
अपराजिता -158
आज जब रेशम अपनी पैकिंग कर रही थी तब मानसी से बातें भी करती जा रही थी..
मानसी की अलग तैयारियां चल रही थी और वो अपनी हर तैयारी रेशम को भी बताती चलती थी..
उसका अपना शादी का जोड़ा नहीं आया था, वो बस रेशम के आने का ही इंतज़ार कर रही थी…
रेशम ने फ़ोन रखा ही था कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दे दी..
रेशम भाग कर दरवाज़े पर पहुँच गयी..
उसने दरवाज़ा खोला सामने अखंड खड़ा था !
एकदम से अखंड को देख रेशम को कुछ सूझा नहीं, लेकिन अखंड ने बिलकुल सहजता से मुस्कुरा कर अपने हाथ जोड़ दिए..
रेशम भी हड़बड़ा गयी.. उसने भी धीमे से अपने हाथ जोड़ दिए..
“क्या हम अंदर आ सकते हैं ?”
अखंड को देख कर सामान्य शिष्टाचार भुला बैठी रेशम ने उसे अंदर भी नहीं बुलाया और वो बेचारा खुद ही पूछ बैठा.. उसके पूछने पर वो झेंप कर एक तरफ खिसक गयी..
“आइये !”
वो घर के कपड़ो में ही पैकिंग में लगी थी, जींस पर उसने एक मेरून टॉप पहना था और बालों को पीछे से ऊपर की तरफ ले जाकर क्लच कर रखा था..
दो चार लटे माथे पर उड़ कर चली आ रही थी..
“डॉक्टर साहिबा, आप यहाँ से जानें वाली है, ये सुनने में आया है.. ?”
“जी.. !”
“कहाँ ?” ना चाहते हुए भी अखंड के मुहं से ये सवाल निकल गया..
और अपनी जल्दबाज़ी पर वो खुद झल्ला कर चुप हो गया..
“वापस जा रही हूँ.. यहाँ का काम पूरा हो गया..।”
” अच्छा ऐसा कुछ भी होता है क्या? कि बस दो साल की ही मियाद होती है ?”
” नहीं ऐसा तो कुछ नहीं होता, रहने वाले कितने भी साल रह सकते हैं। लेकिन हस्बैंड दूसरी जगह रहते हैं और मैं यहां अकेली।
उन्हें परेशानी होने लगी है ।”
अथर्व को सोचकर रेशम के चेहरे का रंग बदल गया और उस बदलते रंग को अखंड ने देख लिया। अखंड खिड़की से बाहर खिले हुए ताजा गुलाबों को देख रहा था। मन में यह भी सोच रहा था कि बात तो सही है, अगर अथर्व के नजरिए से देखा जाए तो वह रेशम को छोड़कर क्यों रहेगा भला…?
उसके मन का स्वाद हल्का कसैला सा हो गया..।
रेशम उसके सामने बैठी थी, सकुचाई सी..
वो जानना चाहती थी की ये आया क्यों है ?
“यहाँ आना कैसे हुआ ?” गले को साफ कर उसने पूछा..
“अरे हाँ, असली बात तो हम कहना ही भूल गए..।
हमारे घर पर अम्मा ने आपको खाने पर बुलाया है..
आपने अनजाने ही हमारे घर परिवार की काफी मदद की है ! हमारी छोटी बहु के भाई को आप ही तबियत बिगड़ने पर अस्पताल लेकर गयी थी…।
उसके बाद अम्मा की तबियत बिगड़ी तब भी, उनके इलाज के बाद समय समय पर आप उन्हें दिशा निर्देश देती रही है.. बस इसी सब कारणों से अम्मा चाहती है, कि जाने से पहले एक बार आप हमारे घर भोजन पर आ जाये..
आपको कोई परेशानी तो नहीं होगी.. ?”
रेशम कोई परेशानी बता कर छुटकारा चाह रही थी कि आखिरी वाक्य में अखंड ने परेशानी वाली बात पूछ ली.. ?
अब रेशम क्या कहे ये सोच रही थी कि गुड़िया चाय की ट्रे लिए नमूदार हुई और पट से बोल पड़ी..
“नहीं प्रधान जी, दीदी को क्या परेशानी होगी.. आ जाएँगी वो.. !”
अपनी दोनों चोटियां हिलाती गुड़िया भी गाँव की परिपाटी निभाती हुई प्रधान जी की जबरदस्त कद्रदान थी…।
अखंड हल्के से मुस्कुरा उठा..
रेशम गुड़िया के इस अप्रत्याशित प्रहार से चौंक गयी.. वो फिर एकदम से उसकी बात काट नहीं पायी..।
“जी अच्छी बात.. मैं आ जाउंगी !”
अखंड बस जैसे यही सुनने के लिए रुका था, तुरंत खड़ा हो गया..
उसने हाथ जोड़े और जाने के लिए निकलने लगा..
“शाम सात बजे तक आ जाइयेगा, घर पर सब आपका इंतज़ार करेंगे !”
हाँ में गर्दन हिला कर रेशम भी खड़ी हो गयी..
तीर की गति से वो बाहर निकल गया जैसे उसके आने का प्रयोजन सफल हो चुका था..।
उसके घर से निकलने के बाद वो गुड़िया को टोकने के लिए पलटी, लेकिन तब तक वो एक छलांग लगा कर रसोई में पहुँच चुकी थी..
“कौन था रेशू ?” जब तक में सवाल दागती उसकी माँ बाहर आयी, तब तक आने वाला पाहुना जा चुका था..
“गांव के प्रधान जी थे, आज रात खाने पर बुलाया है !”
रेशम ने ना अखंड का नाम लिया और ना उसकी माँ ने ज्यादा कुछ पूछताछ की.. वो दोनों एक बार फिर उसकी तैयारियों में लग गए..
गेंदा के स्वास्थ्य में काफी सुधार हो गया था, अस्पताल से छुट्टी होने के बाद उसे ज़िद करके राजेंद्र अपने साथ अपने घर ले आया था..
गेंदा वहाँ नहीं रहना चाहती थी, लेकिन राजेंद्र कुछ सुनने को तैयार नहीं था.. राजेंद्र के साथ ही भावना भी ज़िद पर अड़ गयी थी..।
गेंदा के दिल का हाल वही जानती थी.. राजेंद्र उसके दिल में पनपती कोमल भावनाओ से अपरिचित था.. उसने हमेशा से ही गेंदा में एक दोस्त कम बहन को ही देखा था, इसलिए उसके मन में गेंदा को साथ रखने को लेकर कोई संकोच ना था..।
गेंदा की अम्मा भी मान गयी, वो पहले ज़रूर राजेंद्र और गेंदा के रिश्ते को अलग नजरिये से देखती थी और चाहती थी कि राजेंद्र से गेंदा का ब्याह हो जाये।
लेकिन जल्दी ही वो इस सच को भी स्वीकार चुकी थी कि सिर्फ एक जात के हो जाने से ही ब्याह नहीं हो जाता..।
ब्याह होने के लिए आपसी सोच समझ का एक जैसा विकसित होना भी बहुत ज़रूरी है.।
और भावना को देखने के बाद उनकी रही सही आस भी जाती रही, लेकिन अब उनका नजरिया राजेंद्र के प्रति बदल गया था..।
अब उन्हें उसमे गेंदा के लिए एक अभिभावक सा नजर आने लगा था.. इसलिए बिना किसी दुविधा द्विविचार के उन्होंने गेंदा को राजेंद्र के पास छोड़ दिया..।
गेंदा को भावना अपने साथ अपने ही कमरे में ले गयी। उसके कमरे का पलंग नया ही था, जो डबल बेड तो ना था, लेकिन दो लड़कियों के सोने के लिए पर्याप्त था..।
खाने के बाद जब भावना ने गेंदा को भी अपने ही बिस्तर पर सोने के लिए बुलाया तो गेंदा संकुचित हो गयी..
वो कैसे भावना के बगल में सो सकती थी..
“हम नीचे ही सो जायेंगे दीदी !”
“क्यों ? नीचे क्यों सो जाओगी ? ऊपर ही सो रहो हमारे साथ.. जगह बहुत है यहाँ !”
“नहीं दीदी.. आपको असुविधा होगी ?”
“कैसी असुविधा ? आओ लेटो यहाँ !”
भावना भी गेंदा का संकोच समझ रही थी.. उसने खींच कर उस किशोरी को पलंग पर बैठा दिया.. और खुद खिड़की के परदे लगा कर पलंग के दूसरे किनारे पर किताब खोल कर बैठ गयी..।
गेंदा अपनी दवा खा कर पलंग पर सकुचाते हुए लेट गयी..लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसो दूर थी !!
वो कुछ सोचते हुए भावना की तरफ देख रही थी..
“क्या देख रही हो गेंदा ?” भावना ने पूछ लिया
“एक ठो बात पूछे ?”
“हाँ पूछो !”
“आप डाक्टर साब के साथ नहीं सोती ?”
जिस वक्त गेंदा ने ये सवाल किया ठीक उसी वक्त राजेंद्र अपने फ़ोन का चार्जर पूछने के लिए कमरे के दरवाज़े पर पहुंचा था..
गेंदा का चेहरा दूसरी तरफ था, वो भावना को देख रही थी, लेकिन भावना का चेहरा दरवाज़े की तरफ ही था.. उसकी नजर दरवाज़े पर आकर रुके राजेंद्र पर पड़ गयी और वो इस बात की कोई कैफियत दे पाती, उसके पहले गेंदा ने अपने सवाल को पूरी गहराई के साथ दुहरा दिया..
“आप दोनों तो पति पत्नी है, फिर साथ क्यों नहीं सोते ?”
उस नासमझ सी लड़की को भावना कुछ समझा पाए उसके पहले ही राजेंद्र से उसकी नजर टकराई और दोनों ही बुरी तरीके से झेंप गए..
राजेंद्र तो तुरंत पलट कर बाहर निकल गया और भावना घडी उठा कर उसमे पहले से लगे अलार्म को वापस सही करने लगी..
गेंदा स्वभाव से ही शांत प्रकृति की लड़की थी… उसे ज्यादा पूछताछ करना वैसे भी पसंद नहीं था, लेकिन जाने कैसे अचानक उसके दिमाग में ये सवाल जाग गया और उसने पूछ लिया था.. उसके लिए ये एक सहज सवाल था, पर भावना और राजेंद्र इस सवाल से कुछ ज्यादा ही असहज हो गए थे..।
अपने कमरे में खिड़की पर खड़ा राजेंद्र किसी गहरे चिंतन में खोया हुआ था..
वो अक्सर अपने साथ काम करने वाले विवाहित जोड़ों की खट्टी मीठी नोकझोंक देखा करता था..
साथ बैठे अमित की पत्नी जब खाने के बीच एक आध निवाला यूँ ही अपने पति के मुहं में डाल दिया करती थी, तो वो भी उन लोगो को देख कर मुस्कुरा उठता था..
छोटी छोटी बातो के बीच जब उन दोनों की तकरार बढ़ कर झगडे का रूप ले लेती थी और दोनों तुनक कर अलग अलग दिशाओँ में आगे बढ़ जाते थे तब अक्सर वो भयत्रस्त हो जाता था, लेकिन अगली सुबह एक दूसरे की बाँहों में बाहें डाले झूमते हुए से दोनों चले आते और उस जैसे कुंवारे को भी समझ आ जाता कि रात को मामला सुलझा लिया गया है..।
दुनिया के सबसे अजीबोगरीब रिश्ते में वो भी एक झटके में बंध तो चुका था, बावजूद इतना समय बीत जाने के बाद भी उसके और भावना के बीच अब भी एक अनदेखी पारदर्शी महीन रेखा खींची हुई थी, जिसे चाह कर भी वो पार नहीं कर पा रहा था..।
भावना भी तो कभी पहल नहीं करती थी.. क्या पता वो सच में उसके साथ रिश्ते में बंध कर खुश भी है या नहीं ?
अपने विचारो में खोये राजेंद्र की पलकें बोझिल सी होने लगी थी.. उसने अपने मोबाइल को समय देखने के लिए उठाया लेकिन मोबाइल बंद हो चुका था..।
उसने मोबाइल टेबल पर रखा और वापस भावना के कमरे में चला गया..
दरवाज़ा उढ़का हुआ था, वैसे तो दो लड़कियाँ अंदर सो रही थी, ऐसे में उसका अंदर जाना सही नहीं था, लेकिन मोबाइल को चार्ज पर लगाना भी बहुत ज़रूरी था..
वो दबे पांव कमरे में दाखिल हो गया.. बिस्तर की तरफ देखे बिना ही वो भावना जिस तरफ लेटी थी, उस तरफ के कॉर्नर टेबल तक पहुँच गया..।
वहाँ से चार्जर निकाल कर वो बिना भावना और गेंदा की तरफ देखे निकलने को था कि भावना के सीने पर रखी किताब धड़ाम की आवाज़ के साथ नीचे गिर गयी..
आवाज़ से चौंक कर उसकी नजर भावना पर पड़ी..
एनाटॉमी की किताब पढ़ते पढ़ते ही शायद वो सो गयी थी..
राजेंद्र ने भावना की तरफ देखा और पल भर को उसे देखता रह गया.. उसने धीरे से नीचे गिरी किताब उठायी और टेबल पर रख दी… पैरो के पास से चादर भी आधी से ज्यादा ज़मीन पर पड़ी हुई थी, उसे उठा कर राजेंद्र ने भावना के ऊपर डाल दी, उसके बालो को हल्के से सहला कर और किनारे लगी बत्ती बुझा कर वो धीमे कदमो से बाहर निकल गया..
कमरे से बाहर निकल कर उसने दरवाज़ा वापस लगा दिया… और चला गया !
गेंदा जाग रही थी, उसने चुपके से राजेंद्र को कमरे में आते और जाते देख लिया..
अपने चेहरे पर बाहें रख कर उसने आंखे मूंदी और सोने की कोशिश करने लगी..
क्रमशः

आखिरकार अखंड के आने का प्रयोजन पूरा हुआ भले गुड़िया की नसमझी से हुआ पर मन को खुशी मिली।
राजेन्द्र और भवाना के बीच की दूरी भी जल्दी खत्म हो जायेगी।
शानदार भाग 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
कुछ हालात ऐसे होते हैं कि हमें चाहे अनचाहे उनका सामना करना ही पड़ता है ,फिर चाहे वो अखण्ड का सामना करना हो या फिर राजेन्द्र और भावना के रिश्ते की एक कमी का यूँ सामने आ जाना ।
रिश्ता,आपसी समझ भले ही कितनी भी परिपक्कव क्यों न हो लेकिन पति पत्नी का रिश्ता अपने सम्पूर्ण रूप में तो अभी नहीं ही स्वीकार कर सकें हैं दोनो।
राजेन्द्र और भावना को करीब लाने में गेंदा सहयोगी ही बनकर आयी है ,कम से कम उसने उन दोनों को उनके रिश्ते की हकीकत से तो रूबरू करवा ही दिया है । सुखद होगा इन दोनों को नजदीक देखना ।
जाने अनजाने ही सही पर गेंदा ने राजेंद्र और भावना को उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण प्रश्न से रूबरू करा दिया की क्या वह कभी अपना रिश्ता आगे बढ़ा पाएंगे कभी वह एक नॉर्मल पति-पत्नी की तरह एक दूसरे के साथ रह पाएंगे जिस साथ और प्यार की जरूरत हर मियां बीवी को होती है क्या वैसा सहज सा रिश्ता कभी उन दोनों के बीच में भी पनपेगा।यह बात अब राजेंद्र के दिमाग में तो उथल-पुथल मचा रही है क्या भावना के दिमाग में भी कभी उठेगी
भावना और राजी की केमेस्ट्री तो मुझे दोनो आंखे खोलकर देखनी है। ऐसे😱🧐 क्योंकि मोहब्बत को मोहब्बत की तरह लिखती हैं आप , मजेदार। गेंदा ने बिल्कुल सही सवाल किया 😁🤣मेरा मन गदगद हुआ। बहुत बेहतरीन भाग
लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️💐💐💐💐
Very nyc part 👌👌
Wah..shayad ab rajendra aur bhawna bhi aage bade
Sometimes situation become so awkward. Like bhavna situation after gendaa’s question.
अखंड का खुश होना और गैंदा का देखना हमरे दिल m kahi डर पैदा कर रहा है
राजेंद्र और भावना कब अपनी भावनाओं को समझेंगे।।। जज़्बात तो दोनो के ही मन में है,लेकिन ना जाने कब वे दोनो इन जज्बातों को स्वर देंगे। जो भी हो,इन दोनो को देख कर अच्छा लगता है।
अखंड आज रेशम को अपने घर पर भोज के लिए निमंत्रण देने आया।। दोनो को साथ देख के अच्छा लगा।।उसके मन में आज भी रेशम है,लेकिन वो अपनी मर्यादा जानता है, और अथर्व और रेशम को साथ में देख कर खुश भी है,लेकिन “दिल है कि मानता नही”।
गेंदा का क्या होगा?
लाजवाब कहानी👌👌👌👌👌👌👌👌👌❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️