
अपराजिता -155
धीरेन्द्र को बुरी तरीके से दर्द महसूस हो रहा था, खुद को बचाने के लिए उसने रेशम को ज़ोर से धक्का देकर गिराया और भागने लगा…
रेशम ने वहीँ पड़े बांस के टुकड़े को उठाया और घुमा कर धीरेन्द्र के पैरों पर निशाना लगा कर ऐसे घुमा कर मारा की धीरेन्द्र पलटी खा कर गिरा..
और फिर जो हुआ वो किसी ने पहले कभी नहीं देखा था….
हमेशा की चुपचाप दबी छुपी सी रहने वाली संकोची सी रेशम में आज मां काली स्वयं प्रकट हो गई थी।
जिसने आज तक एक मच्छर भी नहीं मारा था, आज जाने कहां से अपने से ज्यादा लंबे चौड़े ताकतवर पुरुष को पछाड़ने के पैंतरे सीख गई थी। उसके हाथ में जो पत्थर आ रहा था उसे ही उठाकर वह धीरेंद्र की तरफ फेंक रही थी। और आश्चर्य इस बात का था कि इस अर्जुन के हर निशाने मछली की आंख पर ही लग रहे थे।
पता नहीं कहां से उसे यह भी मालूम चल गया था कि भागते हुए आदमी के पैरों पर पड़ा बांस उसके दोनों पैरों के बीच फंसकर उसे गिरने पर मजबूर कर देता है। वही हुआ।
धीरेंद्र के भी पैरों के बीच बांस अटका और वह मुंह के बल जोर से गिरा। उसके मुंह से फिर एक बहुत भद्दी गाली रेशम के लिए निकल पड़ी। अथर्व रेशम को रोकने के लिए आगे बढ़ रहा था कि अनिर्वान ने अथर्व का हाथ पकड़ लिया।
” जाने दीजिए अथर्व बाबू! आज यह सिर्फ आपको चोट पहुंचाने का बदला नहीं ले रही है। यह अपने बीते हुए उन 5- 6 सालों के एक-एक दिन और एक-एक रात का बदला ले रही है, जो इसने रोते हुए गुजारे हैं।
इसकी जिंदगी के वह हसीन खूबसूरत पल जो धीरेंद्र ने मटिया मेट कर दिए थे, यह उनका बदला लेने जा रही है। आज इसे मत रोकिए।
अगर आज इसे रोक लिया तो यह क्या, कोई भी रेशम कभी अपराजिता नहीं बन पाएगी। और अगर आज इसे जाने दे दिया तो हर एक लड़की अपनी हार को जीत में बदलकर इसी तरह अपराजिता बन जाएगी..।”
“लेकिन एसीपी सर यह आदमी बहुत खतरनाक है, पलट कर उसने रेशम पर वार कर दिया तो…?”
“इस वक्त तुम्हारी रेशम रेशम नहीं, माँ चंडी का अवतार लिए है, उसे कुछ नहीं होगा.. बस देखते जाओ !
और फिर कुछ ऊपर नीचे हुआ तो हम हैं ना ?”
अथर्व के पास अनिर्वान की बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था, लेकिन उसकी नज़रें पूरी तरह से रेशम पर टिकी हुई थी। रेशम ने दूसरा बांस का लंबा सा टुकड़ा उठाया और गिरे हुए धीरेंद्र की तरफ बढ़ने लगी। धीरेंद्र के पास पहुंचकर उसने उस बांस से धीरेंद्र के ऊपर जोर से वार किया। लेकिन धीरेंद्र ने दोनों हाथों से उस लकड़ी के टुकड़े को पकड़ा और उसे ज़ोर से खींच दिया।
रेशम का संतुलन बिगड़ा और वह जमीन पर गिर पड़ी। जमीन पर ढेर सारी रेत और गिट्टी फैली हुई थी। जिसमें से एक गिट्टी का टुकड़ा रेशम के माथे पर चुभ गया।
रेशम ने घूर कर जमीन पर गिरे हुए धीरेंद्र की तरफ देखा।
वही एक तरफ पानी और कीचड़ का मलबा पड़ा हुआ था। उसमें से उसने अपने दोनों हाथों मे ढेर सारा कीचड़ उठाया और धीरेंद्र के चेहरे पर फेंक दिया। धीरेंद्र कुछ समझ पाता उसके पहले ही रेशम ने एक बार फिर ढेर सारा कीचड़ उठाकर उसके चेहरे पर मल दिया।
आंख नाक में कीचड़ भरा पानी भरने से धीरेंद्र कलबला गया। उसने जोर से रेशम को धक्का देना चाहा लेकिन कीचड़ होने के कारण उसकी आंखें बंद थी, और उसे कुछ नजर नहीं आ रहा था। रेशम ने धीरेंद्र के बाल पकड़ लिए और बालों से पड़कर उसे खींचते हुए दूसरी तरफ ले जाने लगी।
जमीन पर पड़ी हुई ईट गिट्टी से पीठ पर होने वाले घर्षण के कारण धीरेंद्र चीख उठा। उसने हाथ पीछे की तरफ बढ़कर रेशम के हाथों को पकड़ना चाहा। लेकिन वह उसका हाथ पकड़ पाता उसके पहले ही रेशम ने अपने पैर को जोर से उसके पेट पर मारा और धीरेंद्र के मुंह से एक चीख निकल गई…
” पागल औरत, तू क्या कर रही है, तुझे होश भी है? अगर मेरे हाथ लग गई ना तो तेरी बोटी बोटी कर दूंगा..!”
” तेरे हाथ जब लगूंगी तब देखना, फिलहाल तो तू मेरे हाथ लगा हुआ है..।”
गुस्से में पागल हुई बैठी रेशम की आवाज भी जैसे बदल गई थी। रेशम ने जोर से धीरेंद्र का सर वही गिरे ईंटों पर पटक दिया। एक ईट का बड़ा सा टुकड़ा उठाकर उसने अपनी एक हथेली से धीरेंद्र का मुंह खोला, धीरेंद्र कुछ समझ पाता उसके पहले उसने ईट के बड़े से टुकड़े को धीरेंद्र के मुंह में ठूंस दिया।
धीरेंद्र अपने दोनों हाथों से खुद को बचाने के लिए जूझ रहा था। वह सामने और अपने आसपास हर तरफ अपने हाथ को हिलाकर सामने वाले को मारने की कोशिश कर रहा था। लेकिन रेशम उसके पीछे खड़ी थी। और इसलिए रेशम तक धीरेंद्र के हाथ नहीं पहुंच पा रहे थे। चेहरे पर मिट्टी सनी होने के कारण धीरेंद्र की आंखें बंद थी। और खुले हुए मुंह में बड़ा सा ईट का टुकड़ा फंसा हुआ था। वहीं पर एक किनारे काम करने वाले मजदूरों का सामान पड़ा हुआ था।
तसला, फावड़ा और भी जाने क्या-क्या। गुस्से में पागल हो रखी रेशम ने फावड़े को उठाया और वह धीरेंद्र की तरफ बढ़ ही रही थी कि बाबूराव अनिर्वान को देखकर चीख पड़ा..
” साहब रोक लीजिए, वरना यह गुस्से में पागल शेरनी आज इसका काम तमाम करके रहेगी..।”
” क्यों बाबूराव इतना घबरा क्यों रहे हो..?”
” साहब लड़की का जीवन खराब हो जाएगा। अगर इसके हाथ से इस पापी का मर्डर हो गया तो यह लड़की भी चौदह साल के लिए जेल चली जाएगी। पूरी जिंदगी खराब हो जाएगी साहब, कुछ कीजिए। अब रोक लीजिए..।”
” यह लड़की ऐसी वैसी लड़की नहीं है बाबूराव, डॉक्टर है। और डॉक्टर को तो कानूनन मर्डर करने की इजाजत होती है।
यह लोग बड़ी आसानी से किसी का भी खून करके बच सकते हैं बाबूराव!”
” वह तो अगर अपने ऑपरेशन थिएटर में इसका मर्डर करती तो नहीं पकड़ी जाती।
लेकिन यहां हम कानून के रखवालो के सामने यह मर्डर करेगी तो हम कैसे बचा पाएंगे इसे, बताइए ना..।”
“तो तुम इसके खिलाफ गवाही दोगे? क्या तुमको लगता है कि इस लड़की के खिलाफ गवाही देनी चाहिए..?”
“माना हुजूर की हम इसके खिलाफ गवाही नहीं देंगे, मान गए कि आप भी गवाही नहीं देंगे, लेकिन बाकी लोग भी तो हैं..।”
“हमारे तुम्हारे अलावा इसका पति है, वह काहे इसके खिलाफ गवाही देगा..लेकिन रुको… ।
हमें इस लड़की को रोकना तो पड़ेगा बाबूराव, अब पूछो क्यों..?”
“हुज़ूर आप जो निर्णय लेते हैं, बहुत दूर की सोच समझ कर लेते हैं। इसलिए कुछ तो अच्छा ही कारण आपने सोचा होगा बता दीजिए।”
“कारण यह है बाबूराव कि जो लड़की सिर्फ एक अंधेरे कमरे में एक नाम को बार-बार सुने जाने से इतना डर गई थी कि उसे पांच छह साल का वक्त लग गया सामान्य होने में, अगर वह सच में अपने गुस्से में पागल होकर इस आदमी का खून कर देगी, तो वह कभी सामान्य जीवन नहीं जी पाएगी।
वह पूरी जिंदगी इस गिल्ट में ही रह जाएगी कि उसने एक आदमी का खून कर दिया। भले ही वह आदमी गुनहगार है, तब भी जानते हो बाबूराव हम इंसानों की एक साइकोलॉजी होती है।
हम अंदर से कितने भी नाराज हो, हम सामने वाले का कितना भी बुरा सोच ले, लेकिन कभी उसके साथ बहुत बुरा नहीं कर पाते और किसी का खून कर देना इसका सबसे ज्यादा अहित करने जैसा है।
किसी एक इंसान को मार डालना इतना आसान नहीं होता। और जो लोग हत्यारे होते हैं या बड़ी आसानी से किसी भी इंसान पर गोली चला देते हैं, चाकू चला देते हैं, ऐसे लोगों को मैं इंसान ही नहीं मानता ।इनके अंदर का शैतान इन पर इतना हावी हो जाता है कि इन्हें खून करने में मजा आने लगता है। लेकिन रेशम उन शैतानों में से नहीं है।
भले ही रेशम के साथ धीरेंद्र ने बहुत गलत किया, उसके सहेली की जान ले ली, उसकी जिंदगी में जहर घोल दिया, बावजूद रेशम कभी भी धीरेंद्र को जान से नहीं मार पाएगी। और अब इस देवी के चंडी रूप को शांत करने का समय आ गया है।”
अनिर्वान ने पलट कर अथर्व की तरफ देखा और उसे आगे बढ़ने का इशारा कर दिया। अथर्व के साथ-साथ अनिर्वान और बाबूराव भी रेशम और धीरेंद्र की तरफ बढ़ गए।
अथर्व ने रेशम के पास पहुंचकर पीछे से उसके कंधे पर धीरे से हाथ रख दिया। रेशम जो की एक बड़ा सा ईट का टुकड़ा उठाकर धीरेंद्र के चेहरे पर उसे मारने ही वाली थी, अथर्व के स्पर्श से पीछे पलट गई। अथर्व ने रेशम की तरफ देखा। रेशम ने अथर्व की आंखों में देखा।
कुछ पलों के लिए रेशम सम्मोहित सी सिर्फ अथर्व को देखती रह गई।
अथर्व ने एक हाथ रेशम की कमर में डालकर उसे अपनी तरफ खींच लिया, और दूसरे हाथ से उसके बालों को सहलाने लगा। रेशम के ठीक पीछे खड़े अनिर्वान ने उसके दोनों हाथों से ईंट का वह बड़ा सा टुकड़ा चुपके से ले लिया..
रेशम कुछ देर तक अथर्व को देखती रही और फिर उसकी आंखे बोझिल सी होकर बंद होने लगी..।
उसका शरीर एकदम से ढीला पड़ गया। सारा तनाव जो उसकी कनपटी पर हथौड़े मार रहा था जैसे एकदम से धुल गया, और वह सुध-बुध खोकर अथर्व की बाहों में गिर पड़ी।
अथर्व ने अपनी दोनों बाहों में उसे समेट कर संभाल लिया। बाबूराव भी उसकी मदद के लिए आ गया। अथर्व धीरे से रेशम को उठाकर वहां से दूसरी तरफ जाने लगा।
अब तक में धीरेंद्र ने अपनी आंखों पर से मिट्टी को साफ कर लिया था। अनिर्वान और बाबूराव दोनों का ध्यान फिलहाल अथर्व पर था, यह देखकर धीरेंद्र धीरे से उठा और भागने को था कि अनिर्वान ने पलट कर उसकी कॉलर पकड़ ली..
“इतना पिटे जाने पर भी अकल नहीं आई तुम्हें..?”
“हुजूर आप कहते हैं ना, ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’ बस वैसे ही कुछ है..।”
“सही कह रहे हो बाबूराव, तो क्या किया जाए?
अपने टॉर्चर करने के तरीकों को खंगालते हैं, और उसमें से एक कोई बेहतरीन नुस्खा आजमा लेते हैं..।”
“कौन सा वाला आजमाएंगे हुज़ूर ? आप तो बेमिसाल है इन सब में.. ।”
“तुम ही बता दो.. तुम्हे कौन सा तरीका सबसे ज्यादा पसंद है.. ।”
“हुज़ूर आपका एक वो तरीका है ना जिसमे आप मुजरिम के गले में लोहे का पट्टा बांधते हैं, जिस पट्टे में एक लंबाई में कटा लोहे का त्रिशूल लगा होता है। त्रिशूल का एक सिरा मुजरिम के गले के पास होता और दूसरा सीने के पास। अगर मुजरिम थोड़ा भी इधर-उधर हिला तो वह त्रिशूल अंदर जाने लगता है और महादेव की कसम मुजरिम को भोलेनाथ की याद दिला जाता है..।”
“हाँ बाबूराव लेकिन उसमे मुजरिम बहुत तड़प तड़प कर मरता है..।मुझे पर्सनली वह तरीका पसंद नहीं है। क्योंकि उसमें कई बार मुजरिम तीन-चार दिन तक जमीन पर घिस घिस कर खिंचता जाता है। किसी किसी केस में तो 6 दिन तक भी वैसे ही तड़पता रहता है, तो कुछ दूसरा बताओ..।”
” हुजूर आपका पसंदीदा काम तो उंगलियों पर चलता है। कभी आप उंगलियां काट के तलवा देते हैं, तो कभी आप सुपारी के जैसे सरोते से कटवा देते हैं। इसमें से भी कोई एक तरीका आजमाया जा सकता है..।”
“बाबूराव उसमें जान कहां जाती है? वह तो सिर्फ यह शैतानी खोपड़ी वाले मुजरिमों को सही करने के लिए रहता है। उसमें जान की हानि नहीं होती है, बाबूराव कुछ और सोचो..।”
“हुज़ूर आप एक वो तरीका भी तो आजमाए थे ना.. ?”
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“कौन सा बाबूराव ?”
“जब एक आतंकवादी पकड़ा गया था, तब याद है आपने उसे बरगद के पेड़ से लग कर लेटा कर बंधा था और एक तरफ से उसके सर को खिंचवा रहे थे, दूसरी तरफ से उसके पैर को.. हुज़ूर गज़ब इलास्टिक बना कर रख दिए थे उसे.. ।”
” हां वह तरीका भी करने का अच्छा है बाबूराव, लेकिन उसमें क्रूरता बहुत ज्यादा है। इतनी जोर से दोनों तरफ से खींचा जाता है कि पेट पर की मांसपेशियां कुछ ज्यादा ही खिच खिच कर फटने लगती हैं और ऐसा लगता है जैसे यह करवाते समय हम अनिर्वान भारद्वाज नहीं हिटलर बन गये है। इसलिए अब सोचा है कि यह वाला तरीका हम बंद करते हैं..।”
“तो स्टेपलर वाला आजमा लीजिये.. !”..
” अबे चुप !! इतनी देर से अनिर्वान और बाबूराव की इन खतरनाक बातों को सुनकर डरते हुए धीरेंद्र ने जोर से चीख कर चुप रहने को कहा और सर पर पैर रखकर वहां से भाग खड़ा हुआ।
वह बेवकूफ यह नहीं समझ पाया कि यह सारी बातें सिर्फ उसे डराने के लिए कहीं जा रही थी। ना तो अनिर्वान ने इनमें से कोई पैंतरा आज तक किसी मुजरिम पर आजमाया था, और ना बाबूराव ने देखा था। यहां तक की उंगलियां तल कर खाने वाली बात भी सिर्फ मुजरिमों को डराने के लिए ही की जाती थी…।
लेकिन बेवकूफ धीरेंद्र के दिमाग में यह बात नहीं आई कि यह सब सिर्फ उसे डराने के लिए कहा जा रहा है। अगर वह ध्यान से इन बातों के बारे में सोचता तो वह खुद समझ जाता कि प्रायोगिक तौर पर यह सब करना असंभव ही था।
इतना सब सोचने समझने और सही निर्णय लेने का दिमाग अगर धीरेंद्र के पास होता तो शायद वह इतने गुनाह करता ही नहीं। तेज आवाज में चीखने के बाद धीरेंद्र को खुद होश आया कि उसके पास बचने का एक ही उपाय है यहां से भाग जाना। और वह सर पर पैर रखकर उस उजडी हुई इमारत से निकलकर मुख्य मार्ग की तरफ दौड़ पड़ा।
उसे भागते देख बाबूराव भी उसके पीछे भागने लगा। अनिर्वान भी उसे पकड़ना तो चाहता था, लेकिन अनिर्वान उतनी तेजी से नहीं भाग रहा था।
अनिर्वान को दूर से आती तेज गति की ट्रक नजर आ गई थी।
धीरेंद्र तेजी से भाग कर में रोड पर पहुंचा ही था कि सामने से आती ट्रक में बैठे ट्रक चालक के पुरजोर कोशिश करने के बाद भी ब्रेक नहीं लग पाया, और धीरेंद्र के ऊपर से उसकी ट्रक निकल गई।
ड्राइवर घबरा गया। वह अगर रुकता तो आसपास के गांव वाले उसे जिंदा नहीं छोड़ते, और इसीलिए वह ड्राइवर भी भाग खड़ा हुआ।
अनिर्वान और बाबूराव के पहुंचने तक लहू लुहान धीरेंद्र का शरीर रोड पर पड़ा हुआ था।
” अरे यह क्या हो गया साहब?”
” भगवान ने खुद इसे इसके किए की सजा दे दी बाबूराव। मैं कोर्ट की सजा से संतुष्ट तो नहीं था, लेकिन यह भी सच है कि मैं कानून को हाथ में लेकर फर्जी एनकाउंटर भी नहीं करना चाहता था। कानून का आदमी हूं और सजा भी कानून के अंदर ही रहकर देना चाहता हूं। यह नहीं की भावनाओं में बह कर मैं किसी को जिंदा जला दूं या किसी की आंखों में सरिया घुसा दूं, किसी के शरीर के टुकड़े टुकड़े करके कुत्तों को खिला दूं।
इतना क्रूर मैं भी नहीं हूं बाबूराव। आखिर हूं तो मैं भी इंसान ही।
महाकाल का भक्त हूं, इसीलिए औघड़ बंजारा हूँ, लेकिन ऐसा क्रूर भी नहीं कि सामने वाले की जान ले लूँ..।
ईश्वर ने खुद अपने हाथ से इसे सजा दिलवाई है.. ।”
“हुज़ूर अब उस ट्रक वाले का क्या किया जाए..?”
“क्या किया जाए, जिस ट्रक का ना तो नंबर पता है ना रंग रूप , उस अनजान और अनदेखे ट्रक के खिलाफ चार्ज शीट तैयार कर लो। पंचनामा बना लो बाबूराव, कि रेशम को लेकर भागता हुआ धीरेंद्र यहां पहुंचा और यहां पहुंच कर वह गाड़ी बदलकर आगे जाने वाला था कि रेशम से उसकी झड़प हुई।
उसने हम सब की तरफ गन तान रखी थी इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते थे। रेशम से हुई झड़प के बीच दोनों को चोटे लगी और बचने के लिए वह भागने लगा और भागते हुए ट्रक के नीचे आ गया..।
उसे स्पॉट पर मृत पाया गया…..शांति शांति शांति !!”
क्रमशः

अंत भला तो सब भला आखिरकार मुजरिम को उसके पापों की सजा मिल ही गई इंसान ने ना सही, ईश्वर ने सही फैसला कर दिया।
आज सही मायने में अपराजिता जीत गई अपना बदला भी ले लिया और खुद को न्याय भी दिलाया।👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
अनिर्वाण ने रेशम के हाथों एक पापी को मरने से बचा कर रेशम पर ही उपकार किया वरना धीरेंद्र के मौत को जिंदगी भर भूल नही पाती रेशम।
धीरेंद्र और मान्या दोनों को सजा मिल गई 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻 शानदार भाग।
आखिरकार पाप का घड़ा भर ही गया और ईश्वर के दरवार में देर है अंधेर नहीं वाली कहावत सत्य साबित हो गई।
लोहम्मर्षक भाग रहा आज का यूँ लगा मानो रेशम के रूप में साक्षात काली चंडी का रूप रखकर आ गयी हों पापी का समूल सर्वनाश करने ।
एक पल वह बेहद रोमांचित कर गया जब अथर्व ने रेशम को शांत करने उसके कंधे पर हाथ रखा हो । स्मृति हो आयी उस भगवन कथा की जिसमे काली जी का क्रोध शांत करने शिव जी उनके चरणों मे लेट जाते हैं। बहुत उम्दा कलम चली है आपकी।
अनिर्वाण को भी कुछ गलत करने से बचाते हुए ईश्वरीय न्याय का भुगतान करना पड़ा धीरेंद्र शास्त्री को।
आज रेशम वाकई एक अपराजिता बनकर उभरी है ।
Wah kamal ho gya Dhirendra ka panchnama
रेशम के दिल मे इतने सालों से जो आग दबी थी वो आज ज्वालामुखी बनकर फ़टी है और धीरेन्द्र का भस्म होना तो लाज़िमी था, बहुत अच्छा सबक सिखाया धीरेन्द्र को और कुदरत ने भी साथ दिया और धीरेन्द्र प्रजापति का खेल खत्म..।
अनिर्वान के डायलॉग बहुत मस्त थे 👌🏻😄😄मज़ा ही आ गया पढ़कर, कहाँ से ढूंढ़कर लाती हो आप ये खजाने हमारे लिए 😊आपके दिमाग़, आपकी जादू की कमल को बारम्बार प्रणाम 🙏🏻। बेहद खूबसूरत, लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻।
👍👍👍👍👍👏👏👏👏👏
Aaj resham sach main chandi roop liye hue hain..aur anir babu aapko sau topon ki salaami
Behtareen part 💕💕💕
कहते हैं औरत अबला होती है लाचारी होती है कमजोर होती है पर जब वही लाचारी और कमजोरी छोड़कर वह अपना गुस्सा सबसे ऊपर रखती है तो फिर अच्छे से अच्छा बलशाली आदमी भी पछाड़ सकती है धीरेंद्र का घड़ा वैसे भी भर चुका था सही हुआ कि रेशम ने अपने मन का गुबार भी निकाल लिया और सही टाइम पर उसे रोक कर भारद्वाज जी ने उसे कत्ल करने से भी बचा लिया क्योंकि भले ही कत्ल उसे नीच इंसान का होता पर उसका इल्जाम तो रेशम को जीवन भर अपने सर पर ढोना पड़ता।
Finally ek papi ka ant ho gaya. Ab age dekhna h akhand kya karega.
Finally the end …end थोड़ा filmy था लगा wo encounter करेगा….अब age….what about akhand
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰
लाजवाब डॉक्टर साहिबा आपकी कलम ने तो हमें इतना बांध दिया है कि आपके इस जादू से निकलने का मन ही नहीं करता, लगता है कहानी चलती ही रहे l