अपराजिता -163

अपराजिता -163

राजेंद्र जल्दी वापस आता हूं कह कर अपने दोस्त अमित के घर के लिए निकल गया..

भावना भी बड़े मन से रात के खाने की तैयारी में जुट गई।

गेंदा और उसने बहुत प्यार से खाना बनाया राजेंद्र भी कुछ ही देर में वापस घर लौट आया…!

रसोई समेटकर गेंदा भावना के कमरे में चली गई! भावना को इस बात पर बड़ा संकोच हो रहा था कि वह गेंदा के कमरे से राजेंद्र के कमरे तक कैसे जाए? राजेंद्र खाना खाते समय उससे कई बार इशारों में यह बात कह चुका था कि वह आज से उसके कमरे में सोएगी, लेकिन गेंदा के सामने भावना की ऐसा करने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी!

दूध का गिलास राजेंद्र के कमरे में पहुंचा कर वह निकलने लगी तब, राजेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।

” अरे रुकिए तो, अभी गेंदा सोई भी नहीं है।”

” हां तो, वह जानती है कि हम दोनों पति-पत्नी है।”

” लेकिन आज तक हम उसके साथ उसके कमरे में सो रहे थे।”

” उस कमरे को उसका कमरा बना दिया? मतलब मान तो चुकी हो कि, यह अब तुम्हारा कमरा है।”

भावना राजेंद्र की बात पर लजा गई, और धीरे से हां में गर्दन हिला दी।

“तो जाओ, उसे कहकर आ जाओ हमने रजिस्ट्रार के सामने शादी की है,बकायदे लाइसेंस है हमारे पास।
    समझ रही हो?”

” लेकिन वह बच्ची यह लाइसेंस और रजिस्ट्रार, यह सब नहीं समझती।”

” वह इतनी भी बच्ची नहीं है, तुमसे तीन चार साल की छोटी होगी। जाओ और जल्दी वापस आओ।”

” आप भी बिल्कुल ही रंग बदल गए डॉक्टर साहब।
सुबह तक तो बड़ा मुंह सुजाए इधर-उधर घूम रहे थे। हमने जरा सी पहल क्या कि आप तो बावले ही हो गए।”

” हां तो, इतना सारा बावलापन अपने भीतर छुपाए कैसे भटकता फिरता था, तुम क्या जानो?”

“अब तो जान गए हैं।”

राजेंद्र के पास आकर भावना ने धीरे से उसके माथे को चूमा और “आज न हो पाएगा, थोड़ा इंतजार कर लीजिए।” कहकर बाहर निकल गई..

राजेंद्र अपने पलंग पर लेटे हुए दोनों हाथों का तकिया बनाएं सर के नीचे लगाए छत को देखता रहा और उसे पता भी नहीं चला कब उसे नींद आ गयी…

आधी से ज्यादा रात बीत चुकी थी कि प्यास से गला सूखने लगा और राजेंद्र की नींद खुल गयी..
.
उसने देखा उसके ठीक बाजु में भावना लेटी हुई हैं..
वो सुखद आश्चर्य में डूब गया.. उसने धीरे से अपनी ऊँगली से उसके माथे पर आयी लट हटा दी..।

वो ज़िद्दी लट खिड़की से आती हवा से वापस माथे पर छिटक आयी, और एक बार फिर राजेंद्र ने उसे हटा कर कान के पीछे खिसका दिया..।
भावना कसमसा कर उठ गयी..
जागते ही सामने लेटे राजेंद्र को देख वो ज़रा झेंप सी गयी..

“आप जाग गए ?”

“हम्म.. मैं तो जाग गया और सही समय पर जाग गया, वरना मुझे पता ही कहाँ चलता कि रात भर तुम मेरे साथ थी.. !”

“क्यों पता नहीं चलता ?”

“क्यूंकि मेरे उठने से पहले उठ कर तुम खिसक लेती !”

“नहीं.. हम ऐसा क्यों करते भला ?”

“फिर ? क्या मुझे जगा कर सुबह बता कर जाती कि तुम जा रही हो ?”

भावना इस बात पर मुस्कुरा कर रह गयी..

“अगर बताना ही होता तो जब आयी तब क्यों नहीं बताया ?”

“बताना तो चाहते थे लेकिन आप इतनी गहरी नींद में सो रहे थे कि जगाने का मन नहीं किया !”

“अच्छा और इसलिए तुम भी सो गयी ?”

“नहीं… हम तो काफी देर तक बैठे बैठे आपके जागने का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन जब आप नहीं जागे तब हमें भी पता नहीं चला कब हम भी लुढ़क गए.. !”

“लुढ़क गयी ?” राजेंद्र हंस पड़ा..

“मतलब ?”

“मतलब सो गयी !” धीरे से शरमा कर भावना ने कहा..
खुली खिड़की से चाँद की रौशनी छिटक कर भावना के चेहरे पर पङ रही थी… उसका चेहरा चमक रहा था..
नींद खुलने से आंखे अधखुली सी थी..

राजेंद्र अपलक उसे देखता रह गया .
वो उसके करीब चला आया…

भावना को लगातार कुछ पल देखने के बाद वो बोल पड़ा..

“कभी नहीं सोचा था कि मेरी ज़िन्दगी में मेरा साथ देने के लिए भगवान ने तुम्हे चुना होगा.. मैं वाकई खुशनसीब हूँ जो तुम मेरे जीवन में आयी..! अब लगता हैं जैसे भगवान ने मेरे सपनो को भी अलट पलट कर देखना शुरू किया हैं, अब लगता हैं जो सोचा था वो सब कर जाऊंगा !”

“क्या करना चाह्ते हैं आप ?”

“करना तो बहुत कुछ चाहता हूँ, अपने समाज के लिए, उन निःशक्तजनो के लिए जिनके लिए सरकारे बस कागज़ पर नयी नयी योजनाए बनाती तो हैं, पर उन तक फायदा पहुँचता नहीं… उन सब के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूँ, लेकिन फ़िलहाल..

“फ़िलहाल क्या.. ?

“फ़िलहाल तुमसे प्यार करना चाहता हूँ… बेइंतिहा… जैसा कभी किसी ने न किया हो..।”

राजेंद्र भावना के चेहरे पर झुकता चला गया…
दोनों एक दूसरे में खोने लगे…
यूँ लगा आसमान पर चमकता चाँद और उनके कमरे में छिटकी चांदनी को भी इस राज़ का हिस्सा बन कर ख़ुशी हो रही हैं..।

लेकिन तभी गेंदा की आवाज़ उन दोनों के कानो में पड़ी और एक झटके में दोनों अलग हो गए..

भावना और राजेंद्र भाग कर गेंदा के कमरे में पहुँच गए,
.गेंदा अपने बिस्तर पर बैठी डर से कांप रही थी…

भावना आगे बढ़ी और उसने गेंदा को अपने अंक में ले लिया….

“क्या हुआ गेंदा ?”

“दीदी…. बहुत डरावना सपना देखा हमने.. !”

“क्या देखा ?”

“दीदी वो लोग… वो वापस आ गए थे !”

भावना समझ गयी.. जब से गेंदा के साथ वो हादसा हुआ था वो इसी तरह चौंक कर घबरा जाया करती थी..

गेंदा सुबकने लगी.. और उसे अपने सीने से लगाए भावना उसके बालों पर हाथ फेरती हुई उसे समझाती रही…

राजेंद्र को भी गेंदा से सहानुभूति हो रही थी, लेकिन मन था कि ठहर नहीं रहा था..

उसने एक आस भरी नजर भावना पर डाली, भावना ने तेज़ी से ना में गर्दन हिला दी…..

एक ठंडी सी आह भर कर राजेंद्र अपने कमरे की तरफ बढ़ गया….

“भावना गेंदा को सुला दो.. ज्यादा देर जागना उसके लिए स्ट्रेस बढ़ने का ही कारण बनेगा.. !”

भावना राजेंद्र का उतावलापन समझ रही थी, लेकिन वो कर भी क्या सकती थी..
राजेंद्र को घूर कर उसने जाने का इशारा किया और गेंदा को लेटा कर खुद भी उसी के साथ लेट गयी..।

“अच्छा आओ गेंदा, हम तुम्हे कहानी सुनाते हैं…
बहुत साल पहले एक गांव में एक किसान रहता….

राजेंद्र मुस्कुरा कर कमरे में चला गया…
भोर होने लगी थी, उसने खिड़की से बाहर देखा, सूरज के आने में अब कुछ ही वक्त शेष रह गया था…
वो वापस पलंग पर पसर गया…

*****

पार्टी कार्यालय में भारी भीड़ थी….
वो सारे पुराने कार्यकर्त्ता जो गीता के पिता के वक्त वहाँ कार्यरत थे और जिन्हे धीरेन्द्र ने हटा दिया था वापस चले आये थे..

उनकी वापसी में भी अखंड का ही हाथ था..!

जिस दिन अखंड ने गीता से नामांकन भरने की बात कही, उसके अगले दिन ही वो जब पार्टी कार्यालय पहुंचा, तब वहाँ पसरा सूनापन देख कर वो जान गया की पार्टी के पास अब ईमानदार काम करने वाले लोग नहीं बचे हैं..

धीरेन्द्र ने अपने फ़ायदे के लिए बस अपने भरोसेमंद लोगो को ही पार्टी में रखा था और गीता के पिता के पुराने मुलाजिमों को चुन चुन कर हटा दिया था। इनमें से कई तो गीता के पिता की ही उमर के भी थे.. ।
लेकिन उस वक्त के वो सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं का इस तरह से हटाया जाना पार्टी के हित में भी नहीं रहा था..।

पांच सालो की मेहनत के बाद जब धीरेन्द्र के षड्यंत्रों की सफलता का समय आया, ठीक उसी समय गीता ने उसका कच्चा चिट्ठा दुनिया के सामने खोल दिया, और धीरेन्द्र अपनी बाजी हार गया..

उसने जो मेहनत की थी, वो उसके स्वयं के लिए थी। इसलिए उसके जाते ही उसके टट्टू भी साथ छोड़ गए..
इस तरह पार्टी दफ्तर एकदम ही एकाकी हो गया…

वहाँ पहुँच कर अखंड ने सबसे पहले सारे पुराने कार्यकर्ताओ को जमा किया और फिर चुनावी रणनीति तय करने में लग गया.. ।

उसके मार्गदर्शन में एक बार फिर पार्टी दफ्तर की रौनक वापस लौट आयी…

उसने अलग अलग टीम बना कर काम शुरू कर दिया.. बड़े ज़ोर शोर से उसकी चुनावी रैलियां निकलने लगी.. सुदूर ग्रामीण अंचलो में खुद अपने लोगो के साथ जाकर उसने लोगो से मिल कर उनकी समस्याओ की चर्चा शुरू की….
अखंड धीरे धीरे अपने पुराने चोले मे वापस आ रहा था..

ऐसे ही एक गांव मे उनकी रैली होनी थी.. रैली की समाप्ति पर गांव कस्बे के बड़े मैदान मे भाषण होना था… रैली पुरे गांव और आसपास की जगह से घूम कर भाषण स्थल पर पहुँच गयी…

अखंड रैली के साथ साथ ही था.. लेकिन उसने गीता को साथ चलने से मना कर दिया था..।
गीता एन भाषण के वक्त वहाँ पहुँचने वाली थी..

अखंड उस भाषण स्थल पर पहुंचा ही था कि गीता की गाडी भी चली आयी…।
गाडी को देख कर अखंड के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी… गीता गाड़ी से उतर कर अखंड की तरफ बढ़ गयी..

“लो पानी पीओ !” उसने अपने साथ लायी पानी की बोतल को अखंड की तरफ बढ़ा दिया..

अखंड ने एक साँस मे पूरी बोतल खाली कर दी..

“बहुत प्यास लग आयी होगी ना, सुबह से धुप मे भटक रहे हो, कुछ खाया भी कहाँ होगा ?”

“सुबह नाश्ता कर के निकले थे घर से… वैसे भी दोपहर मे हम खाना खाते ही कहाँ हैं? अब घर लौट कर जायेंगे, तब खाएंगे !”

“इतना भी काम मत करो कि बीमार पड़ जाओ.. थोड़ा बैठ भी लिया करो, आराम भी ज़रूरी हैं !”

कहते हुए गीता ने उसकी तरफ सैंडविच बढ़ा दिया, जिसे अखंड ने थाम लिया

“आराम ही तो कर रहे था आज तक.. इतने सालो से बैठे बैठे जंग सी लग गयी थी देह को, अब जाकर तो ग्रीसिंग हुई हैं, अब नहीं रुकेंगे !”

अचानक सैंडविच का टुकड़ा उसके गले मे अटका और उसे खांसी आ गयी, तभी उसके पीछे से एक हाथ बढ़ा जिसने ग्लास थाम रखा था..
अखंड उस ग्लास को पकड़ कर पानी पी गया…

पानी पीकर वो जैसे ही घूमा सामने खड़े गोलू को देख उसके चेहरे पर उत्साह की लहर दौड़ गयी….

गोलू अखंड के साथ उसके घर तो चला गया था, लेकिन इतने सालो के अकेलेपन का उस पर भी कुछ ऐसा असर हुआ था कि उसने भी एकांत को ही अपना दोस्त मान लिया था…
अखंड उसे रोज अपने साथ चलने के लिए मनाया करता, लेकिन गोलू साफ इनकार कर जाता था। कल रात भी अखंड ने उसे आज की रैली में साथ चलने को कहा लेकिन उसने मना कर दिया..
सुबह निकलने से पहले अखंड जब उसे जगाने गया तो गोलू नदारद था, वो समझ गया गोलू शायद गीता के पास चला गया था..
अखंड उसकी समस्या भी समझ रहा था। लेकिन वो उसे भी सामान्य करना चाहता था। बावजूद कर नहीं पा रहा था।
लेकिन अभी जब उसे एकदम से ठसका लगा तो गोलू का यूँ उसकी तरफ पानी बढ़ाना उसे तसल्ली दे गया..

उसने गोलू को गले से लगा लिया..

“तुम कब आये बे ?”

“अभै तो आये हैं, लेकिन भैया जी अब नहीं जायेंगे आपको छोड़ कर..गंगामैय्या की कसम ।”

“जाना भी नहीं हैं..”
अखंड ने मुस्कुरा कर अपनी पार्टी का झंडा गोलू के हाथ में पकड़ाया और खुद स्टेज की तरफ बढ़ गया..

क्रमशः

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Tripti
Tripti
1 year ago

Bact to the story world..everything us going to be normal nice turning

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻चाँद तारे भी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे इस प्यारी जोड़ी के सम्पूर्ण मिलन के पर 🤦🏻‍♀️ये क्या मोये स्यापा हो गया गेंदा को क्यों जगाया आपने 🤔हाय री मेरी संस्कारी लेखिका जी के संस्कार आवाज़ देने लगे बस बस यहीं तक आगे नहीं लिखना हैना.. 😊बहुत खूब 😘यही चीज तो आपको सबसे अलग लेखक बनाती है आप लिखती भी है तो एक दायरे मे समा बाँध देती हो, लाजवाब 👏🏻👏🏻।
बहुत अच्छा लगा अखंड को आगे बढ़ते देखकर और गोलू भी साथ है अब बची रेखा… उसका क्या होग़ा 🤔। उसका भी तो आपने कुछ तो सोचा ही होग़ा ना 😊।

खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

Manjeet Kaur
Manjeet Kaur
1 year ago

Very nice part 👌👌👌👌👌👌👌

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Kirti tiwari
Kirti tiwari
1 year ago

Thank you abhi खत्म न करने के लिए अखंड और गीता की भी शादी krwa dijiyega please

Rajkumar
Rajkumar
1 year ago

Nice part ❤️❤️❤️❤️❤️

Soma ( J T)
Soma ( J T)
1 year ago

Wah kya bt h sbki gadi patrika pr aa rhi dhere dhere

Vinod Kumar Bansal
Vinod Kumar Bansal
1 year ago

बहुत सुन्दर रचना

Kalpana
Kalpana
1 year ago

Nice part

Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Very interesting and Fantastic n Fabulous part Aakhir Akhand rajniti ka hissa khud ko banaya,waiting for the next part eagerly.