
अपराजिता -162
उस रोज कुसुम और भावना की बातों के बीच जैसे वह दो खोई हुई पुरानी सखियां एक बार फिर से मिल गई थी! वही अल्हड़पन, वही बचपन के दिन जैसे वापस जी उठे थे दोनों!
वह दोनो एक बार फिर से अपने कुंवारे दिनों में पहुंच गई थी। हंसती खिलखिलाती दोनों को होश ही नहीं रहा कि कितना वक्त गुजर गया। कुसुम का फोन बजने लगा तब जाकर उसे होश आया कि अब वह कुसुम कुमारी नहीं बल्कि किसी की ब्याहता पत्नी है।
फोन भी यज्ञ का ही था।
उसने तुरंत ही फोन उठा लिया। यज्ञ किसी काम से शहर आया हुआ था, और उसी ने सुबह कुसुम के सामने साथ चलने का प्रस्ताव रखा था। उसी ने कहा था चलकर भावना से भी मिल लेना, और कुसुम राजी हो गई थी। यज्ञ के लौटने का वक्त हो गया था, और इसलिए वह कुसुम को फोन कर रहा था। कुसुम ने भी साथ चलने की हामी भर दी।
कुछ देर बाद ही यज्ञ डॉक्टर साहब के घर के सामने खड़ा था। उसने अपनी गाड़ी रोकी और नीचे से ही कुसुम को कॉल करने लगा, लेकिन इस बार यज्ञ का फोन देखकर भावना लपक कर बालकनी में चली आई, उसके पीछे कुसुम भी वहीं आ गई। उसने वहीं से हाथ हिला कर यज्ञ को भी ऊपर आने को कहा, अपनी नई नवेली दुल्हन की बात वैसे भी यज्ञ नहीं टालता था, इसलिए वह भी ऊपर चला आया। भावना और कुसुम के साथ चाय पीने के बाद उसने भावना के सामने हाथ जोड़ दिए।
” अब हम चलते हैं, वरना देर हो जाएगी। आज का पूरा दिन हमारा कचहरी में ही बीत गया..।”
“क्यों आपका कोई केस लगा था?” भावना ने अनजाने में ही पूछ लिया..
“नहीं फिलहाल ऐसा कोई गंभीर मामला नहीं था, एक जमीन का मामला है जिसमें वादी और प्रतिवादी दोनों के बीच बचाव के लिए हमें शामिल होना पड़ा था, और दूसरा वीर का भी केस हैं, उसकी भी डेट देखनी थी..।”
“वीर पर केस, लेकिन गेंदा या उसके परिवार वालों ने तो कोई केस नहीं किया फिर.. ?”
कुसुम और यज्ञ एक दूसरे की तरफ देखने लगे। कुसुम ने प्यार से भावना के हाथों को पकड़ लिया।
” कुछ नहीं भावना, ऐसी कोई सीरियस बात नहीं है। हम बाद में कभी बता देंगे।”
और कुसुम यज्ञ के साथ जाने के लिए घर से बाहर निकल गई..।
यह प्रेमी जोड़ा भावना से विदा लेकर अपनी कर में अपने घर की तरफ निकल गया।
” तो मैडम कैसा रहा आज आपका दिन ?”
यज्ञ ने बड़े प्यार से पूछा,
” बहुत अच्छा, बहुत प्यारा।”
” अच्छा भई, बचपन की सहेली मिल गई तो प्यारा दिन तो गुजरेगा ही, तब पति को कौन याद करेगा?”
” पूरा वक्त आपकी ही बातें होती रही, आपने इतनी जबरदस्त लत लगा दी है ना अपनी कि आप साथ रहते हैं तो आपके पीछे-पीछे हम डोलते रहते हैं। और जब साथ नहीं रहते तो हमारे दिमाग में चलते रहते हैं।”
कुसुम की बात सुनकर यज्ञ मुस्करा उठा
“कहीं और घूमने जाना चाहेंगी आप?”
” अभी भावना के घर पर तो बोल रहे थे कि बहुत जल्दी है घर जाने की। हमें लगा कुछ काम होगा आपको?
अगर आपको घूमना ही था, तो थोड़ी देर और हमें अपनी सहेली के घर बैठने दे लेते।”
” और कितना बैठना था अपनी सहेली के घर, 4 घंटे से वही थी। अब थोड़ा अपने पति पर भी मेहरबानी कर दीजिए। चलिए आपको किसी बेहतरीन जगह लेकर चलते हैं।”
कुसुम ने भी मंजूरी दे दी यज्ञ की बाहों में बांहे डाले कुसुम धीरे से उसकी तरफ झुक गई। यज्ञ गुनगुनाते हुए गाड़ी चलाता रहा….
आपका अरमाँ, आपका नाम
मेरा तराना और नहीं
इन झुकती पलकों के सिवा
दिल का ठिकाना और नहीं
जँचता ही नहीं आँखों में कोई
दिल तुम को ही चाहे तो क्या कीजिए?
ओ, मेरे दिल के चैन
चैन आए मेरे दिल को, दुआ कीजिए
****
राजेंद्र अपने तयशुदा वक्त पर घर पहुंच गया। उसका समय देखकर भावना अक्सर चाय का पानी चढ़ा दिया करती थी।
अक्सर राजेंद्र के न रहने पर बाहर वाले कमरे में ही बैठकर पढ़ती थी, लेकिन जैसे ही राजेंद्र के आने का वक्त होता, वह अपना सारा पसारा वहां से समेट कर कमरे को वापस ठीक-ठाक कर दिया करती थी। इसी समय पर वह हाथ पैर धोकर दिया बाती भी कर देती थी। अगरबत्ती की खुशबू घर में फैली हुई उसे बहुत पसंद थी। कई बार राजेंद्र ने भी बातों ही बातों में इस बात का जिक्र किया था कि भावना के आने के बाद उसके घर से हमेशा एक भीनी भीनी खुशबू आती रहती है। इसलिए भावना इस बात का खास ख्याल रखती थी कि शाम को राजेंद्र के आने से पहले ही दिया बाती हो जाए, जिससे उसका घर महकते हुए राजेंद्र का स्वागत करे।
आज भी चाय चढ़ाने के साथ ही वह नाश्ते की भी तैयारी में लग गई। गेंदा भी उसके साथ काम में लगी हुई थी, लेकिन आज गेंदा को देखकर बार-बार भावना को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे गेंदा कुछ अनमनी सी है। भावना से रहा नहीं गया और उसने पूछ लिया
“क्या हुआ गेंदा, कुछ सोच रही हो?”
” दीदी हम यही सोच रहे थे कि अब हमें वापस जाना चाहिए।”
“अरे लेकिन अभी तो तुम्हारी अम्मा भी…”
” वह कल तक वापस आ जाएगी।”
” हमने पहले भी कहा था ना, एक बार डॉक्टर साहब को आ जाने दो। उनसे पूछ लो फिर चली जाना।”
गेंदा ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप सर झुकाए रात के खाने की तैयारी करती रही। भावना को अचानक ही उस मासूम पर बड़ा प्यार आने लगा। उसने अपनी जिंदगी में आज तक कौन सी खुशी देखी थी? कुछ भी तो नहीं देखा था उसने।
अपनी मां के साथ वहां गांव में पड़े-पड़े आखिर यह दिन रात करती भी क्या है, अपनी मां की मदद करने के अलावा? सुबह उठकर घर को झाङ बुहार देती है, मां के साथ चूल्हे को फूंक फूंक कर खाना पका लेती है। बर्तन साफ करके दोपहर में खा पी के फिर घर का ही कोई पुराना कपड़ा सीने बैठ जाती है। शाम को वापस खाना पका कर चूल्हे को लीप लाप कर सो जाती है। क्या सिर्फ इसी काम के लिए इस लड़की का जन्म हुआ है? यह काम आज ये अपने घर में कर रही है, कल को ब्याह के बाद ससुराल में करने लगेगी।
आज अपनी मां के साथ है तो दो लोगों का खाना बनाती है, पता नहीं कल को ससुराल कैसी मिले? कितने लोगों का काम करना पड़े? क्या यह मासूम सी लड़की बस यही सब करती रह जाएगी ?
यह सोचते सोचते अचानक वह खुद के बारे में सोचने लगी कि डॉक्टर साहब से शादी के पहले उसके जीवन में भी और क्या था, अपनी मां की गृहस्थी में थोड़ी बहुत मदद करके उसे लगता था वह अपनी मां का बहुत सारा बोझ कम कर देती है…।
उसके नीरस जीवन की रसवंती फुहार कुसुम ही तो थी। बस जब-जब कुसुम के साथ गांव की गलियों में घूमती थी या, तालाब किनारे बैठकर कचौड़ियां खाती थी, या कुसुम के नए-नए कपड़ों को देखकर खुश होती थी, तभी उसे लगता था कि जीवन में कुछ अलग भी है।
वरना उसका जीवन तो बिल्कुल वैसा ही नीरस था, जैसा आज गेंदा का है।
अचानक ही उसे गेंदा पर बहुत ममता होने लगी। उसी वक्त दरवाजे पर आहट हुई, और वह समझ गई कि डॉक्टर साहब आ गए।
उसके चाय का पानी भी खौल चुका था, उसने नाप जोखकर दूध डाला और गेंदा को देखने को कहकर बाहर निकल आई। राजेंद्र ने बाहर आई हुई भावना पर एक नजर डाली और हल्के से मुस्कुरा कर अंदर कपड़े बदलने चला गया। वह कभी अपने कंधे पर टांग रखे बैग को भी भावना को नहीं पकड़ाता था, खुद ही लेकर अंदर जाता था। लेकिन आज भावना ने आगे बढ़कर उसके कंधे से बैग उतार लिया।
राजेंद्र को थोड़ा अजीब तो लगा, लेकिन उसने सोचा कि शायद भावना उससे कुछ बात करना चाहती होगी। हाथ मुंह धोकर वह बाहर आया, तब तक में भावना चाय और नाश्ता बाहर वाले कमरे में सजा चुकी थी। उसके पास ही आकर बैठ गई।
गेंदा उन दोनों के साथ कभी चाय नहीं पीती थी। वह अपनी चाय लेकर पीछे वाली सीढीओ से सबसे ऊपर वाली छत पर चली गई। उसे उस छत पर चाय पीना बड़ा पसंद आता था..
राजेंद्र ने चाय पीते हुए भावना की तरफ देखा..
“कुछ कहना चाहती हो?”
भावना ने राजेंद्र को देखा और हां में गर्दन हिला दी।
“कुछ नहीं, बहुत कुछ कहना चाहते हैं ।”
राजेंद्र के चेहरे की गंभीरता हल्की सी मुस्कान में बदल गई।
” बोलो क्या बोलना चाहती हो।”
” पहली बात तो हम यह कहना चाहते हैं कि क्या गेंदा हमेशा हमारे साथ रह सकती है ?”
राजेंद्र ने आश्चर्य से भावना की तरफ देखा
” तुम्हें ज्यादा काम हो रहा है? और हेल्पर की जरूरत है तो हम अलग से कामवाली बाई रख लेते हैं।”
” अरे नहीं नहीं, आप गलत समझ रहे हैं। दो लोगो का काम ही कितना होता है? दो कमरों का घर है, हम आराम से सब कर लेते हैं। हां गेंदा के रहने से हमारी मदद तो हो जाती है, लेकिन काम से बचने के लिए हम गेंदा को रखने की बात नहीं कर रहे। आप गलत समझ रहे हैं।”
” फिर क्या बात है?”
” हमें लगता है कि गेंदा यहां शहर में रहेगी तो कुछ सीख जाएगी। गांव में उसका क्या होगा? रात दिन अपने घर को लीपने पोतने के अलावा और करती क्या है?यहां रहेगी तो पढ़ना चाहेगी तो पढ़ भी सकती है, वरना उसकी सिलाई बहुत अच्छी है। उसे कुछ कोर्स करवा कर उसके पैरों पर खड़ा होने लायक तो हम बना ही सकते हैं।”
राजेंद्र के चेहरे पर एक अलग सी चमक आ गई। उसने बहुत गहरी नजरों से भावना की तरफ देखा।
” भावना पता नहीं, लेकिन यह विचार मेरे दिमाग में कभी क्यों नहीं आया? गेंदा को मैंने बहुत बचपन से देखा है। जब छोटी थी तो अपनी अम्मा के साथ हमारे और बाबा के लिए खाना लेकर आती थी। बड़ी होने के बाद खुद अपने हाथ से बना कर लाने लगी, और उसके बाद कई बार मेरे घर पर ही बनाने लगी।
मेरे घर पर कोई पर्दे नहीं थे, इसी ने पता नहीं किन कपड़ों को जोड़-तोड़ के बड़े सुंदर परदे टांग दिए थे। भगवान के कपड़े भी बना दिए थे। इतना सब देखकर मैं कलाकारी से मुग्ध जरूर होता था, लेकिन मेरे दिमाग में सच में यह बात नहीं आई कि गेंदा को सिलाई सीखा कर उसके पैरों पर खड़ा भी किया जा सकता है।
वाह भावना तुमने तो दिल जीत लिया।”
राजेंद्र ने भावना के दोनों कंधों को पकड़ कर झिंझोङ दिया, और भावना लजा कर रह गई। उसके चेहरे के बदलते भाव देखकर राजेंद्र एकदम से सकपका गया और उसने अपने हाथ खींच लिए।
एक बार फिर वह डॉक्टर राजेंद्र कुमार बनकर बैठ गया।
” डॉक्टर साहब आपसे एक बात और कहनी थी।”
” हां कहो।”
” आज कुसुम आई थी।”
” अच्छा।”
राजेंद्र के चेहरे पर कोई भाव नहीं आये। कुसुम का नाम सुनकर ना उसके चेहरे का रंग गुलाबी हुआ और ना ही नीला पड़ा, और यह देखकर भावना के दिल को जरूर ठंडक पड़ गई।
” बहुत देर तक बैठी रही।”
” अच्छा है दोनों सहेलियों को मिलते रहना चाहिए।”
” हां यही उसके ठाकुर साहब भी कह रहे थे।”
” अच्छा वह भी आए थे क्या?”
” वह उसे लेने के लिए जब आए, तब कुसुम ने उन्हें ऊपर चाय पीने के लिए बुला लिया था। बस चाय पीकर तुरंत ही निकल गए दोनों।
कुसुम आज कल अपने ठाकुर साहब के बिना रह नहीं पाती है।”
यह बात भावना ने राजेंद्र को जलाने या चिढ़ाने के लिहाज से नही कही थी, लेकिन कहते ही उसने अपनी जबान जरूर काट ली। उसे लगा गलत वक्त पर उसके मुंह से गलत बात निकल गई। लेकिन राजेंद्र अब भी तटस्थ ही बना रहा।
उसके चेहरे पर इस बात पर भी कोई भाव नहीं आए। बल्कि ऐसा लगा इस बात को सुनकर कुछ देर के लिए उसकी आंखें चमक गई।
जैसे कहीं ना कहीं अंदर ही अंदर वह खुद किसी पश्चाताप मे जी रहा था कि उसने कुसुम की जिंदगी बर्बाद की है, और आज यह जानकर की कुसुम अपने पति के साथ खुश है, वह उस भाव से बाहर आ रहा था।
भावना कुछ देर तक अपने आप में खोए राजेंद्र को देखती रही, फिर धीरे से उसके बगल में खिसक गई, राजेंद्र की बांह थाम कर उसने राजेंद्र के कंधे पर अपना सर रख दिया।
राजेंद्र की सांसे तेज होने लगी, लेकिन उसने अपने आप को संभाला और धीरे से भावना के सर पर अपना हाथ रखकर उसके बालों को सहलाने लगा।
” खुश होना भावना ?”
“हम बहुत खुश हैं डॉक्टर साहब, आपके साथ!
हमें जो यह जीवन मिला है, यह पता नहीं कितने सौभाग्य से हमें मिला है। आपसे ब्याह के पहले लगभग रोज हम भगवान से इस बात के लिए झगड़ा करते थे कि उन्होंने हमें क्यों इस घर में पैदा किया? हमें क्यों यह जीवन दिया? तब हम नहीं जानते थे कि भगवान ने हमारे जीवन में आपको लिखा है, हमारे हर दुख दर्द को दूर करने के लिए।
डॉक्टर साहब हम आपसे एक बात कहना चाहते हैं।”
” बोलो भावना मैं सुन रहा हूं।”
“आप हमें बहुत अच्छे लगने लगे हैं। हम अपना सारा जीवन आपके साथ गुजारना चाहते हैं। लेकिन उसके पहले हम यह जानना चाहते हैं कि आप हमारे लिए क्या सोचते हैं ?”
“तुम्हारी जैसी लड़की बहुत किस्मत वालों को मिलती है भावना । मुझे भी तुमसे मिलने से पहले हमेशा अपनी किस्मत से शिकायत ही रहती थी। मेरी सबसे बड़ी शिकायत थी कि उसने मुझे किसी ब्राह्मण या ठाकुर के घर पर पैदा क्यों नहीं किया? क्यों एक ऐसी जात में मैं पैदा हुआ, जिसके लिए संविधान ने विशेष प्रावधान लिख रखे हैं। मुझे कोई विशेष रियायत या छूट नहीं चाहिए थी।
ना पढ़ाई लिखाई में और ना जीवन में। बहुत कुढता था मैं इस बात पर, और हमेशा अपने पूर्वजों को कोसा करता था। बिना सच्चाई जाने कि इस सब में मेरे पूर्वजों का क्या दोष था?
जिसका जहां जन्म होना है यह तो उसका अपना प्रारब्ध होता है। उसका कोई कुछ नहीं कर सकता। लेकिन जब मेडिकल की पढ़ाई के लिए जनरल की सीट पर मेरा चयन हुआ, तब जाकर मेरे दिल को थोड़ी सी खुशी मिली। लेकिन कॉलेज में होने वाले रैगिंग के दौरान जब मुझे मेरे जातिगत संबोधनों से पुकारा गया, तब एक बार फिर मेरा स्वाभिमान बुरी तरह से छिन्न-भिन्न हुआ। पर मैंने बड़ी मजबूती से खुद को संभाले रखा। और फिर अपनी मेहनत के बलबूते पर नौकरी में चला आया।
यहां आने के बाद ऐसा लगने लगा था कि अब शायद मेरे जीवन से वह जाति का ठप्पा दूर हट जाएगा। लेकिन देखो प्यार भी हुआ तो ठकुराइन से, वह जिसके घर वाले सिर्फ जात-पात के कारण ही मुझे अस्वीकार कर गये।..
भाग्य की विडंबना देखो कि वही भाई जिसने मेरे हाथ में अपनी बहन का हाथ सिर्फ मेरी छोटी जात के कारण नहीं दिया था, मेरे ही हाथों हुए ऑपरेशन से जिंदा बच गया और उस वक्त मुझे लगा कि आज मैंने अपनी जात से ऊपर उठकर एक काम किया है।
मैंने वह काम किया है जो मेरे किसी भी जात के होने से बदल नहीं जाता। मैं ब्राह्मण होता या क्षत्रिय मैं यही काम करता और तब मुझे समझ में आया कि मेरा धर्म और मेरी जात सिर्फ डॉक्टरी है। चिकित्सा है।
मेरे सामने बैठा मरीज सिर्फ मरीज है, किसी जाति या धर्म विशेष का नहीं। आज तक मैंने किसी से यह बात नहीं कही लेकिन तुमसे जरुर कहना चाहूंगा। जब चंद्रभान ठाकुर अस्पताल से डिस्चार्ज हो रहे थे, तब वह मेरी केबिन में मुझसे मिलने आए। उन्होंने अपनी पत्नी और नौकरों को बाहर छोड़ा और अपनी व्हीलचेयर में बैठे हुए ही मेरे पास आकर मेरे पैरों पर झुक गए।
सच कहूं भावना, तो उनका इस तरह झुकना मुझे अच्छा नहीं लगा, मैंने उन्हें रोक लिया। लेकिन वह अपने आंसू नहीं रोक पाए। उन्होंने मेरे सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए और बस इतना कहा कि हो सके तो हमें माफ कर दीजियेगा डॉक्टर साहब !
मैं कुछ कह नहीं पाया। बस उनके दोनों दोनों जुड़े हुए हाथों के सामने अपने भी हाथ जोड़ दिए। क्योंकि सच कहूं तो उस वक्त भी उन्हें छूने की मुझमे हिम्मत नहीं थी। उन्होंने धीरे से मेरे उन जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में लिया और अपने माथे से लगाकर रोने लगे।
सच कहूं भावना तो ऐसा लगा मेरे अंदर इस आदमी के लिए जो नफरत जो गुस्सा पल रहा था, जो ज्वालामुखी भड़क रहा था, वह अचानक ठंडा पड़ गया। उसी क्षण मैंने उस आदमी को माफ कर दिया, अपने पूरे दिल से ।
मुझे लगा कि शायद यह अपनी जगह सही था। हां लेकिन मैं अगर उस आदमी की जगह होता तो मैं अपनी बहन की पसंद को एक बार परखना जरूर चाहता। चंद्रभान के ऊपर नाराजगी सिर्फ इसी बात की थी कि उसने मेरे पूरे व्यक्तित्व को मेरी जात से तौल लिया। मुझे जांचने परखने की गुंजाइश नहीं रखी। खैर उस दिन के बाद से कुसुम का सारा किस्सा ही खत्म हो गया था।
मुझे पता था कि कुसुम अपने पति के साथ खुश रहेगी, क्योंकि मैं यज्ञ से भी मिल चुका था। जब चंद्रभान वहां से जाने लगा तो एक बार को लगा कि मैं उसे रोकूं, और उसे एक बात के लिए धन्यवाद कह दूं कि उसने गुस्से में ही सही लेकिन तुमसे मेरी शादी करवा कर अपनी जिंदगी का एक पुण्य तो कमा ही लिया।
तुम जैसी लड़की जब मेरी जिंदगी में आई, तब धीरे-धीरे मैंने जाना कि जीवन जीना क्या होता है? तुमने मेरे छोटे से दो कमरों को प्यारा सा घर बना दिया भावना। और इसके लिए तुमने जो एहसान किया है मुझ पर उसे जिंदगी भर नहीं चुका सकता। लेकिन तुमसे वादा करता हूं कि मैं हमेशा तुम्हें खुश रखने की पूरी कोशिश करूंगा। जो सात वचन पति और पत्नी अग्नि के सामने लेकर सात जन्म तक निभाते हैं, उन्हें अपनी पूरी शिद्दत से इस जन्म के लिए निभाना चाहूंगा। और अगर कहीं सात जन्म की अवधारणा सत्य होती है, तो मैं सातों जन्म में तुम्हें ही अपनी पत्नी के रूप में पाना चाहूंगा..।”
राजेंद्र ने धीरे से भावना को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया। भावना ने राहत के साथ आंखें मूंद ली। राजेंद्र ने इसके माथे पर अपने प्रेम का प्रथम स्पर्श अंकित कर दिया।
उसी समय कुछ आहट सी हुई और घबराकर भावना राजेंद्र से अलग हो गई।
” क्या हुआ?”
” हमें लगा गेंदा आ गई।”
राजेंद्र भावना के इस तरह बौखला जाने से हंस पड़ा।
” आज कहीं बाहर चले?”
भावना ने देखा और ना में गर्दन हिला दी।
“हमने आपकी पसंद का खाना बनाया है।”
” अच्छा तो यह बात है। मतलब आज पूरी तैयारी में थी आप।”
राजेंद्र अपने माथे पर अपनी उंगली चलाते हुए बोल पड़ा..
“अरे नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। हमने तो बस खाना आपकी पसंद का बनाया है। बाकी उसके बाद का हमारा कोई प्लान नहीं है।”
” लेकिन मेरा तो है। बहुत दिनों से टाल रहा हूं लेकिन आज जब मुहूर्त निकाल दिया है तुमने, तो …”
भावना आंखें फाड़े राजेंद्र की तरफ देखने लगी और राजेंद्र उसे डराते हुए उसकी तरफ बढ़ने लगा।
भावना घबराकर अपनी जगह पर खड़ी हो गई।
” थोड़ा तो सबर कीजिए, गेंदा आ जाएगी अभी।”
राजेंद्र जोर से हंस पड़ा
“तुम तो एकदम से रंग बदल गई भावना।”
” मतलब ?”
“मतलब सुबह तक तो बड़ी छिटकी हुई सी घूम रही थी, तुम्हारी दोस्त क्या आई,उसने तुम पर जादू की छड़ी घुमा दी जो एकदम ही बीवियों वाले तेवर आ गए तुममे।
जो भी है, अच्छे लग रहे हैं तुम पर यह तेवर।”
राजेंद्र जल्दी वापस आता हूं कह कर अपने दोस्त अमित के घर के लिए निकल गया..
भावना भी बड़े मन से रात के खाने की तैयारी में जुट गई।
क्रमशः
****
सोचा तो था आज ख़त्म कर दूंगी, लेकिन एडिट करते हुए देखा पार्ट बहुत लम्बा हो रहा है इसलिए इतना ही भेजा है, अगला भाग कल आएगा..
तब तक पढ़ते रहिये, और लोगो को मेरे ब्लॉग से जोड़ते रहिये…

Ķssh तक़दीर लिखने वाला भी कोई लेखक होता…सुन्दर मोड़ पर आ गयी khaani ….बिगड़ी तक़दीर sawar गयी
Bahut hi behtrin part tha 😘😘👌👌👌👌👌
haaye kitna romantic likha h dr.sahiba aapne…padh k main khud gulabi ho gai
कुसुम की बातों से भावना के मन मे जो गिल्ट था आज खत्म हो गया और कहते भी हैना, अच्छे लोगों के साथ हमेशा अच्छा ही होता है, भले ही देर हुई पर भावना को समझ आप गया है राजेंद्र और उसका रिश्ता अब आगे बढ़ना चाहिए। गाना याद गया यहाँ… दो चार कदम पर हम थे, दो चार कदम पर तुम थे, दो चार कदम थे लेकिन सौ मीलों से कम थे।
लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।
🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍😍❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ आपकी एक लेखनी हम पाठकों के मन मे हजारों फूल खिलाने में सक्षम है।
बेहद खूबसूरत भाग रहा ,बेहद खुशी हुई aj ye देखकर की भावना ने अपना रिश्ता गंभीरता से लिया और राजेन्द्र के चेहरे पर जो मुस्कान थी वो भी उसी की देन थी।
लास्ट में राजेन्द्र ने जो मजाक किया वो बहुत अच्छा लगा।🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂
Lajawab heart touching 💕💞💖💖💖❤️😍 Rajkumar
😍😍😍🥰🥰🥰🥰🥰
Very nice.. As always
बेहतरीन लेखन
😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍