
अतिथि -10
चारों लोग गली के बाहर बने आइस क्रीम पॉइंट की तरफ बढ़ गए..
“मैं चौको बार खाऊंगा, नहीं मैं बटर स्कॉच का कोन खाऊंगा, नहीं नहीं मैं… “
चिंटू भयंकर कन्फ्यूज़ था !
उसके साथ अक्सर यही होता था.. एक तो कभी महीने दो महीने में ये स्वर्णिम मौका मिलता था।
वरना तो गर्मियों के दो महीने, हफ्ते में एक आध बार पापा वही फॅमिली बार उठा लाते थे। जिसमे से मम्मी काट काट कर आइसक्रीम का टुकड़ा पकड़ा देती थी। वो छोटा सा टुकड़ा तो बस दांतो के बीच ही कहीं गुम हो जाता था..।
आइसक्रीम का असली मजा तो पूरा कोन पकड़ कर खाने में ही आता था…
जब तक आइसक्रीम के दो बड़े बड़े गोले कोन में ठूंस ठूंस कर न भरे जाए, और ऊपर से चौको चिप्स, कतरी चेरी न बुर्की जाये तब तक आइसक्रीम खाने का क्या मजा…?
अहा !!
उसका बस चले तो बिना जरूरत भी वो चॉकलेट सिरप के कुण्ड में अपनी आइसक्रीम को भरपूर डुबकियां लगवा कर भवसागर पा करवा ले..
काउंटर पर मंजरी ही आर्डर करने खड़ी थी..!
उसने पीछे पलट कर डिंकी और माधव की तरफ उनका फ्लेवर पूछने के इरादे से देखा, और दोनों ने एक साथ कह दिया.. ” ब्लेक करेंट !”
मंजरी ने हलकी सी गर्दन टेढ़ी करी और वापस सामने घूम गयी..
सबके फ्लेवर ऑर्डर करने के बाद मंजरी पैसे निकालने ही जा रही थी कि माधव आगे चला आया..
“आप रुकिए, मैं दे देता हूँ !”
“नहीं, कोई औपचारिकता की बात नहीं है, मैं दे देती हूँ !”
माधव ने मंजरी की बात सुने बिना रुपये काउंटर पर बढ़ा दिए..
चिंटू अपनी आइसक्रीम लिए, बाहर निकल गया..
वो तीनो भी बाहर बगीचे में बनी बेंच की तरफ बढ़ गए..
“क्या कर रहे है यहाँ आप ?” मंजरी ने यूँ ही बात शुरू कर दी
“जॉब के लिए आया हूँ !”
“रहने वाले कहाँ के है ?”
“वैसे तो गोरखपुर में पापा की जॉब है, लेकिन रहने वाले यहीं बांगरमऊ के है, पुश्तैनी घर यहीं है !”
“अरे वाह, बांगरमऊ तो बड़ा पास है.. वैसे मुझे भी हमारे कानपुर से ज्यादा यही लखनऊ भाता है..। बचपन यही गुजरा है न.. बचपन में एक बार जनेश्वर में गुम हो गयी थी मैं !”
अपनी बात कह कर मंजरी हंसने लगी..
“कभी गोमती में बोटिंग की है ?” मंजरी ने पूछा
“हाँ बचपन में… !!”
“मम्मी पापा के साथ आते रहे होंगे ?”
“नहीं, बाबा के साथ आता था, यहाँ बांगरमऊ में बाबा का घर था। चौथी कक्षा तक यही पढ़ा हूँ !
उन्ही के पास रह कर..
उनके गुजर जाने के बाद पापा अपने साथ ले गए !”
“अरे वाह, तब तो बड़ा मजे का बचपन रहा होगा आपका ? बाबा दादी ज्यादा ही लाड़ जो लड़ाते है ?”
मंजरी ने चहक कर पूछा.. और अपना बचपन याद कर के माधव के चेहरे पर उल्लास छ गया..
“बहुत शानदार बचपन था मेरा। पढाई लिखाई से कोसो दूर… ।
सुबह उठते ही झील की तरफ के बगीचों में निकल जाता था, दो चार मेरे जैसे आवारा दोस्त जोड़ रखें थे मैंने। हम सब मिल कर पूरा दिन आवारागर्दी करते थे। कभी किसी के आम के बगीचे में घुस कर आम चुरा लिए, कभी किसी की बकरी की रस्सी खोल भगा दी..कभी किसी की मुर्गी भगा दी !
कभी कभी पूरा दिन मच्छी पकड़ते निकाल दिया करते थे.. !”
“ओह्ह फिर क्या करते थे उन मछलियों का ?”
“बाजार में जाकर औने पौने दाम में बेच आते थे !”
माधव ये बता कर ज़ोर से हंसने लगा, और उसकी हंसी से ऐसा लगा, वो जगह वो समय जगमगा गया..।
ऐसी उन्मुक्त हंसी वो अमूमन हँसता नहीं था, लेकिन शायद अपने बचपन के समय में जाकर उसे बहुत भला सा लग रहा था…
“मैं बहुत ज्यादा शरारती था !”
“था मतलब, अब नहीं है ?” मंजरी ने हंस कर पूछा
“नहीं… बाबा के जाने के साथ मेरी सारी शरारते भी चली गयी..। पापा मुझे और दादी को आपने साथ ले गए। लेकिन दादी वहां नहीं रह पायी और वापस गांव लौट आयी..।
लेकिन पढाई के नाम पर मुझे पापा ने रोक लिया..
और इसके साथ ही मेरी शरारते भी थम गयी, हमेशा के लिए !”
“उसके बाद ?” इतनी देर से शांति से सब कुछ सुनती डिंकी बोल पड़ी
“उसके बाद पढाई में लग गया ! शहर का स्कूल, नया माहौल, नए दोस्त, इन सब के बीच खुद को खोया खोया सा पाता था।
लेकिन फिर जल्दी ही खुद को पढाई की किताबो में पा लिया.. !”
“मतलब पढाई पसंद आ गयी आपको ?” डिंकी मुस्कुरा उठी..
“पढाई पसंद आयी या स्कूल में साथ पढ़ने वाली कोई? हमे क्या पता डिंकी ?” इस बार मंजरी चहकी..
आज बड़े दिनों बाद माधव भी अच्छे मूड में था..
वो हल्के से हंस पड़ा..
“नहीं, न पढाई अच्छी लगी न कोई साथ पढ़ने वाली..।
पहले पहल तो पढाई बिलकुल पसंद नहीं आती थी, रात दिन बांगरमऊ की याद सताती थी! बाबा की हवेली, उसके सामने का बड़ा कुंआ, चबूतरा, उसके सामने का शिव जी का मंदिर, शाम को होने वाली सामूहिक आरती, शाम को आंगन में पानी के छिड़कने से उठने वाली खुशबु, बाबा की अन्टी से चुराए पैसो से पी बीड़ी,अम्मा के हाथ की घी रोटी, जाने कितने आकर्षण थे जो मुझे गोरखपुर में रहने से रोक रहे थे..।
पहले पहल पापा से कहा फिर एक दिन स्कूल में जब मास्टरजी ने होमवर्क न किये जाने पर मेरी पीठ में अपनी छड़ी तोड़ दी, तब मैं भी वहां से भाग कर सीधा बांगरमऊ पहुँच गया..
लेकिन… “
“क्या हुआ फिर ?” चिंटू की बड़ी बड़ी आँखे विस्मय से और चौड़ी हो गयी..
“लेकिन अम्मा के हाथ के बने रसीले आमरस में अभी पूड़ी डूबा कर खा भी न पाया था कि पापा वहाँ पहुँच गए, और अम्मा से झगड़ा कर मुझे बिना खाये पिए ही आपने साथ ले गए..।
रास्ते भर उन्होने कोई बात नहीं की, और वहाँ जाते ही मुझे फरमान सुना दिया, कि अब अगर मैंने कोई शरारत की, तो वो मेरा गाँव जाना हमेशा के लिए बंद करवा देंगे..।
और अगर मैं गर्मी की छुट्टियों में अम्मा के घर जाना चाहता हूँ, तो शहर में तमीज से रहना और पढ़ना सीख लूँ..
बस उस दिन के बाद से एक ही जूनून सवार हो गया.. किसी भी तरह खूब पढ़ना है और बस पढ़ना है !”
“वाह… आपकी कहानी तो बड़ी मजेदार है ! अम्मा क्या अब… ?”, डिंकी ने आगे का वाक्य जानबूझ कर अधूरा छोड़ दिया
“अम्मा अब भी बांगरमऊ में ही रहती है… बाबा की हवेली खूब बड़ी है, उनका कहना है इतनी बड़ी हवेली छोड़ कर नहीं आ सकते.. भूतो का डेरा हो जायेगा यहाँ !”
ये कह कर एक बार फिर वो झेंपते हुए हंस पड़ा और उसकी हंसी से वो शाम उद्भासित हो गयी…
क्रमशः

Super part 😘😘
माधव ने अपना बचपन जीने के लिए पढाई की
बेहतरीन पार्ट
👌👌👌👌
आइसक्रीम के नाम पर तो बच्चों को कोई रोक ही नहीं सकता और खासतौर से बच्चों को तो चॉकलेट फ्लेवर ही पसंद आता है।
बच्चों को खाने की जगह अगर दिन रात आइसक्रीम भी खिलाई जाए तो भी कम है उनका ना कभी मन भर सकता है और ना ही पेट😊😊😊😊😊😊
आज तो माधव ने सभी को अपने बचपन के दिनों में ले जाकर छोड़ दिया माधव का बचपन बड़ा शरारत भारत और खुशहाल था तभी वह अब इतना उदास उदास सा रहने लगा है सच कहते हैं की मां-बाप से ज्यादा ज्यादा दादी स्नेह करते हैं और इस स्नेह को माधव याद कर कर उदास बना रहता है
तो आज सबने माधव के साथ साथ अपना बचपन भी याद कर लिया। दादी बाबा का दुलार, नदियां, पेड़, शरारत सच में कितना शानदार था बचपन ना कोई चिंता ना कोई फिक्र।
पढ़ाई के लिए इतने सख्त नियम बने की माधव का मन पढ़ाई में ही लग गया।
आइस्क्रीम wow चिंटू के तो मजे ही हो गए।
Very very nice part 👌👌
😊आज माधव के बचपन की बातें सुनकर बहुत अच्छा लगा और मुझे अपना बचपन याद आ गया,सच ही कहते है सुकून तो बचपन मे ही था ना कोई परेशानी,ना कोई ज़िम्मेदारी।
अरे वाह अपर्णा..जैसे आपने आइसक्रीम खाने का अंदाज बताया है मुझे भी बस ऐसे ही कोन भरकर खाना पसंद है और butterscotch ही मेरा फेवरेट फ्लेवर है।कैसा इत्तेफाक है आज आपने वही सब लिखा जो मुझे बेहद पसंद है,कुछ यादें बचपन की,कुछ खाने का शौक 😊।
खूबसूरत भाग,लाजवाब भाग 👌👌👌👌👌👌👌👌👏👏👏🙏।
माधव की कहानी तो वाकई बाहत मज़ेदार है। इस तरह से शायद ही किसी को पढाई में इंटरस्ट आया हो जैसे माधव को आया। खैर बाल मन होता ही ऐसा है, उससे प्यार से या कोई लालच देकर ही कुछ करवाया जा सकता है, जबरदस्ती आप बालक से कुछ भी नहीं करवा सकते। जहाँ मंजरी बहुत इंटरेस्ट ले रही है माधव की बातों में वहीँ डिंकी तो जैसे डूबी हुई है उसकी कहानी में। उसे माधव की हर बात अच्छी लगती है। क्या मैं पिछले भाग में मंजरी और माधव का आपस में इंट्रोडक्शन स्किप कर गया। मेरे हिसाब से तो मंजरी ने पूछा ही नहीं कि ये कौन है।
Nice part…
👌👌👌👌👌👌👌👌