अतिथि

अतिथि..

“सुनो केदार आ रहा है !”

विनोद की बात सुन कर तकिये पर गिलाफ चढ़ाती सुलोचना के हाथ ठिठक गए..

“कब.. ? बताया क्यों नहीं पहले से ? यहाँ घर में कोई तैयारी नहीं है, आप भी न, पता नहीं कब सुधरेंगे ?”

“अरे आज दोपहर ही तो उसका फ़ोन आया, दफ्तर से लौटा फिर तुम और तुम्हारे बच्चो ने अपनी तिकतिक लगा दी, खा पीकर फुरसत होते ही बता तो दिया.. !”

गुस्से में अपने पति की घूर कर सुलोचना ने तकिया उनकी तरफ रख कर दूसरे पर गिलाफ लगाना शुरू कर दिया

“कब आ रहे है, आपके प्रिय मित्र ?”

“कल ही !”

“क्या ? गुस्से और खीझ के मिले जुले भावो से सुलोचना ने विनोद को देखा और चीख उठी

“हद करते है आप, महीने के आखरी दिन चल रहे… घर पर एक आलू का ढेला नहीं बचा है, दाल बस दो दिन की बची है, टमाटरों में आग लगी है इसलिए सब्जियों में अमचूर डाल कर काम चला रही हूँ। अब ये बता दीजिये कि कल आपके इन परमप्रिय मित्र के लिए क्या अपना सर काट कर पका दूँ ?”

“हद करती हो यार तुम भी, अब अगर कोई सामने से होकर फ़ोन कर रहा कि हम आ रहे हैं, तो क्या उसे तुम्हारी गृहस्थी की कमियां गिनवा दूँ, और कह दूँ कि केदार मेरी बीवी के पास अपना सर पकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, इसलिए मत आओ !”

विनोद ने बेकदरी से कहा और वहीँ रखी सौंफ की डिब्बी से सौंफ निकाल कर मुहं में डाल ली..

“मैं कुछ नहीं जानती, अब आप ही करें जो करना है.. मुझसे कोई तामझाम नहीं होना.. अपनी दफ्तर की बाबूगिरी यहीं दिखा कर उपाय निकालिये !”

“अरे इतना लोड क्यों ले लेती हो, घर पर जो पड़ा है, सो बना लेना !”

“गिलकी पड़ी है, वही बना दूँ, रोटियों के साथ ?”

अपने सुदीर्घ वैवाहिक जीवन में आज तक विनोद ने सुलोचना का पकाया सब कुछ बिना नाक भौंह सिकोड़े खाया था। एक गिलकी से ही उसकी जान जलती थी, और उसकी पत्नी गाहे बगाहे उसकी इस कमजोर नस को पकड़ कर दबा ही देती थी..।

“अमा शाम को आ रहा है यार, गली के बाहर वाले पंसारी से सब सामान ले आना, लिखवा देना न। चार दिन में तनख्वाह आ जाएगी तब चुका लेना.. !”

“पंसारी तो दे देगा, लेकिन सब्जी वाले का क्या करूँ.. ? कौन सा आपका भाई लगा पड़ा है वो, जो मुफ्त के कद्दू टिंडे दे देगा ?”

अपनी जेब से कुछ तुडे मुड़े नोट निकाल कर विनोद ने अपनी धर्मपत्नी के हाथ रख दिए..

“भाई होता तब भी मुफ्त में भी कद्दू टिंडे तो खरीदने तब भी नहीं बोलता..।
सुनो कुछ ढंग की सब्जियां ले आना.. कई दिन से गोभी नहीं खायी, बढ़िया सी आलू गोभी बना लेना। वो जो तुम बनाती हो न लुटपुटी सी। और भिंडी बैंगन भर के तल लेना.. धनिये पुदीने की चटनी पीस लेना, थोड़ा अचार पापड़ सलाद कर लेना.. इतना तो बहुत हो जायेगा..
वैसे भी वो शाम को आएगा,अगले दिन सुबह उसके बेटे का कहीं इंटरव्यू है.. बस बेटे के इंटरव्यू के बाद दोनों जन वापस निकल जायेंगे !”

हाथ में आये रुपयों की ऊष्मा से या दोस्त अगली ही सुबह लौट जायेगा इस बात से, लेकिन जो भी हो सुलोचना के चेहरे पर मुस्कान लौट आयी थी।

चेहरे पर संतुष्टि के साथ मन इस कदर शांत था कि केदार शर्मा के साथ उसका बेटा यानी एक मेहमान और बढ़ गया, इस बात पर भी उसका भेजा गरम नहीं हुआ..।

“केदार भाई साहब का बेटा इंटरव्यू देने लायक हो गया है ? हाय इत्ता बड़ा कब हो गया, हमारी शादी के समय तीन चार साल का था न?”

“हाँ बड़ा नहीं बहुत बड़ा हो गया है भाई… सिविल इंजीनियरिंग पास की है उसने.. केदार अक्सर तो अपने इस होनहार लड़के के बारे में बताता ही रहता है.. पढ़ने में भी होशियार है..।
बस औलाद अगर सही निकल गयी तो बुढ़ापा चैन से कट जाता है.. !”

विनोद की बातों के बीच सुलोचना के दिमाग में अलग ही खिचड़ी पकने लगी थी..

“अच्छा सुनिए.. दिमाग में एक बात आ रही है !”

“हम्म बोलो !” सुबह के पढ़े पढ़ाये अख़बार में ही कोई नयी खबर ढूंढते विनोद ने कहा..
मध्यम वर्गीय बाबू आदमी अख़बार पे खर्च किये सारे पैसे जैसे शाम को ही वसूलता था। सुबह तो दफ्तर के लिए होती देरी उसे पूरा अख़बार चाट लेने की अनुमति जो नहीं देती थी..

“हमारी डिंकी के लिए केदार भाई साहब का लड़का कैसा रहेगा ?”

अब तक ‘तुम्हारा मित्र’, ‘तुम्हारा दोस्त’ के उलाहने देती सुलोचना के दिमाग में ये बात आते ही उसके सुर ही बदल गए..

“डिंकी भी तो इस साल फर्स्ट ईयर कर लेगी.. अब उसके लिए भी घर वर तलाशना ही है !”

विनोद ने आँखों पर चढ़े चश्मे को अकारण ही साफ़ करना शुरू कर दिया था, जैसे ये बात उसे कुछ ठीक से समझ में नहीं आयी..।

विनोद और केदार बचपन से एक ही स्कूल में पढ़े थे, दोनों का एक ही गांव था। बचपन में मितान भी बदा था दोनों ने..।
फिर लगभग साथ साथ ही दोनों शहर आ गए.. नौकरियों में लग गए..।
  विनोद की नौकरी पहले लगी, लेकिन शिक्षा विभाग में लोअर डिवीज़न क्लर्क में पदस्थ विनोद आज तक उसी पद पर आसीन थे। जबकि सिंचाई विभाग में क्लर्क के पद से प्रमोट होते होते केदार आज उप प्रबंधन अधिकारी बन चुका था..।
बावजूद आज तक दोनों की दोस्ती पर कोई असर नहीं पड़ा था..।
केदार आज भी किसी काम से विनोद के शहर आता तो उसी के घर रुकता, हालाँकि दो एक दिन में काम ख़त्म होते ही वो तुरंत निकल भी जाता, लेकिन दुनियादारी की समझ उसमे कूट कूट कर भरी थी।
कभी बच्चो के लिए मिठाई फल लाना नहीं भूलता था.. एक बार दिवाली के बाद उसका कुछ काम से आना हुआ था, तब तो सुलोचना के लिए साड़ी भी ले आया था.. बड़े प्रेम से उसने सुलोचना के हाथ में ही पकड़ाया भी था..

“भाभी ये साड़ी विभा ने बड़े मन से आपके लिए भेजी है !”

हाथ में उस पैकेट को पकड़ कर ही सुलोचना का मन इतना भर आया था कि आँखों की कोर भीग गयी थी.. दिवाली पर जाने कितने सालों बाद उसके लिए नयी साड़ी आयी थी..।
बच्चो के होने के बाद से अब वो दोनों पति पत्नी खुद के लिए कहाँ कुछ खरीद पाते है, जब तक एकदम ही आवश्यक न हो..।

केदार के वापस लौटते समय खूब ज़िद कर के उसने भी अपनी बचत से एक ठीक ठाक सी साड़ी अपनी उस अनदेखी दोस्त के लिए भिजवा ही दी थी..।
केदार भले ही आता रहता था, लेकिन न तो कभी विनोद और उसके परिवार का केदार के घर जाना हुआ, न केदार के परिवार में से किसी का आना हुआ..

पहली बार केदार मय बेटा पधार रहा था..।

अगली सुबह विनोद के दफ्तर जाते ही सुलोचना काम पर लग गयी। राशन की लिस्ट तो विनोद ही पंसारी की दूकान पर छोड़ता हुआ निकल गया था।
सब्ज़ी वाले को भी उसने बोल दिया था, ताज़ी सब्जियां घर पर छोड़ देने को !
रसोई की कमान संभाले हुए सुलोचना कमरों को झाड़ती बुहारती भी जा रही थी।

ट्रंक में से धुले पड़े हुए परदे निकाल कर पुराने बदल दिए।
सोफे के कुशन बदल कर सेंटर टेबल पर खुद की कढाई कर बनायीं हुईं गोल सी टेबल क्लॉथ सजा दी..।
कमरे में जो भी सजावट का सामान था सब पर झाड़न मार दिया।
कमरा साफ सुथरा सुंदर लगने लगा था।

लेकिन वो अपने बच्चो का हाल भी जानती थी.. अभी तो दोनों स्कूल कॉलेज निकल गए थे, इसलिए शांति थी।
  आते ही मरदूद घर को अजायबघर बनाने से नहीं चूकते थे..। चिंटू तो फिर भी लड़का था, लेकिन डिंकी लड़की उस पर बडी, फिर भी अक्ल चवन्नी की भी नहीं थी लड़की के भेजे में !
उसे कभी कोई लेना देना नहीं होता था, कौन आ रहा, कौन जा रहा.. मेरी बला से..।

आज भी उससे कितनी मिन्नतें की थी सुलोचना ने कि एक ढंग का कुरता सलवार ही डाल ले, लेकिन ये लोमड़ी सुने तब न..।

आज भी अपनी घिसी पुरानी सी दिखने वाली जींस पर घुटनो से जरा ऊपर तक का नीला गुलाबी सा कुरता डाल कर बालों को झबराये हुए ही निकल गयी थी..
कहीं केदार भाई साहब पहले आ गए, तो इस लड़की का बिखरा बिखरा अजीब सा हुलिया देख कर ही मना कर जायेंगे…
पता नहीं उनका लड़का भी क्या सोचेगा..?

क्या नाम बताया था इन्होने लड़के का…
हाँ माधव!! सुंदर नाम है..!
हमारी डिंकी के साथ जमेगा भी! डिंकी का नाम भी तो अनुराधा है.. पता नहीं इतना सुंदर नाम इस लड़की को पसंद क्यों नहीं आता..?

आजकल के फैशन में बावरी हुईं पड़ी है.. इनसे ज़िद कर के नए चलन वाला फ़ोन और खरीद लायी है, सारा सारा दिन बस फ़ोन में घुसी रहती है..
अब क्या समझाऊं इसे, कि शादी ब्याह भी समय पर हो जाना कितना ज़रूरी है।

हे भगवान, बस ऐसा कुछ कर दो कि केदार भाई साहब खुद मेरी झल्ली को अपने लड़के के लिए पसंद कर ले..।
वैसे उनका स्वभाव बड़ा सरल लगता है, कभी उनकी पत्नी से मिलना तो नहीं हुआ लेकिन वो भी इन्हीं के जैसे होंगी..
एक अच्छा परिवार लड़की को मिल जाये, और क्या चाहिए.. !

अपनी सोच में खोयी सुलोचना का ध्यान कुकर की सिटी से भंग हो गया..
भाग कर रसोई में जाकर उसने दाल बंद की, खुद के लिए चढ़ाई हुईं चाय भी पक कर औंट गयी थी, लेकिन उसे ऐसी ही चाय पसंद थी..।

सबके घर से निकलने के बाद वो आधी गिलास चाय खुद के लिए बना कर बाहर वाले कमरे की खिड़की पर बैठ कर चाय की चुस्कियों का मज़ा लेती थी।
यही उसके पूरे दिन के सुकून के पल होते थे..
आज भी अपनी चाय लिए वो अपनी प्रिय खिड़की पर चली आयी..
एक पुरानी पत्रिका में एक लम्बी कहानी छपी थी, जिसे वो रोज़ थोड़ा थोड़ा पढ़ रही थी.. आज भी उसने उसे खोल लिया..
लेकिन आज चाय के साथ उसका मन पत्रिका की कहानी में नहीं लगा…
उससे अधिक रोचक कहानी तो उसका खुद का दिमाग गुन रहा था।

माधव और अनुराधा की कहानी..
राधा माधव की कहानी !!

……क्रमशः……

एक साधारण मिडिल क्लास की कहानी शुरू की है, जो ज्यादा से ज्यादा दस या पन्द्रह भाग तक जाएगी.. अनावश्यक खींचतान न हुईं तो संभव है पांच सात भागों में भी कहानी समाप्त हो जाये..
आप लोगो को पढ़ कर समझ तो आ ही गया होगा कहानी मेरी बाकी कहानियों की तरह प्रेम कहानी ही है..
तो चलिए एक नए सफर में.. मेरे साथ…
कुछ अनकहे किस्से, कुछ अनसुनी कहानियाँ !!

aparna…

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
10 months ago

शानदार शुरूआत, बढ़िया कहानी..💐🎉🙏

Yashita Rawat
Yashita Rawat
1 year ago

Very Nice pyari lekhika ji.

Nisha
Nisha
1 year ago

Nice 👍👍

seema Kawatra
seema Kawatra
1 year ago

Hint तो दे दिया आपने राधा माधव की कहानी

बहुत दिनों से फुर्सत के पल तलाश रही थी ताकि नई कहानी को चाय की चुस्कियों के साथ ही पढ़ूँ

All the Best 👍
एक और नई बेहतरीन कहानी के लिए

Geeta sidpara
Geeta sidpara
1 year ago

बहुत ही अच्छी शुरुआत 👌👌

Poonam upadhyay
Poonam upadhyay
1 year ago

Bahut sundar

Vandana
Vandana
1 year ago

Sunder ….ek middle class ka sangharsh bhi bkhubi dikhaya h aapne …mahine ke aakhiri dino ki khichataani….kaise grhsthi me hoti h …..sapna aacha dekh rhi h …pura ho payega

Geeta Prasad
Geeta Prasad
1 year ago

वाह! बहुत अच्छी शुरुवात लगी कहानी की। इधर मैं बहुत दिनो से बसी थी। कुछ अतिथियों का मेरे यहां भी आना जाना लगा हुआ था, जिस वजह से कहानियां पढ़ ही नही पाई।।आज ही आपकी ये कहानी अतिथि की शुरुवात की है। तो छुट्टी हूं इसका 2nd भाग पढ़ने।।।

Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
1 year ago

पढ़ते हुए एहसास हुआ, यह भाग पढा हुआ है पर कुछ तो नयापन है और होना चाहिए। राधा माधव की कहानी अच्छी है, nyc start di…💐

जागृति
जागृति
1 year ago

Beautiful and real jivan chatran