अतिथि-6

अतिथि -6


   आज शाम माधव मिलने के लिए आने वाला था, सुलोचना उन्ही तैयारियों में लगी थी.. उसकी जोइनिंग हो चुकी थी..
उसके रहने का क्या ठिकाना इस पर सुलोचना विनोद से दो दिन से झींक रही थी, लेकिन आम आदमियों की तरह विनोद के भी कान में जू नहीं रेंग रही थी!

महीने का पहला हफ्ता था, जो अक्सर मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए दीवाली सा होता है।
सुलोचना के संसार में ज़रूरी गैरज़रूरी हर सामान इस वक्त मौजूद था। कल ही वो सुपर मार्किट जाकर राशन का सामान लायी थी..
  वैसे तो अग्रवाल जी की दुकान से ही सामान आता था, लेकिन इस बार पन्द्रह सौ से ऊपर की खरीदी पर  चीनी सिर्फ तीन रूपये किलो और तेल में पांच लीटर की खरीदी पर दो लीटर मुफ्त की योजना थी..।
बस उसे ही सुलोचना ने लपक लिया था..
वो बड़े मन से बेसन फेंट रही थी..
चाय के साथ पकौड़े निकाल लेगी, फिर रात के खाने में देख लेगी, कम भूख हुईं तो सिर्फ पुलाव बना लेगी !

उसके चाय चढ़ाते ही दरवाज़े की घण्टी बज गयी..
विनोद के साथ साथ ही माधव ने भी प्रवेश किया। उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था, आज लड़का थोड़ा ज्यादा स्मार्ट भी लग रहा था..।
सफेद सी शर्ट के साथ उसने भूरी पेण्ट पहन रखी थी.. उसने मुस्कुरा कर सुलोचना के पैर छुए और डिब्बा उसकी तरफ बढ़ा दिया..

हाय ये मुस्कुराता है तो दाएं गाल पर कैसा लम्बा सा गड्ढा पड़ जाता है! सुलोचना भी मुस्कुरा उठी..

“कैसे हो बेटा ?”

“जी ठीक ! ये मिठाई आप लोगो के लिए। यहाँ की किसी दुकान का कोई आईडिया नहीं था, तो बस ऐसे ही ले आया !”

“अरे नहीं नहीं, तुम्हे लाने की ज़रूरत भी क्या थी ?”

“मेरी जॉब लग गयी है न ?” माधव शायद सुलोचना का प्रेम व्यवहार वाला सवाल समझ नहीं पाया, लेकिन ये बात सुलोचना समझ गयी और हंस कर अंदर चाय और पकौड़े लेने चली गयी..

दो अलग अलग प्लेट में पकौड़े सजाये वो बाहर चली आयी..
अब तक में विनोद भी हाथ मुहं धोकर कपड़े बदल कर आ गया था।

“माधव तुम भी फ्रेश हो लेते बेटा !”

“नहीं अंकल मैं ठीक हूँ !” वो वापस सर झुका कर बैठ गया..
हद लजाता था ये लड़का !!
अपनी मुस्कान छिपाती सुलोचना ने प्लेट उसके हाथ में पकड़ा दी..

एक पकौड़ा उठा कर उसने मुँह में रखा और एकदम से पानी मांगने लगा..

“आंटी ये बैगन का है क्या ?”

“हाँ, क्या हुआ ?”

“मैं बैगन नहीं खा पाता, बचपन से ही पता नहीं क्यों मुझे बैगन अजीब से लगते है !”

“कोई बात नहीं, तुम ये आलू वाले खा लो !”

माधव को मुहं साफ करने की ज़रूरत महसूस हो रही थी, और सुलोचना ने उसे सिंक की तरफ इशारा कर दिया..
मुहं पर पानी मार कर वो पलटा ही था कि तभी अपने कमरे से अपनी पेन को झटक झटक कर चलाने लायक बनाने की कोशिश में निकलती डिंकी के साथ चमत्कार हुआ।
जिस पेन की स्याही की आखिरी बूँद तक को उस लड़की ने चूस लिया था और उसके बावजूद उससे एक पंक्ति और लिख लेने के लालच में उसे झटक रही थी, से जाने कैसे ढेर सी स्याही निकली और माधव की सफ़ेद कमीज को नीला सा रंग गयी…

डिंकी अचकचा कर खड़ी रह गयी..
स्याही के कुछ छींटे माधव की सफ़ेद गर्दन से होते हुए गालों को भी रंग गए..

डिंकी ने धीरे से वही टंगे टॉवेल को उसकी तरफ बढ़ा दिया..
माधव की हालत देखने लायक थी।
सुबह से ऑफिस के काम से थका हारा आराम से बैठ कर चाय पीना चाहता था, लेकिन इन माँ बेटी ने उसका सुकून हर लिया था।
बैगन उसे सख्त नापसंद थे, उनके मुहं में जाने का गम अभी वो भुला नहीं पाया था कि उसकी सबसे प्यारी शर्ट का सत्यानाश हो गया था..

वो चुपचाप अपनी जगह पर आकर बैठ गया..
डिंकी भी वहीँ चली आयी। अब तक में विनोद अपनी प्लेट ख़त्म कर के बड़ी हसरत भरी नजरो से सुलोचना को देख रहे थे कि उन्हें और मिलेंगे या नहीं ?
उधर सुलोचना का पारा सांतवे आसमान पर पहुँच गया था..

घर आया पाहुना बेचारा कुछ खा नहीं पाया और घर के लोग एक के ऊपर एक पकौड़ा ऐसे भकोस रहे थे जैसे उसने जानें कितने युगो के बाद बनाया था..।
जैसे तिवारी वैसी उनकी संतान !!
दोनों बाप बेटे खाने में मग्न थे !

रसोई से सिर्फ आलू के पकौड़े लिए सुलोचना आयी और माधव की तरफ बढ़ा दिया, बिना नानुकुर इसने भी प्लेट पकड़ ली, हालाँकि भूख उसे रत्ती भर भी नहीं थी।

ऑफिस के आड़े टेढ़े गणित में उलझा ये आर्यभट्ट अभी अपने नए नए समीकरण बिठाने में ही उलझा हुआ सा था..।
सही कहा जाए तो उसे ऑफिस का कोई काम समझ में ही नहीं आ रहा था..। कई बार उसे लगता उससे ज्यादा ज्ञानी तो चपरासी है, जो सही फाइल सही व्यक्ति के हाथ रख जाता है..।

“खा लो बेटा, ठन्डे हो जायेंगे ! शर्ट खाने के बाद बदल लेना ! अपने अंकल की शर्ट पहन जाओ, इसे मैं धुल कर रखूंगी !”
.
“नहीं नहीं आंटी जी मैं कर लूंगा !”

माधव की पिछली प्लेट को चिंटू चट कर चुका था.. डिंकी भी एक तरफ चुपचाप बैठी अपने पापा के प्लेट से बैगन के पकौड़े छाँट कर खा रही थी..

“रहने का कहीं ठिकाना हुआ ?” विनोद ने बेतकल्लुफी से पूछा और सुलोचना एक बार फिर अपने बौड़म पति को घूर उठी..
जब उसके पिता उसकी रहने की व्यवस्था करने कह गए थे, तब क्यों आलस के समंदर में डूबे ऊंघते रहे, ये नहीं की गुप्ता जी से ही बात कर आये।
और अब कैसे बेशरम होकर उसी से पूछ रहे व्यवस्था हुईं ?

बेचारा कल का लड़का, न किसी से जान न पहचान कैसे घर ढूंढेगा पर इन्हे क्या ? बस ऑफिस जाना है और घर आकर खा पीकर सो रहना है.. इससे इतर कोई काम, मजाल इनसे कोई करवा ले…
मन ही मन कुढ़ती सुलोचना ने माधव की उपस्थिति के कारण अपने चेहरे के भाव सामान्य रहने दिए..

“जी अंकल.. ऑफिस के पियोन ने एक कमरा बताया है.. ! सिद्धिविनायक हाऊसिंग सोसाइटी में ! वहां एक यदु जी रहते है.. उन्ही के घर के ऊपर एक कमरा खाली है !”..

“सिद्धिविनायक तो यही पीछे की तरफ पड़ता है न ?”

विनोद ने सुलोचना की तरफ देखा और सुलोचना ने हामी भर दी..

“हम्म सिद्धिविनायक में ही तो गरिमा का घर है !” डिंकी बोल पड़ी..

“आप उस दिन मिले थे न मेरी एक फ्रेंड से ?” डिंकी ने माधव की तरफ देख, याद दिलाने की कोशिश की..

“कब डिंकी ?” माधव कुछ पूछता उसके पहले सुलोचना पूछ पड़ी

“जिस दिन ये मुझे सुषमा के घर छोड़ने गए थे मम्मी ! ” डिंकी ने अपनी माँ का संशय दूर किया और वापस  माधव की तरफ घूम गयी..

“दो थी न, उनमे से एक जिसके कर्ली से बाल थे, चश्मा लगाए हुए थी, वो गरिमा है, उसका घर भी वहीँ है !”

“ओह्ह अच्छा !” माधव एक बार फिर चुप हो गया.. यही तो खासियत थी उसकी, बिना ज़रूरत के एक शब्द भी नहीं बोलता था..
और जब बोलना शुरू करता सामने वाले को प्रभावित कर के ही छोड़ता !

“अब मैं चलूँगा आंटी !”

“अरे ऐसे कैसे, खाना खा कर ही जाना है तुम्हे !”

“नहीं आंटी, आज बिलकुल भूख नहीं ! और फिर अभी थोड़ा कुछ सामान भी खरीदते हुए जाऊंगा! कमरे में कुछ नहीं है !”

“ज़रूरत भर का यही से ले जाओ !” सुलोचना बोल पड़ी !
एक मध्यम वर्गीय औरत चाहे जितने पैबंद लगा कर अपनी गृहस्थी की चादर को बुन ले, लेकिन अगर किसी ज़रूरतमंद को देखती है झट से अपनी चादर उस पर डालने को तैयार हो जाती है..।
वैसा ही कुछ सुलोचना के साथ था !!

लेकिन माधव भी अपनी धुन का पक्का था, वो अपनी जगह पर खड़ा हो गया !

“नहीं नहीं, आप परेशान न हो ! मैं अब चलता हूँ, कभी किसी और दिन खाना खा लूंगा आंटी.. वैसे भी अब तो यही रहने आ गया हूँ !”

सुलोचना और विनोद के पैर छू कर वो बाहर निकल गया..
डिंकी भी पकौड़ो की प्लेट उठा कर अपने कमरे में सरक गयी। लेकिन सुलोचना को इस न्यारे अतिथि का बिना खाना खाये चले जाना अच्छा नहीं लगा।
उसका खाना बनाने का मन ही ख़त्म हो गया..
बड़े बेमन से वो रसोई की तरफ मुड़ गयी..

“कौन कौन कितनी रोटी खायेगा, पहले ही बता दो? ये न हो की सिन्की हुई पड़ी रहे। मेहनत सामान और वक्त तीनो ख़राब होता है मेरा !”

“हाँ पापा बता दो आप कितनी रोटी खाओगे, फिर मम्मी का सीरियल शुरू हो जायेगा “हल्दी कुमकुम सौभाग्य “।” चिंटू चहका और दोनों बाप बेटे ने इस बात पर ताली मार ली..

“मैं कुछ नहीं खाउंगी !” कहती डिंकी कमरे से निकल कर बाहर की तरफ बढ़ने लगी कि सुलोचना ने टोक दिया..

“अब तू कहाँ चली ?”

“गम्मो आयी है नीचे, बस उससे मिल कर आ रही मम्मी डार्लिंग !”

सुलोचना और कुछ पूछती, उसके पहले डिंकी निकल गयी..
गरिमा यूँ ही चली आयी थी! दरअसल उसे अभी नयी नयी स्कूटी मिली थी, इसलिए जितना भी चला ले उसका मन नहीं भरता था..
आजकल डिंकी पर भी स्कूटी सीखने का भूत सवार था, बस इसीलिए गरिमा ले आयी थी..

घर के ठीक सामने वो चलाना नहीं सीख सकती थी, वरना उसकी माँ उसके साथ साथ गरिमा का भी भुर्ता बना देगी !
वो दोनों स्कूटी पे सवार होकर गरिमा के घर की तरफ निकल गए..
रास्ते में पड़ने वाले सुपर मार्किट में गरिमा ने कुछ सामान खरीदने के लिए गाडी रोक दी, दोनों लड़कियाँ अंदर चली गयी..
वहीँ गरिमा की नजर माधव पर पड़ गयी..

“ए डिंकी, वो देख तेरे अंकल का लड़का है न वो.. ?”

“हम्म.. कहाँ.. ? अरे हाँ वो ही तो है !”

“चल न चलते है, बात करेंगे उससे !”

“चुप पागल उससे क्या बात करेंगे, लेकिन चल उसकी मदद कर देते है !”

डिंकी और गरिमा माधव के पास पहुँच गए..

“आपकी कुछ हेल्प कर दे ?” डिंकी के सवाल पर माधव एकदम से चौंक गया..
उसने अपने बास्केट में देखा, सामान के ऊपर दो सिगरेट के पैकेट और माचिस की डिब्बी रखी थी.. उसी के साथ डिंकी की भी नजर पड़ गयी..
दोनों की ही नजर सिगरेट से हट कर एक दूसरे  पर गयी और दोनों ही झेंप गए!

“आपकी तो लगभग सारी शॉपिंग हो गयी, लगता है !” डिंकी ने कहा और माधव ने बस गर्दन हिला दी..

“तुम यहाँ कैसे ?

“गम्मो को मैगी खरीदनी थी !”

“मुझसे ले लो, मैंने तो स्टोर के लगभग सारे पैकेट खरीद लिए है !” मजाक में अपनी बात बोल कर माधव मुस्कुरा उठा, और उसके गाल पर पड़ता मनोहारी गड्ढा नीचे तक लम्बा खिंच गया..
मुस्कुराते हुए वो ज़रा झेंप सा जाता था, और इसीलिए उसकी मुस्कान अलग सी जादुई लगने लगती थी, शायद इसीलिए वो मुस्कुराता ही कम था..

डिंकी ने देखा वाकई उसके बास्केट में चाय पत्ती शक़्कर के अलावा मैगी के ही पैकेट थे.. उसके अलावा थोड़ा बहुत और दो चार चीजे ही बस थी.. !

“लगता है मैगी बहुत पसंद है आपको ?”

“पसंद तो नहीं है, लेकिन यही बस बना लेता हूँ !”

अपनी बात कह कर वो सामान उठाये काउंटर की तरफ बढ़ गया..
डिंकी और गरिमा अपना सामान देखने लगे..

माधव ने बिल दिया और बाहर की तरफ निकल गया..
दरवाज़े पर पहुँच कर यूँ ही वो पलट गया, उसी वक्त वहाँ से कुछ दुरी पर खड़ी डिंकी की नजर भी यूँ ही माधव की तरफ उठ गयी..

दोनों एक साथ मुस्कुरा उठे !!

क्रमशः

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
9 months ago

Bahut badhiya bhag, Didi ji

Nisha
Nisha
1 year ago

Super part 😘😘😘

Yashita Rawat
Yashita Rawat
1 year ago

Nice One.

seema Kawatra
seema Kawatra
1 year ago

बस यूं ही…ना कोई रिश्ता ना कोई पहचान
बस यूं ही ..निगाहे देखती है किसी को बिना मेरी इजाजत
बस यूं ही ..

Jagruti
Jagruti
1 year ago

बढ़िया है ,अब पास है तो मुलाकात होती रहेगी।

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
1 year ago

Bahut sundar

Upasna
Upasna
1 year ago

डिम्पल वाली जानलेवा मुस्कान वाले इस नायक पर तो उसकी होने वाली सास पूरी तरह मोहित हो गयीं हैं अपनी झल्ली सी बिटिया का भविष्य एकदम सुरक्षित दिख रहा उनको लेकिन dinki के काम तो कुछ अनोखे ही हैं या की हर लड़की एक उम्र पर ऐसी ही होती है चुलबुली चहकती हुई फिर समय के साथ जिम्मेदारी सिर पर आते ही पूरे मनोयोग से गृहस्थी का सम्पूर्ण भार उठा लेती अपने कंधों पर …
Dinki और माधव का बार बार टकराना कम से कम उन दोनों को एक दूसरे को जानने का मौका दे रहा ।
रोचकता लिए हुए सुंदर भाग

ROOPSAGAR
ROOPSAGAR
1 year ago

👌👌👌👌

कांति
कांति
1 year ago

माधव का दिन सच में खराब निकला पहले तो ऑफिस की headache, फिर बैंगन के पकौड़े और रही सही कसर स्याही ने पूरी कर दी।
सुलोचना आवभगत भी ठीक नहीं नही कर पाई माधव का ना ढंग से पकौड़े ही खिला पाई और ना रात का खाना।
माधव की शॉपिंग और डिंकी का आना कोई तो बात है किस्मत बार बार मिलवा रही,सिगरेट का राज दार बना रही 🤣🤣
अकेला लड़का मैगी के अलावा खरीदे भी तो क्या।
शानदार भाग 👏👏👏👏👏

Alisha Goyal
Alisha Goyal
1 year ago

Bhut aachi khani h ji