जीवनसाथी -3 भाग -123

जीवनसाथी -3 भाग -123

शौर्य अपनी जगह से खड़ा हुआ और खिड़की पर जाकर उसने एक सिगरेट सुलगा ली….. ..

विक्रम आश्चर्य से उसे देखता रहा गया….

विक्रम कुछ भी सोच पाने की हद से बाहर हो चला था, उसे लगने लगा था उसका दिमाग काम करना बंद कर देगा..
वही लड़का जो कल भदौरिया की उलटी नीतियों के ख़िलाफ़ था, आज सिर्फ पैसों के लालच में उसका साथ देने को तैयार हो गया, कैसे ?

राजाधिराज अजातशत्रु का बेटा, रियासत का भावी राजा, अरबों की सम्पत्ति का अकेला मालिक, जिसके पीछे हज़ारों लोग हाथ बांधे घूमते हो, उसे भदौरिया के बिज़नेस प्रॉफिट के हिस्से का क्या लालच हो सकता था?

“आजकल सोचने बहुत लगे हो तुम विक्रम बाबू !”

शौर्य ने विक्रम को टोका और विक्रम उसे देखने लगा..

“हम्म.. नहीं प्रिंस ऐसा कुछ नहीं है !”

“ठीक है फिर जाओ आराम कर लो.. वरना बाद में मुझ पर आरोप लगाओगे कि मैं तुमसे तुम्हारी क्षमता से अधिक काम ले लेता हूँ, तुम्हारा दोहन कर रहा हूँ  !”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं प्रिंस !”

विक्रम अपनी जगह से उठा और वहाँ से बाहर निकल गया..

शौर्य ने वापस अपना मोबाइल खोल लिया..
उसका पिछला मोबाइल एक्सीडेंट में चकनाचूर हो चुका था, और ये नया मोबाइल था..।

उस पर पिछले फ़ोन की कई चीजे नहीं थी..
जिन्हे वो कहीं न कहीं से वापस ला रहा था..
आज भी मोबाइल खोल कर वो किसी चैट एप पर चला आया..
वहाँ उसने कली का प्रोफाइल खोला और उसकी तस्वीर देखने लगा..
कली अपनी तस्वीर में मुस्कुरा रही थी…
वो तस्वीर उस वक्त की थी, जब वो इण्डिया में थी.. उस तस्वीर को देखते हुए शौर्य के चेहरे के भावों में नरमी सी आने लगी..।

उसी वक्त दरवाजा खुलने की आवाज़ हुई और विक्रम अंदर चला आया.. उसे आते देख शौर्य चौंक गया और उसने मोबाइल को एक झटके से बंद कर दिया..।

“क्या हुआ ? यहाँ क्या कर हो इस वक्त ?” शौर्य ने खीझ कर पूछा और विक्रम ने न में सर हिलाते हुए वहीँ कुर्सी पर पड़ी एक चाबी उठा ली..

“बस ये लेने आया था, आपको डिस्टर्ब करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ प्रिंस !”

एक गहरी सी साँस लेकर शौर्य ने उसे जाने का इशारा कर दिया और खुद खिड़की पर जाकर खड़ा हो गया..
उसे सूनी सूनी आँखों से बाहर देखते देख विक्रम का जी कैसा तो भी हो गया..।
लेकिन शौर्य से ज्यादा बात करना भी तो आजकल जी का जंजाल हो गया था..।
ज्यादा पूछताछ करने पर वो बौखला जाता था, नाराज़ होने लगता था। इसलिए अपने मन को काबू कर विक्रम उसे एक बार अभिवादन कर वहाँ से निकल गया.. !

****

मीठी सो रही थी, कि निरमा उसके कमरे में चली आयी.. प्यार से मीठी का सर सहला कर उसने उसका माथा चूम लिया..

“आप ऑफिस जा रही है ?” मीठी ने पूछा और हाँ में गरदन हिला कर निरमा बाहर निकलने लगी..

मीठी पलंग पर बैठ कर अपनी माँ को देखने लगी.. कितनी कर्मठ, अपने काम के प्रति एकदम ईमानदार, जुझारू और उसके और उसके पापा के लिए हद से ज्यादा संवेदनशील..
एक परफेक्ट औरत की छवि नजर आती थी उसे अपनी माँ में..

“मम्मा, हर एक लड़की की पहली नायिका उसकी माँ ही होती होगी न ?”

निरमा ने मीठी की तरफ देखा..

क्यों?”

“क्यूंकि हर बेटी अपनी माँ सी बनना चाहती है..।
बचपन से अपनी माँ को देखते हुए जो बड़ी होती है !”

निरमा जाते हुए रुक गयी, और मीठी के पास चली आयी..

“बेशक हर माँ अपनी बेटी की पहली नायिका होती है, लेकिन अपनी माँ जैसा बनना है या नहीं ये पूरी तरह से बेटी पर निर्भर करता है..।
मैंने कभी अपनी माँ जैसे नहीं बनना चाहा !”

“लेकिन क्यों माँ ?”

“बहुत लम्बी कहानी है मीठी.. मेरे बचपन की कहानी, जो मेरे अलावा सिर्फ तुम्हारी बांसुरी काकी और तुम्हारे पापा को ही पता है !”

“आपको सही लगे तो मुझे भी बता दीजिये !” मीठी ने हलकी सी आवाज़ में कहा.. और एक गहरी साँस लेकर निरमा मीठी का हाथ थाम कर बोलने लगी..

“तुम्हारी नानी मानसिक रूप से बहुत कमजोर थी, छोटी छोटी बातों पर घबरा जाती थी। उन्हें उनके ससुराल में बहुत डरा कर रखा जाता था।
   अपनी सास का डर, जेठ जेठानी का डर, ससुर जी का डर और सबसे बड़ा अपने पति का डर..। इन्ही सब आतंक के साये में जीती हुई वो गहरे डिप्रेशन की शिकार होने लगी थी..
उस ज़माने में डिप्रेशन की परिभाषा समझना लोगो के लिए मुश्किल था, इसलिए उनके स्वभाव को, उनकी झिझक को उनके डर को पागलपन का नाम दे दिया गया..।

उनकी सास यानि मेरी दादी बात बात पर उन्हें पागल होने का ताना देती…
कभी कभी उनके बाल पकड़ कर खींच देती, कभी पीठ पर धौल जमा देती। उनके लिए खाना ही नहीं बचाया जाता। पूरे घर को पका कर खिलाने वाली मेरी माँ अक्सर भूखी ही रह जाती थी..।
अपने लिए अलग से कुछ पका ले इतनी हिम्मत उनमे नहीं थी !
ताई जी के दो लड़के थे, वो पूतो वाली थी। उनसे घर का नेम वंश चलना था, इसलिए ताई जी को कई बातों की छूट थी। फिर वो हर वक्त बीमार होने का ढोंग कर वैसे भी कामकाज से कन्नी काट लेती थी..

पापा मिलिट्री में थे, वो बहुत कम घर आ पाते थे.. और जब आते तब घर के बड़े बुज़ुर्गों के बीच ही उनका पूरा दिन निकल जाता था..।
इसी बात का फायदा उठा कर दादी और ताई जी माँ के ख़िलाफ़ उनके कान भर दिया करती थी..।

पापा के पास माँ के लिए सिर्फ रात के कुछ घंटे हुआ करते, उसमे वो अपनी ज़रूरतें पूरी कर मुहं फेर कर सो रहते..।
दादी का पापा के कान भरने का सिलसिला बदस्तूर ज़ारी रहता। ऐसे में अगर, माँ कभी किसी रात अपनी मन की कहना भी चाहती, तो बरसो से दिमाग में जमा कर रखी बातों पर माँ के बिलखने का कोई असर नहीं होता!
  पापा के दिल दिमाग में दादी की कहीं बातों की जो बर्फ जम चुकी थी, उसे पिघलाने की सामर्थ्य माँ खो चुकी थी। और बरसो से जम रही इस बर्फ ने पिघल पिघल कर पापा के मन में सीड़न भरनी शुरू कर दी थी..।
पापा को दादी की कही बातें सच लगने लगी थी !

पापा एक बहुत अच्छे इंसान थे। पूरी दुनिया की मदद करने वाले, एक सच्चे और ईमादार देशभक्त के तौर पर उनकी पहचान थी। लेकिन वक्त की कमी और दोनों के बीच पल रही गलतफहमियों ने पापा को माँ की दिमागी हालत और उनके स्वास्थ्य के बारे में सोचने का अवकाश ही नहीं दिया..।

किसी से कुछ न कह पाने की पीड़ा में बिसूरति माँ की हालत बद से बदतर होने लगी थी..। मैं उस वक्त मुश्किल से नौ दस साल की थी..।
उस पूरे घर में शायद मैं ही एक ऐसी थी, जिसे अपनी माँ से सहानुभूति थी और जो अपनी माँ की पीड़ा को समझती थी..।
मैंने खुद पापा से कई बार कहना चाहा लेकिन दादी बड़ी होशियारी से मुझे पापा से दूर किये रहती।
कुछ समय बाद इलाज के नाम पर दादी और ताई जी माँ को किसी झाड़ फूंक वाले बाबा के पास ले जाने लगे..। उससे माँ की हालत और बिगड़ने लगी और फिर तो उनका डिप्रेशन वाकई पागलपन में बदलने लगा।

माँ उस घर के लिए बस एक अवेतनिक सेविका ही थी। जिसे सारे काम के बदले दो रोटी डाल दी जाती थी..।

उस वक्त पहली बार मैंने बड़ी हिम्मत कर के घर के बाहर के टेलीफ़ोन बूथ से मामा जी को फ़ोन किया था..।
मैंने उनसे माँ की सारी हालत बताई और कहा कि वो आकर मुझे और माँ को अपने साथ ले जाएँ..।
वो उस वक्त अपने काम से कहीं बाहर जाने वाले थे, इसलिए उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि वो काम से लौटने के बाद अगले ही दिन वहाँ आकर हम दोनों को वहाँ से निकाल ले जायेंगे..।

लेकिन वो कभी माँ को अपने साथ नहीं ले जा पाए !

“क्यों ?” मीठी ने अपनी बहती आँखे पोंछ कर कहा

“मैं उन्हें फ़ोन कर घर लौटी और चुपचाप अपना बस्ता उठाये स्कूल निकल गयी..।
शाम को घर आयी तो माहौल बहुत मनहूसियत भरा लग रहा था। किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी ।फिर बड़ो की बातचीत पर कान दिया तो मालूम चला पापा की छावनी पर हमला हुआ था..।

उस हमले में पापा और उनके साथियों ने डट कर मुकाबला किया और हमलावरों को मार भगाया। लेकिन उसी गोलीबारी में पापा भी घायल हो गए थे। उन्हें मिलिट्री हॉस्पिटल में भरती करवा दिया गया था।
ये सब सुन कर मुझे घबराहट सी होने लगी, मैं भाग कर माँ के पास पहुंची।

माँ अपने कमरे में दीवार से लग कर बैठी सूनी सूनी आँखों से पापा की फोटो को देख रही थी..।
मैंने उनके दोनों हाथ थाम लिए।
वो उदास आँखों से मेरी तरफ देखने लगी.. “नीरू, वो नहीं बचेंगे, मैं जानती हूँ.. !”
“कैसी बात कर रही हो माँ !”
  “मैं सच कह रही हूँ नीरू, इस बार जब वो जा रहे थे तभी मैंने जान लिया था.. उसी समय लगा इन्हें आखिरी बार जी भर कर देख लूँ..।
इसलिए सारा काम छोड़ कर मैं इनके साथ पहली बार अपनी चाय भी कमरे में ले आयी थी।
इनके साथ बैठ कर मैंने पहली बार चाय पी नीरू..।
बहुत अच्छा लगा, ऐसा लगा जैसे जन्मों की साध पूरी हो गयी। ये जाते समय बोल कर गए मेरे लिए इस बार लाल कंगन लेकर आएंगे, लेकिन मैं समझ गयी थी ये कभी कंगन नहीं ला पाएंगे..।
   मैंने मौत को सूंघ लिया था नीरू !”

  ” माँ कैसी पागलो जैसी बातें कर रही हो ! बंद करो ये बकवास, पापा को कुछ नहीं होगा ! अभी ताऊ जी और बाबा उन्हें लेने जाने वाले है !”

  ” मैं उन्हें ऐसे नहीं देख पाउंगी नीरू, कभी नहीं !
सुन, तू अपने मामा के साथ चली जाना, यहाँ मत रहना !”

   “माँ क्या बोल रही हो तुम ?”

   “और सुन, कभी अपनी माँ जैसी मत बनना, कभी नहीं ! अपने लिए निर्णय लेने की स्वतंत्रता अपने पास रखना.. कभी अपने जीवन की लगाम किसी और के हाथ में मत देना। अपने पति के हाथ में भी नहीं ! अगर पति प्रेमी हुआ तो बहुत प्रेम करना, लेकिन अगर तुझे दुःख पहुँचाने वाला हुआ तो उससे अलग होने में पीछे मत हटना। और एक बात.. अपना संबल खुद बनना, इसके लिए ज़रूरी है एक मजबूत औरत बनाना..।
इतना पढ़ना इतना पढ़ना कि अपनी ज़रूरतों के लिए किसी का मुहताज न होना पड़े.. !”
और उसके बाद माँ सिसकने लगी.. उस कमजोर सी निरीह औरत का आर्तनाद, आज भी मेरा हाड कंपा देता है मीठी.. तुम्हारी नानी से मेरी वही आखिरी बातचीत थी..।
माँ से बात कर रही थी कि बाहर शोरगुल सुनाई दिया.. मैं भाग कर बाहर चली गयी..।

बाहर कुछ मिलिट्री वाले पापा को ले आये थे। बाहर उनकी अंतिम विदाई की तैयारी चलने लगी थी..।
दादी तार सप्तक में क्रंदन करती हुई हर आने जाने वाले को पापा की बहादुरी के किस्से भी बताती जा रही थी। 
सब कुछ दुःख शोक में भयानक रूप से डूबा हुआ था। वहाँ मौजूद किसी का ध्यान माँ की तरफ नहीं था कि वो कहाँ है ? बाहर क्यों नहीं आ रही?
किसी रिवाज के लिए माँ के नाम की पुकार मची और ताई जी के साथ मैं उन्हें बुलाने अंदर चली गयी।

लेकिन माँ वहाँ कहाँ थी ?

वो तो पहले ही अपनी अनंत यात्रा पर पापा का हाथ थामे निकल चुकी थी..।

सच कहूं तो उस वक्त माँ का यूँ चले जाना मुझे अंदर से एक तृप्ति, एक आनंद दे गया..।
मुझे लगा चलो जीवन भर अलग रहे तो क्या, अपनी अंतिम यात्रा तो दोनों ने साथ ही कर ली..।
कहीं न कहीं मैं जानती थी पापा के बाद अब माँ को दादी और भी ज्यादा परेशान कर देती..।
ताई जी ने माँ का माथा छू कर देखा और चीख पड़ी.।

दोनों की अंतिम यात्रा एक साथ निकाली गयी….
जहाँ पापा के नाम के जयकारे के साथ पहली बार माँ के नाम के जयकारे भी लगे..।
लोग सती माता की जय बोलते हुए उस यात्रा में शमिल होते चले गए..।
एक तरह से पूरा गांव ही उस यात्रा का हिस्सा बनने उमड़ पड़ा ! लेकिन मैं चुपचाप पीछे खड़ी रह गयी..

मेरे दुःख की सीमा न थी और उसे समझने वाला भी कोई नहीं था…!
दादी की तरफ देखने का भी मन नहीं था मेरा..।

मेरी माँ कमजोर ज़रूर थी, लेकिन मेरा तो वही सहारा थी..।
मुझे एकबारगी लगा मैं भी मर क्यों नहीं गयी..?

मन किया गाँव के बाहर के दरिया में कूद कर जान दे दूँ, लेकिन एक जोड़ी मजबूत हाथों ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे दिलासा सा दे दिया कि खुद को कभी अकेला मत समझना..
मामा जी वहाँ पहुँच गए थे.. उन्हें देखते ही मैं फ़ूट फ़ूट कर रो पड़ी..।

उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया.. उसके बाद उन्होने मुझे वहाँ नहीं छोड़ा और अपने साथ के आये…।

मैं कभी अपनी माँ में एक नायिका को नहीं देख पायी मीठी।
वो एक मजबूत औरत नहीं थी, लेकिन जाते वक्त उनके जो आखिरी शब्द थे, वो भी मैं कभी भूल नहीं पायी…।
बस इसी बात का अफ़सोस ज़िन्दगी भर रहेगा कि मैं जानती थी दादी, पापा के मन में कितना कुछ जहर भर रही, लेकिन मैं कभी पापा को सच्चाई नहीं बता पायी। बस कुछ गलतफहमियों के कारण माँ पापा का जीवन बर्बाद हो गया !”

मीठी बड़े ध्यान से सुन रही थी..
इस सारी कहानी में कई बार उसके आंसू आये, और वो ये भी समझ गयी कि उसकी माँ इतनी मजबूत महिला क्यों हैँ..

” मम्मा आज एक बात और समझ आ गयी ?”

“क्या मीठी ?”

“यही कि आप और पापा जब भी मौका मिलता है बाहर गार्डन में बैठ कर साथ में चाय क्यों पीते हैँ ?”

मीठी अपनी माँ के गले से लग गयी..
उसके दिल का बोझ अचानक हल्का सा हो गया था…

“हो सकता है नानी आपकी नायिका न रही हो, लेकिन मेरी तो मोस्ट फेवरेट हीरोइन मेरी मां ही है..।। सुपर स्मार्ट, इंटेलिजेंट, ब्यूटीफुल, चार्मिंग.. और..

“बस बस… अब जल्दी से उठ कर तैयार हो जाना ! सुबह तुम्हारे लिए महल से लंच का इन्विटेशन आया है !”

“ओह्ह.. !”

“हम्म, सुबह रानी साहब का फ़ोन आया था। उसके बाद वहां से एक नौकर एक कार्ड भी दे कर गया है.. मैं तो यूनिवर्सिटी में रहूंगी, मेरा जाना मुश्किल है.. तुम ही चली जाना !”

मुस्कुरा कर निरमा ने मीठी के बालों पर हाथ फेरा और बाहर निकल गयी..

मीठी भी अपनी माँ को बाय बोलने नीचे चली आयी.. दरवाज़े पर खड़ी वो अपनी माँ को ऑफिस के लिए निकलते देखती रही..
आत्मविश्वास से भरे लम्बे डग भरती निरमा काम पर चली गयी थी..।

और पीछे छोड़ गयी थी अपनी बेटी के मन में विश्वास का खिलता फ़ूल जिसकी महक से मीठी पिछली रात की कड़वाहट को भूल कर नए उत्साह से आज के नए दिन की चुनौतियों से लड़ने को पूरी तरह से तैयार थी…

क्रमशः

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उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

सच कहूं तो रोंगटे खड़े हो गए डॉक्टर साहिबा निरमा की मां की कहानी सुनकर।
और यह एक कहानी किसी एक अकेली औरत की नहीं है बल्कि उन हजारों लाखों औरतों की है जो ऐसी स्थिति में जीवन की रही है या जीती आई है और वह ऐसी ही परिस्थितियों में अपना जीवन निकाल देती हैं मैं खुद ऐसी कई औरतों को देखा है जिन्होंने ऐसा जीवन जिया है।
पर आज अपनी नानी यह जीवन से सीख लेकर मीठी के मन में जो साहस जगह है वह उसके और हर्ष के रिश्ते को कभी भी डूबने नहीं देगा।
अच्छा किया निर्माण है जो अपनी बच्ची के दिमाग पर पड़ी हुई उस भ्रम रूपी धूल को हटा दिया पन्ना भावों के अतिरेक में रहकर पता नहीं क्या निर्णय लेती और शायद अपना और हर्ष का नुकसान कर बैठती

Meera
Meera
1 year ago

फू साहेब की फुल , अब मीठी का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी , आज जो उसने अपनी मां से , अपनी नानी की बात सुनी है कुछ चंद शब्दों ने उनकी मां को इतनी हिम्मती बनाया है तो वो तो खुद निरमा की बेटी है और प्रेम का पूरा जीवन , ऐसे कैसे कोई फू आ कर उस से उसकी जिंदगी उसका प्यार हर्ष छीन सकती है !!
👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

बहुत अच्छा भाग 👌👌👌👌💐💐💐
आज निरमा की माँ के बारे मे पता चला और निरमा ने इनसब मे बहुत सफर किया शायद इसलिए उसमे इतनी हिम्मत है और मीठी निरमा की बेटी है और निरमा की बेटी कमजोर नहीं हो सकती ये फू फा फी साहेब 😏मीठी का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी।एक नए जोश के साथ मीठी अपने प्यार,अपनी मंजिल तक पहुंचेगी।
लाजवाब भाग 👌👌👌👌💐💐💐💐⭐⭐⭐⭐⭐।

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Nisha
Nisha
1 year ago

Super part 😘😘😘👌👌👌👌👌👌🥰🥰🥰

जागृति
जागृति
1 year ago

Very nice and intresting

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
1 year ago

Bahut sundar

Ritu Jain
Ritu Jain
1 year ago

Happy Diwali diii and all my dear friends

Varsha
Varsha
1 year ago

Please post jeewansaathi season 3 part 124

Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
1 year ago

Awesome part….very nice story 😍 bahut hi badhiya story 😍