अपराजिता -150

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अपराजिता -150

“नहीं बेटा ऐसे नहीं कहते, यह तुम्हारे पिता की आखिरी इच्छा थी कि उनके तीनों बच्चों को उनकी मेहनत की कमाई में से कुछ ना कुछ जरूर मिले, और इसलिए इस वसीयत पर तुम्हारा भी हक है !”.

उनकी बात सुन सान्या सोच में पड़ गयी…
लेकिन धीरेन्द्र के दिमाग में शैतानी घूमने लगी…

“आप बिलकुल सही कह रहे हैं चाचाजी, हम तीनो ही आपस में बराबर है, जब सान्या के पास भी पापा का दिया इतना कुछ है तो ये अब हम सब से दूर क्यों रहे..? सान्या चाचा जी सही कह रहे, तुम आज ही जाकर अपना पूरा सामान ले आओ.. अब हम तीनो भाई बहन एक साथ रहेंगे.. !”

“लेकिन धीरू.. हम अपनी ज़िन्दगी में खुश है, और फिर शायद हमारे पति इस बात के लिए न माने.. तब ?”

“कैसे नहीं मानेंगे ? मानना ही पड़ेगा ! सान्या, अब हमारा और मान्या का और कौन है ? सारे रिश्तेदारों को भी तुम अच्छे से जानती हो, किसी को कुछ लेना देना नहीं है हम से !
अब हमारा भी करियर बनाने का वक्त आ चुका है, ऐसे में मान्या का हर वक्त सिर्फ नौकरों के साथ रहना भी तो ठीक नहीं है ! तुम और तुम्हारा परिवार साथ रहेगा तो हम भी निश्चिन्त होकर अपना काम देख सकते हैं ! इतना तो अपने भाई बहनों के लिए कर ही सकती हो ना ?”

धीरेन्द्र ने जैसे भावों के साथ कहा सान्या उसकी बातों पर पिघल गयी..
उसे अब सब कुछ बड़ा अच्छा लग रहा था.. उसके अपने घर में उसकी वापसी होने वाली थी…।
वैसे उसे ज़मीन जायदाद का वाकई लालच नहीं था, लेकिन जैसा कि उसके पिता के दोस्त ने कहा उसके पिता मरने से पहले उसे माफ़ कर के गए थे.. और अब उसका भाई भी चाहता है कि वो साथ आ जाये..।
मन ही मन सान्या की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था..
वो एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी, वहीँ उसके बच्चे पढ़ते भी थे..।
पति भी प्राइवेट कम्पनी में नौकरी कर रहा था.. घर अच्छे से चल रहा था लेकिन किसी की नौकरी, नौकरी ही होती है, समय पर जाना, रात दिन मेहनत करना और छुट्टी के नाम पर ठेंगा..
कुछ भी हो अपना काम अपना ही होता है….।
पापा का ऑफिस उसे मिल जाना भी बहुत बड़ा सहारा था..
उसका कॉलेज के समय से ही अपना बुटीक खोलने का सपना था, जो अब वो पूरा कर सकती थी..
वो अपनी सोच में ग़ुम थी कि धीरेन्द्र ने पास आकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया..

“चलो दीदा खाना खा लो !”

उसकी आंखे भर आयी.. वो सभी एक साथ खाने की टेबल पर बैठ गए… वाकई धीरेन्द्र के कहने पर मान्या ने सब कुछ उसी की पसंद का बनवाया था…
खाना देख कर वो और भावुक हो गयी..
तीनो भाई बहन साथ बैठ कर खाने लगे, एक बार फिर बचपन की बातें चल पड़ी और एक एक कर किस्सों की पोटली खुलने लगी..
ऐसा लगा जैसे सबके मन से कड़वाहट धुल पुंछ गयी..
खाना खाने के बाद उनके पिता के दोस्त वकील अंकल वसीयत के कागजात सान्या के हाथ में रख कर उन सब से विदा लेकर अपने घर चले गए..
और सान्या को जोर देकर के धीरेन्द्र ने घर पर रुकवा लिया !

सान्या बड़े दिनों बाद अपने कमरे में दाखिल हुई और हर एक सामान को देख उसकी आंखे भीग गयी…
उसने कमरे में बैठ कर अपनी स्मृतियों को सोच कर आंखे मूँद ली..
उसके बच्चे भी खुश थे..।
दोनों को अपने पलंग पर थपकी देकर सुलाने के बाद वह अपना फोन लेकर खिड़की पर खड़ी हो गई। बड़े प्यार से उसने अपने पति को फोन लगा दिया। सारी बातें सुनने के बाद एकबारगी सान्या के पति को धीरेंद्र और मान्य की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन सान्या के बार-बार कहने पर वह भी खुश हो गया।

सान्या के मनाने पर वह भी वहां आकर रहने को तैयार हो गया..
सान्या का अब इस घर को छोड़कर जाने का मन ही नहीं कर रहा था। उसने अपने पति से कहा भी कि तुम सारा सामान लेकर आ जाओ, लेकिन अकेले पूरी गृहस्थी को समेट लेना इतना भी आसान नहीं था। इसलिए उसने सान्या को ही वापस आने को कह दिया। सान्या भी इस बात के लिए मान गई। आंखों में ढेर सारे सपने लिए वह भी अपने बच्चों के पास जाकर एक मीठी सी नींद सो गई…

अगली सुबह सारे लोग एक साथ नाश्ते की टेबल पर बैठे नाश्ता कर रहे थे कि सबको चौंकाते हुए सान्या का पति सबर वहां चला आया..

सान्या उसे देखते ही चौंक गयी..
सबर ने आगे बढ़ कर उसे और अपने बच्चो को गले लगा लिया..
सान्या के इस सवाल पर की “आप अचानक यहाँ कैसे ? ” पर उसने धीरेंद्र की तरफ इशारा कर दिया।

धीरेंद्र मुस्कुरा कर कंधे उचका कर खड़ा हो गया।

” हम चाहते थे कि हम सब एक साथ रहना शुरू करने से पहले एक परिवार की तरह मिल जुल ले। और सारी बातें आपस में तय कर ले।
जिससे किसी को भी आगे साथ रहने में समस्या ना हो। वैसे भी जहां चार बर्तन रहते हैं वहां खटकते जरूर है। आज तक हम और हमारी छोटी बहन मान्या ही एक साथ रहते आए थे, लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि हमारे भी आपस में वैचारिक मतभेद हो जाते हैं। फिर यहां तो दो अलग-अलग परिवारों को एक साथ रहना है। बस यही सोचकर हमने सबर जी को बुला लिया था। जिससे हम सब लोग कुछ दिन एक साथ रहे।”

सान्या इस बात पर बहुत खुश हुई। मान्या भी एक तरफ चुपचाप बैठी थी, और मुस्कुरा रही थी। लेकिन उसके दिमाग में यही बात चल रही थी कि अचानक धीरेंद्र में इतना बदलाव कैसे आ गया…।

उसकी समझ से बाहर था कि एक-एक पैसा दांत से पकड़ कर रखने वाला धीरेंद्र अचानक सान्या को उसका हिस्सा देने के लिए कैसे तैयार हो गया?

लेकिन इस वक्त उसने कुछ भी कहना और पूछना सही नहीं समझा। सबर के वहां आ जाने से सान्या और बच्चे और भी ज्यादा खुश हो गए। धीरेंद्र ने सभी के एक साथ घूमने जाने के लिए टिकट निकाल लिया।
  वह वैसे भी अखंड के केस के बाद कुछ दिनों के लिए शहर से कहीं गायब हो जाना चाहता था, और इसीलिए वह पूरे परिवार के साथ घूमने के लिए लक्षद्वीप चला गया..

कोर्ट में अखंड के केस के समय पूछताछ के दौरान यही मालूम चला कि धीरेंद्र पहले से तय किन्हीं छुट्टियों के लिए अपने परिवार के साथ बाहर गया हुआ है। इसके साथ ही धीरेंद्र की भलमनसाहत का किस्सा भी अखंड के केस में जोड़ दिया गया कि कैसे उसने अपनी उस बहन को अपना लिया जिसे उसके पिता ने परिवार से बेदखल कर दिया था।

कहीं ना कहीं इन बातों ने धीरेंद्र के लिए एक कोमल भावना लोगों के मन में जगा दी। शायद धीरेंद्र यही चाहता था। हफ्ते भर की छुट्टियों के बाद वह लोग वापस लौटने वाले थे…।
दो बड़ी गाड़ियों में उन लोगों का सामान लोड कर दिया गया…
सान्या सबर और उनके दोनों बच्चे एक गाड़ी में बैठ गए थे। मान्या धीरेंद्र के साथ बैठने वाली थी कि धीरेंद्र ने मान्या को भी सान्या वाली गाड़ी में बैठा दिया, और खुद उन लोगों के पास चला आया।

” हमें विधायक जी ने तुरंत बुलवाया है। कुछ चुनाव से संबंधित बहुत जरूरी काम है। इसलिए हम यहां से सीधे विधायक जी के घर जाएंगे। आप लोग सब घर पहुंचे, हम वही आप सब से मिलते हैं…।”

इस बात पर किसी को भी क्या आपत्ति हो सकती थी? मान्या भी धीरेंद्र को एक नजर देखने के बाद सान्या के साथ उसकी गाड़ी में बैठ गई। इतने दिनों की छुट्टियों के बाद अब दोनों बहनों के भी संबंध में पहले से सुधार आ चुका था  सान्या लोगों की गाड़ी उनके घर की तरफ निकली, और धीरेंद्र की गाड़ी विधायक जी के घर की तरफ मुड़ गई..

सान्या लोगों वाली गाड़ी भी तेजी से आगे बढ़ने लगी। रास्ता बेहद खतरनाक मोड़ों से होकर गुजरता था। एक तरफ खाई थी और दूसरी तरफ पहाड़…. ड्राइवर भी कोई नया था। यह घर का पुराना ड्राइवर नहीं था..।
मान्या ने उसे देखा और पूछ लिया..

“तुम कौन हो ? संतोष कहाँ है ?” अपने ड्राइवर को मान्या अच्छे से पहचानती थी..

“हमें संतोष ने ही भेजा है, आज उसकी तबियत सही नहीं थी !”..

“क्या नाम है तुम्हारा ?”

“नवीन !”

“ठीक है, थोड़ा धीरे चलाओ… घाटी बहुत गहरी है और रात का समय है, यहाँ इस रास्ते में अंधे मोड हैं !”

“हम्म… !”

एक रुखा सा हम्म पटक कर वो वापस उतनी ही तेज़ी से चलाने लगा..
सामने ड्राइवर के बाजु वाली सीट पर सबर बैठा था, पीछे दोनों बहने थी,और सबसे पीछे दोनों बच्चे !”

गाडी बहुत तेज़ी से भाग रही थी कि एक मोड पर सामने से आती लारी से बचने के लिए ड्राइवर ने झटके से गाड़ी को मोड़ा और गाडी हज़ारो फ़ीट गहरी खायी में पलट गयी….

गाड़ी भयानक दुर्घटनाग्रस्त हो गयी….

आसपास मौजूद जिन लोगो ने भी ये मंजर देखा उनकी सांसे थम सी गयी..
गाड़ी पलटते ही ड्राइवर अपनी तरफ का दरवाज़ा खोल कर कूद गया और जैसे तैसे उसकी जान बच गयी, उसी ने धीरेन्द्र को फ़ोन कर दिया..
धीरेन्द्र तुरंत ही घटना स्थल पर पहुँच गया..

पुलिस की टीम भी वहाँ पहुँच गयी.. खोजबीन शुरू हो गयी… थोड़ी खोजबीन के बाद काफी गहराई पर पलटी हुई गाडी मिल गयी… गाडी के बाहर ही सान्या और सबर की लाशें भी मिल गयी, लेकिन मान्या की लाश बरामद नहीं हो पायी…
सब के साथ साथ धीरेन्द्र ने भी यही मान लिया कि खाई के नीचे बहती नदी में मान्या की लाश बह कर कहीं दूर निकल गयी..

लेकिन इस इतने बड़े हादसे में एक दैवीय चमत्कार हुआ और गाडी की सबसे पीछे की सीट पर बैठे दोनों बच्चो को मामूली खरोंच के अलावा कुछ नहीं हुआ…।
दोनों बच्चो को ज़िंदा देख कर धीरेन्द्र के चेहरे कर रंग बदल गया…।
उस वक्त तो दुनिया के सामने दिखावा करने के लिए धीरेंद्र उन दोनों बच्चों को अपने साथ अपने घर उठा लाया, लेकिन महीना भर बीतते बीतते उसने बच्चों को अनाथ आश्रम में डाल दिया। उसने वहां यह जरूर लिखा पढी कर दी कि बच्चों का महीने का खर्चा वह अपनी जेब से देगा, लेकिन उसके घर पर बच्चों की परवरिश के लिए कोई औरत नहीं होने से उसे बच्चों को अनाथ आश्रम में रखना पड़ेगा।

इन सारे प्रकरण में विधायक जी का हाथ धीरेंद्र के सिर पर मौजूद था। इस कठिन समय में विधायक जी ने धीरेंद्र को पल भर के लिए भी नहीं छोड़ा, और विधायक जी के साथ-साथ उनकी बेटी गीता भी इस सारे क्रियाकलाप के समय मौजूद थी। उसने इन दोनों बच्चों को बड़े करीब से देखा था और उसे इन बिन मां बाप के बच्चों पर बहुत तरस आ रहा था। उन्हें अनाथ आश्रम में डालने से पहले गीता ने अपनी तरफ से धीरेंद्र के सामने यह पेशकश भी रखी की वह बच्चों को अपने पास रखना चाहती है, लेकिन धीरेंद्र ने उस वक्त साफ मना कर दिया..।

हुजूर यहां तक की बातें हमें काफी सारी खोजबीन करने के बाद मालूम चली। यह सारी बातें पूरी तरह सच है। लेकिन अगर धीरेंद्र सामने कटघरे में आकर कबूल कर ले तो सच्चाई आपके सामने आ जाएगी। इसके अलावा मान्य के साथ क्या हुआ, कैसे हुआ, यह भी मान्या खुद बताएगी.. ।”

अनिर्वान ने अपनी बात पूरी की और कोर्ट में मौजूद सारे ही लोग आश्चर्यचकित रह गए। किसी ने नहीं सोचा था कि धीरेंद्र इतना बड़ा षड्यंत्रकारी हो सकता है? धीरेंद्र को तुरंत कटघरे में बुला लिया गया। उसके ऊपर लगे सारे आरोप लगभग सिद्ध हो चुके थे। अनिर्वान ने एक-एक कर इन आरोपों को साबित करने के लिए सबूत भी पेश करवा दिए थे ।

धीरेंद्र के घर काम करने वाले नौकरों से लेकर उसके पिता के वह दोस्त वकील साहब भी वहां जाकर इन बातों की पुष्टि कर चुके थे।

इसके अलावा सान्या और मान्या को एक साथ जिस गाड़ी में धीरेंद्र ने आखिरी बार भेजा था, उस गाड़ी के ड्राइवर को भी अनिर्वान जाने किस पाताल लोक से ढूंढ  लाया था।

उस ड्राइवर ने भी इस बात को कबूल कर लिया गया कि उसे जानबूझकर गाड़ी का एक्सीडेंट करने के लिए धीरेंद्र ने पैसे दिए थे। और उसे साफ तौर पर कहा था कि एक्सीडेंट इस तरह होना चाहिए कि गाड़ी में कोई भी जिंदा ना बचे। और इसीलिए एक तीखे मोड़ पर लाकर ड्राइवर ने जानबूझकर गाड़ी को खाई में गिराया था। गाड़ी पलटे उसके ठीक पहले वह दरवाजा खोलकर कूद गया था। उसे कुछ चोटे जरूर आई थी, लेकिन उसकी जान बच गई थी।

इस एक्सीडेंट के बाद धीरेंद्र से ढेर सारा पैसा लेकर वह किसी दूर शहर में रहने चला गया था। धीरेंद्र के पास अब इन बातों को कबूल करने के अलावा और कोई सहारा नहीं बचा था। सारे सबूत उसके खिलाफ थे, सारे गवाह उसके खिलाफ थे। लेकिन अभी वह आश्चर्यचकित था कि मान्या आज तक जिंदा कैसे थी?
और अगर वह जिंदा थी तो आज तक छुपी हुई क्यों थी? इस बात को जानने के लिए उसकी भी नजरे अब मान्या की तरफ थी।

मान्या को कटघरे में बुलाया गया। मान्या ने एक नजर घूर कर अपने भाई धीरेंद्र को देखा और सच बोलने की शपथ लेकर उसने अपनी कहानी सुनानी शुरू की। उसकी कहानी लगभग वैसे ही थी, जैसी कहानी अनिर्वान ने कह सुनाई थी..

वो भी वही सब बताने लगी..

“जज साहब.. जो कुछ भी इन्होने कहा वो सब सच है.. हम उनकी हर एक बात मानते हैं। हमारे अंदर लालच था, यह हम नहीं कहेंगे। वह हमारा हक था जो हमें चाहिए था। हम सान्या और उसके पति सबर को क्यों कुछ भी देते, जब उन्होंने पापा की उस वसीयत को बढ़ाने में कोई योगदान नहीं दिया। तो सिर्फ पापा की बेटी होने के कारण क्या हम सान्या को अपने हिस्से में से आधा हिस्सा दे देते। जबकि पापा के बिजनेस में हम और धीरेंद्र भाई दोनों साथ ही जुड़े थे। हमें बस यह लगता था कि हमें अपनी मेहनत का पूरा हिस्सा मिलना चाहिए। हां हमें एक अच्छी जिंदगी जीने का शौक था, हमें पैसों की जरूरत थी। क्योंकि हम कुछ ज्यादा ही खुले हाथ वाले थे…।

धीरेंद्र और सान्या दोनों ही हमारे भाई बहन थे, लेकिन सान्या ने अपनी मर्जी की शादी करके पहले ही अपने आप को जायदाद से अलग कर लिया था। इसलिए हम खुद यह सपना देखने लगे थे कि वह पूरी हवेली और हवेली के पीछे वाला ऑफिस हमारा होगा और बाकी की जमीन जायदाद के मालिक धीरेंद्र भैया होंगे। लेकिन हम नहीं जानते थे कि जिसे हम भाई मानकर जिसकी हर बात को अपने सर माथे लगाया करते थे, वह खुद हमारी जान का दुश्मन बन जाएगा। हमने इसके राजनीतिक कैरियर के लिए क्या कुछ नहीं किया, अपना भविष्य भी दांव पर लगा दिया। वह इतनी आसानी से हमें मौत के घाट उतारने को तैयार हो जाएगा, यह हमने सोचा नहीं था।

जिस वक्त गाड़ी पलटने वाली थी, उसी वक्त हमारा ध्यान पता नहीं कैसे ड्राइवर पर चला गया, और हमने उसे गाड़ी के सभी डोर्स को वापस लॉक करते देखा।
हमें लगा खाई वाला रास्ता है, शायद इसलिए यह सारे डोर्स लॉक कर रहा है। लेकिन जब उसने अपने दरवाजे का लॉक खोल दिया, तब हमारा माथा ठनकने लगा। और उस वक्त एक खतरनाक मोड़ पर गाड़ी अचानक पलटी, गाड़ी के पलटते समय भी हमारा ध्यान पूरी तरह उस ड्राइवर पर था, उसने धीरे से अपनी साइड का दरवाजा खोला और पलटते हुए बाहर कूद गया। हमारी गाड़ी खाई में पलटती चली गई।

    हम बेहोश हो गए… कुछ देर बाद हमें हल्का सा होश आया,कोई हमे एक तरफ खींच रहा था..
     खुली आंखों से हमने देखा कोई लड़का था जो हमें बचाने की कोशिश कर रहा था…
लेकिन हमारी आंखें इतना खुल नहीं पा रही थी कि हम उसे साफ तौर पर देख पाए! हम एक बार फिर बेहोशी में चले गए!”

क्रमशः

अगला भाग कल जिसमे सारी गुत्थी सुलझ जाएगी..

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Yashoda Sharma
Yashoda Sharma
1 year ago

जिस बात का डर था, वही हुआ,,, आखिर उस नीच इंसान ने अपनी नीच फितरत दिखा ही दी।

Upasna Dubey
Upasna Dubey
1 year ago

शातिर दिमाग वालों से भावुक मन वाले लोग हमेशा हारे हैं।ये दुनिया धीरेंद्र जैसे लोगों से भरी पड़ी है ,और सान्या जैसे लोग जो रिश्तों अपनो और भावनाओं के जाल में फंसे रहते हैं आसानी से शिकार बना जाय करते हैं। धीरेन्द्र के जैसे शातिर कुटिल बुद्धि लोग भले ही नम्रता और प्रेम के दिखावे का चोला ओढ़ लें लेकिन देर सवेर उनके चेहरे से ये नकाब हट ही जाता है । लेकिन तब एक कोई मासुम छला जा चुका होता है
कुत्सित कुटिल षड्यन्त्रकारी धीरेन्द्र के चेहरा देर से ही सही बेपर्दा हो तो रहा है वरना असलियत में बहुतों के चेहरे दुनियाको धोखा ही देते रहते हैं ।अनिर्वान जैसे पुलिसकर्मी की वजह से न्याय होकर ही रहेगा जिसने जी जान से हर सबूत इक्क्ठा किये हैंधरेंद्र प्रजापति के खिलाफ।

कांति
कांति
1 year ago

एक के बाद एक धीरेंद्र के गुनाहों से पर्दा उठता जा रहा है। उसने अपनी बहनों तक को भी नहीं छोड़ा कैसा गिरा हुआ व्यक्ति है।
लेकिन अब उसके पाप का घड़ा भर चुका है।

Neeta
Neeta
1 year ago

🙏🙏🙏🙏🙏💛

Vandana
Vandana
1 year ago

Kitna bda kaandi nikla dheerendra….apni behan tak ko nhi choda

Meera
Meera
1 year ago

धीरू को जितना सोचा था उस से भी ज्यादा गिरा हुआ है ये साला 😤😤 un बच्चो का चेहरा भी एक बार सामने नहीं आया उसके ?? 😡🤬

Shruti jindal
Shruti jindal
1 year ago

Superb part good job dear ❤️💕💕💖🥳🥳🥳🥳🥳🥳💕

Deepshikha Manu
Deepshikha Manu
1 year ago

Superb part

Manjeet Kaur
Manjeet Kaur
1 year ago

Superb awesome part 👌👌👌👌👌👌

Deepa verma
Deepa verma
1 year ago

वाह अपर्णा जी वाह अब तो मैं आपकी और भी जबरी फैन हो गई।क्या क्या ट्विस्ट ओ हो मतलब अगर आप मुझे देख पाते तो मैं फेकता कपूर के नाटक की तरह 3 बार पलट पलट के बोलती क्याआआ क्याआआ क्याआआ