
अतिथि -3
कमरे में वापस घुसते ही डिंकी को याद आ गया कि मम्मी ने सुबह ही बताया था मेहमान आने वाले है, लेकिन ये मेहमान इतनी जल्दी आ जायेंगे, उसे कहाँ पता था ?
अब बाहर तो निकलना ही होगा, ऐसे तो मम्मी मानेंगी नहीं, उस लंगूर से बाद में निपट लेगी। फ़िलहाल थोड़ा हुलिया सुधार कर बाहर निकलना चाहिए, ये सोच कर वो अपने बालों पर कंघी मार कर उन्हें ठीक करने लगी। उसी वक्त दरवाज़े पर उसकी मम्मी की आवाज आने लगी..
“डिंकी! बेटा, केदार चाचा जी आ गए है, आओ बाहर !”
“हम्म आ रही !”
उसका फीका सा ‘आ रही’ सुलोचना के दिल पर लगा लेकिन मेहमानों के सामने कुछ कह भी नहीं सकती थी..
सुलोचना रसोई में चाय लेने चली गयी..
बिस्किट के डिब्बे को खोल कर देखा, गिन कर चार बिस्किट्स बची थी..
ये मरभुक्खा कुछ बचने दे तब तो.. गिन के चार बिस्किट उसमे भी एक आधी टूटी सी, अब कैसे परोसे ?
उसी समय डिंकी रसोई में चली आयी..
“क्या हुआ मम्मी ? क्या बड़बड़ कर रही हो ?”
“तुम दोनों के मारे कोई चीज बचने नहीं पाती घर में, ये देख, अब बता चाय के साथ ये साढ़े तीन बिस्किट कैसे परोसूं ?”
सुलोचना के माथे पर खीझ की रेखाएं उबर आयीं..
डिंकी ने देखा और एक छोटी कांच की कटोरी में टूटे टुकड़ो को नीचे रख तीन बिस्किट्स उनके ऊपर रख दी..
वही अलमारी में पड़े डिब्बे से दालमोठ निकाल कर उसने दूसरी कटोरी में भर दी..
बड़े जतन से स्टील के डिब्बे में छुपा कर रखे काजू किसमिस निकाल कर उसने तीसरी कटोरी भी भर दी…
“लो अब ठीक है ? “
“ये काजू रखने की क्या ज़रूरत ? ये मेहमानों को परोसूँगी तो खीर हलवे में क्या डालूंगी, अपना सर ?”
“मम्मी डार्लिंग, ये सब दिखाने के आइटम होते है इन्हे कोई हाथ भी नहीं लगता। शर्त लगा सकती हूँ न आपके बिस्किट कोई उठाएगा न काजू.. ज्यादा हुआ तो एक आध चम्मच मोठ ही उठेगी… !”
“चल.. ठीक है ये तू ही ले आ !”
“न न ट्रे वे लेकर मैं नहीं जाने वाली.. पानी पीने आयी थी, आपको परेशान देख कर मदद कर दी, वही बहुत है !”
वो पलट कर पानी निकालने चली गयी और सुलोचना चाय नाश्ते की ट्रे लिए बाहर चली आयी..
सलीक़े से ट्रे टेबल पर रख उसने चाय के कप उठा उठा कर अतिथियों को पकड़ा दिए..
सुलोचना के पीछे से डिंकी भी बाहर चली आयी.. केदार को नमस्ते कर उसने एक उड़ती सी नजर माधव पर डाली और हाथ जोड़ दिए..
माधव भी हड़बड़ा गया, उसके हाथ में प्याला था इसलिए बस गर्दन हिला कर ही उसने नमस्ते का जवाब दे दिया..
गहरी हरे रंग की स्कर्ट पर मेरून टॉप में डिंकी प्यारी तो लग रही थी, लेकिन अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही कम दिख रही थी।
क्या ज़रूरत थी इसे आज स्कर्ट पहनने की, इससे तो अच्छा जींस ही डाली रहती.. कम से कम जिस उम्र की है उतनी तो लगती, अभी तो छटंवी में पढ़ने वाली बच्ची लग रही..
“कौन सी क्लास में पहुँच गयी गुड़िया रानी ?” केदार ने डिंकी से पूछा और वो धीमी सी आवाज में जवाब दे गयी..
“जी.. इस साल फर्स्ट ईयर के एग्जाम देकर सेकेंड ईयर में आ जाउंगी !”
“वाह, बहुत बढ़िया.. हमारी डिंकी बिटिया तो बडी हो गयी है.. चिंटू किस क्लास में है ?” केदार ने नजर वहीँ बाजु में बैठे चिंटू पर टिका दी..
चिंटू जब बाहर आया था, तभी केदार के पैर छूने जो गया तो केदार ने खींच कर उसे खुद से सटा कर बैठा लिया था..
चिंटू की आत्मा ही जानती थी कि वो कैसा तड़फड़ा रहा था उस बंधन से निकलने को…।
लेकिन जैसे ही सामने काजू की कटोरी आयी चिंटू का मन लग गया..
उसकी आंखे उसी कटोरी पर टिकी थी, उसे मालूम था इन मेहमानों के बीच अगर उसने एक दो टुकड़े उठा कर मुहं में धर भी लिए, तो मम्मी कुछ नहीं कर पायेगी..
केदार चाचा ने अपने एक हाथ को उसके इर्द गिर्द लपेट रखा था, जिससे उसके हाथ बंधे से महसूस हो रहे थे, लेकिन काजू पर वो ‘बकोध्यानम’ लगाए हुए थे..
जैसे ही उससे सवाल पूछा गया वो कसमसा कर केदार चाचा की पकड़ से छूटने का प्रयास करने लगा..
“मैं एर्थ क्लास में हूँ !” लेकिन उसके इस प्रयास को पूरी तरह विफल करते हुए केदार चाचा ने और लाड़ से उस पर अपना शिकंजा कस लिया..
वहां मौजूद लोगों में डिंकी के अलावा और किसी को चिंटू की पीड़ा समझ में नहीं आ रही थी..।
डिंकी ने चिंटू को देख अपनी एक भौंह ऊपर चढ़ा कर धीमे से “मजा आया ?” का इशारा कर दिया और चिंटू उसे घूर कर “तुझे देख लूंगा “, का इशारा कर गया..
इन दोनों भाई बहनों की इशारेबाजी को वहां मौजूद एक और इंसान बड़े ध्यान से देख रहा था..
अचानक ही डिंकी की नजर माधव पर पड़ गयी, माधव उसे ही देख रहा था.. जानें क्यों लेकिन डिंकी उसके बाद चिंटू को चिढ़ा नहीं पायी..
“भाई साहब आपने तो चाय के साथ कुछ लिया ही नहीं.. माधव बेटा तुम तो कुछ ले लो !”
सुलोचना ने इसरार से कहा लेकिन माधव मुस्कुरा कर रह गया..
अपनी चाय ख़त्म कर उसने टेबल पर कप रखा और एक काजू उठा लिया..
“भाभी जी, मैं चाय के साथ वैसे भी कुछ नहीं लेता, अब तो आपके हाथो का स्वादिष्ट खाना ही खाऊंगा.. वैसे भी जल्दी सोना होगा, सुबह माधव को आठ बजे तक इंटरव्यू के लिए पहुंचना है !”
“कहाँ है ऑफिस ? मतलब किस एरिया में ?” विनोद ने पूछा
“नाइन हिल्स के साइड पर है.. उसी तरफ ज्यादातर दफ्तर है !”
“अच्छा, ज्यादातर बड़े स्कूल कॉलेज भी उसी तरफ है !” विनोद ने अपना तड़का लगा दिया..
उन दोनों को बातों में लगा देख सुलोचना खाली कप ट्रे उठा कर रसोई में चली आयी.. उसी के पीछे डिंकी भी आ गयी..
“देखा अम्मी जान, एक भी बिस्किट किसी ने छुआ तक नहीं.. किसी को मालूम भी नहीं चला कि नीचे टूटी फूटी पड़ी है !”
डिंकी बोल कर हंसने लगी और बाहर तक उसकी आवाज़ न चली जाए, ये सोच कर सुलोचना उसे चुप कराने लगी, ठीक तभी रसोई के दरवाज़े पर माधव आ खड़ा हुआ…
“आंटी जी.. !”
सुलोचना और डिंकी दोनों ही हड़बड़ा गए..
“हाँ… हाँ बोलो !”
“रेस्ट रूम किस तरफ होगा ?” माधव के पूछते ही सुलोचना पल भर के लिए सोच में पड़ गयी..
रेस्ट करने के लिए कमरा पूछ रहा है क्या लड़का ? आजकल की जनरेशन ज्यादा ही खुली नहीं हो गयी.. बाप बाहर बैठा है, इन्हे रेस्ट करना है ! सुलोचना अभी डिंकी के कमरे की तरफ इशारा करती उसके पहले घर के एकमात्र बाथरूम की तरफ डिंकी ने इशारा कर दिया..
“वो रहा.. आप वहाँ फ्रेश हो लीजिये, मैं टॉवेल ले आती हूँ !”
डिंकी के दिखाते ही माधव उस तरफ बढ़ गया और डिंकी अपने कमरे से अपना साफ सुथरा टॉवेल ले आयी…
डायनिंग टेबल की कुर्सी पर अपना टॉवेल टांग कर वो अपनी माँ के पास पहुँच गयी..
“मम्मी, मैं जाऊं ?”
सुलोचना ने “कहाँ ” अपनी आँखों से ही पूछ लिया..
“बताया तो था सुष के घर रुकेंगे आज !”
“हम्म.. जरुरी है क्या ?”
“मम्मी यार, क्या करती हो आप भी..?”
“ठीक है ठीक है चली जाना, पहले खाना लगाने में मदद करवा दे !”
सुलोचना जानती थी डिंकी से कुछ करवाना है तो उसकी नब्ज दबाये रखनी होगी..
कंधे झटक कर डिंकी थालियां निकाल कर पोछने लगी..
“अरे अंदर से नया वाला डिनर सेट निकाल ला.. इन स्टील की थालियों में थोड़े न परोसेंगे !”
डिंकी को इस बात में कोई सेन्स समझ नहीं आया.. खाना ही तो खाना है, फिर क्या स्टील और क्या कांच की क्रॉकरी.. पर वो अपनी माँ का कहा मान कर क्रॉकरी निकाल लायी..
खाना गर्म हो गया था, सुलोचना ने संग ही संग गर्म फुल्के भी बना लिये थे.. उन पर घी लगा कर वो परोसती जा रही थी..
खाना वाकई स्वाद बना था, सभी के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे, लेकिन माधव से ज्यादा खाया नहीं गया.. शायद उसे होने वाले इंटरव्यू का डर सता रहा था..
वो खुद में खोया खोया सा था..
सबसे पहले उसी का खाना खत्म हुआ, अपनी थाली लिए वो उठ खड़ा हुआ
“आंटी कहाँ रख दूँ ?”
“अरे तुम छोडो न.. मैं ले जाउंगी बेटा !”
“नहीं आंटी मैं अपनी प्लेट खुद ही रखता हूँ !” वो वैसे ही खड़ा रहा, तब सुलोचना ने उसे रसोई के दरवाज़े से झांकता बाहर का अहाता दिखा दिया.. वो उसी तरफ बढ़ गया..
“ठीक है अंकल जी, मैं अभी निकलती हूँ.. आज मेरी फ्रेंड के घर हम सब ग्रुप स्टडी करने वाले है !” इस बार बिना कोई रिस्क लिए डिंकी ने सीधे केदार अंकल के कंधे पर बन्दुक रख अपनी माँ की तरफ निशाना साध दिया..
सुलोचना डिंकी की तरफ देखने लगी…
“जा चिंटू को साथ ले जा.. तुझे छोड़ आएगा !”
“पिछली गली में तो उसका घर है, और फिर चिंटू मुझसे आठ साल छोटा है, ये क्या मुझे छोड़ने जायेगा मम्मी ?” डिंकी बिफरते बिफरते रह गयी.. उसे अपनी माँ की ऐसी बातें सख्त नापसंद थी..
“मैं चलूँ… थोड़ी वॉक भी हो जाएगी ?”
माधव के इस अप्रत्याशित सवाल पर सभी अचकचा कर उसे देखने लगे।
क्रमशः
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Bahot pyara bhag..bda mza aya..chintu se rest nyc 1💐
Dinki pyari hai aur madhav dekhte hain kaisa hai.
So interesting.
क्या बात 👏सोचा ना था माधव डिंकी को छोड़ने जाएगा
Engaging entertaining intersting part…💐
बहुत ही खूबसूरत पार्ट 👌👌
Ab mna kar payegi dinki …..akal toh maa ki tarah hi h bas serious nhi h
Superb fantastic part
क्या बात है….भाई साहिब लाइन मार रहे हो क्या? इन्हे भी जाना है टहलने कि लिए। आपकी कहानियों की यही तो खासियत है कि आप एक एक डायलाग को इंटरेस्टिंग बना देती हो। मेरा तो सपना है कि मैं कभी इस तरह से लिख सकूँ। डिंकी वैसे तो समझदार है पर थोड़ी लापरवाह किस्म की लड़की है। शायद उम्र का तकाजा है, धीरे धीरे अक्ल आ जाएगी उम्र के साथ। लगता है वो होने वाला है जो सुलोचना चाहती है, मतलब ये इन दोनों को मिलाना चाहती है, माधव को उसकी हरकतें कुछ ज्यादा ही पसंद आयी लगती हैं शायद। बहुत सुन्दर कहानी।
आम मध्यमवर्गीय भारतीय घरों में रची बसी है ये कहानी .. बड़ी ही सहजता से परोस दी है ये थाली आपने हम पाठकों के समक्ष जिसमें कुछ पतली पर तड़का लगी दाल भी है और प्यार से तर रोटी भी है । बहन भाई की नोंकझोंक ,बच्चों की खींचतान से बचाकर रखी गृहस्थी और अपनी औलादों की नस नस से वाकिफ माँ …सभी कुछ तो है इस प्यारी सी चुलबुली सी कहानी में …
वही स्पेशल डिनर सेट का निकलना और छोटे भाई को बहन की सुरक्षा में तैनात करना … साढ़े तीन बिस्किट और उस पर बच्चों कब वकोध्यानम …सही कहा किसी ने ऐसा लग रहा कि गुल्लक का ही सीजन देख रहे
Dinki को छोड़कर आने का माधव का प्रस्ताव तो एकदम अप्रत्यशित ही है …देखते हैं कि क्या छुपा है इस प्रस्ताव के पीछे