर की बहु बनी नहीं हूँ न, और फिर यहाँ आप सबके जो नियम है उन्हें बिना किसी से पूछे तोड़ भी नहीं सकती !”
“जवाब तुरंत देती हो न ?”
“हाँ, मन में जवाब रख कर करुँगी क्या ? जब मेरे पास जवाब है तो देना तो पड़ेगा ही न !”
“वैसे शादी से पहले अपने ससुराल आना नहीं चाहिए, ये होने वाली बहु के लिए अच्छा नहीं मानते.. !”
फू साहब की बहु ने ज्ञान झाड़ा और एक गहरी साँस भर कर मीठी उसका भी मुँहतोड़ जवाब देने को थी कि हर्ष उसके पास चला आया..
“आओ तुम्हे अपना कमरा दिखा दूँ !”
हर्ष की बात पर मुस्कुरा कर मीठी खड़ी हो गयी..
“अपना नहीं, हमारा कमरा !”
बोल कर मीठी ने पलके बड़ी अदा से उठा कर फू साहब कि तरफ देखा, उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था..
मीठी हर्ष के साथ निकल गयी..
जाते जाते उसने पलट कर फू साहब की तरफ देखा वो उसे ही घूर रही थी।
अगर उनका बस चलता तो आँखों से देख भर कर वो मीठी को ज़िंदा जला देती..
इन्ही बातो से कभी मीठी दब जाती थी लेकिन अब उसने भी मन ही मन ठान ली थी कि मुखौटेबाज़ रिश्तेदारों से वो निपटारा कर के रहेगी..
उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई..
कमरे के दरवाज़े पर पहुँच कर उसने वापस एक बार पलट कर देखा और हर्ष की बांह पकड़ कर उससे लग कर चलने लगी..
क्रमशः

तो यह पक्का हो गया है कि यह शौर्य नहीं है तो फिर यह लड़का है कौन और मुझे ऐसा क्यों लगता है की काली की तरफ ही आकर्षित हो रहा है इसकी इसका ऐसा करना बिल्कुल गलत है क्योंकि शौर्य कभी भी अपने प्यार को किसी के साथ नहीं देख सकता यह बात तय है और जिस दिन शोर है सबके सामने होगा उसे दिन यह लड़का कहीं नजर नहीं आएगा।
भदोरिया को पता नहीं है कि उसने कितनी बड़ी गलती की है ऐसा करके जिस दिन नजर सब को पता चलेगा उसे दिन भदोरिया की शामत ही आ जाएगी।
बिल्कुल बुआ जी के अंदाज में ही जवाब दे रही है उनकी भतीजी बहू और ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए तभी उन्हें उनकी औकात समझ में आती है वरना वह फिजूल में ही दूसरों के फटे में टांग आने से बाज नहीं आते
Hii, Madam ji, kya Jadu hai aapki kahani ki!
👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👎👎👎👎👎👎👎👎👎👎👎👎😩😩😩😩😩😩😩😩😩😩😩😩
Ye shaurya nahi ho sakta.hamara shaurya toh bahut hi pyara hai.mithi ko aise dekhkar achha laga 👌👌👌👌👌👌🥰🥰🥰🥰
Very nyc part 👌
Shaurya ka kissa ulajhta hi ja raha hai kya rahsya hai, edhar Mithi sahi kar rahi hai Fu saheb ko kara takkar de rhi hai
Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
अब तो ये पक्का हो गया कि ये शौर्य नहीं है।शाबाश मीठी ये एटीट्यूड भी जरूरी है।👍🏻
बहुत अच्छा भाग 👌👌👌👌
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