रंगबाज कपारफटा-2

रंगबाज कपारफटा-2

दूर से ही चमचमाता हुआ बोर्ड नजर आ गया
    रंगबाज कपारफटा
  हर तरह का सर का दर्द, अधकपारी, मूर्छा,सन्यास,  का शर्तिया इलाज किया जाता है !
इलाज ना होने पर पैसे वापस !

जाने क्या सोच कर मैंने वहाँ गाडी रोक दी..

झटके से गाड़ी रुकने पर ज्योत्स्ना आगे को झटक गयी

“ये क्या हरकत है ? यहाँ क्यों गाड़ी रोकी ?”

“तुम्हारे सर दर्द का इलाज करवा कर आते हैं!”

“पागल हो गए हैं क्या? यहां सोहागपुर में तुमको कौन मिल गया डॉक्टर? सही हमें नहीं उतरना ऐसे बीहङ में। पता नहीं कितना पिछड़ा कस्बा है। यहां हमारा इलाज करवाइएगा? और कोई नहीं मिला?”

” मतलब तुम मानोगी नहीं। पहले तो इलाज नहीं करवाते कहकर ताने मारोगी, और जब इलाज करवाने जा रहा हूं, तब यहां नहीं करवाना। ठीक है, तुम गाड़ी में बैठो। मैं दवा लेकर आता हूं।”

मैं गाड़ी के शीशे लगा कर गाड़ी से उतर गया। जाने क्या सोच कर वह भी पीछे से उतर आई। दीपू को भी उसने साथ ले लिया था।

        रंगबाज कपारफटा का बोर्ड पढ़कर ही ज्योत्सना का मुंह बन गया। छोटे से टूटे-फूटे बोर्ड के पीछे लकड़ी की जाली नुमा खिड़की थी। जिसके पीछे बैठा आदमी बाहर आने वाले लोगों को साफ देख सकता था। चार-पांच सीढ़ियां थी जिनका प्लास्टर भी जगह-जगह से उधड़ा हुआ था। ठीक सीढीओ के बगल से होकर गंदी सी नाली बह रही थी। ज्योत्सना ने पर्स से निकाल कर अपना रुमाल नाक पर रख लिया। मैं सीढीओ को पार कर दरवाजे पर पहुंच गया।

लकड़ी का ही पुराने जमाने का टेहरा नीला रंगी दरवाज़ा था ।

मन ही मन सोचता कि कौन होगा ये रंगबाज मैं अंदर दाखिल हो गया..
एक छोटी सी टेबल के पीछे रखी लकड़ी की कुर्सी पर एक अधपके खिचड़ी बालो और बेतरतीब दाढ़ी मूंछ वाला बन्दा बैठा था, अपनी एक आँख की ऐनक को हाथो से पकडे वो टेबल पर पड़ी किसी जीर्ण शीर्ण सी किताब को पढ़ने की कोशिश कर रहा था..!

तो ये था रंगबाज !!

मैं उसके कमरे में कूद पड़ा और उसकी एकाग्रता को भंग कर दिया!

“रंगबाज जी !” उसने आंखे मिचमिचा कर ऊपर देखा..

“हम्म, कहिये !”

“आप ही हैं ?”

“और कोई दिख रहा यहाँ ?” उसने मेरे सवाल के जवाब में सवाल कर दिया

मैं निरुत्तर उसके उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा उसने नीचे अपनी किताब पर आँख गड़ाए हुए ही अगला सवाल दाग दिया..

“मरीज़ कौन है ?”

“जी मेरी पत्नी..!”

मैंने पीछे खड़ी ज्योत्स्ना को खींच कर आगे कर दिया..
उसने आंखे नीचे गड़ाए हुए ही ऊँगली से ज्योत्स्ना को बैठने का इशारा कर दिया..

धूल से ढकी कुर्सी को देख कर ही ज्योत्स्ना का मुहं बन गया.. लग नहीं रहा था यहाँ कोई भूले भटके आता भी होगा !

‘”बैठ जाइये.. इसी मिट्टी से हमारी काया भी बनी है !”

बिना ज्योत्स्ना की तरफ देखे कैसे इसने उसके विचार भांप लिए..
ज्योत्स्ना को मन मार कर बैठना पड़ा..

“बोलिये क्या तकलीफ है ?”

उसके सवाल को अनसुना कर ज्योत्स्ना घूर कर मेरी तरफ देखने लगी..
मैंने ही उसकी तरफ से जवाब दिया..

“सर में दर्द बना रहता है !”

“किस वक्त पर होता है दर्द ?”

उसका ये सवाल बड़ा अजीब था, क्यूंकि हम एलोपेथी वाले तो कभी नहीं पूछते कि रोग किस वक्त बढ़ता या शुरू होता है..

“लगभग दिन भर बना रहता है  !! इस बार भी जवाब मैंने ही दिया..

रंगबाज ने अबकी बार आँख उठा कर देखा और ज्योत्स्ना की तरफ देखने लगा..

‘”बोलने में भी दिक़्क़त है क्या ?”

ज्योत्स्ना उसका मतलब नहीं समझ पायी, लेकिन मेरी समझ में आ गया.. जवाब जबान तक आते आते रह गया..

“क्या ?” उसने पूछा..

रंगबाज ने अबकी बार ध्यान से ज्योत्स्ना फिर मुझे देखा और इस बार मुझ से मुखातिब हुआ..

“काम क्या करते हैं आप ?”..

“डॉक्टर हूँ !”

“हम्म, मैडम आप भी डॉक्टर हैं ?”

“नहीं.. हम कुछ नहीं करते.. बस घर पर पड़े रहते हैं !” कुढ़ा हुआ जवाब फेंक कर मारा ज्योत्स्ना ने

“घर के काम, खाना वाना बनाना, कपड़े धुलना साफ़ सफाई वगैरह ?” रंगबाज पूछ उठा 

“हर काम के लिए महरी है.. सब कर जाती है !” ज्योत्स्ना ने जवाब दिया..

“आइये वहाँ लेट जाइये !”

उसने एक मरियल सी लकड़ी की ऊँची बेंच दिखाई..
मुझे ज़रा आपत्ति आयी, लेकिन मैं उसका नुस्खा  जानना और देखना चाहता था..

ज्योत्स्ना ने मुहं बिगाड़ लिया..

“ज़रूरी है क्या ?”

ज्योत्स्ना की बात को बुरी तरह अनसुना करते हुए रंगबाज ने अपनी सिलबिली सी टेबल में से एक दराज़ खोली और स्टील का छोटा सा दीपक नुमा कुछ निकाला..

“हाँ.. आपके नासारन्ध्रों में दवा की बूँद डालनी है!”

रंगबाज़ खड़ा हुआ और अपनी आदमयुग की चरमराती अलमारी खोल कर कोई दवा निकाल लाया..

ज्योत्स्ना लेट गयी..
वो उसके सरहाने खड़ा हो गया..
उस टेबल के ठीक बाजु में खिडकी थी, जिस पर एक पुराना सा हरियल पर्दा टंगा था! उसे उसने खिसका  दिया, और सूरज की मध्धम रौशनी ज्योत्स्ना के चेहरे पर पड़ने लगी..
ज्योत्स्ना का तांबई रंग चमकने लगा..

उसने दवा को उस स्टील के दीपक में पलट दिया और तब ज्योत्स्ना की बात का जवाब दिया..

“चेहरा ज़रा ऊँचा करिये.. जिससे नासारन्ध्र दिखाई दे !”

“अब ये नासा में कहाँ पहुँच गए भाई ?” मैंने अपना ज्ञान उड़ेला..

“नासारन्ध्र नॉस्ट्रिल को बोलते हैं !” इस बार रंगबाज की जगह ज्योत्स्ना बोल पड़ी..

रंगबाज के चेहरे पर एक हल्का सा उत्साह का रंग चढ़ गया..

“उमर क्या है आपकी !” अपनी हथेली पर की तेल की बुँदे ज्योत्स्ना के माथे पर गिरा कर उसने अपनी उंगलियॉं से हलके हलके उसके माथे को थपकना शुरू किया..
एक दो बार इसकी उँगलियाँ चली और ज्योत्स्ना ने आंखे मूँद ली..

“इस जुलाई में सैंतीस पूरा कर लूंगी !”

“हम्म… !” एक धीमे हम्म के साथ उसकी उंगलियॉं के पोर ज्योत्स्ना के माथे, कनपटी और आंखों के ठीक बीच के बिंदु पर चलती रही। ज्योत्सना का चेहरा देखकर यह महसूस हो रहा था कि उसे राहत सी लग रही थी। कुछ सेकेंड तक अपनी उंगलियों को चलाने के बाद उसने वही रखे एक कपड़े से ज्योत्सना के दोनों तरफ के कानों को लपेट, चेहरे को धीरे से खींचकर ऊपर की तरफ कर दिया।
     ज्योत्स्ना की गर्दन टेबल से जरा नीचे की तरफ झुक रही थी। मुझे लगा उसे तकलीफ ना हो रही हो। लेकिन उसके चेहरे को देखकर ऐसा कुछ महसूस नहीं हो रहा था। रंगबाज ने उस दीपक के सामने की तरफ निकले हुए चोंचनुमा रास्ते से दो-दो बूंद उस दवा के ज्योत्सना की नाक में डाल दिए।

नाक में दवा जाते ही ज्योत्सना को कोई सनसनी सी जरुर महसूस हुई, क्योंकि उसके पैरों ने हल्के से झटका खाया। हाथ की उंगलियां तड़पती गई। लेकिन फिर वह तुरंत स्थिर हो गई। नाक पर से बूँदे बाहर नहीं आने के लिए रंगबाज ने एक छोटे से डिब्बे को खोलकर रूई निकाली।

    उस डिब्बे के खुलते ही कपूर की तेज महक पूरे कमरे में फैल गई। मुझे लगा रूई में भी कपूर होगा। मैं कुछ बोल पाता उसके पहले रंगबाज ने मुझे हाथ दिखाकर शांत कर दिया। उसने रूई से धीरे-धीरे नाक की निचली सतह को साफ कर दिया..।

“कुछ देर लेटी रहिये.. ! उठेंगी तो सर का दर्द गायब होगा ! वैसे आपकी उम्र में ये दर्द होना नहीं चाहिए..। अमूमन अड़तालीस पचास के बाद ऐसा सर का दर्द महिलाओं में पाया जाता है, आप तो अभी काफी कम उम्र है ! “

मैंने देखा ज्योत्स्ना के चेहरे पर एक हल्की सी लुनाई आ गयी..

“वैसे अपने जितना बताया उससे आपकी त्वचा की उम्र और भी कम है.. अगर आपको ये सर का दर्द नहीं होता तो आपकी त्वचा अभी सर्फ पच्चीस बरस की होती, लेकिन इस दर्द ने आपकी उम्र को पैंतीस का कर दिया है.. !”

“कोई दवा है डॉक्टर साहब, इस दर्द से निजात पाने के लिए !” ज्योत्स्ना टहूकी..

मुझे लगा यह त्वचा वाली बात सुनने के बाद ज्योत्सना जबरदस्त तरीके से इस दर्द से निजात पा लेना चाहती है। रंगबाज के चेहरे पर वही स्थिर भाव थे। ना वह मुस्कुरा रहा था ना वह नाराज लग रहा था। उसने अपने लेटर हेड को सामने किया और प्रिस्क्रिप्शन लिखने लगा। कुछ दो-चार पंक्तियां लिखने के बाद वह बड़ी गंभीरता से मेरी तरफ देखने लगा..

“उपाय आप दोनों को ही करने पड़ेंगे। वरना कल को आप भी इस तकलीफ के साथ मुझे ढूंढते चले आएंगे !”

उसकी बात सुनकर मैंने ज्योत्सना की तरफ देखा।

” कुछ आराम हुआ? अभी उठ सकती है?”

मैंने रंगबाज से पूछा। रंगबाज ने धीरे से गर्दन हिला दी। ज्योत्सना उठकर बैठी और उसकी आंखों की चमक देखकर मैं उसे देखता रह गया। ज्योत्स्ना ने पहली बार पूरी आंखों और पूरे भाव से मेरी तरफ देखा और हल्के से मुस्कुरा उठी। उसके चेहरे पर उस वक्त मुझे सच में प्यार हो आया।

   ऐसा लगा जाने कितने सालों बाद मैंने अपनी बीवी को मुस्कुराते देखा है। अगर रंगबाज नहीं होता तो मैं आगे बढ़कर ज्योत्सना को गले से लगा लेता। ज्योत्स्ना धीरे से उस ऊंचे स्टूल से कूद कर नीचे उतर गई। मेरे पास आकर वो खड़ी हो गयी.. ।

“क्या हुआ आराम हुआ?”

उसने हां में गर्दन हिला दी।

“आराम ऐसा हुआ है कि लग ही नहीं रहा मुझे सर में दर्द भी था। पता नहीं कितने सालों बाद ऐसा लग रहा है कि सिर बहुत हल्का हो गया है। आपकी यह नाक में डालने वाली दवा तो चमत्कारी थी डॉक्टर साहब, मुझे यह दवा जरूर दे दीजिएगा..।”

रंगबाज ने वह पर्ची मेरी तरफ बढ़ा दी और ज्योत्सना की तरफ देखने लगा।

” सुबह कितने बजे उठ जाती हैं?”

ज्योत्सना ने आंखों पर जोर डालते हुए कहा

“आठ तक उठ जाती हूं ।”

रंगबाज ने धीमे से हां में गर्दन हिलाई

“सुबह सूर्योदय के पहले उठना पड़ेगा,क्योंकि यह दवा सूर्योदय के पहले ही चमत्कारी प्रभाव डालती है।”

” लेकिन मेरा सर का दर्द तो अभी भी ठीक हो गया।”

” इसलिए क्योंकि मैंने आपकी नाक में दवा डाली..।
लेकिन जब इस दवा का प्रयोग मरीज खुद अपने ऊपर करता है, तब उसे सूर्योदय के पहले उठकर सूर्य की प्रथम किरणो मे अपने चेहरे को रखकर इसका उपयोग करना पड़ता है। और तभी फायदा होता है। और यह काम आप अकेली नहीं कर सकती। इसमें आपके पति ही आपका साथ दे पाएंगे।”

” लेकिन मैं तो इतनी सुबह उठ ही नहीं पाता। मुझे रात में सोने में देर हो जाती है।”

” कोशिश करके देखिए, जब एक बार सुबह जल्दी उठने लगेंगे तो रात में खुद-ब-खुद नींद आ जाएगी। सुबह सूर्योदय के समय उठकर आप दोनों को एक साथ सूर्य देवता को नमस्कार करना है। सूर्य देवता को जल चढ़ाने के बाद आप इस दवा को अपनी नाक में लेंगे।
     सिर्फ 7 दिन यह प्रयोग करके देखें, आपका सिर दर्द जड़ से दूर हो जाएगा। हां इसके बाद आप चाहे तो आप दोनों आधे घंटे के लिए टहलने के लिए भी जा सकते हैं।”

मेरे लिए यह बातें बड़ी हवा हवाई सी थी। लेकिन मैंने ज्योत्सना की तरफ देखा, उसे देखकर लग रहा था जैसे वह अगले दिन से ही यह चमत्कारी इलाज करने के लिए आतुर हो रही थी। उसकी खुशी के लिए मैं भी यह करने को तैयार हो गया। मैंने हामी भरी और धन्यवाद देकर अपनी जगह से उठ गया। ज्योत्सना ने भी रंगबाज के सामने दोनों हाथ जोड़े और मुस्कुरा कर बाहर निकल गई।

   मैं भी पीछे से बाहर निकलने को था कि मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया।
मैं पलटा, रंगबाज मुझे देख रहा था।

” जी कहिए?”   मैंने सवाल किया

“डॉक्टर साहब सूरज के सामने कोई दूसरा तारा चमक नहीं पाता। दूसरे तारे भी सूरज के ढलने के बाद ही अपनी चमक बिखेर पाते हैं। अगर शादीशुदा जीवन में पति-पत्नी में से एक सूरज बनकर चमकने लगे तो दूसरा उन्ही तारों की तरह गुम होने लगता है। और अपने गुम होते अस्तित्व को बहुत बार किसी के सामने व्यक्त नहीं कर पाता है।
   अपने आप को दिखाने के लिए , सबके बीच उभरने के लिए उसे सूरज के डूबने तक का इंतजार मत करने दीजिएगा।”

मुझे ऐसा लगा मेरे शरीर का सारा रक्त एक साथ मेरे चेहरे पर चढ़कर मेरे चेहरे को लाल कर गया था। कितने आसान शब्दों में इस गंवई वैद्यराज ने मेरी और ज्योत्सना की जिंदगी का वह ढका छुपा काला पहलू देख लिया था, जिसे मेरे मनोविज्ञान की किताबें भी नहीं ढूंढ़ पा रही थी।

    तो यह राज था ज्योत्सना के सिर दर्द का। जो मैं आज तक नहीं ढूंढ पाया। अपने आप को हर तरफ से मुझसे कमतर मानकर अपनी अहमियत जताने के लिए उसने बीमारियों की पोटली खुद पर लाद ली थी। और कोई बीमारी नहीं मिली तो रात दिन सोच-सोच कर उसने सिर दर्द को ही अपने गले से लगा लिया था। कम से कम उसके सिर दर्द के बहाने मैं उसकी खैर कुशल पूछ लिया करता था। शायद यही वजह थी कि शादी के बाद से आज तक उसका सिर दर्द ठीक नहीं हुआ, और शायद यही वजह थी कि रंगबाज ने मुझे सुबह उठकर उसके साथ समय गुजारने की सलाह दी थी ।

अब और कुछ करूं ना करूं लेकिन अपनी व्यस्त दिनचर्या में से सुबह के वह हसीन पल ज्योत्सना के साथ बिताने की कोशिश जरूर करूंगा।
अपने विचारों में खोया हुआ मैं उसे टूटे-फूटे दवा खाने से बाहर निकल आया। अपने ख्यालों में गुम मैं कार में जाकर बैठ और मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

ज्योत्स्ना ने धीरे से मेरे पैरों पर अपना हाथ रख दिया।

” सुनिए फीस कितनी ली उसने?” तब जाकर मुझे ध्यान आया कि मैंने उसे फीस तो दी ही नहीं।

” अरे मैं तो भूल ही गया।”

” आप भी ना, हर बात याद दिलानी पड़ती है।”
ज्योत्स्ना ने उलाहना तो अब भी दिया लेकिन बहुत ही भीने शब्दों में दिया। यह उलाहना प्यार भरा था। मैं उसकी तरफ देख कर मुस्करा उठा। मैंने धीरे से उसे अपनी तरफ खींचा और उसके माथे को चूम लिया।
    ज्योत्स्ना ने रेडियो बजा दिया।

” लौटते वक्त यही से तो होकर गुजरेंगे, उस वक्त याद से उनकी फीस देते जाएंगे..।”

  दो दिन शादी की रौनक में यूं बीत गए, पता भी नहीं चला। बहुत दिन बाद ज्योत्सना को इतना खुश देख रहा था। इन दो दिनों में उसने सर दर्द की एक बार भी शिकायत नहीं की। दिल ही दिल में मैं भी उस रंगबाज कपारफटा को मान गया। वाकई उसने कुछ निराला ही इलाज किया था ज्योत्सना का। पता नहीं उसे कौन सी बूटी पिलाई थी। लेकिन मुझे जो भी कहा उसमें जिंदगी की सच्चाई घुली हुई थी। दो दिन बाद हम वापस उसी रास्ते से लौट रहे थे। उस जगह पर पहुंच कर मैं ध्यान से उस बोर्ड को ढूंढने लगा। और मुझे एक बार फिर वह बोर्ड नजर आ गया। लेकिन इस बार वह दीवार पर सीधा टंगा होने के बजाए एक तरफ से नीचे की तरफ गिरा हुआ था। दरवाजा अब भी वैसा ही टूटा फूटा था।

    मैंने गाड़ी वहाँ रोक दी और गाड़ी से उतर गया। ज्योत्सना से पूछा तुम भी चलोगी, ज्योत्स्ना ने मुस्कुरा कर हामी भरी और दरवाजा खोलकर वह भी उतर गई।
हम सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने वाले थे कि बाजू वाले पान की दुकान जो उस दिन बंद थी, मे मौजूद पान वाले ने हमें आवाज दे दी।

” क्या हुआ भैया कहां जा रहे हो?”

” यह रंगबाज डॉक्टर के यहां दिखाने जा रहे हैं।”

उस पान वाले ने आश्चर्य से हम दोनों को देखा और मुंह में भरे गुटके को एक तरफ थूक कर हमें अपने पास बुलाने लगा। हम दोनों ही दो-दो सीढ़ियां चढ़ चुके थे, उतरने का मन नहीं था। लेकिन सीढ़ियां उतर कर उसके पास जाना पड़ा।

” बोलो क्या बात है?”

” यह डॉक्टर नहीं वैद्यराज थे।”

” हां हां उन्ही वैद्य के पास दिखाने आए हैं।”

“क्या बात कर रहे साहब।अब वैदराज थोड़े ना मरीज देखते हैं।”

“ऐसे कैसे हो सकता है ? अभी 2 दिन पहले ही तो हम यहां से गुजरे थे, तब तो यह क्लिनिक खुला हुआ था।”

” पगला गये है क्या? 2 दिन पहले क्लिनिक खुला हुआ था ? क्या बात कर रहे है?”

” हां हां उन्होंने हमें दवाई लिखकर भी दी थी..।”

“अरे भैया, इन वैदराज को मरे हुए पूरे डेढ़ सौ साल हो चुके हैं। लेकिन इनका यह दवाखाना जस का तस है।

” क्या बात कर रहे हो? डेढ़ सौ साल से यह दवा खाना वैसे का वैसा है अब तक नहीं बदला..?”

“अरे भैया इनकी भी एक कहानी है। कहा जाता है कि कई सौ सालो पहले एक वैदराज हुआ करते थे रंगबाज कपारफटा!
    वह हर एक बीमारी का चुटकियों में इलाज कर दिया करते थे। उनके बाद उनके बेटे ने उनकी वसीयत को आगे बढ़ाया, और उसके बाद उनके बेटे ने। लेकिन उस समय अंग्रेजों का शासन आ गया। कहा जाता है कि एक बार किसी अंग्रेज की बीवी को सिर के दर्द की समस्या थी। वह अंग्रेज खुद डॉक्टर था लेकिन उसकी बीवी का सिर दर्द वह ठीक नहीं कर पा रहा था। एक बार वह अंग्रेज और उसकी बीवी यहां से गुजर रहे थे। बीवी जबरदस्त चिड़चिड़ी और बददिमाग औरत थी। उस डॉक्टर को मजाक सूझा, उसने सोचा कि यह गांव गंवई का बेवकूफ अडियल बैलबुद्धि वैदराज क्या ठीक करेगा मेरी बीवी को, इसी के पास दिखाना चाहिए।
    वह असल में अपनी बीवी को सबक सिखाना चाहता था। क्योंकि उसकी बीवी उसके इलाज पर कभी भरोसा ही नहीं करती थी !!
और वो अपनी बीवी को लेकर रंगबाज के पास पहुँच गया..
रंगबाज ने बीवी के हमेशा के सरदर्द की नब्ज पकड़ ली… डॉक्टर दिखने में सुंदर और अच्छा पढ़ा लिखा था, जबकि बीवी साधारण थी। बस इसी बात ने बीवी के अंदर एक हीन भावना को जन्म दे दिया था.. बची खुची कसर डॉक्टर साहब बात बात पर अपनी बीवी का मजाक उड़ा कर पूरा कर देते थे..।
   हालाँकि ये उनका स्वभाव था, लेकिन उनके मजाकिया स्वभाव को बीवी समझ नहीं पायी और अपने अहम को चोट लगा बैठी..
अपना महत्व जताने के किये उसने एक रातदिन का मर्ज पाल लिया, और सरदर्द से तड़पने लगी..
रंगबाज ने उसकी समस्या समझी और उस अँगरेज़ को भी समझा दी.. बस उस दिन से उस गोरे की बीवी सही हो गयी और गोरा रंगबाज के पैरो में नतमस्तक हो गया…।
वो उसे अपने साथ ले जाना चाहता था, लेकिन रंगबाज नहीं माना..
जब उस डॉक्टर ने ज्यादा ही जोर दिया तब रंगबाज ने शर्त रख दी कि अगर मुझे साथ ले जाना चाहते हो तो मेरा देश हमेशा के लिए छोड़ जाओ और हमें आज़ादी दे दो..
रंगबाज की बात पर गोरा नाराज़ हो गया लेकिन उसके साथ आये बाक़ी आफिसर बिलकुल ही तिलमिला गए..
वो सब के सब रंगबाज के दुश्मन हो गए..
वो गोरा डॉक्टर मना करता रह गया लेकिन उससे छिप  कर उन लोगो ने रंगबाज को रातो रात मौत  के घाट उतार दिया, और उसके दवाखाने में तोड़ फ़ोड़ मचा गए..
वो तो उसकी किताब भी उठा कर ले गए.. दवाखाने के ठीक बाहर उस किताब में आग लगा दी.. लेकिन किताब जल पाती, उसके पहले बारिश हो गयी और उस अँगरेज़ डॉक्टर के वहाँ पहुँच जानें से वो सभी लोग वहाँ से भाग गए..।

वो डॉक्टर इस बात से बहुत दुखी हुआ..
उसी ने उस किताब को उठाया और दवाखाने में ले गया..
लेकिन कहते है लोगो ने उस डॉक्टर को बस दवाखाने के अंदर जाते देखा, बाहर आते किसी ने नहीं देखा।


उसके बाद सालो बीत गए…!
हमारा देश आज़ाद हो गया, लेकिन ये दवाखाना यही का यही रह गया ….
जब कभी कोई इस दवाखाने को हटाने यहाँ आता है, पता नहीं वह कहाँ गायब हो जाता है। लेकिन ये टूटा फूटा दवाखाना आज भी यही है साहब !!

मौसम बदल गए, सरकार बदल गयी लेकिन इस दवाखाने की टूटती दीवारे आज भी वैसी की वैसी हैं… !
यहाँ तक की इतने सालों में रंगबाज का पोस्टर भी जस का तस है.. !”

पाने वाले की गुमटी पर ग्राहक चला आया और हम लोगो से ध्यान हटा कर वो पान लगाने में व्यस्त हो गया. . मैंने ज्योत्स्ना की तरफ देखा, वो भयत्रस्त नेत्रों से मुझे ही देख रही थी.. मैं उसके पास गया और वो सरे राह मुझसे लिपट गयी..
उसके कंधे पर हाथ रख मैं उसे गाड़ी तक ले आया.. उसे गाड़ी में बैठा कर मैंने गाड़ी निकाल ली..

मेरी गाड़ी के बैक व्यू मिरर में अब भी रंगबाज नजर आ रहा था।

            रंगबाज कपारफटा
सभी तरह के सर दर्द, अधकपारी मूर्छा सन्यास का  शर्तिया इलाज किया जाता है !
इलाज ना होने पर पैसे वापस !!

इति !!

5 29 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

72 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Gajab ki kahaniDr Aprna ji bahut hi vichitra or ajibogarib kahani,Aaj ke samya me ye kaise kahani, lekin par kar acchi lagi,Gajab ka dimag or Gajab ke lekhni Aap ki ,kya khu Sabbat Kam par ja rahaya hai.

Geeta Prasad
Geeta Prasad
1 year ago

कहानी कहां से कहां पहुंच गई। जब इसका पहला भाग पढ़ा था तो बिल्कुल अंदाजा नही था की अंत ऐसा होगा।।।। वाह जी👌👌👌👌👌👌👌 गजब लिखती हैं आप।।।।।यानी की रंगबाज कपारफटा की आत्मा आज भी परेशान लोगों का इलाज करती है।।।👌👌👌👌👌👌👌

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

😲ये क्या था डॉक्टर साहिबा कहानी का एन्ड तो चोकाने वाला था सच मे, कमाल लिखती हो आपको, बिलकुल हमारी सोच से परे लाजवाब 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻।एक साधारण सी घरेलू कहानी..अंत…आते आते मेरा तो मुंह ही खुल गया हैरानी से 😲। वाकई आप जैसा कोई नहीं सोच सकता, कमाल लिखा है डॉक्टरनी जी 😘।रंगबाज कपारफटा डॉक्टर ने बिलकुल सही नब्ज पकड़ी है बीमारी की जड़ पकड़ ली और इलाज़ भी बहुत अच्छा बताया।
बहुत बहुत खूबसूरत कहानी डॉक्टर साहिबा, कभी कभी तो आपके हाथ चूमने का मन करता है 😊😘🫣।
बहुत बहुत खूबसूरत लिखा आपने 👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

😱😱😱😱😱😱😱😳😳😳😳😳😳😳
सोचा नहीं था कि आखिर में ये होगा।
मतलब की आत्मा अभी भी परेशानो का इलाज कर रही है बिना किसी लालच के,वाह 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
आपने तो एकदम से माहौल ही बदल कर रख दिया
कहां तो हम इसे एक नॉर्मल si कहानी मन कर चल रहे थे आपने अंत में इतना बड़ा झटका दे दिया 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Rekhapradeepsrivastava
Rekhapradeepsrivastava
1 year ago

बहुत ही बेहतरीन कहानी
आज कल की भाग दौड़ वाली जिंदगी में हर दूसरे घर में इस तरह का सर दर्द मिल ही जाता है जिसका इलाज बहुत ही अच्छा बताया आपने 👌👌👌👌👌

Gurpreet Kaur
Gurpreet Kaur
1 year ago

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍esi stories aap hi likh sakti ho meaningful +horror wow 👌👌👌

,Anu Saggar
,Anu Saggar
1 year ago

बहुत ही बढ़िया 👌👌

Deepa verma
Deepa verma
1 year ago

वाह वाह बड़ा आनंद आ गया पढ़कर।इतनी गहराई से कैसे सोच लेते हो आप अपर्णा जी।हर नई कहानी के साथ मैं आपकी ओर भी ज्यादा फैन होती जाती हूं।

कांति
कांति
1 year ago

वाह 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻 शानदार एक बार फिर से, कहां कहां से ऐसी कहानियां लाती हो समझ नहीं आता ओह! याद आया इच्छा की कलम रखी है ना🤣🤣
अपने आप को कमतर समझ कर मानसिक बीमारी बन जाना जाना शायद हर दूसरे घर में एक मरीज मिल जाएं। लेकिन उपाय लाजवाब था 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Archana
Archana
1 year ago

बहुत अच्छा लगा पढ़कर…..मजा आया…. और मुझे पता है भारत में अब बही ऐसे महान वैध है…
हमारे तरफ भी बहुत सारे rogo ka fuka झाड़ होता है
बेहतरीन रचना….