दगाबाज-2

दगाबाज -2

   गुल्लू और उसकी पत्नी आये और चले गए, लेकिन मेरे जीवन में कुछ नहीं बदला.. वही सुबह से अपनी गृहस्थी की आर्मी में जुती मैं, इनके और नीलू के निकलने के बाद काम वाली के साथ माथा खपाती और उसके बाद जब उसका काम भी ख़त्म हो जाता तब ग्यारह बजे के आसपास चाय बना कर महरी का कप उसे पकड़ा कर फिर सोफे पर पसर पाती थी..।

आज भी अपनी सुकून का कप थाम कर पेपर खोले बैठी ही थी कि दरवाजे की घंटी बज गयी.. जाकर खोला तो सामने विनती खड़ी थी..।

इन लोगो को यहाँ आये महीना भर ही बीता था.. एक सेकेंड को मुझे उसका चेहरा पहचानने में वक्त लगा लेकिन मैं तुरंत ही मुस्कुरा कर उसे घर के अंदर ले आई। उसका माथे भर का घूंघट आज सलीक़े से कंधों पर सजा हुआ था, मुझे उसे देखकर अच्छा ही लगा..

“आओ बैठो विनती, तुम्हारे लिए भी चाय ले आती हूं।” मुस्कुरा कर उसे सोफे पर बैठाकर उसे चाय का प्याला पकड़ा कर मैंने अपना कप भी थाम लिया।

” और सुनाओ कैसी हो?”

” ठीक हैं। आज अपना कहीं बाहर जा रहे थे काम से, तो कहा भाभी से मिल आना। छोड़ कर गए है।”

उसकी बोली में बदलाव मैं साफ महसूस कर पा रही थी। साफ था कि लड़की शहरी रंग में रंगने के लिए उत्सुक थी, और काफी तेज भी।

” अरे वाह, तुम तो काफी कुछ हिंदी बोलने लगी हो।”

वह मुस्कुराने लगी “थांक यू जिज्जी।” कह कर  वो चाय पीने लगी..
उसका “थांक यू” खट से दिल पर लगा…

अच्छा था यह गुल्लू की तरह नहीं थी कि जिससे बात करने के लिए मुझे ही नई-नई बातें सोचना पड़े। यह खुद कुछ तो बोलती थी। मैंने वापस बात छेड़ी..

“कैसी हो.. कैसा लग रहा, यहाँ शहर में ?”

“ठीके हैं…!” उसके जवाब पर मैं मुस्कुरा कर रह गयी  … मैंने उसकी नजर बचा कर एक बार घडी देख ली.. बस यही आधे घंटे सुकून के मिलते थे मुझे, उसके बाद खाना बनाने की कवायद शुरू करनी होती थी.. मैं उससे बच कर घडी देखना चाहती थी, पर उसने ताङ लिया..

“कहीं जाना है का ?”..

“‘नहीं नहीं.. बस खाना बनाने का वक्त होने लगा.. तुम बैठो मैं बस दाल चढ़ा कर आयी..। ऐसा करो आज यही दोपहर का खाना खा लेना !”

“नहीं, हमहु को जाना पड़ेगा जिज्जी। इनके एक ठो भाई आये है ना, उनका खाना पीना देखना पड़ता, हम साग तरकारी बना कर आयी है, जाकर दुइ चार रोटी बेल लेंगे !”

“गुल्लू का भाई ? ” आश्चर्य से मेरी आंखे चौड़ी हो गयी..

“हम लोगो को तो यही मालूम था कि गुल्लू की चार बहने हैं, और सबका ब्याह हो चुका है ।”

“हां, यह उनके चाचा जी के लड़िका हैं ।”

“अच्छा! शहर में नौकरी के लिए आया है क्या?

” हाँ नौकरी हियाँ थाली माँ परोस के मिलत हुईं हैं..।”

उसका ये राग मुझे समझ नहीं आया, और वो आगे बोलने लगी…

“अब का बताई जिज्जी, हुआं गांव मा सबको लगत है, हियाँ ये डिप्टी बने बैठे हैं..
  जिनको देखो मुहँ उठाये चला आता.. अब ई लाला जी मैट्रिक पांच बार फेल कर गए .. बहुत पुअर हैं पढाई लिखाई में… !”

उसकी बात सुन मुझे समझ आ गया उसका ये पढाई में बहुत पुअर देवर उसे फूटी आँख नहीं भा रहा

“इस बार जब लाला घर आये, चाचा जी गंडासा लिए चौखट पे खड़े थे, देखते ही चीखे, “अंदर ना घुसना नहीं परान ले लेंगे मुंहझौंसा !”..
     ये सुन कर लाला जो भागे सीधा हियाँ सहर आकर रुके.. हमार मनसेधू अउर बड़े डिप्टी हैं.. कहन लगे यहीं आ जाओ, दुइ महीना पड़े रहो, चाचा जी का गुस्सा सिराये जाए तब चले जाना..
अब तब ही से यही पड़े है !”

मुझे उस नयी नवेली की पीड़ा समझ में आ रही थी.. अकेली जाने कितनी उमंग से अपने पति के संग नयी गृहस्थी सजाना चाहती होगी, ऐसे में देवर को देख दिमाग तो खराब होना ही था। मैं मुस्कुरा कर सब्जी काटने लगी और वह मेरे साथ फलिया तोड़ने लगी..

” खाना तो बना कर आयी हो ना ?”

” साग पका कर धर आये है, लाला का खाना भी अगड़म बगड़म हैं, उनको दुनो बखत दाल चाहिए, वह भी कटोरा भर के!
   छुहारा बादाम और जाने का का भिंजवाते हैं..  पहली बार हमसे बोले हमने दुई बादाम भीगा दिया अगले दिन कहने लगे ‘अरे भाभी बस इतना..?इतने में  क्या होगा? हम अकेले थोड़ी ना खाएंगे? तुम अपना लिए और भैया के लाने भी भिगाव।’ अउर  खुद रसोई मा आइन और मुट्ठी भर भिगाकर चल दीन.. ई सब तामझाम भी खुदै खरीद लाते हैं।
कभी किलो भर पेठा लाकर पटक देते हैं कहते है पीस कर जूस निकाल दो भाभी, कभी कोई परोटिन ले आते है, कहते हैं पानी में घोर के दे दो.. बस यही पिएंगे !”

मुझे समझ में आ गया इसका लाला कोई फिटनेस फ़्रीक़ था…
कुछ देर बाद ‘बडी अबेर हो गयी’कह कर वो भी चली गयी..

कुछ दिनों बाद एक दोपहर उसका वापस आना हुआ… इस बार वो स्लीवलेस कुर्ती चूड़ीदार में थी..!
उसकी ये बदली सी अदा अच्छी तो लगी, लेकिन उसके बित्ते भर के घूंघट वाली पहली झलक के बाद सिर्फ तीन महीने में उसका गहरे गले का बिन बाहों का कुरता मेरी आँखों को ठंडा नहीं कर पाया..
पता नहीं ये आजकल की लड़कियाँ खुद को रिबेल साबित करने क्या कुछ दिखावा करने लगी थी..

एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ उसकी बतकही भी शुरू हो गयी..।

लेकिन इस बार बातों में एक अलग नजाकत थी, एक अदा थी, चेहरे पर तेवर थे,और नयी ब्याहता वाली चमक थी !
अब बात बात पर वह अपने उस देवर पर खीझ नहीं रही थी, बल्कि बातों बातों में लग रहा था जैसे बार-बार उस पर वारी जा रही हो!
उसकी वही आदतें जो कभी इसे जी का जंजाल लगती थी, आज उनकी मुरीद हुई जा रही थी..।
जाने कितने तो उसने मुझे नुस्खे थमा दिए जो उसके इस बौड़म और पढाई में पुअर देवर ने उसे बताये थे…।

“सुबह सवेरे जीरा पानी पीने से चर्बी गल जाती हैं जिज्जी.. ।”

उसकी यह बात सुनकर मैंने आंखें गोल गोल कर उसे देखा।

” मैं किस तरफ से तुम्हें मोटी नजर आ रही हूं ?”

“अरे नहीं आप कहां मोटी, हम बस बता रहे हैं।”

मुझे समझ में आ गया, उसका यह देवर रील्स देख देख कर जो भी औङम बौङम ज्ञान मिल रहा था, उसे अपनी नई नवेली भाभी पर लुटा रहा था। और उसकी भाभी भी बड़ी शिद्दत से सारा ज्ञान सहेज कर जहां मौका मिलता वहां बांटने पर तुली हुई थी।

कुछ देर बैठकर इधर-उधर की बातें कर वह वापस चली गई। लेकिन जाने क्यों आज उसका आना मुझे नहीं भाया।
     मन के किसी कोने पर गुल्लू के लिए एकदम से ममता छलक आई।
बेचारा लड़का दिन भर काम के चक्कर में व्यस्त जानता भी नहीं कि उसके पीछे से उसकी सुंदरी बीवी क्या गुल खिला रही है?
इस सोच के साथ ही मैंने खुद ही अपने माथे पर अपना हाथ मार लिया। हम औरतें भी कम नहीं होती, किसी औरत को अपने पति के अलावा किसी और लड़के से बात क्या करते देख लेती है, तुरंत उसके एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के पर्चे छपवा लेती है..।
देवर भाभी का स्वस्थ सुंदर रिश्ता हैं उनके बीच, बस हम उम्र होने से थोड़ा ज्यादा अपनापन आ गया होगा..
यही सोच मैं वापस अपने काम में लग गयी.. 

इसी बीच नीलू के इम्तिहान चले आये और मैं भी एक अनुशासित माँ की तरह उसके साथ उसके इम्तिहान की तैयारियों में जुट गयी!
इन सब में बहुत दिनों से गुल्लू या उसकी पत्नी का आना नहीं हुआ इस बात पर ध्यान ही नहीं गया।

एक रात खाने की मेज पर इन्होने बात छेड़ दी..

“लता तुम्हे बताना भूल गया था, दो दिन पहले गुल्लू मिला था.. कह रहा था वापस गांव चले जायेंगे, यहाँ अब मन नहीं लगता !”

उनके मुंह से यह सुनकर जाने क्यों मेरा मन डूबने लगा। हो ना हो मेरे दिमाग में जो बात आई थी, वही बात शायद गुल्लू भी सोचने लगा हो..।
यह भी हो सकता है कि जो मैंने सोचा था, वह सच हो और उन दोनों का वाकई चक्कर चलने लगा हो। इसके बारे में गुल्लू जान गया हो और अब इसलिए उसका यहां मन नहीं लग रहा हो।
दूसरी संभावना यह भी है कि उन दोनों का चक्कर न हो, लेकिन गुल्लू को बिना वजह शक होने लगा हो। लेकिन दोनों ही सूरत में मुझे गुल्लू पर भयंकर तरस आने लगा। मेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर इन्होंने मुझे पकड़ कर झकझोर दिया।

” क्या हुआ लता, खाना तो खाओ। किस सोच में डूब गई?

“कुछ नहीं। कुछ दिनों पहले गुल्लू की पत्नी घर आई तो थी।”

” तब उसने कुछ कहा था?” इन्होंने पूछा और मैंने ना में गर्दन हिला दी ।

उस दिन की बातें मैं उसी दिन इन्हे बताने के लिए व्याकुल हो गई थी, लेकिन यही सोचकर नहीं कहा कि यह मुझे ही दो बातें सुना देंगे कि तुम औरतों का दिमाग घूम फिर कर फालतू बातों में ही जाकर टिकता है। और मैं चुप रह गई थी।
लेकिन आज गुल्लू के मन की यह बात सुनकर दिल डूबने सा लगा। लेकिन मैं कर भी क्या सकती थी।

ऐसे ही कुछ दिन और बीत गए। एक दिन शाम के समय घंटी बजी, दरवाजा इन्होंने ही खोला, और दरवाजे से ही हांक लगा दी

” अरे सुनती हो, गुल्लू और विनती आए हैं।” मैं चौके से अपने हाथ पोछते हुए बाहर निकल आई। उन दोनों को साथ देख कर मुझे ख़ुशी ही हुईं..।

लेकिन आज एक बार फिर विनती साड़ी में थी..। हालाँकि उसने सर से पल्ला नहीं लिया था, लेकिन पल्लू को कंधे पर से लपेट रखा था..
दोनों को पानी पिलाने के बाद विनती को साथ लिए मैं अंदर चली गयी..

चाय के प्याले के साथ मेरी आंखे विनती पर पूरी तरह गड़ी हुईं थी..
जैसे मैं उसके चेहरे को देख कर ही उसके अंदर क्या चल रहा है, जान लेना चाहती थी..।

“कैसी हो ? और तुम्हारा देवर कैसा हैं ? है या चला गया ?”

मैंने तो बस यूँ ही पूछ लिया, लेकिन उसके ज़िक्र भर से विनती के चेहरे पर जो भाव उभरे, उससे मुझे समझ में आ गया कि वो जा चुका हैं..

“गांव में चाचा जी रिस्ता देखे रहे, इसीलिए लालाजी को जाना पड़ा !”

मैंने गौर से उसकी तरफ देखा, उसके चेहरे पर पीड़ा से ज्यादा रोष उभर आया..

“बताओ, पढाई लिखाई तो कुछ की नहीं थी तुम्हारे लाला जी ने, अब ब्याह भी हो रहा.. ये गांव वाले इतनी जल्दबाजी क्यों करते हैं भला ?”

मैंने गौर से विनती के चेहरे को देखा, उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे, जैसे वो खुद पर ही तरस खा रही हो.. जैसे उसे महसूस हो रहा था कि जिसके पीछे वो बड़े नाज़ो से अपना संसार डुबाने चली थी, जिसके झूठे मोह में कुंए में कूदने चली थी, वो तो दगाबाज निकला..
और जिसे राह का कंकर समझ कर खुद से परे हटाती चली थी, वो वास्तव में हीरा निकला..।
उसकी आँखों में सब कुछ एक साथ नजर आ गया था..।
पश्चाताप के दो आंसू उसने बड़े प्रयासों से अपनी आँखों में ही समेट लिए..
आज मैंने जानबूझ कर दोनों को रात के खाने के लिए रोक लिया..
गुल्लू के चेहरे की मुस्कान गायब थी, लेकिन वो दुखी भी नहीं लग रहा था।
खाने के बाद वो लोग जाने को थे कि मैं अंदर से एक शर्ट पेंट का कपडा और एक साड़ी ले आयी..

‘” भाभी जी इस सबकी क्या ज़रूरत थी ?” गुल्लू विनम्रता से दुहरा हो गया।

“कैसे ज़रूरत नहीं थी.. खाने पर तो तुम दोनों पहली ही बार आये हो ना !”

गुल्लू ने बडी गहरी सी नजर से मुझे देखा, जाने कैसे उसकी वो नजर मेरे अंदर तक उतर गयी..
    विनती सीढ़ियां उतर गयी थी, नीलू उसके साथ ही थी, ये भी उन दोनों के पीछे निकल गए.. दो सीढ़ियां उतर कर गुल्लू वापस मुझ तक चला आया..

“भाभी जी, बीच बीच में बिनती को समझाती रहा कीजिये..! गांव की हैं ना, बडी भोली हैं, जल्दी ही किसी की भी बात में आ जाती हैं..।
बाहरी चकाचौंध से जबरदस्त प्रभावित हो जाती हैं… दीन दुनिया की समझ नहीं हैं इस नादान को। और इतना भी नहीं समझती कि जिंदगी बार-बार मौका नहीं देती। हमने अपनी तरफ से समझाने का प्रयास किया तो है, बस भगवती कृपा बनी रहे।
आशीर्वाद दीजिए भाभी जी, कि हमारी जोड़ी बनी रहे…।”

उस लड़के ने झुक कर मेरे पैर छुए और जाने क्यों मेरी आंखें डबडबा गई।

इसका मतलब गुल्लू से कुछ छिपा नहीं था, और उसने इतनी बडी गलती के बावजूद विनती को माफ़ कर दिया था..

वह तुरंत पलट कर सीढ़ियां उतर गया, और मैं पीछे खड़ी उस असाधारण रूप से साधारण चेहरे मोहरे वाले लड़के के साधारण से दिखते लेकिन असाधारण व्यक्तित्व को देखती रह गई।

aparna..

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Tripti
Tripti
1 year ago

गुल्लू जी कहा मिल गए आपको…..nice story

Seema garg
Seema garg
1 year ago

बहुत ही भावुक कर गई रचना🙏🏻गुल्लू का रूप साधारण है चाहे लेकिन उसकी सोच बहुत ही अच्छी है जिसने उसे उसके रिश्ते को बचाने के लिए प्रेरित किया और सब जानकर भी विनती को माफ कर अपनी गृहस्थी बचा ली❤️❤️दूसरी तरफ विनती अपने रूप के दंभ में शहरी चकाचौंध में उलझती जा रही थी और अपने ही दगाबाज देवर के साथ मिलकर शायद गुल्लू को धोखा दे जाती अगर वो शादी न कर रहा होता🥺🥺गांव वापिस जाने का फैसला एकदम सही रहा गुल्लू का क्योंकि गांव के बंधन में विनती भी वापिस सही राह पर आ जायेगी🙏🏻🙏🏻
बहुत ही अच्छी कहानी👌🏻👌🏻

Soma ( J T)
Soma ( J T)
1 year ago

Ha bahak jati h auratein ajkl ki chakachondh me.. Pr sadi suda hoker ye krti h to bahut galat lgta h…..

Yashita Rawat
Yashita Rawat
1 year ago

Very impressive pyari lekhika ji.

जागृति
जागृति
1 year ago

गुल्लू जैसे दिलदार कम ही है संसार में और जिनको मिलते हैं वो भाग्यशाली

जितेन्द्र कुमार वैश्य Jitendra Kumar Vaish
जितेन्द्र कुमार वैश्य Jitendra Kumar Vaish
1 year ago

बहुत सुंदर रचना 👏👏👏👏👏 बहुत बड़ा दिल है गुल्लू का 👏👏👏👏👏🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

बुरा लगा गुल्लू के लिए कैसे उसकी बीवी ने उसके पीछे उसे धोखा देने की कोशिश की फिर भी वह बेचारा मासूम सा लड़का अपनी बीवी को समझाने और अपनी गृहस्थी को बचाने की कोशिश में लगा है😥😥😥😥
गुल्लू का रूप रंग साधारण जरूर है पर उसकी सोच असाधारण है और सोच ही इंसान को अलग बनाती है गुल्लू की जगह कोई और होता तो अभी तक तो पता नहीं क्या कर जाता पर उसने समझदारी से काम लिया और भाभी से गुजारिश भी की उसकी बीवी को समझाएं 🙄🙄🙄🙄🙄🙄
बिल्कुल सही निर्णय लिया गुल्लू ने क्योंकि छोटी-छोटी बातों में घर गृहस्ती नहीं तोड़ी जाती🌝🌝🌝🌝🌝
बेहतरीन रचना 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Gurpreet Kaur
Gurpreet Kaur
1 year ago

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍

Meera
Meera
1 year ago

विनती और गुल्लू को देख , लगता है की गुल्लू की समझदारी उनके जीवन को बचा लेगी , अगर सच्ची में विनती भोली है सब की बातो में आने वाली , दुनियादारी से बेखबर फिर ठीक हैं। पर हर बार सभी को सुधारने के मौके नही मिलते । अगर यही हारकर गुल्लू की तरफ से की गई होती तो शायद ही कोई माफी मिलती।👌🏼👌🏼❤️ Ok or nayi soch 🫡🫡

Rekhapradeepsrivastava
Rekhapradeepsrivastava
1 year ago

बहुत ही बेहतरीन कहानी
गांव की भोली भाली लड़की विनती अपने ही देवर के चालों में फंस कर अपनी गृहस्थी खराब करने चली थी, गुल्लू की समझदारी ने उसको और अपने घर को बचा लिया।
बाहरी नही दिल की सुंदरता ही मायने रखती है, ये बात विनती को समझ आ गई।👌👌👌👌👌