मायानगरी -2 भाग -8

मायानगरी -2 भाग -8

प्राची को छोड़ने रंगोली और झनक नीचे तक चले आये..

“रात में ही जाना ज़रूरी था क्या, कल सुबह चले जाते ?”

“हम्म ज़रूरी था, अभी शिफ्ट हो जाउंगी और कल की  छुट्टी वाले दिन ज़रूरी सामान खरीद लाऊंगी.. यहाँ हॉस्टल में तो सब मिला था, वहाँ मेरे पास कुछ भी नहीं है ! और तुम लोग जानते ही हो कि एक संडे के अलावा हमे कोई छुट्टी नहीं मिलती !”

अधिराज बाहर खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था..
प्राची, रंगोली और झनक के गले से लग कर उनसे विदा लेकर जैसे ही पलटी, उसके सामने उसकी माँ खड़ी थी..

दूर उनकी गाडी खड़ी थी..
अपनी माँ को सामने देख उसके माथे पर बल पड़ गए..

“आप यहाँ कैसे ?”

“कैसे मतलब ? तुम्हारी माँ हूँ तुमसे मिलने नहीं आ सकती ?”

“आ सकती हैँ, लेकिन कभी ऐसे सरप्राइज दिया नहीं न आपने ?” प्राची को उन्हें देख कर किसी तरह की ख़ुशी नहीं मिल रही थी..

“आओ गाड़ी में बैठो.. तुम्हे छोड़ दूँ ?” प्राची की माँ ने कहा

“छोड़ तो आप बहुत पहले चुकी हैँ !” प्राची ने धीमे से कहा और अधिराज की तरफ बढ़ गयी..

“मेरा दोस्त आया है, वो मुझे घर तक छोड़ देगा !”

अधिराज ने प्राची की तरफ देखा और फिर उसी के साथ कदम मिला कर आती उसकी माँ की तरफ देखने लगा

“जाओ प्राची, अपनी मॉम के साथ ही चली जाओ !”..

अधिराज ने धीरे से कहा..
प्राची ने उसे घूर कर देखा..

“जाने को मैं अकेले भी जा सकती हूँ, तुम्हे पता है मुझे किसी की ज़रूरत नहीं !”

प्राची के ऐसा बोलते ही अधिराज ने उसे देख कर धीमे से न में गर्दन हिला दी..

“अपनी मॉम की बात मान लो, मैं पीछे अपनी बाइक पर आ रहा हूँ !” इस बार अधिराज के कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि प्राची मना नहीं कर पायी।
   वैसे भी हॉस्टल के बाहर वो किसी तरह का तमाशा नहीं करना चाहती थी..
वो जाकर अपनी माँ की गाडी में बैठ गयी..

“तुम भी आ जाओ !” उन्होंने अधिराज से कहा और अधिराज ने अपनी गाड़ी की तरफ इशारा कर दिया..

“ठीक है, लेकिन गाड़ी को फॉलो करते हुआ आना ज़रूर, वापस मत चले जाना.. हम लोग यहाँ से खाना खाने चलेंगे !”

“जी !” एक छोटा सा जवाब देकर अधिराज ने अपनी गाडी निकाल ली..

प्राची की माँ कि गाडी के पीछे अधिराज भी निकल गया…
उन लोगो के जाते ही रंगोली और झनक वापस मुड़ गए..

‘”कितनी सुंदर है न प्राची मैम की मम्मी ?” रंगोली ने कहा और झनक ने हाँ में गर्दन हिला दी..

“सुंदर तो है लेकिन थोड़ी अजीब लगती है मुझे ! कहाँ तो माँ बाप अपना सारा जीवन बच्चो के पीछे लगा देते हैँ, और कहाँ ये अपने जीवन को बनाने के चक्कर में बेटियों का जीवन स्वाहा कर गयी !”

“हम्म, लेकिन एक तरह से देखा जाए तो ठीक भी है न, अगर वो अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में खुश नहीं थी, तो उनका अलग होना सही भी तो था…।
उन्होंने अजेय सर से पैसो के लालच में तो दूसरी शादी की नहीं.. वो तो सच में उनसे प्यार करने लगी थी न ?”

“रंग बेबी, ये ‘सच में प्यार’ क्या होता है ? अब अगर उन्हें किसी से और प्यार हो जायेगा तो, अजेय सर को भी छोड़ कर चली जाएँगी क्या ?
नहीं न ?
कहीं न कहीं समझौता तो करना ही पड़ता है जीवन में.. हर मनचाही चीज़ हमें मिल जाये ये सम्भव नहीं..।
और हर इच्छित वस्तु के पीछे भागना भी कोई समझदारी नहीं..।
बहुत बार, बल्कि अधिकतर बार हमें जीवन में समझौते करने पड़ते हैँ !
  प्राची मैम की मॉम की एक गलती ने कितनी ज़िंदगियाँ बर्बाद कर दी..
अगर आज वो प्राची मैम के फादर के साथ होती तो प्राची मैम कभी ऐसे स्वभाव की नहीं होती..। उन्हें कभी सिगरेट शराब की लत नहीं लगती.. ।
और तो और गौरी मैम भी किसी मेंटल ट्रामा की शिकार नहीं होती..।
दोनों बहने एक साथ हंसी ख़ुशी रहती…
और दूसरी तरफ अजेय सर अपनी पत्नी के साथ होते तो वो भी इतना बीमार नहीं रहती और मृत्युंजय सर का जीवन भी सरल हो जाता..।”

“हम्म.. तू कितना सोचती है झनक.. लेकिन बात एकदम सही बोलती है !”

दोनों बातें करती अपने कमरे में चली गयी..

प्राची की माँ उसे लेकर अपने घर चली आयी..
घर देख कर प्राची के माथे पर बल पड़ गए..

“यहाँ क्यों लायी हैँ आप ?”

“प्राची ये घर है तुम्हारा, ऐसा क्यों कर रही हो ?”

“मुझे देर हो रही.. फ़्लैट में शिफ्ट होना है, किचन सेट करना है ! बहुत काम है मुझे !”

“जानती हूँ बहुत काम है तुम्हे, और शायद इसलिए तुम भूल गयी कि आज तुम्हारी माँ का बर्थडे है…। 
सुबह से अकेले पड़े पड़े सोचती रही और फिर जब शाम को मन भर आया तो तुमसे मिलने चली आयी..
मानती हूँ तुम्हारी माँ बहुत गलत है।  हमेशा बस अपने बारे में सोचा मैंने, और तुम सब कि ज़िन्दगी ख़राब कर दी, लेकिन मुझे मेरे बारे में सोचने की खुद की ख़ुशी ढूंढने की तुम सब ने कोई कम सजा तो नहीं दी..।

आज मेरे पति अजेय के अलावा और कौन है मेरे पास ?

  मैंने मेरी ख़ुशी के बारे में सोच कर तुम्हारे पापा से तलाक ले लिया, तो मैं गलत हो गयी। क्यूंकि मैंने अपने बच्चो के बारे में नहीं सोचा, अपने पति के बारे नहीं सोचा… ?
लेकिन एक बात बताओ प्राची क्या माता पिता का यही फ़र्ज़ है.. कि बच्चे होने के बाद अपनी सारी ज़िंदगी बच्चो के पीछे खर्च दे।
और जो माँ बाप ऐसा न करे, बच्चे उन्हें अपने जीवन से बिलकुल ही भुला बैठते हैँ..।
जैसे तुमने किया !
और मान लो मैंने तुम्हारे पापा से तलाक नहीं लिया होता और घुट घुट कर सारी ज़िंदगी काट भी लेती, तब भी कौन सी गारंटी थी कि तुम और गौरी मुझे पूछते या मेरा ख्याल रखते..?

एक तरफ आज का समाज कहता है अपनी ख़ुशी के लिए जियो, भरपूर ज़िन्दगी जिओ। लेकिन अगर कोई औरत अपनी परिपाटी से अलग सच में अपनी ख़ुशी के लिए जीने लगे, तो वो समाज ही नहीं अपने, अपनों की नजर में भी चुभ जाती है…
तुम जाना चाहो तो लौट जाओ..

मैं बस तुम्हारे साथ डिनर करना चाहती थी !”

उनकी बात सुन कर प्राची की आँखे भीग गयी थी।
वो चुपचाप अंदर की तरफ बढ़ गयी.. अधिराज वहीँ खड़ा था..।
वो वापस मुड़ने को सोच रहा था कि उन्होंने उसे भी बुला लिया..

“आओ अधिराज, अंदर आओ.. तुम भी हम लोगो के साथ डिनर कर लो !”

“अजेय सर नहीं दिख रहे ?” अधिराज ने माहौल हल्का करने के लिए पूछा..

“वो किसी काम से इण्डिया से बाहर गए हैँ !”

टेबल पर एक दूसरे के सामने बैठे तीनो लोग चुप थे.. अधिराज को लग रहा था, कैसे वो यहाँ से भाग निकले, लेकिन वो चुपचाप बैठा था…
प्राची की माँ ने ही बोलना शुरू किया

“तुम तो कुछ खा ही नहीं रहे हो अधिराज ! वैसे तुम्हारा नाम बड़ा अलग सा है.. यूनिक !”

अधिराज हल्का सा मुस्कुरा उठा..

“घर पर कौन कौन है ?”

अधिराज ने प्लेट से सर उठा कर उनकी तरफ देखा..
और हल्के से मुस्कुरा उठा..

“दादा जी है दादी है, ताऊ जी है ताई है, उनके तीन बच्चे, यानि मेरे तीन बड़े भाई बहन हैँ, मेरे मम्मी पापा, मेरी छोटी बहन, मेरे दो चाचा और चाची उन के दो दो बच्चे हैँ, एक बुआ जी भी है.. !”

“अरे बस बस.. मैंने खानदान नहीं पूछा… बस ये पूछा कि घर पर कितने लोग साथ रहते हैँ ?”

“हम सब साथ ही रहते हैँ !” अधिराज के चेहरे पर शैतानी भरी मुस्कान आ गयी..

“मेरी जॉइंट फैमिली ही है.. मेरे घर पर लगभग बीस लोग हम साथ रहते हैँ.. मेरे घर से लगे दोनों तरफ के घर भी हमारे रिश्तेदारों के ही हैँ.. दादा जी के भाइयें के परिवार है, और सामने तरफ दादी के भाइयों के परिवार है.. एक तरह से एक छोटा क़स्बा ही पूरा हमारा है..।
खानदान में देखे तो चार पांच सौ तक सगे ही हैँ हमारे !”

प्राची की माँ आँखे फाड़े उसे देख रही थी, प्राची सर झुकाये प्लेट से खाना खा रही थी….

“प्राची तुम इतनी बड़ी फॅमिली में रह लोगी ? आई मीन कैसे एडजस्ट करोगी ?”

उनकी ये बात सुन कर प्राची आंखे फाडे अपनी माँ को देखने लगी, अधिराज के गले में खाना फ़ंस सा गया और उसे खांसी आने लगी..

“हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं है !” प्राची ने कहा और अधिराज की तरफ देखने लगी।
जिससे वो उसकी बात में सहमति दे, और उसका इशारा समझ कर हामी भर दे..

लेकिन अधिराज ने कुछ नहीं कहा..
उन दोनों की इशारे बाजी देख कर प्राची की माँ मुस्कुरा उठी..

“वैसे बड़ी फॅमिली के होने फायदे भी होते हैँ !” उन्होंने वापस कहा और इस बार प्राची खड़ी हो गयी..

“अब हम लोगो को चलना चाहिए, देर हो रही है !”

अधिराज भी उठ गया, प्राची की माँ दोनों को बाहर तक छोड़ने चली आयी..

“आज मेरे साथ डिनर करने के लिए थैंक यू !”

एक गहरी सी साँस भर कर उन्होंने कहा और प्राची अधिराज के साथ आगे बढ़ गयी..
आगे बढ़ने के बाद प्राची को लगा एक बार वापस जाकर अपनी माँ के गले से लग जाये, लेकिन संकोच से वो वहीँ ठिठक कर खड़ी रह गयी..

कुछ कदम ठहरने के बाद वो अधिराज के साथ अपने फ़्लैट के लिए निकल गयी..

एक बड़े से अपार्टमेंट में अधिराज ने ही प्राची के लिए फ़्लैट देखा था.. वो खुद भी उसी अपार्टमेंट में रह रहा था..!

जब प्राची को दूसरी बार हॉस्टल वार्डन की तरफ से नोटिस मिला तब उसने फ्लैट देखने की गुजारिश की और आनन फानन में अधिराज ने अपने अपार्टमेंट में ही उसके लिए भी फ्लैट देख लिया।

प्राची को वहां रहने में कोई दिक्कत नहीं थी। और इसलिए आज का दिन उसने चुना था वहाँ शिफ्ट होने के लिए।
अगला दिन रविवार था, और उस दिन वह अपने फ्लैट के लिए जरूरी सामान खरीद सकती थी। बस यही सोचकर वह हॉस्टल छोड़कर निकल आई थी।

पहले ही मन बहुत भावुक हुआ जा रहा था, उस पर उसकी मां ने उसे थोड़ा और भावुक कर दिया। आज पता नहीं क्यों अपनी मां से मिलकर लौटते वक्त उसे लगा एक बार पलट कर अपनी मां के गले लग जाए, लेकिन वह इन मामलों में जरा संकोची थी। उसे कभी भी अपने दिल का प्यार दिखाना या जताना नहीं आया।

उसकी मां ने भी अधिराज को लेकर अजीब सी बात पूछ ली।

इस बात से भी वह जरा झेंप गई थी। पता नहीं अधिराज भी क्या सोचता होगा?
वह चुपचाप फ्लैट की चाबी लिए फ्लैट में दाखिल हो गई।
उसके पीछे अधिराज भी अंदर आते आते बाहर ही ठहर गया।

” क्या हुआ अंदर नहीं आओगे?”

” बहुत लेट हो गया है। अब तुम आराम करो।
  मैं ठीक तुम्हारे ऊपर वाली मंजिल पर ही हूं।कुछ भी जरूरत हो, तो फोन कर लेना।”

प्राची ने बस गर्दन हिलाई और दरवाजा बंद कर वापस मुड़ गई।
     यहाँ शिफ्ट होने पर ही आज पहली बार उसने अपना फ्लैट देखा था। उसे अपना फ्लैट बड़ा पसंद आया।
कमरे में फर्नीचर के नाम पर सिर्फ एक स्टडी टेबल के साथ एक कुर्सी रखी थी। अधिराज ने अपने कमरे से एक गद्दा लाकर जमीन पर डाल दिया था। जिस पर एक साफ सुथरी चादर बिछी हुई थी। एक ओढने की चादर और एक ताकिया रखा था।
    और बस इतना सामान उसके लिए काफी था। उसने अपनी पीठ पर टांग रख बैग को नीचे रखा और उसमें से सिगरेट का पैकेट निकाल लिया।

एक सिगरेट जलाकर वह उस हाल की बालकनी के ग्लास डोर को खोलकर बाहर चली आई।
    बालकनी की ठंडी हवा उसे तरोताजा कर गई।
सिगरेट फूंकती वह वहां खड़ी अपने बारे में सोचने लगी।

अपने ख्यालों में गुम प्राची दूसरी सिगरेट जलाने वाली थी कि तभी उसके कानों में कहीं से आवाज पड़ी।

” बस बहुत हो गया, दूसरी नहीं जलाना। जाओ चुपचाप सो जाओ।”

प्राची ने इधर-उधर देखा, आखिर अधिराज की आवाज आ कहां से रही है? उसने पलट के पीछे देखा। लेकिन फ्लैट का दरवाजा तो बंद था।
बालकनी से ही झांक कर उसने ऊपर की तरफ देखा, उसके ठीक ऊपर वाले फ्लैट की बालकनी पर अधिराज खड़ा था।

अधिराज अपनी बालकनी की रेलिंग पर अपने दोनों हाथ टिकाए उसे ही देख रहा था।

” तुम क्या वहां से मुझे रूल करोगे?”

” पहली सिगरेट के लिए नहीं टोका ना, लेकिन अब दूसरी मत लो।
जाओ सो जाओ। बहुत देर हो गई, फिर कल हमें बहुत सारा काम रहेगा।”

प्राची ने घूर कर अधिराज को देखा और फ्लैट के अंदर चली गई…

क्रमशः

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Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

seema Kawatra
seema Kawatra
1 year ago

कुछ ना होने के बाद भी बहुत कुछ है इन दोनों के बीच

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

मैं सच मे आज के भाग की समीक्षा करना करना चाहती हूँ पर हमेशा की तरह जब बहुत कुछ मन मे चल रहा तो शब्द साथ नहीं देते वैसा ही हो रहा आज भी,, फिर भी कुछ नहीं से..कुछ तो…,।आज झनक ने जो कुछ भी कहा बहुत हद तक हर औरत के हिस्से मे यही आता समझौता.,प्राची की माँ मे खुद की आजादी चुनकर खुद की ज़िन्दगी तो आसान कर दी पर अपनी दोनों बेटियों का बचपन उनकी माँ के बिना परवरिश का असर दोनों बेटियों को सहना पड़ा और उसका एक कदम,मृत्युंजय, मृत्युंजय की माँ,प्राची और गोरी की ज़िन्दगी की राहें मुश्किल कर गई एक कदम बहुत दूर तक पीछे धकेल देता है इंसान को शायद इसीलिए औरत इतना कुछ सोचकर समझौता कर लेती है ताकि जो भी दुख हो मेरे तक रहें,मेरे बच्चों,मेरे परिवार को कोई आंच ना आए।पर कहीं कहीं ऐसा भी होता है बच्चे माँ का त्याग समझ नहीं पाते और एक समय पर माँ ही गलत ठहराई जाती है 🤦।पता नहीं क्या क्या लिख रही हूँ 🙏 इमोशनल हो गई पढ़ते पढ़ते 🥺।
बहुत अच्छा भाग 👌👌👌🙏

Last edited 1 year ago by Manu Verma
Rekhapradeepsrivastava
Rekhapradeepsrivastava
1 year ago

अधिराज की फैमिली तो सच में बहुत ही बड़ी है, उसकी मां ने पूछ ही लिया कि प्राची तुम इतनी बड़ी फैमिली में रह लोगी मां है आखिर सब समझ गई,अधिराज ही है जो प्राची को अच्छे से संभाल सकता है।
आज प्राची की मां ने बहुत अच्छी बात कही कि वैसे तो समाज कहता अपनी खुशी के लिए जियो और जब औरतें ये काम करती है तो वही समाज उनको गलत ठहराता है।
बहुत ही बेहतरीन पार्ट 👌👌👌👌👌♥️♥️♥️♥️♥️

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
1 year ago

Bahut sundar

Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
1 year ago

Awesome part ♥️ adhiraj parchi ko like karta he..superb story…

Jagruti
Jagruti
1 year ago

Adhiraj bahut hi samjdar hai ,vo prachi ko sambhal lega.

Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Very interesting and Fantastic n Fabulous n Shandaar and Jaberdast part, Prachi or Adhiraj ke baraya me Jan kar accha laga.

Arun Kumar
Arun Kumar
1 year ago

🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻

Deepa verma
Deepa verma
1 year ago

दो दिल मिल रहे हैं मगर चुपके चुपके ❤️ बेहतरीन भाग 👌🏻👌🏻