दगाबाज़…


दगाबाज…

  स्कूल से आकर नीलू बैग एक तरफ फेंक कर नित्य के अभ्यास से सोफे पर पसरने को थी कि उसकी नजर सामने बैठ कर मुस्कुराते गुल्लू पर पड़ गयी और जरा ठिठक कर उसे नमस्ते कर वो अंदर चली गयी…

उसके चेहरे का बदलता रंग देख कर ही मैं समझ गयी कि लड़की का दिमाग चढ़ गया हैं.. स्कूल से आने के बाद उसे घर पर किसी का दिखना फूटी आँख नहीं सुहाता था.. ये वक्त उसका और उसकी टीवी का होता था..
बिना यूनिफॉर्म बदले सोफे पर पसर कर वो किसी इंग्लिश सीरियल का हिंदी अनुवाद देखती थी.. आधे घंटे का कार्यक्रम फिर पूरा किये बिना उसे उसकी जगह से हटाना मुश्किल था..।

आज का एपिसोड छूट जाने की पीड़ा उसकी आँखों में छलक आयी.. मैं उसके कमरे मैं उसका नाश्ता और पानी का गिलास लिए चली आई।

“ले कपड़े बदलकर नाश्ता कर ले, फिर बाहर आ जाना। गुल्लू कब से तुझसे मिलने बैठा है..।”

“अरे मम्मी यह क्या है इनका रोज मुंह उठाए चले आते हैं, और फिर दो घंटे तक सामने बैठे रहते हैं। न ये कुछ बोलते, ना हम कुछ बोलते हैं।
मुझे तो समझ नहीं आता उनसे क्या बात करूं..?”

“कोई बात नहीं बेटा, जान पहचान का लड़का है। बेचारा इस शहर में उसका कोई अपना भी नहीं है.. ।”

“हां तो, हम भी उसके कोई अपने नहीं है। हमारे घर क्यों चला आता है रोज-रोज।”

” यह तू जाकर अपने जेलर चाचा से पूछ ना, वही तो पहली बार लेकर आए थे कि लड़का यहां नौकरी की तलाश में आया है, और बस तब से..”

नीलू इस लड़के से अजब खीझती थी..।
लड़का था भी उबाऊ..।
आज के ज़माने से मिलाओ तो कहीं फिट नहीं बैठता था। जाने क्या सोच कर शहर में नौकरी की तलाश में चला आया था..?
ना ढंग की कोई डिग्री ही थी और ना कोई हुनर। बावजूद शहर में नौकरी करने का चस्का उसे गांव से ठेल कर यहां ले आया, और यहां कभी किसी छोटी पानी की बोतल बेचने वाली कंपनी का एजेंट बना घूमता तो कभी किसी प्राइवेट लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के लिए लोगों से उनके मरणोत्तर सुखद भविष्य की कामना करते हुए पॉलिसी बेचता..।

लेकिन उसे देख कर साफ़ समझ में आने लगा था कि उसके दीदे उन कामो में खूब लगते थे..।

शक्ल सूरत असाधारण रूप से साधारण थी..। रंग खुला था लेकिन बरहट मुहांसो से पूरा चेहरा ढंका था..
घने बाल माथे का आधे से ज्यादा हिस्सा ढांप कर चेहरे के बचे खुचे तेज़ को निस्तेज किये देते थे।
ना लड़के को कपड़े पहनने की तमीज थी ना खाना खाने की..
पहली बार कहाँ से मैंने उसे खाने पर रोक लिया..।

कोफ्ते के साथ आलू मटर की सब्जी और दो रोटियां परोसी..
मेरे थाली रख कर वापस रसोई से अचार लाते में ही उसने दोनों रोटियों को साथ सारी सब्जी भी भकोस ली थी..।

“बाप रे मम्मी ये डायनोसोर इसी गति से सब्जी खायेगा तब तो पूरा कढ़ैया यही खा जायेगा.. !”

नीलू की बात सच थी, हमारे तो इसी एक परोसे की सब्जी में हमारा सारा खाना निपट जाता था ..
वो तो अच्छा था कि सबका खाना एकसाथ नहीं लगाया था मैंने..।
इनके साथ उसे बैठा दिया था.. नीलू की भविष्यवाणी सही साबित हुई..।
लड़का अगली दो रोटियों के साथ वापस दो कटोरी सब्जी निगल गया..
बस उसी दिन से तय कर लिया कि आइंदा इसे खाने के लिए बोलना मतलब रोज़ाना के अंदाज़ से डबल सब्जी बनाना होगा..

उसे अबोले की बीमारी भी थी.. घंटो बैठा रहेगा लेकिन बोलेगा कुछ नहीं.. ।
जब तक मुझे बातें सूझती मैं कुछ न कुछ पूछती रहती फिर वही मनहूस मसानी चुप्पी।

वो अक्सर दोपहर ढलने के वक्त ही आता.. चाय नाश्ता डकार कर फिर इनका रास्ता देखते बैठा रहता और इनके आने पर वापस इनके साथ चाय दुहराई जाती..

और अक्सर ये उसके निकलते समय उसे बड़े लाड़ से टोक देते.. “गुल्लू अब तो खाने का वक्त हो गया है, खा कर ही जाना “

इनकी इस मेहमान नवाजी से मेरे हाङ मांस में आग लग जाती। अरे एक बार किचन में झांक तो लें क्या रखा है क्या नहीं?

सिर्फ टिंडे पड़े थे और आज रात के खाने में सिर्फ रोटियां और टिंडी बनाने वाली थी। अब मेहमान को क्या यही खिलाना होगा।
और वह भी जितने टिंडे हैं, यह तो पूरे एक बार में निगल कर फिर सब्जी के लिए मेरा मुंह देखने लगेगा तब क्या पड़ोस से मांग कर लाऊंगी…।
पर इनको कुछ समझाना मतलब दीवार पर सर फ़ोड़ लेना..

“तुम भी गजब करती हो लता.. कुंवारा लड़का हैं बेचारा खुद पकाता खाता हैं, नौकरी भी ढंग की हैं नहीं, जाने क्या खाता होगा..?
महीने पन्द्रह दिन में कभी उसे दो रोटी खिला भी दोगी तो ऐसा कौन सा आसमान टूट पड़ेगा..?”

अब इन्हे कैसे समझाया जाए कि घर पर सब्जियां पड़ी हो तो मुझे, दस रोटी भी खिलाने में संकोच न होगा लेकिन ये तरोई गिलकी जैसी सब्जियां मुझसे नहीं परोसी जाती.. !
लेकिन उस लड़के की खूबी कह लो या मेरी पाककला में सिद्धहस्तता, उसने कभी मेरी परोसी हुई इन अंडररेटेड सब्जियों को भी नहीं नकारा, बल्कि उतनी ही द्रुत गति से इन कटोरियों को भी उसने खाली लिया जितना तेज़ी से मटर पनीर खाली करता था.. !

वैसे तो गुल्लू गाहे बगाहे कभी भी चला आता था, लेकिन आज किसी विशेष प्रयोजन से आया था..
मैंने पूछा, लेकिन उसने भाई साहब के आने पर बताऊंगा कह कर बात ख़त्म कर दी..
अब तो बडी शिद्दत से इनका इंतज़ार होने लगा..
इनके आते ही उसने अपनी कमीज के अंदर से शादी का एक कार्ड निकाला और इनके हाथ में रख उनके पैर छू लिए..

इन्होने उसके सर पर हाथ रखा और कार्ड पढ़ने लगे..
शादी पर नाम लिखा था ‘बांकेबिहारी संग विनती’
इन्होने भौंह सिकोड़ कर गुल्लू की तरफ देखा..

“तुम्हारा नाम बांके बिहारी हैं ?”

“जी भइया.. !”

“अरे वाह.. बहुत बधाइयाँ, तो कब हैं शादी ?”
.
“बस अगले महीने.. !”

मैंने कार्ड इनके हाथ से छीना और पढ़ने लगी.. मैंने भी उसे बधाई दे दी, जानें कहाँ से नीलू भी वहाँ टपक पड़ी..

“वाह गुल्लू भैया, अब तो भाभी के संग ही आना आप !”

गुल्लू शरमा गया और उसके बेडौल और नीरस चेहरे की अनगिन रेखाओं पर उसकी लज्जा एक वीभत्स आकृति बना गयी..

“आप सब को आना हैं भाभी जी !”

मैंने बड़े जोश से हामी भरी लेकिन मन ही मन जानती थी ना ये इस अनचाहे वर के विवाह के लिए अपनी छुट्टियां झोकेंगे और ना ही नीलू उसके गांव जाने को राज़ी होगी..

उस दिन के बाद गुल्लू महीने भर के लिए गायब हो गया…
शादी के लिए शायद महीना भर पहले से चला गया था..

ठीक डेढ़ महीने बाद एक शाम जब मैं अपनी पड़ोस में होने वाले सुंदरकांड में जाने तैयार हो रही थी, दरवाज़े की घंटी बजी और नीलू ने दरवाज़ा खोल कर वहीँ से हांक लगा दी.. “मम्मी गुल्लू भैया आये हैं.. भाभी भी हैं.. !”

हैं ? भाभी भी हैं, मतलब ये लड़का शादी कर के आ भी गया..?

मैं तुरंत बाहर चली आयी..
गुल्लू मुस्कुराता खड़ा था और उससे लग कर एक लगभग उसी की ऊंचाई की लड़की घूंघट डाले खड़ी थी..

“आओ आओ, अंदर आओ.. नाम क्या बताया था गुल्लू !”

अपनी पूरी बत्तीसी निकाल कर गुल्लू ने नाम लिया बिनती..

“आओ विनती.. बैठो !”

वो चुपचाप बैठ गयी…

उसी वक्त ये भी आ गए, इनके आते ही झटके से वो खड़ी हो गयी.. गुल्लू ने इनके पैर छुए और विनती से भी कह दिया..

“बड़े भाई समान हैं, चरण धूल ले लो !”

चुपचाप सर घुमा कर वो इनके पैर में झुकने को थी कि ये चिहुंक कर पीछे कूद गए..

“अरे नहीं नहीं हमारे यहाँ लड़कियों से पैर नहीं छुवाते !”

“आओ विनती, हम लोग रसोई में चाय चढ़ाते हैं !” मुझे लगा गांव कि ये मासूम सीधी सी लड़की अब इनके सामने वहां बैठेगी नहीं और मेरी बात सुन वो सर झुकाये अंदर चली आयी..
मैंने उसे नीलू के कमरे में बैठा दिया और उसके लिए पानी का गिलास ले आयी..

“लो अब आंचल सर से हटा कर पानी पी लो..

विनती ने अपना आंचल हटाया और उसका चेहरा देख कर मैं स्तब्ध रह गयी..
लड़की तो सुंदर थी….
गोरा लहकता रंग, तीखी लम्बी सी नाक जिसके कारण चेहरा भी कुछ लम्बोतरा हो गया था,  घुंघराले से घने बाल, बालो कि मोटाई के कारण उसके जूड़े की मोटाई भी असाधारण सी थी.. उस जूड़े पर उसने जानें कितनी मोतियाँ लच्छे सजा रखे थे..
नाक पर गोल छोटी सी नथ थी।
आँखों में मोटा काजल, लहकती लाल लिपस्टिक, और बीच की मांग में भरा चमकता लाल बंगाली सिंदूर जिसके सबसे सामने उसने एक नग वाली बिंदी लगा रखी थी..।

लड़की सुंदर थी, लेकिन उसका हद से ज्यादा सजा संवरा रूप बिलकुल उस ज़री वाली साड़ी की तरह चुभने लगा जिस पर ज़रूरत से ज्यादा काम किया गया होता हैं…

बाहर इन लोगो को चाय नाश्ता देकर मैं पकौड़े और उसकी और अपनी चाय लिए नीलू के कमरे में चली आयी..
हालाँकि इस जुर्म के लिए आँखों ही से मेरी राजदुलारी ने मुझे घूर कर सजा भी दे दी….

मैंने यूँ ही बात शुरू करने की गरज से उससे पूछ लिया..

“और कैसा लग रहा हैं शादी के बाद !”

और वो जैसे फट पड़ी..

“अब का कहीं जिज्जी, हमार कलेजा तो उसी दिन जल कर राख होइ गवा, जे रोज़ इनका राजकुमार सा सूरत देखा है..
हमार बाबूजी तो इनके चौतरे पर बने बिसुन भगान के मंदिर पे रीझ गया और हमें ब्याह के आपन बिपता इन्हे मोल दे दिया.. !”

“अरे.. ऐसे क्यों बोलना.. किसी बाप के लिए बेटी विपदा थोड़े ना हैं !”

“ये तो हमहु जानत हैं, अब का काहे बियाह तो हुई गवा, अब हम और हमार मनसेधू यही हैं..।
इस जन्म तो अब और कोई पथ नहीं बचा हमारे लाने..
सत्ती माता लाज रखें, बस भाग सोहाग बना रहे,कैसे भी रो झींक के अब इन्हीं के साथ ज़िंदगी गुजारना हैं !”

जानें क्यों विनती की ये बात मुझे कचोट गयी.. माना कि उसके बाबूजी ने गुल्लू के खेत खलिहान बड़ा घर देख कर लड़की को ब्याह दिया, लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि ऐसे सरे आम वो अपने पति की बदसूरती का रोना रोये….।
लेकिन ऊपर से मुझसे कुछ कहा नहीं गया..
समझ ही नहीं आ रहा था कि उसे सांत्वना क्या दूँ ? और दूँ भी या नहीं..?

कुछ देर पहले उसके चेहरे का लुभावनापन अब कुछ कुछ कर्कश लगने लगा था, कि तभी इन्होने बाहर से चटनी की डिमांड कर दी और मुझे बाहर चटनी लिए निकलना पड़ा..

हालाँकि मैं जानती थी गुल्लू आया हैं तो अब डिनर भी खा कर ही जायेगा, लेकिन मुझे अचम्भित करता गुल्लू आज खाने के लिए मना कर गया…

कुछ देर बाद वो लोग निकल गए और उन्हें छोड़ कर लौटने के बाद मैं कुछ देर तक विनती की बात सोचती रह गयी… तब मैंने सोचा भी नहीं था कि विनती अपने पति के लिए मन में इतना बैर पाले बैठी थी..

क्रमशः

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Jagruti
Jagruti
1 year ago

Nice part

Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Database story Gav Dahat ki niri gavar si kahani lag rahi hai,Aagya dekhtya hai kya hoga, waiting for the next part.

कांति
कांति
1 year ago

हर बार की तरह अलग सी, सुंदर कहानी 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

कांति
कांति
1 year ago

गुल्लू भैया जितने सीधे निकले उनकी मेहरारू तो बस उनकी बुराई करके निकल गई। नई नवेली दुल्हन ने आते ही अपने पति के रूप रंग की शिकायत कर दी, जाने आगे क्या होगा।
बेहद शानदार भाषा शैली 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Mukesh Duhan
Mukesh Duhan
1 year ago

Nice ji

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

डॉक्टर साहिबा आपसे एक शिकायत है अब शिकायत कहे या उलाहना या तारीफ यह आप डिसाइड कर लेना आपकी रचनाएं मुझे अमिया कि उसे खट्टी मीठी लौंजी की तरह लगती है जिसमें एक चम्मच डूबा के आपके मुंह में रख दी जाए और बाकी की कटोरी छीन ली जाए☹️☹️☹️☹️☹️☹️☹️ फिर जो मन ललचाता है ना उस को खाने के लिए यह तो आप भी भली भांति जानती होंगी।
मन करता है बस की पूरी कटोरी छीन कर कहीं भाग जाऊं और तसल्ली से मन भर कर खा लो पर ऐसा हो नहीं पता है रचना का एक-एक भाग बिल्कुल उसी तरह की अनुभूति कराता है मुझे ।
मैं यही बात कहूंगी कि आपकी रचनाएं मुझे बेहद प्रिय है और उनका एक भाग पढ़ने के बाद मन में जो बेचैनी होती है वह दूसरा भाग मिल जाने पर ही समाप्त होती है। 🙂🙂🙂🙂
तो अब जब तक अगला भाग नहीं मिल जाता मन अटका रहेगा 😁😁😁😁😁😁😁😁
और आज एक बात बताऊं कि मुझे आपकी यह लघु कथाएं बेहद पसंद आती हैं मैं मैगजीन में ढूंढ ढूंढ कर ऐसी कथाएं पढ़ती थी जब बहुत छोटी थी और आज आपकी यह लघु कथाएं मुझे बिल्कुल वैसा ही एहसास कराती हैं 🥰🥰🥰🥰🥰❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
यह रचना देने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया डाक्टर साहिबा
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Nice story 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Pooja priyam
Pooja priyam
1 year ago

Kramashah hai matlab story aage bhi aaegi chalo bhaiya banke Bihari ji aapki sanvali Saloni Surat pay Radha Rani I hai bhai Dil mein Kitna bhi bair Ho

Anuja rashmi
Anuja rashmi
1 year ago

Kal se wait karte karte that gaye,lagta hai Dr sahiba busy hai,intjaar hai second part ka

vrinda
vrinda
1 year ago

Nice
Waiting for the next part ❤️