
अपराजिता -149
सान्या और मान्या की बातों के बीच धीरेन्द्र भी वहाँ पहुँच चुका था, पर दोनों ही बहनो का ध्यान उस पर नहीं गया था..।
मान्या ने बोलना ज़ारी रखा…
“ये घर कितनी भी कीमत का हो लेकिन ये हमारा है, और इस में हम किसी की हिस्सेदारी नहीं होने देंगे !”
“तुम पूरी तरह से पागल हो चुकी हो मान्या, हमें वाकई इस घर से या पापा की सम्पत्ति से कुछ भी लेना देना नहीं है.. हम मानते हैं कि हम बहुत पैसे वाले घर में नहीं गए, लेकिन हमारा पति ठीक ठाक कमा लेता है, रहने के लिए छत और खाने के लिए रोटी है हमारे पास..
और अब तो हम ने भी नौकरी शुरू कर दी है !”
“वो तो करनी ही थी, तुम्हारे पास उपाय क्या बचा था और ? एक की नौकरी में घर चलाना भी तो मुश्किल है.. यही सब रोना रोकर तुम्हे लगा धीरेन्द्र को पिघला लोगी और अपना हिस्सा बाँट कर ले जाओगी.. क्यों है ना ?”
“मान्या तुम्हारी सडी हुई सोच तुम्हे मुबारक !! हम जिस वक्त घर छोड़ कर गए थे, उस वक्त पापा के साथ साथ तुम सब भी बहुत नाराज़ हो गए थे..
उसके बाद पापा भी चले गए, हम उस वक्त भी आये लेकिन धीरू ने गुस्से में बाहर से ही धक्के मार कर हमें निकाल दिया था..
अब लगा बहुत समय बीत चुका है…. धीरू और तुम्हारा गुस्सा कम हो गया होगा, यही सोच कर हम अपने बच्चो को साथ लिए चले आये।
लेकिन हमें नहीं मालूम था कि इन कुछ वर्षों में तुम्हारा दिमाग एकदम ही ख़राब हो चुका है…।
हालाँकि तुम बचपन से ऐसी ही थी, हद दर्जे की स्वार्थी और कपटी…
हमें लगा था वक्त के साथ कुछ तो बदलाव हुआ होगा लेकिन तुम आज भी नहीं बदली..
छि, हमें शर्म आ रही कि तुम हमारी बहन हो !! !
“तो जाओ किसी कुएं में जाकर कूद जाओ ! अगर इतना ही बुरा लग रहा तो अब तक यहाँ खड़ी क्यों हो ? जाती क्यों नहीं ?”..
“चले जायेंगे, बस एक बार धीरू से मिल ले !”
“क्यों… धीरू से मिल कर क्या अपना हिस्सा मांग कर ही जाना है ?”
मान्या की बात सुन सान्या का धैर्य छूट गया और अपने दोनों बच्चो का हाथ पकड़ कर वो वापस मुड़ गयी… वो बाहर के सदर दरवाजे की तरफ बढ़ रही थी कि परदे के पीछे खड़ा धीरेन्द्र बाहर निकल आया..
धीरेन्द्र को देखते ही सान्या के चेहरे पर हंसी आते आते रह गयी..
उसे लगा मान्या जैसी ही सोच धीरेन्द्र की भी होगी, वो तो ऐसे भी उससे चिढ़ा बैठा था…
वो धीरेन्द्र को देख रही थी, अब उसे लगने लगा था कि यहाँ आकर उसने गलती कर दी है..
जब छोटी बहन होकर मान्या ने उसे इतनी इज्जत बख्श दी तो धीरेन्द्र से क्या उम्मीद की जा सकती थी..
वो चुपचाप अपने बच्चो का हाथ पकड़ कर निकलने लगी कि धीरेन्द्र की सर्द सी आवाज़ उसके कानो में पड़ी….
“रुक जाओ दीदा !” बहुत दिनों बाद धीरेन्द्र के मुहं से खुद के लिए पहले वाला सम्बोधन सुन कर वो थम गयी..
बहुत दिनों से, बल्कि बचपन के बाद से उसने धीरेन्द्र के मुहं से आज ये सम्बोधन सुना था..
उसने पलट कर देखा, धीरेन्द्र की आंखे उसे ही अपलक देख रही थी..
धीरेन्द्र की नजर उसके साथ खड़े बच्चो पर भी थी..
सान्या ने बच्चो को धीरे से उसकी तरफ बढ़ा दिया..
“ये हमारे बच्चे हैं धीरू , तुम इनके मामा हो !”..
धीरेन्द्र ने धीरे से अपनी बाहें फैला दी और उन दोनों बच्चो को खुद में समेट लिया…
मान्या ये देख कर आश्चर्य में डूब गयी, वो कुछ बोल पाती उसके पहले हाथ के इशारे से धीरेन्द्र ने उसे चुप करवा दिया..
“दीदा बहुत दिनों के बाद वापस आयी है, आज हम तीनो भाई बहन पहले की तरह साथ बैठ कर खाना खाएंगे..
मान्या जाओ, शांता मौसी को बोलो आज दीदा के पसंद का खाना तैयार करें.. !”
मान्या आश्चर्य से धीरेन्द्र को घूरती हुई रसोई में चली गयी..
सान्या खुद आगे बढ़ कर धीरेन्द्र के गले से लग गयी..
धीरेन्द्र आज अखंड का खेल एक तरह से ख़त्म कर आया था, अखंड अब थाने में था और वहाँ से उसे जेल ही जाना था, इसी बात का संतोष धीरेन्द्र के चेहरे पर नजर आ रहा था.. !!
मान्या को भी लगा कि अखंड को हरा देने कि ख़ुशी में उसका भाई बावला हो गया है इसलिए सान्या को इतने प्यार से खाने के लिए रोक रहा..
वो बड़बड़ाती हुई चली गयी.. .
वो रसोई में थी और बाहर सान्या के साथ धीरेन्द्र बैठा था.. धीरेन्द्र ने सान्या की तरफ देखा और पूछ बैठा..
“मान्या प्रॉपर्टी के बारे में क्या कह रही थी?”
धीरेंद्र के मुंह से यह सुनते ही सानिया चौंक गई।
” क्यों तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो धीरेंद्र?”
धीरेंद्र बहुत गहरी नजरों से सान्या की तरफ देखने लगा
” सब सच बताओ, वह घर और हमारी जमीन के बारे में क्या कह रही थी ?”
सान्या ने धीरेंद्र को देखा और धीरे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
” धीरेंद्र मान्या घर में सबसे छोटी है, और उसकी सोच हमेशा से ही अलग है। उसे जानते तो हो। उसे ऐसा लग रहा था जैसे की हम यहां प्रॉपर्टी के लालच में आए हैं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। वह हमसे यही कह रही थी कि यह घर सिर्फ उसका है, और जमीन तुम्हारी। और इस सबके बीच हमें बोलने का कोई हक नहीं।”
धीरेंद्र ने सारी बात सुनने के बाद सान्या की तरफ देखा
” यह पंद्रह करोड़ का बंगला अकेले उसके नाम कैसे हो गया? पापा ने पहले ही सब कुछ हमसे कह दिया है, और उनके बनाये कागज़ो के हिसाब से ही सब होगा.. वो खुद को समझती क्या है?”
धीरेंद्र के गुस्से को देखकर सान्या घबरा गई। वह धीरेंद्र के कंधे पर हाथ रखकर उसे शांत करने का प्रयास करने लगी नहीं।
” धीरेंद्र गलत मत समझो, मान्या घर में सबसे छोटी है हम, तुम दोनों से यही कहना चाहते हैं कि हमें घर में और सारी जायदाद में कोई हिस्सा नहीं चाहिए।
वैसे भी हमने तो अपनी मर्जी की शादी की थी और इस बात से पापा बहुत नाराज भी थे। तो जाहिर है उन्होंने जो भी कागजात अपनी बीमारी के वक्त तैयार करवाए होंगे उसमें हमारा कोई नाम नहीं होगा। और हम सच कहें तो जब उनका आशीर्वाद ही नहीं मिल पाया तो इस जमीन को लेकर हम क्या करेंगे ?
भगवान के आशीर्वाद से हमारे पति बहुत अच्छे हैं, और हमें बड़े प्यार से रखते भी हैं ।इसलिए तुम दोनों ही इस बात से निश्चिंत रहो कि हम अपना हिस्सा मांगेंगे। तुम भी मान्या से, इस घर के लिए कुछ मत कहना। तुम्हारी ही तो बहन है। अगर उसे यह घर, यह बंगला चाहिए, तो दे दो।
जमीन और बाकी की वसीयत भी जो तुम्हारे नाम है वह कम तो नहीं है ना…।”
सान्या और धीरेंद्र की बातें उस हाल की खिड़की के बाहर खड़े धीरेंद्र के पिता के दोस्त सुन रहे थे।
उनकी बातें पूरी होने के बाद वह भी अंदर चले आए। उन्हें देखकर यह दोनों ही लोग खड़े हो गए। धीरेंद्र ने आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए। वह उसके पिता के मित्र होने के साथ-साथ वकील थे।
पेशे से वकील होने के कारण उन्होंने ही वसीयत का सारा बंटवारा लिखा था, और इसलिए वह खुद जानते थे कि सान्या के पिता ने वसीयत में क्या लिखवाया है। वह एक ऐसी बात जानते थे जो धीरेंद्र सान्या और मान्या तीनों ही नहीं जानते थे।
वह वहां जाकर उन लोगों में शामिल होकर बैठ गए। उन्होंने यह जाहिर नहीं किया कि उन्होंने पीछे से छुपकर सान्या और धीरेंद्र की बातें सुन ली है।
” कैसे हो धीरेंद्र? कैसी हो सान्या? बहुत दिनों बाद तुमसे मिलना हुआ। “
“जी चाचा जी, आना ही नहीं हो पा रहा था। लेकिन अब मन नहीं माना तो अपने भाई बहन से मिलने चले आए। “
“बहुत अच्छा किया जो तुम चली आई। एक बहुत जरूरी बात थी जो तुम्हें बताना था और अगर तुम नहीं आती तो मैं तुम्हें ढूंढता हुआ चला आता।”
” चाचा जी कहिए ना, क्या बात है?”
” तुम्हारे पिता की वसीयत का एक हिस्सा मैंने धीरेंद्र और मान्या को पढ़कर नहीं सुनाया था, क्योंकि तुम्हारे पिता चाहते थे कि उस हिस्से को तुम तीनों की मौजूदगी में ही पढ़ा जाए। उनका कहना था कि धीरेंद्र और मान्या के सामने जायदाद का आधा ही हिस्सा पढ़ा जाएगा और बाकी का हिस्सा जब कभी भी तुम घर आओगी, तब तुम्हें सुनाया जाएगा।
उन्हें कहीं ना कहीं विश्वास था कि एक न एक दिन तुम अपने भाई बहन के प्रेम में वापस जरूर आओगी। उन्होंने मरने से पहले तुम्हें भी दिल से माफ कर दिया था।”
उन चाचा जी की यह सारी बातें सुनकर सान्या की आंखें भीग गई। उसने आंसू पोछ लिए, लेकिन धीरेंद्र के चेहरे पर परेशानी के भाव उभर आए। उसे अंदर से डर सा लगने लगा कि वसीयत की ऐसी कौन सी बात है जो उसे और मान्या को नहीं मालूम।
तभी उन चाचा जी ने आगे बोलना शुरू किया।
” सान्या तुम आई हो इस बात की खबर मुझे घर के नौकर ने दी, और मैं वसीयत के सारे पेपर समेट कर ले आया। मेरी भी उम्र तुम्हारे पिता की उम्र जितनी है। मेरे भी जीवन का कोई भरोसा नहीं, आज है, कल नहीं। लेकिन जाने से पहले अपनी जिम्मेदारी पूरी करके जाना चाहता हूं।
तुम्हारे पिता चाहते थे कि इस घर के दो हिस्से हो।
यह घर वैसे भी एक पूरी कोठी के रूप में बना हुआ नहीं है। एक यह हिस्सा है जिसमें तुम सब रहते हो, पीछे एक और हिस्सा बना हुआ है जो लगभग इतना ही बड़ा है। जहां तुम्हारे पिता का दफ्तर हुआ करता था।
तुम्हारे पिता अपने दफ्तर वाला वह पूरा हिस्सा तुम्हें देना चाहते थे, और उन्होंने उसी को तुम्हारे नाम लिख दिया है। जिसे तुम कमर्शियल उपयोग में भी ला सकती हो, और रेजिडेंशियल भी।
तुम जैसा चाहो वैसा उसका उपयोग कर सकती हो।”..
“लेकिन चाचा जी हमें यह सब नहीं चाहिए..।”
“नहीं बेटा ऐसे नहीं कहते, यह तुम्हारे पिता की आखिरी इच्छा थी कि उनके तीनों बच्चों को उनकी मेहनत की कमाई में से कुछ ना कुछ जरूर मिले, और इसलिए इस वसीयत पर तुम्हारा भी हक है !”.
उनकी बात सुन सान्या सोच में पड़ गयी…
लेकिन धीरेन्द्र के दिमाग में शैतानी घूमने लगी..
क्रमशः

है महादेव,,, ये धीरेंद्र अब कोई और चाल ना चल दे अपनी बहन के खिलाफ ही,, वैसे भी पैसे का मोह लोभ अनंत काल से झगड़े करवाता आया है।
किसी ने बहुत सही कहा है जर,जमीन और जोरू अक्सर मतभेद की वजह बनते हैं ।संपत्ति का लालच अच्छे अच्छों के बीच खाई खोद देता है फिर यहां हो पहले से ही काफी दूरियां हैं।
परिवार में अगर एक संतोषी है तो दूसरे मिलकर उसको इतना गिरादेंगे कि वो उठ ही न पाए ।लेकिन माता पिता के लिए सभी समान होते हैं…. सान्या के पिता ने भी अपनी तीनो संतान का भला चाहा पर ….जहां सुबुद्धि तहां सम्पत्ति नाना जहां कुबुद्धि तहां विपत्ति निदाना चरितार्थ हो रही
🧡💛🙏🙏🙏🙏🙏
सान्या की प्रॉपर्टी मिलने से तो धीरू भी खुश नही लगता शायद , मुझे लगा जैसे बच्चो को बाहें फैलाए ले लिया अपनी बहन को भी अपनाएगा पर जैसे ही प्रॉपर्टी की बात आई उसके चेहरे के हाव भाव ही अलग दिखे ।
मान्या की इतनी गन्दी सोच रही है इसलिए तो उसने अखंड और रेशम के साथ ये सब किया 😤😤
Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻
🤗👍good part.Dhirendra aur Manya shaitani dimag ke hain.kahi in dono ne he Sanya ko marawa diya aur usake bachche Dhirendra ke ghar mae pal rahe hain……
Akhir pyar per Paisa bhari pad hi gaya
अपर्णा जी आप कैसे हो 2- 3 दिन से कोई पोस्ट कोई नोटिफिकेशन नही आया तो मैं डर रही थी आपकी तबीयत तो खराब नही।बढ़िया भाग👌🏻👌🏻 इस नालायक ने अपनी ही बहन को भी तो नहीं मार डाला प्रॉपर्टी के लालच में।
Mai bhi yhi soch rhi thi
इतना अच्छ कैसे लिखती हो , हमे बांध कर रखती हो आगे क्या होगा इसी आशा में👌
पैसे का लालच इंसान से क्या न करवा दे !
जबकि कुछ भी साथ नहीं ले जाना है… जमीन/बंगले… सब यही रह जाते हैं, इनके पीछे लड़ता इंसान दुनिया से चला जाता है। जिंदगी का कोई भरोसा नहीं होता, कब साथ छोड़ दे, इस छोटी सी जिंदगी में कुछ लोगो के लिए रुपया, पैसा, जमीन, जायदाद इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे अपनों की जान भी ले लेते हैं इसके पीछे…!! लालच के चक्कर में गलत रास्ते अपनाने वाले अंत समय पछताते हैं।
पर समय रहते कोई चेतता नही 😢 उफ्फ!!