
मायानगरी -2 भाग -6
वह दोनों कैंटीन की तरफ बढ़ रहे थे कि तभी इमरजेंसी गेट की तरफ का बड़ा सा कांच का स्लाइडिंग डोर खुला और तेजी से स्ट्रेचर पर किसी को लिए हुए अस्पताल का स्टाफ अंदर आपातकालीन चिकित्सा कक्ष में दाखिल हो गया…..।
उन लोगो को आते देख प्राची और अधिराज एक तरफ को हो गए..
स्ट्रेचर को लगभग दौड़ते हुए स्टाफ ने अंदर किया..
उस स्ट्रेचर के साथ साथ एक आदमी भी दौड़ते हुए अंदर आया…
उसने हाथ में मोबाइल पकड़ा रखा था, और लगातार किसी का नंबर लगाने की कोशिश कर रहा था.., लेकिन शायद उसका नंबर लग नहीं रहा था..
उसने खीझ कर अपना मोबाइल एक तरफ किया और आपात चिकित्सा कक्ष में मौजूद डॉक्टर से बोल पड़ा..
“डॉक्टर मृत्युंजय कहाँ मिलेंगे.. ! हमें उन्ही को दिखाना है !”
ड्यूटी डॉक्टर एकदम से कुछ बोल नहीं पाया..
“जी सर.. केस क्या है ?”
“केस जो भी है, ये केस सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर मृत्युंजय देखेंगे.. हमें और किसी भी डॉक्टर को नहीं दिखाना है आप प्लीज़ तुरंत उन्हें बुलाए!”
” जी सर, डॉक्टर मृत्युंजय इस वक्त अस्पताल में नहीं है.. लेकिन मैं उन्हें कांटेक्ट करने की कोशिश करता हूं! लेकिन आप फिलहाल इनका केस बताएंगे, तो हमें इनका ट्रीटमेंट शुरू करने में आसानी होगी..!”
“आप जानते भी है ये कौन है ?”
ड्यूटी डॉक्टर ने पलट कर ध्यान से उस स्ट्रेचर पर पड़े हुए मरीज की तरफ देखा.. और उसकी आंखे खुली रह गयी..
“नारायण गुम्बर है ये !”
नारायण गुंबर उस शहर का एक बहुत बड़ा नाम था… ढेर सारे व्यापर उसके नाम चढ़े थे, किसी जमाने में राइस मिल से अपना काम शुरू करने वाले नारायण गुंबर के कारोबार की आज कोई इंतिहा नहीं थी.. चीनी के कारखाने, टेक्सटाइल मिल्स, ऑटोमोबाइल्स के बाद अब उसने विमान सेवा के कारोबार में भी कदम रख दिया था…
नारायण गुम्बर को ना पहचाने ऐसा वहाँ कोई नहीं था..
वो आदमी नारायण गुम्बर का पीए था..
वो अभी उस डॉक्टर से बात कर ही रहा था कि मध्यम आयुवर्ग की एक महिला तेज़ी से चलती हुईं वहाँ चली आयी..
“क्या हुआ नारायण को ?”
“अहह मैडम… आप सम्भालिये खुद को.. सर बिलकुल ठीक हो जायेंगे.. !”
“बताओ तो सही हुआ क्या है ?”
“मैम वो मीटिंग के दौरान अचानक बेहोश हो गए… !”
“दवा तो ली थी ना लंच के बाद वाली ?” उस औरत के चेहरे पर परेशानी उतर आयी..
” मैम.. मैं कभी उनकी दवा में कोताही नहीं बरतता… लेकिन आज उनका लंच मिनिस्ट्री में था, वहां उनकी विमान सेवा वाली मीटिंग थी मैम.. मैंने दवा साथ रखी तो थी, लेकिन मालूम नहीं कि उन्होंने दवा ली या नहीं क्योंकि मीटिंग से निकलने के बाद जब हम लोगों की मीटिंग ले रहे थे उस वक्त बेहोश हो गए और इस बीच में मैं उनसे दवा के बारे में पूछ नहीं पाया..”
” तुम पागल हो गए हो क्या? वेल्लोर के डॉक्टर ने इनसे साफ-साफ कहा था कि ऑपरेशन की डेट तक इन्हे एक दिन भी मेडिसिन स्किप नहीं करनी है.. “
“हाँ मैम… बस इसलिए इन्हे तुरंत यहाँ ले आया हूँ.. आप घबराइए मत.. उस वेल्लोर के डॉक्टर जितना काबिल डॉक्टर यहाँ भी मौजूद है.. हम ऑपरेशन उन्ही से करवाएंगे..
“कौन है वो.. बुलवाओ, जल्दी !”
“यस मैम उसी कोशिश में हूँ… “
अब तक में आपात चिकित्सा में मौजूद स्टाफ अपने काम पर लग गया था, प्राची और अधिराज भी उनकी मदद में लग गए थे..
प्रेजिडेंट और डीन को जैसे ही ये मालूम चला कि नारायण गुम्बर को अस्पताल में लाया गया है, वो लोग दौड़ते भागते इमरजेंसी में पहुँच गए..
वहां डीन और प्रेजिडेंट को देखते ही वो आदमी उनके पास पहुँच गया..
“हमें गुम्बर जी की सर्जरी के लिए डॉक्टर मृत्युंजय चाहिए… उन्हें बुलाइये वो जहाँ भी है उन्हें लाइए… आप लोगो को इस सर्जरी की मुहं मांगी कीमत दी जाएगी.. बस सर को बचा लीजिये !”
मढ़रिया और थापर एक दूसरे की तरफ देखने लगे….
थापर के चेहरे का रंग उड़ गया था, जो मरीज़ सामने पड़ा था उसे बचाना अब उसके खुद के लिए जीवन मृत्यु का प्रश्न बन गया था…!
अगर वो उस मरीज़ को बचाने का प्रयास करता है, तो उसे जय को बुलाना ही होगा और अगर वो जय को नहीं बुलाता और गलती से गुम्बर सिधार गया तो उसका भी निपटना तय था..।
थापर ने अपना रुमाल निकाल कर माथे का पसीना पोछा और फ़ोन निकाल कर कॉल लगाने लगा..
****
जय अपने घर पर बैठा कोई किताब पढ़ रहा था, छवि उन दोनों के लिए चाय बना रही थी..
जय का मोबाइल साइलेंट मोड पर था… इसलिए थापर की आयी रिंग उसे सुनाई नहीं दी..
तुरंत ही थापर ने उसे दुबारा रिंग करना शुरू कर दिया…
छवि उसी समय वहां पहुंची उसने मोबाइल देख लिया.. थापर का नंबर देख कर उसे गुस्सा तो आया लेकिन फ़ोन उठाना भी ज़रूरी था.. उसने फ़ोन उठा लिया..
“जय से बात करवाओ !”
“जी सर !”
छवि ने फ़ोन जय की तरफ बढ़ा दिया..
उसने इशारे से बता भी दिया कि फ़ोन पर थापर है..
“सर.. !” जय के ऐसा बोलते ही थापर ने वहाँ से बोलना शुरू कर दिया..
“डॉक्टर मृत्युंजय… आपको तुरंत हॉस्पिटल आना होगा.. एक इमरजेंसी है !”
“लेकिन सर मैं कैसे आ सकता हूँ.. ?”
“वो सब मुझे नहीं पता.. तुरंत आओ !”
“सर, आपने ही तो मुझे ससपेंड किया है… प्रोटोकॉल के हिसाब से मैं हॉस्पिटल प्रेमिसेस में भी नहीं दिख सकता, वरना मुझ पर डिसिप्लिनरी एक्शन ले लिया जायेगा.. !”
“शट अप… भाड़ में जाए ये प्रोटोकॉल.. हम ही तो बनाते है ये सब.. मैं ही तुम्हे ऑर्डर दे रहा हूँ तुरंत आओ..।
बहुत बडी इमरजेंसी है और ये ऑपरेशन तुम ही कर सकते हो.. अब मैं और कुछ नहीं सुनूंगा, फ़ौरन चले आओ, वरना मैं तुम्हे नौकरी से निकाल दूंगा.. !”
“सर !” इतना कह कर जय ने फ़ोन रख दिया, छवि उसी की तरफ देख रही थी..
“क्या हुआ ? क्या कह रहे थे वो ?”
“हॉस्पिटल बुलाया है !”
“लेकिन क्यों ?”
“कोई इमरजेंसी सर्जरी आयी है.. उनका कहना है मैं ही कर सकता हूँ.. !”
“स्वार्थी लोग… एक तरफ तो बिना गलती के सजा देते है, और फिर जब खुद कुछ किया नहीं जाता तब फिर बुलाने लगते है.. कोई जरुरत नहीं वहाँ जाने की !”
जय ने छवि की तरफ देखा, छवि गुस्से में मुहं फुलाए खड़ी थी.. जय उसकी तरफ बढ़ा और उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया..
“शांत मेरी शेरनी, शांत हो जा ! ये तो मेरे लिए अच्छा मौका है ना.. आखिर उस थापर को भी समझ में आ गया कि मेरे बिना उसका काम नहीं चलना..।”
“तो क्या हॉस्पिटल जायेंगे आप ?”..
छवि ने जय की बाँहों से निकल कर उसकी आँखों में आंखे डालते हुए पूछा..
“हाँ.. देखना चाहता हूँ क्या ऐसी इमरजेंसी आ गयी.. वैसे डॉक्टर हरीश भी तो न्यूरो में ही है.. प्रोफेसर कुलदीपक भी है.. इन सब के बावजूद थापर मुझे ही क्यों बुला रहा ? ये भी तो जानना है.. ! मुझे जाना होगा छवि !”
छवि का चेहरा बुझ गया..
जय खड़ा हुआ और घर से बाहर निकलने लगा..
“अरे रुकिए.. ऐसे ही चले जायेंगे क्या ?”
“हाँ क्यों ?”
“आप घर के कपड़ों में है !” छवि ने जय को टोका, और जय हल्के से मुस्कुरा उठा..
“”शुकर मनाओ कपड़ो में हूँ !”
जय दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया..
छवि भी तुरंत अंदर चली गयी.. जल्दी जल्दी कपड़े बदल कर वो भी हॉस्पिटल के लिए निकल गयी…
***
रंगोली और झनक की क्लास चल रही थी…
सभी को उनके कम्पाइलेशन टॉपिक्स बाँटने के बाद मेडिकल ज्यूरिस के प्रोफेसर क्लास से चले गए..
“थैंक गॉड क्लास ख़त्म तो हुईं !” रंगोली की इस बात पर झनक उसे देखने लगी..
“क्या हुआ तेरी तो फेवरेट क्लास है ये !”
“हाँ यार, लेकिन आज बहुत भूख लग रही.. !”
“ओह्ह, चल फिर कैंटीन में चलते है ! लंच का टाइम भी हो गया !”
“हम्म… होप की आज कुछ ठीक ठाक हो लंच में ! इतने दिन से कुछ अच्छा नहीं खाया.. मैं तो पक गयी हूँ कैंटीन और हॉस्टल मेस के सड़े खाने से !”
“हम्म, लेकिन किया क्या जा सकता है !”
दोनों बातें करती हुईं कैंटीन की तरफ बढ़ रही थी कि सामने से बाइक पर आते अभिमन्यु पर उनकी नजर पड़ गयी..
रंगोली के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान चली आयी..
“तुम यहाँ क्या कर रहे हो हीरो ?” झनक ने उसे छेड़ते हुए कहा
“बस अपनी हेरोइन को देखने चला आया.. तुझे क्यों जलन हो रही ?”.
“मुझे क्यों जलन होगी.. वो भी तुझसे ? कभी नहीं ! “
झनक ने मुहं बिगाड़ लिया और अभिमन्यु हंसने लगा..
रंगोली चुप खड़ी बस अपने सैंया जी को निहार रही थी..
कैसा तो हो गया था उसका मन, आजकल अभिमन्यु को जितना देखती थी उतना ही और देखने का मन करता था..
उस चेहरे को देखते हुए मन ही नहीं भरता था उसका… यहाँ तक कि अभिमन्यु भी उसे कहने लगा था, आजकल बात ही नहीं करती हो,क्या हो गया है ? वो क्या समझाती उसे, कि वो किस कदर उसकी दीवानी होती चली जा रही है.. ..
अभिमन्यु ने रंगोली की तरफ देखा..
“आज दूसरा शनिवार है ना, तो मेरी छुट्टी है, सोचा आज अपनी ताजातरीन नाजनीन और बेहद हसीन बीवी के साथ कहीं अच्छी जगह लंच किया जाये !”
रंगोली हलके से मुस्कुरा उठी..
“आप भी चलिए महोदया… आपको छोड़ कर हमारी शरीके हयात नहीं जाएँगी.. !” अभिमन्यु ने झनक को देख कर कहा..
“क्या… शरीफे हया.. ये क्या होता है ?” झनक ने अभिमन्यु की तरफ देख कर पूछा..
“छोड़ वो सब… पहले लंच के लिए चलते है.. फिर वहाँ तुम दोनों को वो किस्सा सुनाऊंगा !”
“कौन सा किस्सा ?” रंगोली ने पूछा
“अरे वही, जब मेरी बॉस ने मुझे तुम्हारे साथ देख लिया था !”
अभिमन्यु के चेहरे पर शरारत से भरी मुस्कान चली आयी..
अब तक में झनक अपनी स्कूटी निकाल कर ले आयी..
रंगोली पसोपेश में पड़ गयी कि अभिमन्यु के साथ बैठे या झनक के..
फिर उसने अभिमन्यु की तरफ देख कर धीमे से माफ़ी मांगी और झनक के पीछे जा बैठी.. अभिमन्यु को अंगूठा दिखा कर चिढ़ाते हुए झनक अपनी गाडी आगे बढ़ा ले गयी…
अपने बालो पर बडी अदा से हाथ फेर कर अभिमन्यु भी अपनी गाडी निकाल ले गया…
क्रमशः..

Very interesting part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
हर बन्दे की अपनी काबलियत होती है ना तो हम ये सोच सकते है कि हमे कभी जरूरत नही ना उस पर आश्रित हो सकते है
मृत्युंजय की जरूरत डॉक्टर थापर को आन पडी चाहे कारण कुछ भी रहा हो
उम्मीद करते है डॉक्टर थापर को अपनी गलती समझ आयेगी
रंगोली अभिमन्यु welcome
Very very nice part 👌👌
एक ही दिन में अकल ठिकाने लग गई us कंजर थापर की ऐसा थप्पड़ पड़ा है उसके मुंह पर वक्त का कि उसे खुद ही जय के सामने गिगियाना पड़ा।😏😏😏
जय के पास सही मौका है थापर की बात का जवाब देने के लिए और सही कहा जय ने के देखना भी तो जरूरी है कि इतने लोगों के होने के बाद भीउसे क्यों बुलाया गया है ऐसी भी क्या इमरजेंसी आ गई।🙄🙄🙄🙄
बेचारे रंगोली और अभिमन्यु शादीशुदा होकर भी अकेले जीवन काटने पर मजबूर हैं पता नहीं उनकी यह प्रोब्लम कब ठीक होगी पर वह दोनों साथ में रह पाएंगे🥰🥰🥰🥰🥰😍😍😍😍😍😍😍❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
Awesome part ❤️ jabardast story ❤️
Ye baat toh sahi hai ki jay jaisa koi ho hi nahi sakta.thapar aur baki sabne use suspend kar diya aur jab baat khud ke jaan pe ban aayi toh khud hi phone karke bula liya use swarthi log.jay kabil dr hai wo jarur wahan jayega aur chhavi bhi.bahut dino baad rangoli aur abhi ko dekha achha laga
Beautiful part 🥰🥰♥️🥰🥰
Bahut badhiya kahani hai, nice part..
सारे रूल्स खुद ही बनाओ और खुद ही अपने जरूरत के हिसाब से तोड़ लो थापर जैसे लोगो का यही काम है, आखिर झुकना ही पड़ा उसको जय के सामने और वापिस बुलाना पड़ा।
आज बड़े दिनों बाद रंग और अभि की जोड़ी दिखी, रंगोली के मन की बात अभिमन्यु को पता चल गई की उसे लंच में कुछ अच्छा खाना खाना है और पहुंच गए अपनी रंग के पास
बेहतरीन पार्ट 👌👌👌👌👌♥️♥️♥️♥️♥️
ये होती है काबिल डॉक्टर की पहचान इतने डॉक्टर्स होते हुए भी मृत्युंजय को ही बुलाना पड़ा।थापर की तो सारी हेकड़ी बाहर निकल गई बड़ा आया डॉ. मृत्युंजय को ससपेंड करने वाला पर छवि और मृत्युंजय तो घूमने जाने वाले थे 🤔पर ड्यूटी के आगे कुछ नही यही है मृत्युंजय..😊।
ओहो…क्या बात 😊👏🍫🍫आज बड़े दिनों बाद हमारी रंगीली जोड़ी के दर्शन हुए मजा ही आ गया दोनों को देखकर 🥰।
बहुत अच्छा भाग 👌👌👌👌।