
रंगरेज कपारफटा
क्लीनिक का काम फटाफट निपटा कर सेक्रेटरी को अगले दिन कोई अपॉइंटमेंट ना लेने की हिदायत देकर मैं निकल ही रहा था कि ज्योत्स्ना का फ़ोन आ गया..
“और कित्ती देर लगेगी ? अभी तक आपके मरीज़ सुलटे नहीं ?”
“अरे हो गया यार, आ रहा हूँ बस !”
“हूँ, और सुनिए उस जमीला को कह दीजियेगा कल का कोई कॉल नहीं लेगी ! कल वापसी किसी सूरत में सम्भव नहीं है !”
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“हाँ जानता हूँ, मना कर दिया हूँ.. !”
“एहसान !.. आइये फटाफट खाना लगा दिया है !”
ज्योत्स्ना के लिए कितना कुछ कर लो, कभी खुश ही नहीं होती !
कमबख्त ज़िन्दगी जैसे रेल की पटरियों सी हो चली है, साथ तो चल रहे पर संग नहीं है !
बाहर से देखने वालों के लिए मेरी और ज्योत्सना की जिंदगी किसी सपने के पूरे होने जैसी है।
न्यूरोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद पहले दो-चार साल बड़े-बड़े अस्पतालों में काम करने के बाद जब अनुभव की गठरी पक्की बांध ली, तब अपना क्लीनिक डाल दिया। ईश्वर की कृपा से पहले दिन से ही क्लीनिक पर चल पड़ा।
पिताजी ने अपने गांव के परिचित के ढूंढे हुए रिश्ते में मुहर लगा दी और साधारण लिखाई पढाई करी हुई ज्योत्स्ना मेरे जीवन में पत्नी बन कर आ गयी..।
दिखने में ज्योत्स्ना साधारण थी। अपने नाम के अनुरूप नही थी..
शुरुवात में स्वभाव भी ठीक था, लेकिन धीरे धीरे जानें क्यों उसके अंदर एक कड़वाहट भरती चली गयी!
हर बात पर शिकायत, हर बात पर नाराजगी! जाने क्यों कभी खुश रह ही नहीं पाती थी! शादी के बाद मुश्किल से डेढ़ दो महीना गांव में बाबूजी और मां के पास रही होगी, उसके बाद मैं उसे शहर ले आया ..
तब तक लोन लेकर मैंने शहर में अपना घर भी खरीद लिया था! शादी के शुरुआती दिनों में ही अपना बड़ा घर, बड़ी गाड़ी भी उसे कभी मुस्कान नहीं दे पाई। पता नहीं किस चीज की तलाश में रहती थी, जो हर वक्त उसका सर चढ़ा ही रहता था।
हर तीसरे दिन उसे सिर दर्द की शिकायत हो जाती थी। डॉक्टर होने के बावजूद मेरी दी कोई दवा उसे कभी मुआफिक नहीं बैठी। समझ ही नहीं आता था कि इस औरत को कैसे खुश रखूं।
कमाता भी उसी के लिए था, उड़ाता भी उसी के लिए था।
साल में एक बार क्लीनिक बंद कर 10- 12 दिनों की छुट्टियों में उसे घूमाने जरूर ले जाता था। शादी के 2 साल बाद दीपू हमारी जिंदगी में आ गया। उसके आने से ज्योत्सना के स्वभाव की कठोरता जरा कम तो पड़ी लेकिन जड़ से उखड़ नहीं सकी।
कहते हैं मां बनने के बाद औरत का स्वभाव नखशिखांत बदल जाता है। ऐसा कुछ ज्योत्सना में नजर नहीं आया। अब तो उसका हर तीसरे दिन उठने वाला सर दर्द लगभग रोज ही बना रहने लगा।
खेलते कूदते दीपू भी आठ बरस का हो गया। दूसरे बच्चे के लिए ज्योत्सना ने एक दो बार कहा, लेकिन मैंने ही रुचि नहीं दिखाई। मुझे लगा एक बच्चे को तो कूट पीट कर पाल रही है, दो आ गये तो पता नहीं क्या जी का जंजाल करेगी?
मैंने अपने कॉलेज के दोनों में मनोविज्ञान की भी पढ़ाई की थी। इसलिए बहुत बार ज्योत्सना के स्वभाव की कर्कशता को परखने की कोशिश भी करता था कि आखिर ऐसी कौन सी कमी है जिसके कारण वह इतनी क्षुब्ध रहती है। आखिर कौन सा पेंच मुझसे छूट रहा है। लेकिन मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि वह कौन सी कमी मुझसे हुई जा रही है, जिसके कारण यह औरत कभी खुश नहीं रहती..।
जीवन तो चलता ही है। दिन गुजरते ही हैं, लेकिन मेरे जैसे खुशदिल इंसान को जीवन काटना व्यर्थ लगता है।
लगता है कि जीवन जीने के लिए है, काटने के लिए नहीं।
और मेरे ढेर सारे प्रयासों के बावजूद दुर्भाग्य से मेरा मेरा जीवन कट रहा था, मैं जी नहीं पा रहा था..।
इसी सब में साले साहब की शादी लग गयी..
मैंने समय की कमी का लाजवाब कारण देते हुए ज्योत्सना को पहले ही जाने की बात कही। लेकिन उसने साफ इनकार कर दिया। उसे लगा अगर वह पहले चली गई, तो मैं बाद में कोई बहाना बनाकर शादी में नहीं आऊंगा। इसलिए हल्दी वाले दिन सुबह हमारा निकलना तय हुआ। तीन दिन से ज्यादा की छुट्टियां मैं नहीं ले सकता था। क्योंकि बहुत से तो आपातकालीन मरीज भी मेरी क्लीनिक पर पहुंचते थे। जिनकी समय पर सर्जरी करना नितांत आवश्यक हो जाता था, और अगर मरीज को ऐसे ही वापस करता रहा, आज नहीं तो कल यह बार-बार आने वाले मरीज किसी दूसरे ठौर ठिकाने को तलाश लेंगे।
यह मैं भी जानता था।
तीन दिन की छुट्टियां भी मेरे लिए ज्यादा ही थी। लेकिन ज्योत्सना को कुछ भी समझाना व्यर्थ था। सुबह के मरीजों को निपटाकर निकालने का वादा किया था, और अपने वादे के अनुसार ठीक एक बजे मैं घर पहुंच गया। अंदर पहुंचते ही डाइनिंग टेबल पर थाली परोसी पङी थी।
मैंने बिना थाली की तरफ देखे ही ज्योत्सना को मुस्कुरा कर साथ चलने को कहा और वह भङक गई।
” थाली छोड़कर चले जाएंगे क्या?
जल्दी-जल्दी दो कौर डालिये और चलिए।”
उसका चिढ़ा हुआ सा जवाब मेरे गुदगुदाते हुए मन को ढाप गया..
मैं वापस किसी अंधे कुंए में जा गिरा !
डायनिंग पर बैठ कर मैंने जैसे तैसे दो चार कौर निगले और खड़ा हो गया..!
उसकी ज़िद थी ड्राइवर को साथ लेने की, लेकिन मैं खुद ही गाडी चलाना चाहता था…!
दीपू उछलता कूदता आकर मुझसे लिपट गया..
उसके लिए मैं एक ट्रॉफी सा था..!
अपने दोस्तों में वो मेरे नाम की रौब गांठता था..।
सुबह मेरे सोकर उठाने से पहले वो स्कूल निकल जाता था, और रात में मेरे लौटने तक वो सो जाता था..। एक अकेला इतवार ही हम दोनों को जोड़ने की कड़ी थी।
उसमे भी शाम के वक्त मेरी मित्र मण्डली या तो आ धमकती या मुझे संग खींच ले जाती…।
वैसे ये मित्र मण्डली का साथ मेरे लिए ज़रूरी भी बहुत होता, मेरे दौड़ते भागते जीवन का मल्टीविटामिन थे मेरे दोस्त..।
लेकिन इस सब में दीपू का साथ अक्सर मिस कर जाता था..।
ज्योत्स्ना का साथ मिस करने का सवाल ही नहीं उठता था, उससे तो एक तरह से बचने लगा था मैं..।
एक आधी छुट्टी भी कभी उसके साथ बितानी पड़ जाए तो मुझ पर भारी पड़ जाती थी। बस उसके ताने कलह क्लेश में पूरा दिन बीत जाता था..
मैंने अपने पैरों के पास लिपटे हुए दीपू को प्यार से गोद में उठा लिया।
घर की महरी ने आकर बर्तन समेटे और ज्योत्सना का पर्स लाकर सामने रख दिया। ड्राइवर पहले ही हम सब का सामान गाड़ी में लोड कर चुका था। ज्योत्सना ने जाकर घर के चारों कोनों पर मौजूद दरवाजे को चेक किया, ताले खींच खींच कर जांच की, ठीक से लगे हैं या नहीं?
सारे पंख और बत्तियां बंद करने के बाद उसने महरी को बुलाया और चाबी के छल्ले में से एक चाबी निकाल कर उसके हाथ में रख दी।
घर बाहर में क्या-क्या काम उसे इन तीन दिनों में करना होगा उसे शायद वह पचासवी बार समझा रही थी।
लेकिन उतनी ही अतल्लीनता से सब कुछ सुनती खङी महरी हमारे निकल जाने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी।
सब समझा कर वह गाड़ी की तरफ बढ़ गई। मैं भी दीपू को गोद में लिए आगे बढ़ गया। दीपू को पिछली सीट में डालकर मैंने ड्राइवर वाली सीट हथिया ली।
ज्योत्सना मेरे बगल में आकर बैठ गई। मैंने गाड़ी निकाल दी। कुछ दूर चलने के बाद उसने अपना पर्स खोला और एक सॉन्फ की डिब्बी निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दी।
“खाना खाने के बाद सौंफ नहीं खाया था ना, ले लीजिए।”
मैंने अपने हथेली आगे बढ़ा दी। सॉन्फ चबाते हुए मैंने धीरे से गाने बजा लिए।
” अरे क्या गाने बजा दिए, मेरा सुबह से सिर्फ फट रहा है, उपर से आपके यह गाने?”
मैंने मजबूरी में गानों का वॉल्यूम जरा धीमा कर दिया। लेकिन पंजाबी मस्त मौला गाने थे, सुनते-सुनते गाड़ी चलाने का मजा ही अलग था। मुझे खुद पता नहीं चला कब अपने आप अपने हाथों वॉल्यूम जरा तेज हो गया।
परेशान होकर ज्योत्सना अपने पर्स में कुछ ढूंढने लगी। उसे इस तरह करते देखकर मेरा अच्छा खासा मूड बर्बाद होने की तरफ बढ़ने लगा।
” क्या हो गया? बंद ही कर देता हूं गाने।” और मैंने गाने बंद कर दिये।
मेरी खीझ देखकर उसने मुझे घूर कर देखा और पानी की बोतल निकाल कर दो घूंट पानी भर लिया।
” आपको क्या समझ में आएगा? दिन भर मेरी तरह गृहस्थी के खटराग में फंसो, तब तो पता चले ना मुवा सर का दर्द जाता नही,और पतिदेव को कुछ समझ में आता नहीं !”
” पति को तब समझ में आएगा, जब तुम समझाने की कोशिश करोगी! अगर दिन भर शिकायत ही करती रही तब तो हो चुका?”
” बड़े फेमस डॉक्टर है ना, अपनी पत्नी के सिर दर्द को तो ठीक नहीं कर पाते? किस काम की आपकी डॉक्टरी ?”
” मेरी कौन सी दवा खाती हो तुम?”
” आपकी दवा खा खा कर भी कितना ठीक हो पाएंगे?”
” बस जब देखो तब ताना मार लो, यह नहीं की सर के दर्द का कारण क्या है वह जानने की कोशिश करो? अरे अगर मेरी पेन किलर दवाओं पर भरोसा नहीं है तो किसी आयुर्वेद वाले को या होम्योपैथी वाले को दिखा दो।
हो सकता है उनकी दवा से असर हो जाए। वह आयुर्वेद में कुछ कहते है ना वात कफ, हो सकता है कुछ बढा घटा होगा, जिसके कारण तुम्हें हर वक्त सर का दर्द रहता है।”
” आज 10 साल हो गए, आपसे एक ढंग की जांच करते तो बना नहीं, आए हैं बड़ा सिर दर्द ठीक करने वाले।”
ज्योत्सना की बात सुनकर वाकई इतना दिमाग खराब हुआ कि लगा गाड़ी का दरवाजा खोलकर उसे धक्का देकर बाहर गिरा दूं। लेकिन अपने ऊपर काबू कर लिया मैंने।
चुपचाप मन को साधने के प्रयास में इधर-उधर देखने लगा।
हमारी गाड़ी इस वक्त सोहागपुर से होकर गुजर रही थी।
यह गांव से थोड़ा बड़ा कस्बा था। कुछ छोटी-मोटे दुकाने एक पंक्ति में लगी हुई थी। कुछ खोमचे गुमटी वाले खड़े थे, तो कुछ साइकिल में पीछे कुल्फी की पेटी दबाए इधर से उधर घूम रहे थे। रास्ते में थोड़ी आवाजाही थी, इसलिए स्पीड मैंने कम ही रखी थी। दुकानों को देखते हुए गुजर रहा था कि एक नाम पर आँखें टिक गई।
दूर से ही चमचमाता हर बोर्ड नजर आ गया
रंगबाज कपारफटा
हर तरह का सर का दर्द, अधकपारी, मूर्छा,सन्यास, का शर्तिया इलाज किया जाता है !
इलाज ना होने पर पैसे वापस !
जाने क्या सोच कर मैंने वहाँ गाडी रोक दी..
क्रमशः

हमारे मे एक कहावत है…, घर का योगी योगड़ा और बाहर का योगी सिद्ध मतलब जैसे कहते है ना घर की मुर्गी दाल बराबर, डॉक्टर अपनी बीवी का सिरदर्द ना ठीक कर पाया मतलब कुछ तो है जो डॉक्टर की बीवी के मन मे जो उसे खाय जा रहा। ।चलो घर का डॉक्टर नहीं तो किसी और से ही सही…
रंगबाज कपारफटा 😊नाम पहली बार सुना मैंने पर बहुत रोचक सा नाम है अब देखते है अगले भाग मे क्या ये जो वैद है कपारफटा जी क्या डॉक्टर की बीवी का सरदर्द ठीक कर देते है 🤔।
लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏻।
रचना काफी मनोरंजक जान पड़ रही है ।
बिचारे डाक्टर साहब के इतने प्रयासों के बाद भी पत्नी देवी खुश दिखाई नहीं दे रही है ऐसा क्या दुख है उन्हे जो उनका सर दर्द होता रहता है।
अब इतने बड़े डॉक साहब क्या हकीम से इलाज करवाएंगे अपनी पत्नी का
कहानी बहुत ही अच्छी है, आखिर आपकी लेखनी है अपर्णा
देखते है आगे कि ज्योत्सना को रंगबाज कपारफटा से कितना आराम मिलता है।
😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍
मन समझने वाला जीवनसाथी न मिले तो जीवन वाकई जीता नहीं सिर्फ कटता है खैर अभी डाक्टर का नजरिया जाना है देखते हैं कि ज्योत्स्ना का नजरिया क्या हैं
अत्यंत रोचक कहानी प्रतीत हो रही है।ज्योत्सना जैसे लोग सच में भी होते हैं चिड़ेले से कितना भी कुछ कर लो कभी खुश नहीं हो पाते।
Interesting lga title ….kuch naya sa ….aage kya hoga doctor saheb ki zindagi me ….desi dawa khane ka kya role rahega
अपनी बीवी के असंतोष और रूखे व्यवहार से कही डॉक्टर साहब के सर में दर्द ना शुरू हो जाए और खुद का इलाज करना पड़े। शानदार भाग, और लाजवाब शीर्षक 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻 देशी नाम, क्या सही मिल पाएगा उपचार।
अगले भाग का इंतज़ार ❤️❤️❤️
Badhiya
अनेक सुन्दर और रोचक कहानियां देने के बाद डॉक्टर अपर्णा मिश्रा क़ी एक और बेहतरीन रचना. इंसान अपने परिवार से कुछ नहीं चाहता बस ये चाहता है कि ज़ब घर आये तो उसका मुस्कुराते हुए स्वागत हो. पर कुछ कलहणी औरतें अपने पतियों को अपनी चिढ़ पूरी करने का साधन समझती हैँ, कुछ ऐसी ही औरत है ज्योत्स्ना. एक सफल डॉक्टर पति से दो शब्द प्यार के करना तो दूर क़ी बात चंद साधारण शब्द भी नहीं बोल सकती. क्या ये औरत पत्नी कहलाने के काबिल है. ऐसा नहीं कि पति समझना नहीं चाहता पर सामने वाला समझना भी तो चाहे. आखिर क्या चाहती है ज्योत्स्ना. हमें भी जानने क़ी उत्सुकता है. बहुत ही सुन्दर रचना ❤️❤️