
जीवनसाथी -3 भाग -108
छोले चावल देख कर शौर्य ने घूर कर विक्रम की तरफ देखा और उसके बॉक्स को लेने उसकी तरफ हाथ बढ़ा दिया..
“नो नो.. लिटिल मास्टर.. बड़े दिन बाद इंडियन खाना मिला है.. मै नहीं दूंगा !”
“अच्छा..! मुझे नहीं दोगे.. ?” शौर्य ने घूर कर कहा और अपना पास्ता का बॉक्स विक्रम की तरफ बढ़ा कर छोले वाला बॉक्स उससे छीन लिया..
मुहं लटका कर विक्रम ने पास्ता देखा और बेमन से खाने लगा..
“अच्छा सुनो.. !” और शौर्य ने अपने में से थोड़े से चावल विक्रम को दे दिए और वापस बड़े मन से खाने लगा..
कली शौर्य को तृप्ति से खाते देख हलके से मुस्कुरा उठी…
एक गहरी सी साँस भर कर उसने शौर्य की तरफ देखा..
“तुम लोग आराम से खाओ, मैं अब जा रही हूँ !”
शौर्य का ध्यान खाने पर था। उसने हाँ में गर्दन हिला दी, कली पलटी और वहाँ से चली गयी..
“लिटिल मास्टर एक बात कहूं.. !”
“बोलो !”
“प्रिंसेस आप से प्यार बहुत करतीं है !”
“पर मान तो नहीं रही, कहती है तुमसे कभी प्रेम किया ही नहीं, लेकिन एक सीक्रेट बताऊँ ?”
“बताइये मास्टर !”
“वो मुझसे बेहद प्यार करती है, मैं जानता हूँ ! बस एक बात समझ में नहीं आ रही कि वो मना क्यों कर रही !”
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“आपको एक आईडिया बताऊँ ?”
शौर्य विक्रम की तरफ देखने लगा..
“भागती फिरती थी दुनिया, जब तलब करता था मैं,
जबसे मैंने इसको छोड़ा, बेक़रार आने को है.. ! ये सुना है आपने ?”
शौर्य ने ना में गर्दन हिला दी..
“इसका मतलब क्या हुआ विक्रम !”
“लिटिल मास्टर इसका मतलब ये हुआ कि आप जब तक कली के पीछे पीछे भागेंगे वो आपसे दूर भागती रहेंगी, जिस दिन आपने मुहं फेरा उसी दिन से वो वापस आपके पास चली आएगी.. देख लीजियेगा !”
“अच्छा.. पर ये दिव्यज्ञान तुम्हे दिया किसने ?”
“हम्म.. ये तो पता नहीं ! लेकिन कहीं सुना था मैंने.. वैसे भी प्यार में छोटे छोटे कदम ही लिये जाने चाहिए, ये कब एक ऊँची छलांग बन जाये पता ही नहीं चलता.. ये किसने बोला है, ये भी नहीं पता, लेकिन ये सच है !”
विक्रम की बात सुन कर शौर्य हंसने लगा..
“चलो अब वापस चलते है !” विक्रम और शौर्य मुस्कुराते हुए वहां से निकल गए..
अपनी खिड़की पर परदे की ओट में खड़ी कली ने उन दोनों के जाते ही झांक लगायी और जब तक शौर्य की गाड़ी नजर आती रही, उसे देखती रही और उस के बाद अपने पलंग पर थकान से ढह गयी…।
****
महल में अब तक ये बात तय हो चुकी थी कि हर्ष का विवाह मीठी से ही होगा..।
अब सब खुश थे, बस एक रूपा के मन में हलकी सी फ़ांस सी कभी कभी चुभ जाया करती थी..
लेकिन उसने भी धीरे धीरे खुद को मना लिया था…
शाम की चाय पर सारी रॉयल लेडीज़ एक साथ महल के बगीचे में बैठी चाय का मजा ले रही थी.. वहाँ हर्ष की शादी से जुडी बातें भी चल रही थी..।
रूपा की बुआ भी इस वक्त महल में आयी हुईं थी..। उनके किसी गुरूजी का वहां आगमन हुआ था, उनकी सेवा में प्रस्तुत होने के लिए ही वो वहां आयी थी.. उनका बड़ा मन था कि महल की औरते भी सत्संग का लाभ उठाये, लेकिन वहां से रूपा के अलावा कोई जाने को राज़ी नहीं हुआ..
अगली सुबह महाराज जी ने सत्संग के बाद अपने खास लोगो से मिलने का समय दिया हुआ था..।
बुआ जी रूपा को उसी समय गुरु जी से मिलने के लिए मना रही थी..
“रूपा, आप जानती नहीं है वो कितने पहुंचे हुए संत है.. त्रिकालदर्शी है महाराज.. हम चाहते है एक बार आप हमारे लाड़कुंवर हर्षवर्धन की कुंडली भी उन्हें दिखा दीजिये !”
“ठीक है ‘फू साहेब’ ! क्या कुंडली ही देखते है वो ?”
“माथा भी पढ़ लेते है, अगर आपके लाड़ले वहाँ जाना चाहे तो ?”
“नहीं अभी हर्ष को दिल्ली से बुलाना मुश्किल होगा.. जब से वहां अपनी बिज़नेस की मुख्य शाखा डाली है, वही तो ज्यादातर रहते है हर्ष !”
“कोई बात नहीं, आप कल हमारे साथ सुबह के वक्त पर चलिएगा, हमारी मौजूदगी ही काफी होगी !”
सन से सफ़ेद बालों की चांदी बुआ जी के तेजोज्ज्वल चेहरे से मिल जुल कर अलग ही चमक पैदा कर जाती थी..।
दूध से गोरे रंग पर उनकी हलकी हरी सी आँखों के कारण उनसे मिलने वाले को यूँ लगता की वो ज़रा घमंडी है, लेकिन ये पहली बार का पहला इम्प्रेशन इतना भी गलत नहीं होता था..।
अपने रूप रंग और धन दौलत का उन्हें वाकई बहुत घमंड था, और सबसे अजीब बात ये थी कि अपने घमंडीपने का भी उन्हें घमंड था।
कंधे से ज़रा नीचे तक कटे बालो को वो बडी सहजता से खुला छोड़े रखती थी। उनकी छोटी छोटी आँखों में ज़माने भर को खुद से तुच्छ समझने का स्थायी भाव था !
भींचे हुए से पतले गुलाबी होंठ अक्सर ही गुस्से में फड़कते रहते थे !
उनके बिना बाँहों के ब्लाउज़ से झांकती उनकी दुग्ध धवल कलाइयों में से एक में बंधी करोडो की पैटेक फिलिप(घड़ी) और दूसरे में हर दिन के हिसाब से बदलते महंगे विदेशी राशि रत्नों की दुलड़ी उनके पुरे व्यक्तित्व को विदेशी आडंबर में रंग जाती थी..
बुआ जी के इस व्यक्तित्व के पीछे की सच्चाई भी उनका विदेशों का सुदीर्घ प्रवास ही था..।
अपने बड़े बेटे के पास ऑस्ट्रेलिया में कई साल बिताने के बाद वो छोटे बेटे के पास नेपाल आयी हुईं थी…
और इसी दौरान उनके गुरूजी का भी आगमन हो गया था..
गुरूजी के दर्शनों की चाह नहीं होती तो बुआ जी को कोई उनके महल से इंच भर भी हिला नहीं सकता था..
रूपा भी अपनी ‘फूफू साहब’ के आगमन से प्रसन्न थी.. अगले दिन वो हर्ष की कुंडली दिखाने को तैयार हो गयी..
उसने बांसुरी को भी साथ चलने के लिए मना लिया..
अगली सुबह नियत समय पर बांसुरी और रूपा को साथ लिए ‘फू साहब’ गुरूजी से मिलने निकल गयी…
अपने विदेशी लटकों झटकों के बावजूद जन्मपत्री पर विश्वास करने में ‘फू साहब’ खालिस देसी हो जाया करती थी।
सत्संग समाप्त होने के साथ ही गुरु जी के विशेष सहायक ‘फू साहब’ के पास चले आये..
“कंचन लता जी… आइये आपको गुरूजी बुलवा रहे है !”
बुआ जी ठाठ से उठी और रूपा और बांसुरी को साथ चलने का इशारा कर उस तरफ बढ़ा गयी जहां से वो आदमी आया था।
उस विशाल प्रांगण के एक ओर से अंदर की तरफ सादा संकरा सा गलियारा था, जिसे पार करने के बाद एक बड़ा सा लकड़ी का दरवाज़ा था….
जिसके सामने दो द्वारपाल खड़े थे.. उन दोनों ने ठेल कर दरवाज़ा खोल दिया…
अंदर प्रवेश करते ही रूपा और बांसुरी की आंखे अंदर की भव्यता और चकाचौंध से चमक गयी..
वो आदमी वहाँ नहीं रुका, उस विशालकाय कक्ष को पार कर वो एक गोल गलियारे में दाखिल हुआ, और उसके पीछे वो तीनो औरते भी चली गयी..।
एक बड़े से कांच के दरवाज़े से अंदर जाने के बाद एक और दरवाज़ा आया जिसे पार कर अब वो लोग जिस कक्ष में थे वो गुरु जी का साधना कक्ष था..
ये अपेक्षाकृत शांत और संयमित लग रहा था.. दीवार पर किसी औघड़ बाबा की धुंधली सी तस्वीर लगी थी।
एक चंदन के पाटे पर गुरुदेव आंखे मूंदे बैठे थे।
उन तीनो के वहाँ घुसते ही बिना आंखे खोले गुरूजी बोल पड़े..
“आ गयी कंचनलता !”
“जी बाबा जी.. हम आ गए है !”
बुआ जी आगे बढ़ कर बाबाजी के पैरो के पास पहुँच गयी..
“प्रणाम करते है आपको गुरुवर !”
“प्रसन्न रहो स्वस्थ रहो, आज क्या सवाल लेकर आयी हो ?”
“गुरूजी, ये हमारी दो भतीजियां है, इनके दोनों के पुत्रों की कुंडली ज़रा बंचवानी थी !”
अब जाकर गुरूजी ने आंखे खोली और उनकी आंखे देख कर कुछ पल के लिए रूपा घबरा सी गयी…
“कहाँ है कुंडली ?” अपनी लाल लाल आँखों से ‘फू साहब’ को देखते हुए गुरूजी ने पूछा और रूपा ने अपने बेटे की कुंडली उनके सामने रख दी..
एक बार फिर आंखे बंद कर कुछ मन्त्र पढ़ने के बाद गुरूजी ने आँखे खोली और हर्ष की कुंडली पढ़ने लगे..
“सब तो ठीक ही दिख रहा !”
“गुरूजी, बेटे का विवाह करना चाहती है हमारी भतीजी ! बस उसी के बारे में जानना था.. !”
कुछ देर तक ध्यान से कुंडली देखने के बाद गुरूजी के माथे पर बल पड़ गए..
“जिस लड़की से इसका विवाह होगा, वो मारी जाएगी !”
ये बात सुनते ही बांसुरी और रूपा एक दूसरे की तरफ देखने लगी।
“लेकिन गुरूजी ये कैसे हो सकता है ?” रूपा के मुहं से आह निकल गयी..
“जो लिखा है कुंडली में वो तो होकर रहेगा.. !”
“इसका कोई उपाय, कोई तोड़ !” बुआ जी ने गुरूजी के सामने हाथ जोड़ कर पूछा..
“उपाय बताने वाला मैं कौन.. उस औघड़ महादानी से मांग लो कि वो उस कन्या की रक्षा करे, अथवा तुम लोग पुत्र का विवाह ही मत करो !”
ऊपर आसमान की तरफ हाथ उठा कर गुरूजी ने बोला..
“ये तो अब असम्भव है !” रूपा के मुहं से दर्द भरी ये बात निकल आयी.. उसने पलट कर बांसुरी को देखा, बांसुरी को जानें क्यों ये वातावरण, ये गुरूजी कुछ भी रास नहीं आ रहा था…!
उसने रूपा की तरफ देखा और धीरे से उसे वहां से निकलने का इशारा कर दिया।
रूपा एक बार में अमझ नहीं पायी और वापस बांसुरी ने वहाँ से चलने को कहा और इस बार गुरु जी ने बांसुरी को देख लिया..
“तू यहाँ से निकल जाना चाहती है?
क्या तुझे अपने इकलौते लाडले की कुण्डली नहीं दिखानी ?”
“महाराज मुझे क्षमा करे, लेकिन मेरा इस सब पर विश्वास नहीं !”
“अच्छा है मत कर विश्वास वरना पल पल रोयेगी… तेरे बेटे की कुंडली में सर्प फन काढ़े बैठा जो है..
मृत्यु योग में है तेरा बालक.. जो बच गया तो बहुत नाम करेगा तेरा, लेकिन बचने के योग बहुत कम है… बहुत कम!”
बांसुरी का शरीर अंदर तक कांप गया।
ये कैसी भविष्यवाणी कर गए थे महाराज… !?
क्रमशः

क्यो बाँसुरी की मुश्किले खत्म नही होती
राजा के साथ साथ शौर्य की भी चिन्ता
In Baba logo per vivas karay ki nahi,bahut hi vikat isthi, Aagya dekhtya hai kya hoga Dr Sahiba hi naiya Paar lagayagi,
Very nice n good n Marblus n Fantastic n Fabulous n Shandaar and Jaberdast part.
Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
Ye kaise bhavisayavani ki Maharaj ji ne,Bahut hi chintajanak,Waiting for the next part eagerly
Mujhe in sabme wiswas nahi hota hai.shauray ki aayu bahut lambi ho mahadev
यह कैसी विकट स्थिति आप पड़ी है मुझे नहीं लगता कि यह संत जो कह रहे हैं वह ठीक है हो सकता है फू साहब का यह कोई षड्यंत्र हो इससे वह रूपा रानी को हर्ष की शादी के लिए मना कर सके।🙄🙄🙄🙄🙄🙄🙄
और जाते-जाते बांसुरी के दिल में भी एक खटका लगा ही दिया और संत महाराज ने अरे क्या जरूरत थी मुंह खोलने की मत बताते कुछ ,😠😠😠😠😠😠
माओ का दिल तो वैसे भी अपने बच्चों के लिए कितना कच्चा होता है जरा सी तकलीफ पर ही रो पड़ती है आपने तो सीधा शौर्य के जीवन पर ही सवाल खड़ा कर दिया मुझे ऐसे संत महात्मा बिल्कुल नहीं पसंद जो बिना किसी के पूछे बताएं अपना ज्ञान बघारते फिरे।
एक तकलीफ खत्म नहीं होती जो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है
ये किस दुविधा में आन पड़ी है कली , रूपा और बाँसुरी…
कली को प्रेम है पर पिता की वजह से स्वीकरोक्ति नहीं कर सकती
रूपा को पुत्रवधु के प्राणों पर संकट की विपदा ने आ घेरा और बाँसुरी जो इन सब पर यकीन कर भी न पा रही थी लेकिन इतनी बड़ी बात सुनकर रह भी कैसे सकती है बिना रुके।
जीवन कितनी विसगत घटनाओ का साक्षी बना देता है मनुष्य जिस पर विश्वास नहीं भी करना चाहता उस पर भी उसे भरोसा करना पड़ जाता है अब क्या करेगी बाँसुरी
ये क्या बोल रहे है बाबा जी, मीठी की मृत्यु हो जायेगी शादी के बाद और शौर्य के लिए , शौर्य के लिए अभी खतरा तो है वहां पर सब ठीक हो होगा, बाबा तो पूरी तरह से ढोंगी ही लग रहे है।
देखते हैं क्या होता है आगे, बेहतरीन पार्ट 👌👌👌👌♥️♥️♥️♥️
सही कहूं तो dr साहिबा, ये कुंडली तो मैं पढ़ता चुकी हूं और सच में अब लगता है नही पढ़वाई होती तो अच्छा था ,
आज दोनो भाई लोग के लिए सच में चिंता होने लगी , जिस तरह की फू साहेब है , मुझे तो ये बाबा ढोंगी लगता है , ये राजा साहब के समय वाले बाबा जैसे तो बिलकुल नहीं है , जो बाबा लोग के बड़े बड़े आश्रम होते है उन पर विश्वास करना मुस्कील होता है, ओर आपने फू साहेब का जो वर्णन किया है जबरदस्त 👌🏼👌🏼👌🏼❤️❤️😊