
अपराजिता -161
“अब तुम ही बताओ क्या किसी इंसान को दो बार प्यार हो सकता है ?”
“हाँ हो सकता है !”
भावना ने अपनी बात ख़त्म की ही थी कि, उसकी बात के बाद एक आवाज़ हवा में गूंज गयी..
भावना ने पलट कर देखा, दरवाज़े पर कुसुम खड़ी थी..
भावना और गेंदा दोनों चौंक गयीं.. भावना तो घबरा ही गयी..
“क क… कुसुम तुम.. यहाँ… अचानक ?”
“हमारी दोस्त का घर है ? क्या अब यहां आने के लिए भी हमें इजाजत लेनी पड़ेगी?”
” अरे नहीं, हमारा ये मतलब नहीं था।”
भावना अपनी जगह से खड़ी हो गई। वह कुसुम की तरफ मुस्कुराते हुए बढ़ गई। लेकिन कुसुम के चेहरे पर बड़े पथरीले से भाव थे। जैसे उसे भावना की बात पसंद नहीं आई थी। और कुसुम के चेहरे के भाव देखकर भावना मन ही मन और भी ज्यादा घबरा गई। उसे लगा कि वह कुसुम से उसका प्यार बांट रही है। राजेंद्र को कुसुम से छीन रही है।
दुनिया में उससे बड़ी पापन और कोई नहीं? उसे लगा धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। एक-एक करके सारी बातें उसके दिमाग में घूमने लगी। पत्ते की तरह कांपने लगी वह।
कुसुम कुछ देर तक उसे देखती रही और फिर उसे कंधों से पकड़ कर झिंझोङ दिया।
” अरे पागल क्या हो गया तुम्हें? हमें देखकर खुश नहीं हो?”
कुसुम मुस्कुरा उठी। उसने भावना को गले से लगा लिया। कुसुम के ऐसा करते ही भावना के धैर्य का बांध ढह गया। और उसके आंसू छलक आये वो सुबक-सुबक कर रोने लगी।
” ए पागल क्या हो गया, भावी तुम रो क्यों रहीं हो? हमने ऐसा क्या बोल दिया, जो तुम ऐसे सुबकने लगी..? बोलो ना.. !”
भावना से एकाएक कुछ कहा नहीं गया। बस उसने धीरे से ना मे गर्दन हिला दी। कुसुम ने भावना को खुद से दूर किया और उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में पकड़ कर ध्यान से उसे देखने लगी।
” आओ बैठ कर बात करते हैं।” कुसुम ने भावना को कुर्सी पर बैठाया और उसकी बगल में बैठ गई। उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर वह धीरे-धीरे सहलाने लगी।
” अब बोलो क्या बोल रही थी तुम?” भावना ने बहुत डरते हुए आंखें उठा कर कुसुम की तरफ देखा। कुसुम की आंखों में भावना के लिए ढेर सारा लाड़ और दुलार था। उस दुलार को भावना की आंखें पहचानती थी। यह तो उसकी बचपन की ही सखी थी। बीच में कुछ समय के लिए जब कुसुम के दिल में गलतफहमी घर कर गई थी, उस वक्त कुसुम में जो बदलाव आया था, वह अब पूरी तरह से छंट गया था। और यह कुसुम एक बार फिर वही बचपन वाली भावना की सखी कुसुम हो गई थी।
” कुसुम हम बस यह कहना चाहते थे कि…”
कुसुम ने भावना के होठों पर अपनी उंगली रख दी।
” कुछ मत कहो, पहले हमारी बात सुनो। तुम यह पूछ रही थी ना कि क्या प्यार दो बार हो सकता है? तो हां हो सकता है। हमें भी तो हुआ है ना।
याद करो भावना, आज तक हमारे जीवन में घटी कोई भी ऐसी बात है जो तुमसे हमने नहीं कही हो। नहीं ना, तो अब हमारे दिल में यह जो नया-नया प्यार का भाव मचल रहा है, उसे तुमसे कैसे नहीं बताते?”
“अब किससे प्यार हो गया तुम्हें ?”
भावना ने डरते हुए कुसुम की तरफ देखा और कुसुम ने घूर कर भावना को देखा, और जोर से हंस पड़ी।
” अपने पति से। इतना भी नहीं समझती बुद्धू।”
भावना के चेहरे पर हल्की सी हंसी चली आई। गेंदा दो गिलास में पानी लेकर चली आई। उन दोनों के सामने रखकर वह वापस रसोई में चली गई ।
“दीदी हम आप दोनों के लिए चाय बना कर लाते हैं।” भावना ने गर्दन हां में हिला दी। गेंदा के जाते ही कुसुम ने भावना की तरफ देखा।
” यह कौन है?”
” वह बाद में बताएंगे, पहले तुम बताओ तुम्हारी प्रेम कहानी?”
मुस्कुरा कर कुसुम ने भावना के हाथों को अपने हाथ में ले लिया।
” क्या बताएं भावी, तुम तो हमारे बारे में सब कुछ जानती हो। कैसे हम डॉक्टर साहब के प्यार में पागल हो गए थे। उस वक्त तो हमें लगने लगा था, जैसे अगर डॉक्टर साहब हमें नहीं मिले तो हमारा जीवन व्यर्थ हो जाएगा। कुछ खाकर अपनी जान ले लेंगे। लेकिन सच कहें तो बहुत बार हमारा दिल और दिमाग एक साथ काम नहीं करता।
जब हम छोटे ठाकुर के घर पहुंचे, वहां का माहौल बहुत अलग था। बहुत ही अलग।
हमने जाने कितनी तिकड़म लगाये कि उन लोगों से हमारा संबंध खत्म हो जाए। वह लोग हमसे नाराज हो जाए! हमारी हरकतों से परेशान हो जाए, और गुस्से में हमें घर से निकाल दे! लेकिन उस घर के लोगों ने कभी ऐसा कोई मौका ही नहीं दिया कि हम कुछ भी गड़बड़ कर सके।
हर बात हमारी हर गलती करने के पहले वो लोग सब सही कर जाते थे। लेकिन इस सब के कारण बस हमें उस घर में रहने की आदत होने लगी थी। उस घर के लोगों के साथ रहना अच्छा लगने लगा था। लेकिन हमारे छोटे ठाकुर से मुहब्बत बहुत धीरे-धीरे हुई है। कहते हैं ना जो फल धीरे-धीरे पकता है, उसका स्वाद ही अलग होता है।
वैसा ही कुछ है। और अब तो ऐसा लगता है कि अगर छोटे ठाकुर हमारे जीवन में नहीं होते तो हमारा जीवन जीवन ही नहीं होता। हम पता नहीं आज तक खुद को क्या समझते आए थे? एक अजीब सा नशा था हमारी आंखों में एक अजब सा गुरूर था…।
एक फिजूल सी ठसक थी ठाकुर होने की।
लेकिन अपने छोटे ठाकुर के साथ रहते हुए हमें समझ में आया कि ठाकुर होना असल में क्या होता है?
सच कह रहे हैं भावना, वह दोनों भाई दुनिया से निराले हैं। छोटे ठाकुर कभी बिना वजह किसी नौकर से भी ऊँची आवाज में बात नहीं करते। वह इंसान को इंसान समझते हैं, उसे पंडित ठाकुर कहार बढ़ई में नहीं बांटते..
उनके लिए हर एक आदमी बराबर है.. !
यह चीज हमने अपने घर में तो नहीं देखी थी। भावी हमारे घर में तो जितने भी काम करने वाले आते थे, सब हमारे बाबूजी, बड़े भैया, मां, भाभी यहां तक कि हमारे भी पैर छूकर जाते थे, और हमें इसमें अपनी शान लगती थी। लेकिन तुम जानती हो हमारे छोटे ठाकुर हमारे घर में काम करने वाले बूढ़े माली के भी दिवाली के दिन पैर छूते हैं, उनसे आशीर्वाद लेते हैं। और बूढ़े काका इस बात पर संकोच करके जमीन में गङ नहीं जाते, वह बकायादे अपनी जेब से सौ पर एक रुपए निकाल कर हमारे छोटे ठाकुर के उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं।
छोटे ठाकुर ने हमेशा समझाया है कि इंसान होना क्या होता है। पहले तो हम हमेशा सोचते थे यह आदमी इतना खुश किस बात पर रहता है? एक दिन हमने पूछ भी लिया, कि आप इतना खुश क्यों रहते हैं?
जानती हो उन्होंने क्या कहा, कहने लगे हमारे पास दो हाथ है, क्या यह खुशी की बात नहीं? दो पैर है क्या यह खुशी की बात नहीं?, हमारे पास तुम्हारे जैसी प्यारी बीवी है, क्या यह खुशी की बात नहीं? हमारे पास अखंड भाई जैसा बड़ा भाई है जो बिल्कुल श्री राम की मूर्ति है, क्या यह बड़ी बात नहीं? और इन सब के ऊपर आज भी हमारे सर पर हमारे माता-पिता का आशीर्वाद है, खुशी की बात नहीं? हमें लगता है इतनी चीजे जिंदगी में खुश रहने के लिए जरूरत से ज्यादा ही है। बस रोज हम भगवान के सामने एक बार हाथ जोड़कर इस बात के लिए उन्हें धन्यवाद दे देते हैं। और फिर पूरा दिन खुश रहते हैं। और छोटी ठकुराइन तुम भी इस बात को गांठ बांध लो। हमारी खुशी हमारे हाथ है। हम और किसी को अपनी खुशी का इंतजाम बनने की इजाजत ही क्यों दे।
भावी हम पूरी तरह से छोटे ठाकुर के प्यार में रंग चुके हैं, तुम्हें पता है वह जल्दी ही हमें घुमाने लेकर जाने वाले हैं.. ।”
“अरे वाह, कहाँ जा रहे हो दोनों ?”
“बनारस !”
“बहुत बढ़िया..!”
“अब तुम कुछ अपनी सुनाओ? तुम्हारी जिंदगी कैसी चल रही है?”
” अच्छी चल रही है, पढ़ाई कर रहे हैं। बस अब कुछ ही महीने रह गए हैं इम्तिहान को। देखते हैं क्या रिजल्ट आता है?”
” तुम्हारा रिजल्ट तो अच्छा ही आएगा। तुम सेलेक्ट हो जाओगी, हमें पूरा भरोसा है। एक तो तुम पढ़ाकू बहुत हो, दूसरा डॉक्टर साहब जैसा पढ़ाने वाला तुम्हारे पास मौजूद है। लेकिन भावना एक बात कहेंगे, इस सब में डॉक्टर साहब को सिर्फ अपना टीचर बना कर मत रख लेना। वह तुम्हारे पति हैं, और इस बात का ख्याल तुम्हें ही रखना है कि उनकी खुशी उनसे छिन न जाए।”
” तुम क्या कह रही हो कुसुम?” भावना ने अटक अटक कर कहा।
” हम जानते हैं तुम बहुत भोली हो, लेकिन यह सब बातें किसी को बोलने और समझाने की थोड़ी होती है? यह तो शादी के बाद अपने आप समझ आ जाती है ना? डॉक्टर साहब का ध्यान रख लिया करो। बहुत संकोची है, शर्मीले हैं। उन्हें अपना प्यार जताना और बताना नहीं आता। यह हमसे ज्यादा कौन जानता है ?
लेकिन हमारे साथ साथ तुम भी तो यह जानती हो कि उनका स्वभाव कैसा है? पहल तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी भावी।
उनके ऊपर हमें पूरा भरोसा है, वह अब तक हमें भूल कर तुम्हारे साथ जिंदगी के रास्ते में आगे बढ़ने के लिए अपने आप को तैयार कर चुके होंगे। लेकिन वह कभी खुले दिल से इस बात को तुम्हारे सामने स्वीकार नहीं करेंगे। बस एक कदम तुम उनकी तरफ बढ़ा लो, वह तुम्हें गोद में उठाकर अपने प्यार भरे सफर पर आगे बढ़ जाएंगे।
भावी, यह जिंदगी के बहुत सुनहरे दिन है, इन्हें गंवा मत देना। यह दिन जाने के बाद कभी वापस नहीं आते हैं…।”
भावना कुसुम की बात समझ कर लजा गयी..
“पर कुसुम.. हम कैसे.. मतलब कैसे शुरुवात.. ?”
“सब हो जायेगा.. तुम एक कदम तो बढ़ाओ, डॉक्टर हैं वो, तन और मन की नाड़ी सही ही थामेंगे !
गेंदा की चाय उफान चुकी थी। लेकिन वो दोनों सहेलियों की बातो में विघ्न नहीं डालना चाहती थी, इसलिए औंटी हुई चाय को दूध डाल डाल कर बढाती रही और फिर जब लगा की अब वहाँ जाना चाहिए, तब छान कर बाहर ले आयी…
जहाँ यज्ञ के बारे में सोच कर कुसुम गुलाबी पड़ी जा रही थी वहीँ राजेंद्र को सोच कर भावना..
गेंदा ने चाय लाकर रख दी..
“दीदी हम अब ठीक है, क्या आज घर चले जाये ?”
“नहीं, डॉक्टर साहब की इजाजत के बिना हम तुम्हे नहीं जानें दे सकते ? और वैसे भी यहाँ से गांव तक अकेले कैसे जाओगी ?”
“हम चले जायेंगे ! आप चिंता ना करे !”
“नहीं गेंदा, तुम यही रहोगी, हमारे साथ !”
भावना ने कहा और गेंदा सर झुका कर अंदर चली गयी..
‘”अब बताओ भी कौन है ये ?”
“तुमने पहचाना नहीं इसे.. तुम पहले मिल चुकी हो गेंदा से !”
अपनी याददाश्त पर जोर देते हुए कुसुम कुछ सोचने लगे और तभी उसे गेंदा याद आ गई।
” अच्छा तो यह वह लड़की है जो डॉक्टर साहब के लिए खाना बना कर लाया करती थी?”
भावना ने हामी भर दी।
” अच्छा तो यह यहां?”
” कुसुम तुम फिर भूल गई, तुम्हारे देवर और उस दूसरे लड़के ने जिस लड़की के साथ बदतमीजी की थी वह गेंदा ही तो थी। बहुत बुरी हालत में उसे छोड़कर गए थे वह लोग… अस्पताल में कुछ दिन इलाज के बाद यह स्वस्थ हो गई और उसके बाद डॉक्टर साहब इसे हमारे साथ यहां ले आए कि कुछ दिन हम लोगों के साथ रहेगी तो मन बहल जाएगा। वरना अकेले में बार-बार वही सारी बातें याद आएंगी। “
भावना की यह बात सुनते ही गुस्से में कुसुम की मुट्ठियाँ भिंच गई ।
“क्या हुआ कुसुम, हमारी बात बुरी लगी क्या?”
” नहीं भावी, तुम्हारी बात बुरी नहीं लगी। लेकिन इस सब के बाद वीर पर हमें बहुत नाराजगी है। भले ही जमानत हो जाने के कारण वह घर तो वापस आ गया है, लेकिन हमें वह लड़का फूटी आंख नहीं भाता..।
पता नहीं इस घर का होने के बावजूद वह इतना अलग कैसे हैं अपने दोनों भाइयों से।
ना उसकी बातचीत करने का तरीका इन दोनों जैसा है, और ना ही सोचने समझने का। पता नहीं पूरी दुनिया को अपनी जूती पर क्यों रखना चाहता है…।
गुस्सा तो जैसे हर समय उसकी नाक पर बैठा रहता है। ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया का ठेका इसी ने ले रखा है। यही पूरी दुनिया चला रहा है। जब देखो तब दमदमाता रहता है। अब तक बड़ी मुश्किल से खुद को रोक कर रखा है, लेकिन किसी न किसी दिन इससे हमारा जबरदस्त झगड़ा होने वाला है, हम जानते हैं..।”
” अरे छोड़ो भी उसे झगड़ कर क्या करोगी? ससुराल का माहौल खराब होना है बस। तुम तो बस अपने छोटे ठाकुर पर फिदा रहो। अच्छा क्या तुम्हारे छोटे ठाकुर दो भाई हैं..?”
“हां एक उनके बड़े भाई हैं, अखंड सिंह परिहार…।
बड़े अच्छे और सच्चे इंसान है। आज तक हमने उनके जैसा सज्जन दूसरा नहीं देखा। कभी-कभी यज्ञ बाबू को भी गुस्सा आ जाता है, लेकिन अखंड भैया तो जाने किस मिट्टी के बने हैं। इतने सहनशील इतने धैर्यवान, कभी-कभी ऐसा लगता है यह दुनिया उन जैसे शरीफों के लिए बनी ही नहीं है। इतना अच्छा होना भी अच्छा नहीं होता भावी। उनके कॉलेज के दिनों में उनके साथ कुछ बहुत बुरा हुआ था।
छोटे ठाकुर ने हमें बताया था, और यह भी बताया कि वह भाई साहब बरी हो गए थे बावजूद उन्होंने मन में एक पीड़ा बांध ली थी। हालांकि केस वापस खुला और अब सब सही हो चुका है। लेकिन अखंड भैया अब भी उस पुराने खोल से बाहर नहीं आ पाए।
अभी-अभी तो यहां आने से पहले उन्हें चाय देकर आ रहे हैं हम..।”
“हो जायेंगे.. वक्त के साथ वो भी ठीक हो जायेंगे !”
दोनों सहेलियां इधर-उधर की बातों में लग गई। उधर अखंड अपने कमरे की खिड़की पर खड़ा एक रात पहले की बात सोच रहा था। जब इत्तेफाक से रेशम और उसकी मां को छोड़ने के लिए उसे जाना पड़ा। रेशम के घर पहुंच कर उसने गाड़ी रोक दी।
रेशम की मां गाड़ी से उतरकर उसके सामने हाथ जोड़कर अंदर चली गई।
रेशम गाड़ी से उतर कर उसकी तरफ आकर खड़ी हो गई..।
“अखंड !” रेशम के मुहं से अपना नाम सुन अखंड पूरी तरह से पिघल गया..
उसे लगा अब उसे जीवन में और कुछ नहीं चाहिए !!
“आपसे कुछ कह सकती हूँ !”
(इन्हे हमसे इजाजत लेने की क्या ज़रूरत, ये जो चाहे कहे, जो चाहे मांग ले ) मन ही मन सोचते हुए अखंड ने गर्दन एक तरफ को झुका दी..
“ठहरा हुआ पानी भी किसी काम का नहीं रह जाता.. लोग पानी भी बहता हुआ ही पसंद करते हैं..।
जीवन गति का नाम है। अगर एक ही जगह हम ठहर कर रह गए तो जिंदगी आगे नहीं बढ़ सकती। जिंदगी में बहुत सी बातें ऐसी होती हैं, जब हम थक जाते हैं। परेशान हो जाते हैं। किसी जगह फंसकर रह जाते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हमें प्रयास नहीं करना चाहिए। हर एक रात की सुबह होती है। लेकिन अगर कोई इंसान अपने चारों तरफ के दरवाजे और खिड़कियों पर गहरे रंग के पर्दे डालकर कमरे के अंदर छुप कर बैठ जाएगा, तो उसके जीवन में आने वाली हर सुबह अंधेरे में डूब कर वापस रात में तब्दील हो जाएगी। पता नहीं मैं अपनी बात आपको समझा पा रही हूं या नहीं। लेकिन बस इतना कहूंगी कि उठिये, खड़े हो जाइए। और अपने चारों तरफ लगे पर्दों को खोल दीजिए। सूरज की किरणो को अपने तक आने दीजिए।
मत रोकिए इन्हे।
उनका भी हक है आप पर। जैसे पूरी दुनिया जी रही है वैसे ही खुलकर आप भी सांस लीजिए। भगवान ने आपको यह जीवन इसलिए नहीं दिया कि आप इसे गफलत में डूब कर बर्बाद कर दें।
यह मेरा फोन नंबर है, आप जब कभी भी शहर आइएगा कॉल कर दीजिएगा। मैं और अथर्व आपसे जरूर मिलने आएंगे। और अपनी अम्मा जी को भी लेकर आइएगा अब चलती हूं कल मुझे वापस निकलना है..!”
रेशम ने हाथ जोड़े और अंदर चली गयी…
अखंड उसे जाते हुए देखता रह गया.. ।
इस वक्त के पहले तक उसके अंदर, सीने में एक मरोड़ सी उठ रही थी कि रेशम कल चली जाएगी। लेकिन इस छोटी सी मुलाकात के बाद जाने ऐसा क्या परिवर्तन हो गया कि उसके दिल में एक अजब सी उत्साह की लहर उठने लगी थी। ऐसा लगने लगा था कि उसे कुछ करना है।
मुस्कुरा कर उसने गाड़ी अपने घर की तरफ घुमा ली। फोन निकाल कर उसने गीता का नंबर मिला दिया..
“क्या हुआ अखंड इतनी रात गए फ़ोन किया ?”
“गीता… हमने सोच लिया है !”
“क्या.. ? क्या सोचा है ?”
“हम नामांकन भरने को तैयार हैं !”
“क्या ?”
“हाँ !”
“ये तो बहुत अच्छी बात है.. कल सुबह आ जाओ.. मिल कर सब तय कर लेते हैं !”
“ठीक है !”
गीता के होंठो पर भी मुस्कान चली आयी.. अखंड भी मुस्कुराते हुए अपने घर की तरफ बढ़ गया.. !
क्रमशः

कुसुम कुमारी ने आखिरकार भावना का संकोच खत्म कर दिया। अब जाकर राजी को उसकी भावी मिलेगी।
कुसुम ने भावी को अपने दिल की बात बताकर उसका मन हल्का कर दिया और अपनी दोस्त को फिर से पा लिया।
अखंड और रेशम की मुलाकात काफी खास रही अब उसके जीवन में भी बदलाव आयेगा।
जब सब कुछ अच्छा हो तो अंत बहुत खूबसूरत हो जाता हैं। बेहद शानदार लिखी गई है कहानी ❤️❤️❤️❤️
Bahut Sundar part ❤️❤️❤️❤️❤️
सब सब कुछ सही पर ये गीता वाला ,!! चलो कोई नहीं आप ने कुछ जरूर सोचा होगा , हमे तो अंत में गेंदा और अखंड की जोड़ी भी सही लगी पर ये गीता !!🙈🙈🙈🙈
आज कुसुम ने अपने दिल की हर बार भावना को बता कर भावना के मन से एक पत्थर को हटा दिया ऐसा लगता है , जल्द ही बनारस घूमने जा रहे है छोटे ठाकुर अपनी ठाकुराइन के साथ ❤️🫠🫠🫠🫠
अब तो भावना को भी कुछ सद्बुद्धि आएगी लगता है 😍😍😍😍👌👌👌👌
ओर ये वीर को तो सच्ची एक बार कुसुम के हत्थे लगना ही होगा 🙄🤨
हाय मेरी कुसुम कितनी समझदार हो गई है, कितने प्यार से भावना को गले से लगाकर अपनेपन से समझा रही थी,यही तो दोस्ती की खासियत है मन चाहे कितने भी बड़े भंवर में फंसा हो दोस्त बाँह पकडकर, खिंचकर बाहर निकाल ही देते है।सही तो कहा कुसुम ने प्यार दूसरी बार भी…हो सकता है…ये तो पूरी तरह यज्ञ के रंग में रंगकर ही इतनी समझदार हो गई है। कुसुम की बाते भावना समझ तो गई है और कुसुम और राजेंद्र के लिए जो उसके मन में चल रहा था वो भी साफ हो गया है और दूसरी तरफ राजेंद्र भी बहुत समझदार है, अब तो ये दोनों अपनी गृहस्थी की गाडी आगे बड़ा ही देंगे।
रेशम के द्वारा आपने जो भी अखंड को समझाया उसका हर एक शब्द जो आपने लिखे बहुत खूबसूरत थे सही कहा जीवन गति का नाम है,….. पानी ठहरा हुआ….. मतलब इस सीन के डायलॉग 👌🏻👌🏻👌🏻आपकी लेखन शैली बहुत कमाल की है 🫡🫡लाजवाब 👌🏻👌🏻👌🏻।
खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
Nice ji
Behtareen part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
Very very sweet part. True love always make positive changes. And its very impressive that all gets their true love. Very sweet story pyari lekhika ji. Sweet like u.
Nice…a new journey of life waiting for both Akhand and Bhawana
हर रात की सुबह होती है और अब अखंड सिंह परिहार भी वापस लौट रहे हैं और कुसुम ने भी भावना के मन से सारा संदेह मिटा दिया है तो राजेंद्र और भावना की भी ज़िंदगी का सवेरा होने वाला ही होगा fantastic part
Nice