
अतिथि -2
अपनी चाय ख़त्म करते हुए सुलोचना का ध्यान घड़ी की टिकटिक पर चला गया, आते ही होंगे ये दोनों शैतान, ये सोच कर वो रसोई में चावल चढाने चली गयी..
पन्द्रह मिनट में दरवाज़े की घंटी बज गयी और पहले चिंटू और उसके कुछ देर बाद डिंकी भी चली आयी..
खाना परोस कर सुलोचना भी सामने ही बैठ गयी..
“अरे वाह आज दाल तो बढ़िया बनायीं है मम्मी !” चिंटू चहक उठा, उसका खिला चेहरा सुलोचना को तृप्त कर गया। लेकिन देवी जी अपने मोबाइल पर आंखे गड़ाए जाने किस कार्य में महा व्यस्त थी..
“खाना खा ले डिंकी !”
“हम्म.. खा तो रही हूँ !”
“अचार ला दूँ ?”
“हम्म.. न.. !”
“ये लड़की हाँ बोलती है या न, मेरी तो समझ ही नहीं आता ?”
सुलोचना को कभी कभी डिंकी का ये बेलौस व्यवहार उबा देता था।
लड़की है इसलिए मार भी नहीं सकती, वरना अगर चिंटू ऐसी हरकत करता तो अभी कान के नीचे दो चमाट लगाती और उसके मोबाइल को छीन कर आग लगा देती..।
सच तो है, हम माँ बाप बचपन से ही लड़का लड़की में भेदभाव शुरू कर देते है। णलड़की को ज़बरदस्ती सर पर चढ़ा कर पालेंगे और लड़के को कूट पीट कर..
और फिर ससुराल में अपने कलेजे के टुकड़े को कहीं थोड़ी भी तकलीफ मिले तो दिल टूक टूक रोता है फिर..।
ससुराल की बात पर सुलोचना को अपना सुबह का सपना याद आ गया।
मन में हल्की सी सरगम बजने लगी..
एक तरफ रेडियो पर पुराने नगमे चल रहे थे..
“इन भूल-भुलइया गलियों में, अपना भी कोई घर होगा,
अम्बर पे खुलेगी खिड़की या, खिड़की पे खुला अम्बर होगा….”
घरौंदा का ये गीत उसे कितना पसंद था, स्कूल में थी जब ये फिल्म आयी थी!
बाबूजी के डर से फिल्म तो नहीं देख पायी, लेकिन बिनाका गीत माला में ये गाना खूब सुना था..
उस वक्त सोचती थी शादी के बाद खूब फिल्मे देखूंगी।विनोद शौकीन भी थे, लेकिन इतने रुपये ही नहीं जुड़े कभी की शौक पूरा हो पाए..
हाँ गाँव की पुश्तैनी ज़मीन के बंटवारे में ससुर जी ने जो रुपये भेजे, उसमे बैंक से थोड़ा और लोन लेकर ये घर खरीद लिया।
फिल्म न देख पाने का अफ़सोस, आबोदाना और आशियाना बना कर ख़त्म कर लिया. !
हाउसिंग बोर्ड के चार मंजिला फ़्लैट सिस्टम में दूसरी मंजिल पर मिला ये घर भी वैसे तो छोटा नहीं था..!
ठीक ठाक सा बाहर का कमरा और दो छोटे बैडरूम के साथ एक छोटी बालकनी भी थी..।
रसोई ज़रा ज्यादा ही छोटी थी, लेकिन रसोई के पीछे लम्बा खुला अहाता सा था, जिसमे उसके ढेरो काम निपट जाते थे..
घर, चार लोगो के परिवार के लिए पर्याप्त था। लेकिन कोई मेहमान आ जाये तो रुकवाने का संकट हो जाता था..।
अपने ही विचारो में खोयी सुलोचना अचानक सतर हो गयी..
“डिंकी चिंटू सुनो !”
“हाँ मम्मी !” चिंटू तो उसकी तरफ देखने लगा लेकिन उसकी शहज़ादी फ़ोन पर ही लगी पड़ी थी..
“आप भी सुन लीजिये क़्वीन विक्टोरिया !”
“फरमाइए मलिका ए नूर !” डिंकी ने फ़ोन पर से आंखे अपनी माँ पर टिका दी
“कुछ बोलूंगी, मान लोगे न दोनों ?”
“अरे अम्मी जान, आपके लिए जान हाज़िर है, आप तो हुकुम करो बस !” डिंकी बस बातो की रानी थी, ये सुलोचना जानती थी..
उसे पता था अभी कितना भी मीठा बोल ले, कमरे की बात सुनते ही भूखी शेरनी सी उसे नोच डालेगी..
“सुनो, तुम्हारे केदार चाचा आ रहे है, अपने लड़के के साथ ! आज रात यहीं रुकने वाले है, तो आज रात वो दोनों तुम्हारे कमरे में सो जायेंगे..! डिंकी तू मेरे कमरे में मेरे साथ सो लेना और चिंटू मेरा लाडू तू यहाँ हॉल में अपना बिस्तर डाल लेना बेटा !”
चिंटू को तो वो फिर भी किसी तरह समझा लेती थी, लेकिन डिंकी से निपटना आसान नहीं था… अपने कमरे,अपने सामान के प्रति उसका अनुराग कुछ अलग ही किस्म का था..
लेकिन आज जाने कैसे ये अजूबा घट गया..
चिंटू तो रात में टीवी देखते हुए सो रहूँगा ये सोच कर बाहर वाले कमरे में सोने को बडी ख़ुशी से राजी हो गया।
लेकिन डिंकी इतनी आसानी से तैयार हो जाएगी ये उसने नहीं सोचा था..
“ओके मॉम, इत्ती सी बात के लिए इतना मेलोड्रामा करती हो.. ! जाओ शहज़ादी हुकुम बानो ने अपना शाही कमरा आपके इस्तेमाल के लिए दिया !”
सुलोचना आँखे फाडे डिंकी को देखती रह गयी..
“सो जाएगी न मेरे कमरे में ?”
इस सवाल पर बडी शैतानी आँखों से डिंकी ने अपनी माँ की तरफ देखा..
“आपको बताया तो था आज सुषमा के घर पर मैं और गरिमा रुकने वाले है !”
अच्छा बच्चू तो ये बात थी… तभी कोई नाटक नौटंकी किये बिना मान गयी..
सुलोचना को डिंकी का सहेलियों के घर रुकना कभी पसंद नहीं था और न वो कभी इजाजत देती थी.. एक आध बार खूब रो धोकर डिंकी ने उसे मना लिया था, लेकिन ज्यादातर वो उसे नहीं ही जाने देती थी..
आज की बात भी उसे दो दिन पहले डिंकी ने बताई ज़रूर थी, लेकिन उसके दिमाग से निकल गयी थी..
लेकिन अब कुछ नहीं किया जा सकता था.. मन मार कर उसने डिंकी को सुषमा के घर रुकने की इजाजत दे दी थी..
“डिंकी.. बेटा, पढाई ही करना, ये नहीं की रात भर जाग कर बस फिल्मे देखते रहे !
हमारे समय में तो.. “
सुलोचना की बात आधे में ही काट कर डिंकी बोल पड़ी..
“हाँ हाँ आप बहुत बार बता चुकी हो, कि नानाजी के डर से आप लोग फिल्मे नहीं देखते थे वगैरह वगैरह.. लेकिन मेरे पापा तो कूल है न..?
और वैसे भी हम लोगो को प्रोजेक्ट पूरा करना है, सो जस्ट चिल मॉमी..
हम प्रोजेक्ट बनाएंगे, पिज्जा पार्टी करेंगे, एक अच्छी सी हॉरर फिल्म देखेंगे और दो तीन बजे तक सो जायेंगे !”
“ये आजकल की लड़कियाँ भी न, पता नहीं इन सड़ी गली हॉरर फिल्म्स देखने में इन्हे क्या मजा आता है ?”
थालियां उठा कर वो रसोई में ले गयी….
डिंकी छलांग लगा कर अपने कमरे में पहुँच गयी, और चिंटू टीवी पर एनिमे लगा कर पसर गया..
दोनों के बैग से लेकर जूते चप्पल सब समेट कर सुलोचना शाम की तैयारियों में लग गयी..
उन्नीस बरस की हो गयी है लड़की, पर मजाल है तमीज से एक काम कर ले..।
कितनी बार वो उसके पीछे झींक चुकी है। दाल चावल ही बनाना सीख ले, ससुराल में काम आयेंगे। लेकिन हमेशा उसकी सीधी बात का टेढ़ा जवाब दे कर निकल जाने में इसे महारत हासिल है..।
विनोद भी तो कम नहीं है.. इस लड़की की हर ज़रूरी गैरज़रूरी मांग ऐसे पूरी करते है जैसे वो इनकी बेटी नहीं माँ है..।
कुछ ज्यादा ही सर चढ़ा रखा है, तभी तो ऐसे मनमौजी हुईं जा रही है..
पैर ज़मीन पर नहीं टिकते इस लड़की के..
जानें किस बात पर हवा में सवार रहती है…
खुद में बड़बड़ाते हुए वो गोभी काटती जा रही थी..
लेकिन ये भी तो सच है कि ये उम्र ही हवाबाजी वाली होती है। अब ये नहीं उड़ेगी तो क्या हम उड़ेंगे…?
उसे अपना समय याद आ जाता.. वो भी तो कुछ कुछ ऐसी ही थी, लेकिन ससुराल पहुँचते ही जानें कैसे कहाँ से ज़माने भर की समझदारी आ गयी, वैसे ही इसे भी आ जाएगी..।
वैसे हवा में उड़ने लायक है भी तो छोरी…
ज्यादा देर वो खुद अपनी लाड़ली को नहीं देखती कि कहीं नजर न लग जाये.. देख कर ही कलेजे को ठण्डक पड़ जाती है।
कैसा तो मासूम सा चेहरा बना कर भेजा है ऊपर वाले ने, अब देखने वालों को क्या पता शक्ल ही मासूम है, अंदर से तो पूरी हरकाला है !!
मुस्कुराते हुए सुलोचना फटाफट हाथ चलाती रही.. खाना बनाने में उसका कोई सानी नहीं था, कलछुल तोड़ के रख देती थी वो.. जितना सुस्वादु भोजन उतनी ही सुंदर सजावट..
भिंडी और बैंगन तो उसने दोपहर ही तल कर रख लिए थे। मेथी से आलू गोभी छौंकने के बाद उसने दही को मथ कर भीगी बूंदी मिला कर रायता ढांप कर फ्रिज में रख दिया..।
सुबह दाल ज्यादा ही बना ली थी, उस पर शुद्ध देसी घी का तड़का लगा कर ऊपर से धनिये की पत्तियां डाली और आटा माड़ने लगी..
“मम्मी कुछ हेल्प कर दूँ ?” डिंकी किसी हवा के झोंके सी रसोई में चली आयी और पानी लेकर पीने लगी!
“आज सूरज किधर से निकला है जो ये छिपकली मदद करने पूछ रही ?” चिंटू भी कम नहीं था, डिंकी पर फुलझड़ी छोड़ भाग गया..
डिंकी पलट कर उसे मारने भागी… और सुलोचना चावलों को धोकर कुकर में लगा कर अपने लिए चाय चढाने लगी..।
चटनी और सलाद उसने पहले ही फ्रिज में ढँक कर रख दिया था, बीती रात घर में किसी ने दूध नहीं पिया था, इसलिए उस बचे दूध से सेवइयां भी बना ली थी..
सारा काम कर के सुलोचना हाथ मुहं धोकर बाहर निकली कि दरवाज़े पर घण्टी बज गयी।
उसकी चाय के पकने और विनोद के घंटी बजाने का समय एक ही था..।
मुस्कुरा कर वो दरवाज़ा खोलने चली आयी..
सामने विनोद खड़ा था और उससे जरा लग कर केदार! अरे ये भी साथ ही चले आये ?
“नमस्ते भाई साहब आइये आइये… !”
विनम्रता से दुहरी होती सुलोचना हाथ जोड़ कर दरवाज़े से एक ओर हट कर खड़ी हो गयी.. विनोद के साथ केदार भी अंदर चला आया..
“नमस्ते भाभी जी.. कैसी है आप ? आप और विनोद तो जाने कौन सा च्यवनप्राश खाते हो, उमर की कोई रेखा आप दोनों के चेहरे पर नजर ही नहीं आती !”
इतना कहते हुए केदार अंदर सोफे पर धंस गया, उसी के पीछे एक सजीला शर्मीला सा लड़का भी अंदर चला आया..
आते ही उसने सुलोचना के पैर छू लिए, और सुलोचना उस लड़के को देख मुग्ध सी हो गयी..
अहा यथा नाम तथा रूप !! साक्षात् मुरलीवाला ही जैसे आधुनिक कपड़ो में उसके सामने खड़ा हो गया था, बस लड़के का रंग साफ़ था..!
बुद्धिदीप्त बडी बडी आंखे चमक रही थी..सलीके से सँवरे बाल, बाएं हाथ में बंधी घड़ी, और टक इन की हुईं चेक्स की शर्ट उसके गंभीर व्यक्तित्व की चुगली कर रहे थे.. !
लड़के को देख सुलोचना की आंखे जुड़ा गयी..
काश केदार जी के मन में भी वही बात आ जाये जो उसके मन में चल रही…लेकिन उसकी उबड़ खाबड़ देश की शहज़ादी को ये सजीला पलट कर देखेगा भी? पसंद करना तो दूर की बात है !!
“कुछ चाय पानी लाओगी !” विनोद ने टोका तो वो अपने ख़यालो से बाहर चली आयी.. तुरंत ही रसोई में जाकर उसने चाय में थोड़ा दूध और डाल कर उसे बढ़ाया और पानी ट्रे में लेकर बाहर चली आयी..
“भाभी जी बच्चे कहाँ है ?” केदार जी के सवाल पर सुलोचना का ध्यान गया, अब तक उसके दोनों छछूंदर जाने कहाँ छिपे बैठे थे ?
“जी भाई साहब, अपने कमरे में होंगे ! मैं बुला कर लाती हूँ !”
सुलोचना का दिल धड़क उठा था, पता नहीं उसके दिमाग से कैसे निकल गया कि डिंकी को कपड़े बदलने बोल दे..।
कुछ तो भी अजूबा कपड़े पहनने में उसे महारत थी, ये भी तो टोकते नहीं थे और उसे डिंकी के अजीब कपड़े कभी पसंद नहीं आते थे..
काश कोई चमत्कार हो और ये लड़की ढंग का कुरता पहनी हुईं हो..
डिंकी के कमरे में दस्तक देने के पहले ही दरवाज़ा खुला और चिंटू तूफान मेल की स्पीड से भागता हुआ निकला और सीधा बाहर वाले कमरे में जाकर रुका..
उसके ठीक पीछे लकड़ी की बडी सी स्केल उसी का पीछा करती हवा में उड़ती बाहर तक चली आयी और माधव के ठीक कान के पास से होकर नीचे जा गिरी..
लड़का सहम कर रह गया.. उसने झुक कर स्केल उठा ली..और धीरे से टेबल पर रख दी।
और तभी चिंटू पर बरसती हुईं, साक्षात् रणचंडी अवतार में डिंकी कमरे से बाहर अवतरित हुई..
बाहर बैठे लोगो पर नजर पड़ते ही वो उलटे पैरो कमरे में गयी और दरवाज़ा बंद कर लिया..!
क्रमशः
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Nyc chapter, apne ghr ki kahani lgi ma’am, namkiniyat se bhri💐
Dinky is sweet.
Bahut hi achhi lagi 👍👌👌👌👌👌
याद आ गया मुझे गुजरा जमाना..
बिनाका तो हमारे टाइम भी आता था फिर आया टी वी और उसमे आता था चित्रहार
बहुत ही खूबसूरत पार्ट 👌👌
Very very NYC part…. आजकल के अजब गजब बच्चे, अमोल पालेकर और जरीना वहाब अभिनीत घरौंदा…💐
Bahut badhiya part
Bahut sundar
Jo sooch rhi thi uska ulta ho hua …..dinki ki entry ho gyi …woh bhi aise …..ha ..ha…ha
Lovely part