
अपराजिता -152
अलग-अलग धाराओं के तहत लगे आरोपों पर जज साहब ने उसे सजा सुना दी, उसके साथ-साथ उसकी छोटी बहन मान्या और दीपक पर भी केस हुआ और उन्हें भी अलग-अलग आरोपों के अंतर्गत दोषी करार मानकर सजा दे दी गई….!
कोर्ट ने धीरेन्द्र को मानव हत्या के षड्यंत्र में शामिल पाया था और इसलिए उसे दस वर्ष का कारावास दिया गया था.. इसी के साथ मान्या और दीपक को भी ऐसी ही सजा सुनाई गयी थी..।
मान्या ने भले ही सामने लल्लन की हत्या करवाने का इल्जाम खुद पर ले लिया था, लेकिन उसके ख़िलाफ़ कोई सबूत स्पष्ट रूप से नहीं मिल पाया था..।
ऐसे ही धीरेन्द्र के ऊपर भी हत्या करने नहीं, करवाने के षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप सिद्ध हुआ था..।
किसी भी चश्मदीद ने धीरेन्द्र को पंकज का क़त्ल करते स्वयं नहीं देखा था, और इसी बात का फायदा धीरेन्द्र को मिल गया..
अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज में चेहरा गमछे से बांधे युवक की धुंधली सी आकृति तो दिखी, लेकिन स्पष्ट नहीं हुआ कि वो धीरेन्द्र ही है !
रेशम के साथ उन दोनों भाई बहन ने जो किया था, इसके बदले उन दोनों को ही रेशम को एक लाख रूपये का मुआवजा देना पड़ा था, सिर्फ..
क्या एक लड़की के मानसिक शोषण के बदले ये सजा पर्याप्त थी ?.
कतई नहीं, लेकिन अदालत ने यही और इतनी ही सजा मुकर्रर की, क्यूंकि रेशम के साथ किसी भी तरह का शारीरिक दुर्व्यवहार नहीं किया गया था !!
अखंड का नाम निर्दोष होते हुए भी इस सब में घसीटने का आरोप सिद्ध होने पर उन दोनों को अखंड को पचास हज़ार रूपये का मुआवजा और एक माफीनाम लिख कर देने की सजा सुनाई गयी थी…!
कानून की प्रक्रिया जटिल होती है…!!
और उससे भी जटिल होती हैं कानून के द्वारा किसी अपराध पर दी गयी सजा..
अपराध किसी भी श्रेणी का हो, उस पर दी जाने वाली सजा को भी मानवीयता के आधार पर तय किया जाता है। और इसलिए बहुत बार कानून की इस लचीली प्रक्रिया के कारण अपराधी अपने अपराध के मुताबिक सजा नहीं पा पाता है। और इसी के कारण पीड़ित को वो संतुष्टि नहीं मिल पाती, जो सजा मिलने पर मिलनी चाहिए..।
इसलिए शायद कोर्ट द्वारा दी गयी सजा से वहां मौजूद लोग खुश नहीं थे..
ना ही रेशम के चेहरे पर सुकून था, ना अखंड के चेहरे पर.. सभी हताश थे..
इस सब में सबसे ज्यादा दुखी और हताश था अनिर्वान भारद्वाज !!
लेकिन अनिर्वान कानून का आदमी था, उसके हाथ बंधे थे और इसलिए कानून ने जो सजा धीरेन्द्र,दीपक मान्या जैसो के लिए तय की थी, उसे मानने के अलावा उसके पास चारा ना था।
कोर्ट के आदेश की अवमानना नहीं की जा सकती थी.. वहाँ मौजूद सभी लोग ने कोर्ट के आदेश को सर माथे रखा और तीनो ही लोगो को साथ लेकर पुलिस बाहर निकल गयी…
तीनो के हाथों को बांध कर उन्हेँ कोर्ट परिसर से बाहर ले जाया जाने लगा..।
मान्या एक बड़े घर की लड़की थी और इस बात का उसे गरूर भी था..।
वो एक नंबर की ज़िद्दी सनकी और तुनकमिजाज लड़की थी..। और इन सब के साथ गज़ब की स्वार्थी और लालची भी थी..।
दीपक के साथ इतने समय से रहते हुए भी उसका ध्यान इसी बात पर केंद्रित था कि एक न एक दिन वो धीरेन्द्र की छाती पर सवार होकर अपना हिस्सा उससे वसूल ही लेगी..।
दीपक का साथ उसे अच्छा लगने लगा था, ये दोनों ही लोग एक जैसे थे, स्वार्थी और दूसरों से द्वेष रखने वाले इसलिए दोनों की जमने भी लगी थी..।
दोनों ही एक प्रकार के विचार रखते थे कि कैसे सामने वाले का नुकसान किया जा सके।
दीपक फिर भी धैर्यवान था लेकिन मान्या में धैर्य नाम की चीज़ नहीं थी..।
उसे ये सब अपना अपमान लग रहा था… जेल की ज़िंदगी की कठिनाइयां सोचने से अधिक कठिन उसे अपनी लाचारगी लग रही थी..।
जब तक वो अपने घर में थी पुरे ठाठ बाठ से रही…। दीपक ने भी कोई कमी नहीं रखी थी,और अब उसका नाम, उसका मान सब कुछ मिट्टी में मिल चुका था..।
अगर किसी तरह यहाँ से छूट जाती तो अलग बात थी लेकिन अब इस बात की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी..।
हाँ उसका वकील उसके कान में गुनगुनाता चल रहा था कि इससे अपर न्यायालय में अर्जी लगायी जा सकती है..।
लेकिन वो समझ चुकी थी कि पुलिस और बाकी महकमा भले ही एक बार उनके पैसो और रुतबे के कारण उन पर रियायत बरत दे, लेकिन अनिर्वान उन्हें चैन से जीने नहीं देगा..
अनिर्वान की आंखे जैसे धीरेन्द्र और उन सब को घूर रही थी, वो समझ चुकी थी, कि इस पुलिस वाले से बचना उनके लिए मुश्किल ही होगा..
चलते चलते मान्या का ध्यान अपने आसपास हर तरफ था..
उसने अचानक अपने साथ चल रहे पुलिस वाले को ज़ोर से धक्का दिया और तेज़ी से भाग खड़ी हुई..
जब तक बाकी के पुलिस वाले उसके कारनामे को समझ कर उसके पीछे भागते वो तेज़ी से आगे बढ़ कर सीढ़ियां चढ़ गयी..
न्यायालय परिसर लगभग चार मंजिला इमारत थी.. वो तेज़ी से सामने पडते लोगों को अपने दोनों हाथों से धक्का देते हुए तेजी से ऊपर की तरफ दौड़ती जा रही थी। उसके पीछे पुलिस वाले भी भाग रहे थे। पुलिस वालों को उसके पीछे भागते देखकर अनिर्वान चौकन्ना हो गया था। उसका ध्यान दीपक और धीरेंद्र पर ही था। लेकिन उस समय धीरेंद्र ने बाकियों की नजर बचाकर अपने बंधे हुए हाथों से अनिर्वान की पेंट पर से झांकती गन खींचकर निकाल ली, और एक किनारे से बाहर की तरफ निकलती रेशम को पकड़ कर उस पर गन तान दी।
रेशम पर गन ताने-ताने उसने तेजी से उसे अपने हाथों की रस्सियाँ खोलने को कहा।
धीरेंद्र इतना हड़बड़ाया हुआ था कि वह बार-बार गन चारों तरफ लहरा रहा था, और इसके साथ ही उसने रेशम को भी पकड़ रखा था।
रेशम घबरा गई थी उसने अनिर्वान की तरफ देखा, अनिर्वान ने उसे आंखों से इशारा कर दिया कि धीरेंद्र जो कह रहा चुपचाप मान जाओ।
रेशम घबराई हुई सी अपने आसपास देखने लगी। अथर्व आगे बढ़ाने को था कि अनिर्वान ने उसे रोक लिया।
“अथर्व ऐसा कोई भी काम मत करना कि धीरेंद्र से गोली चल जाए। इस वक्त धीरेंद्र के सर पर जुनून सवार है। वह खुद को बचाने के लिए कुछ भी कर सकता है। और सबसे बड़ी संभावना यही है कि वह रेशम को गोली मार देगा। इसलिए उससे दूर रहो।”
धीरेंद्र कुछ बोल पाता, उसके पहले अनिर्वान बोलने लगा। आसपास मौजूद लोग आश्चर्य से उन लोगो को देख रहे थे कि आखिर ऐसा क्या हुआ है?
रेशम ने अनिर्वान की बात मानते हुए धीरे से धीरेंद्र के दोनों हाथ खोल दिए।
धीरेन्द्र ने एक हाथ से बड़े आराम से गन पकड़ी और दूसरे हाथ से उसने रेशम को अपने कब्जे में ले लिया।
“अगर किसी ने भी हमें रोकने की कोशिश की तो हम इस लड़की को भून देंगे। हमें यहां से निकलने दो, बस हमें और कुछ नहीं चाहिए।”
लेकिन यहां से निकल कर जाओगे कहाँ? तुम्हें कहीं से भी पुलिस पकड़ कर ले आएगी। यह मत सोचो कि यहां अब कम पुलिस मौजूद है, और आधे लोग छत पर तुम्हारी बहन को पकड़ने चले गए है, तो तुम्हें कोई रोक नहीं सकता।”
” वह हम देख लेंगे कि हमें क्या करना है ? लेकिन फिलहाल हमें यहां से निकलने दीजिए ।
हम सच कहते हैं हम इस लड़की को गोली मार देंगे।”
” यहां से पैदल कैसे भाग पाओगे धीरेन्द्र बाबू? तुम्हें क्या लगता है कि यहां पुलिस वाले गाड़ियों में चाबी लगाकर घूमते हैं। जो तुम्हें कोई भी गाड़ी खड़ी मिल जाएगी भागने के लिए।”अनिर्वान बोल पड़ा
” हम जानते हैं हमें कोई गाड़ी खाली नहीं मिलेगी, और गाड़ी में भागने से बढ़कर बेवकूफी दूसरी नहीं है। क्या हम नहीं जानते कि तुम दूसरी गाड़ी से पीछा करके हमे पकड़ लोगे।”
धीरेन्द्र ने इधर उधर देखा और एक बुज़ुर्ग से पुलिस वाले को अपने पास बुलाने लगा
“ए, अरे तुम.. यहाँ, आओ !”
“हम… काहे ? क्या हुआ ?” उस पुलिसिये ने सवाल कर दिया..
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” चुपचाप यहां आओ, अपनी गाड़ी निकालो और हमें साथ लेकर चलो..!”
वहां मौजूद हवलदार से धीरेंद्र ने कहा और वह कुछ बोल पाता, उसके पहले अनिर्वान बोल पड़ा
“इसे गाड़ी चलानी नहीं आती!” वो पुलिस गाडी का ड्राइवर था, आश्चर्य से अनिर्वान को देखने लगा..
” तो साले तू चल.. ! फिलहाल यहाँ से निकलना ज़रूरी है.. जल्दी चल!”
अनिर्वान हल्का सा मुस्कुरा कर सामने रखी जीप की तरफ बढ़ा गया..
जाते जाते उसने एक तरह से घोषणा सी कर दी..
“इस आदमी के सर पर इस वक्त खून सवार है, कोई इसका पीछा मत करना, कहीं मुझ पर और रेशम पर गोली ना चला दे.. !”
अनिर्वान ने बड़े आराम से गाड़ी में चाबी लगायी और पिछली सीट पर धीरेन्द्र और रेशम के सवार होते ही वहाँ से निकल गया..
क्रमशः

इस पागल भाई बहनों में वाकई दिमाग की कमी है, वो मरने चली शायद और धीरेंद्र खुद मरने का सामान यानी अनिर्वाण को साथ ले गया, वाह प्रभु आपकी लीला।
कहानी बेहद शानदार जा रही। अपराजिता को अब जीत मिलेगी 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
मान्या ने सही फैसला लिया अब शायद ही वो बच पाएं। काश थोड़ी अक्ल धीरेंद्र में भी आ जाती तो इतना पागलपंती नही करता पर कोई ना। अदालत से जो सजा उसे नही मिली अब मिलेगी। अनिर्वाण को उसने नही, अनिर्वान ने उसे बेवकूफ बनाया है। सही सजा देने के लिए, उचित नयाय करने के लिए।
मजा अब आयेगा।👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
न्याय प्रक्रिया की शिथिलता और अत्यधिक लचीलापन वाकई पीड़ित के मन से न्याय व्यवस्था पर भरोसा उठा देता है ।
अभी चन्द सालों पहले ही तो कितना चर्चित हुआ था वह निर्भयाकांड जिसमें जुवेनाइल एक्ट का फायदा उठाकर ही तो कांड को अंजाम देने वाले सबसे दुर्दांत अपराधी को केवल बाल सुधार गृह में भेज दिया गया था। कितना आक्रोश से भर गए थे सबके मन न्याय व्यवस्था की इन लचर पद्दति से ।लेकिन शायद कानून की प्रक्रिया इतनी सरल नहीं ।
मानवाधिकार नामक एक तन्त्र सक्रिय हो उठता है ऐसे मौकों पर ।
खैर… मान्या ने तो शायद आत्मघाती कदम उठाने की सोचकर ही छत की ओर दौड़ लगा दी है लेकिन धीरेंद्र….ये खूब रही …अपनी मौत को खुद ही दावत दे दी धीरेंद्र ने । ड्राइवर बना के साथ ले भी किसे चला है साक्षात यमराज को ।अब कोई नहीं बचा पायेगा उसे ,अनिर्वाण के हाथ कानून से भी लंबे हैं😊😊
ओहो… 😄😄😄😄😄क्या बात ये तो गजब हो गया मान्या ने खुद के लिए खुद ही मौत चुन ली क्यूंकि पुलिस से बचकर भागना और वो भी छत पर.. बचने का कोई रास्ता नहीं और इसमें तो बस मौत ही बची और दूसरी तरफ धीरेन्द्र के लिए तो ऐसा लग रहा अनिर्वान ने ही चक्रव्यू रचा है और फंस भी गया धीरेन्द्र, क्या बात 👏🏻👏🏻डॉक्टर साहिबा ऐसे ही ना आप हमारे दिलों मे बसी हो 😘क्या खूब गेम बना दी मज़ा ही आ गया 👌🏻👌🏻👌🏻😘😘।
बहुत लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻।
Anirvan aapni style me jawab dega…. ❤🧡💚💚💚💚💚
🤗👍 very good part.Anirwan jaise pahale se janata tha ki kanoon in logo ko koi khas saja nahi dega aur Dhirendra ki fitrat ke chalate wo bhagane ki koshish jarur karega.wohi huaa.ab Anirwan he gadi chalyega phir aage jo hoga wo Anirwan ki marji se hoga 😃😃
यह तो पूरा लग रहा है अनिर्बन का प्लान के तहत चल रहा है वह खुद चाहता है कि सजा तो कोर्ट से कम मिला लेकिन वह खुद अपने हिसाब से सजा दिलवाना चाहता है तभी यह प्लान कर रहा है …मुझे जहां तक लग रहा है यह इसका एनकाउंटर करेगा तो करना भी चाहिए… ऐसे आदमी का एनकाउंटर …. देखते हैं अगले पाठ में क्या होता है ब्यूटीफुल पार्ट डॉक्टर साहीबा
Ab insaaf Hoga👍🏻👍🏻👍🏻🙏🙏🙏🙏🙏
एनकाउंटर डीयर 👌