
अपराजिता -144
अथर्व और रेशम भी घर लौट गए थे…
रास्ते भर रेशम अथर्व से कुछ नहीं पूछ पायी लेकिन उसके मन में सवाल घुमड़ते रहे..
ढेर सारे सवाल उसके और अथर्व के बारे में? अथर्व को क्या मालूम चला था आखिर ? अथर्व ने क्यों उससे कुछ नहीं कहा ? कभी कुछ क्यों नहीं पूछा ?
जब उसे सब पता था, तो शादी से पहले एक बार बात क्यों नहीं की.. ?
इन सारे सवालों के बावजूद रेशम कहीं न कहीं खुश थी..
उसका पति उससे प्रेम करता था, बावजूद आज तक उसने कभी अपने प्रेम का प्रतिदान नहीं माँगा..।
जब भी जो भी किया खुले दिल से अपनी पत्नी के लिये किया.. और वो आज तक अपने ही संसार में विचरती रही..।
उस संसार में जिसका असल में कोई अस्तित्व ही नहीं था..।
जिस काले गहरे कुंए में वो आज तक डूबी पड़ी थी, असल में उसका कोई अस्तित्व ही नहीं था..।
उसकी इज्जत से खिलवाड़ अखंड सिंह परिहार ने नहीं किया था, उल्टा वो तो उसे बचाने आया था और फंस गया था..
उसका खुद का जीवन इस घटना के बाद अंधकारमय हो गया था..
वो तो फिर भी हिम्मत रख कर आगे बढ़ गयी थी, लेकिन अखंड तो वही का वही खड़ा रह गया था..।
आज अखंड को देख कर उसे और भी ज्यादा दुःख हो रहा था..।
सही मायनो में देख जाये तो आज उसने अखंड को पहली बार इतने ध्यान से देखा था।
पहले यूनिवर्सिटी के यूथ फेस्ट में हर तरफ चहचहाता घूमने वाला लड़का कितना बुझ सा गया था..
उसे देख कर लग रहा था, खाना भी वो बस किसी औपचारिकता के निर्वहन के लिए खा रहा था..
बस उतने निवाले जिससे शरीर चलता रहे !!
हे भगवान इसके घर पर इसका ध्यान रखने के लिए कोई होगा या नहीं ? भगवान करें कि इसकी अब जल्दी से शादी हो जाये और इसे संभालने वाली कोई इसके पास आ जाए..
“क्या हुआ किन ख्यालों में खोयी हो ?”
अथर्व ने उसे अपनी बाहों के घेरे में घेरते हुए पूछा और वो सकुचा कर रह गयी..
रेशम से कुछ कहा नहीं गया वो बस गर्दन हिला कर रह गयी..
कुछ देर में ही वो लोग घर पहुँच गए.. ।
मानव बेसब्री से उन दोनों का इंतज़ार कर रहा था। हालाँकि उसकी अथर्व से फ़ोन पर बात हो गयी थी, लेकिन उसे वहां घटा क्या, ये मालूम नहीं था।
वो उत्सुक था, कि सब ठीक है या नहीं ?
अथर्व और रेशम के पहुँचते ही वो सामने चला आया।
रेशम ने हल्के से मुस्कुरा कर अपने भाई को देखा और अंदर चली गयी.. अथर्व मानव के साथ बैठ कर उसे सब बताने लगा…
रेशम हाथ मुहं धो कर रसोई में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ पूरा खाना बना रखा था।
गुड्डी की सुबह तबियत ख़राब थी, इसलिए वो जल्दी वापस लौट गयी थी…
रेशम ने डोंगे खोल खोल कर देखना शुरू कर दिया, बैगन का भरता, छोले, चावल और फुल्के भी सिंके रखें थे !
रेशम पलट कर बाहर चली आयी..
“मानव खाना ?”
“क्या ?” मानव रेशम की तरफ देखने लगा..
“किसने बनाया ?” वो पूछ उठी..
“मैंने और किसने? खाना ही तो बनाया है कोई ट्रेन थोड़ी चलाने लगा, जो तू इतनी आश्चर्य में डूब रही है!
तुम दोनों थक कर आए हो, खाना खा लो और अब मैं निकलता हूं..!”
“ऐसे कैसे निकलता हूँ ?”
अब की बार अथर्व बोल पड़ा और मानव ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखकर उसके कंधों पर हाथ रख दिया।
” भई प्राइवेट कंपनी में काम करने वाला नौकर हूं।
मेरे ससुर की कंपनी नहीं है जो मुझे छुट्टियों पर बैठे-बैठे भी सैलरी देता रहे। छुट्टियां खत्म हो गई है, और आज मुझे वापस लौटना ही था।
लेकिन इस बीच इतना कुछ घट गया। खैर अब सब ठीक है, वह लड़की भी अब ठीक है। तुम दोनों भी घर आ चुके हो, अब मुझे निकल जाना चाहिए, सही वक्त पर घर पहुंच जाऊंगा मैं ..!”
अथर्व और रेशम एक दूसरे को देखने लगे..
“मानव सुबह निकल जाना ना.. अभी निकल कर आधी रात में पहुंचेगा !”
“हाँ लेकिन, सुबह आठ बजे ऑफिस भी पहुंचना होता है ना.. अभी दो घंटे की ड्राइव में घर पहुँच जाऊंगा !”
रेशम का चेहरा उतर गया, मानव ने आगे बढ़ कर उसके सर पर हाथ रख दिया.. !
“चलो अब मैं निकलता हूँ.. तुम दोनों भी आराम करो !”
उन दोनों से मिल कर मानव निकल गया..
अथर्व भी हाथ मुहं धोने कमरे में चला गया।
रेशम खाना गरम करने लगी.. खाना उसकी पसंद का बना था.. गरम करते हुए उसके होंठो पर हलकी सी मुस्कान चली आयी।
खाना खा कर भी चला जाता तो क्या बिगड़ जाता.. वो सोच ही रही थी कि मसाले के डिब्बे के नीचे दबी एक पर्ची पर उसकी नजर चली गयी..
“मैं छोले चावल खा चुका हूँ.. तुम दोनों आराम से डिनर एन्जॉय करना, मैं पहुँच कर मेसेज कर दूंगा ! अपना ध्यान रखना लाडो।”
मानव की लिखावट में लिखा परचा देख वो मुस्कुरा उठी..
उसने अपना और अथर्व का खाना परोस लिया..
वो अथर्व को बुलाने कमरे में चली आयी.. लेकिन कमरे में घुसते ही उसे कोई नजर नहीं आया, वो थोड़ा आगे बढ़ी कि पीछे से अथर्व ने उसे अपनी बाँहों में कैद कर लिया…
वो धीरे से उसके कंधे पर अपनी ठोड़ी चलाने लगा.. रेशम सिहर गयी… लेकिन इस बार रेशम ने खुद को संभाले रखा..
धीरे धीरे अथर्व की उँगलियाँ रेशम की उंगलियों में अपनी जगह बनाने लगी।
प्रेम के उन सुन्दर पलों की रचना होने लगी जिनके बिना प्रकृति अपूर्ण है.. पुरुष और स्त्री अपूर्ण है !!
अथर्व के प्रेम उन्माद में उसकी अभिसारिका उसकी प्रेयसी खोने लगी और अपनी सम्पूर्णता को पाकर दोनों अतृप्त आत्माये तृप्ति के समंदर में गोते लगाने लगे ….
रेशम को आज पहली बार ना कानो में कोई नाम सुनाई दिया और ना ही अथर्व के स्पर्श से किसी तरह की पीड़ा की अनुभूति हुई…
आज उसके चारों तरफ सिर्फ आनंद ही आनंद था..।
उसके पति के प्रेम को पा लेने का आनंद।
उसके काले अतीत के धूल पुंछ कर साफ़ हो जाने का आनंद..
उसके मानसिक अवसाद के समाप्त हो जाने का आनंद।
इन सारे आनंद ने उसके पीड़ादायक इतिहास की कालिख को एकदम से कम कर दिया था, बल्कि पूरी तरह समाप्त ही कर दिया था..।
जिन समस्याओ को उसने जीवन मृत्यु का प्रश्न समझ लिया था, वो तो असल में समस्या ही नहीं थी।
बस इतना पता चलते ही कि अखंड ने कुछ भी नहीं किया, बल्कि उसकी देह पर से मिलने वाले हस्ताक्षर किसी लड़की के थे, वो अपनी पीड़ा की गगरी छलका आयी थी।
हालाँकि अब भी उसके दिमाग में ये बात ज़रूर एकबारगी कौंध गयी कि कौन थी वो लड़की जिसने अखंड का नाम इस्तेमाल कर उसे डराने की कोशिश की।
लेकिन अथर्व के अनुरागी स्पर्श के सामने इस बात को तुच्छ जानकर दिमाग से उसी वक्त निकाल दिया, और जीवन में पहली बार अपने पति का साथ देते हुए प्रेम के निराले ही संसार की आड़ी टेढ़ी गलियों में उसका हाथ थामे आगे बढ़ गयी..
प्रेम की परिपूर्णता, प्रीती की तृप्ति उसके चेहरे पर एक अभूतपूर्व लालिमा ले आयी…
उसने पलट कर अथर्व की तरफ देखा लेकिन आंखे भर कर देख नहीं पायी।
“क्या हुआ.. ?” अथर्व उसे छेड़ने लगा..
“खाना खाएंगे या नहीं ?”
“अब तो कोई भूख ही नहीं बची.. !”
अथर्व मुस्कुर उठा.. उसने रेशम को वापस अपनी तरफ खींच लिया, लेकिन इस बार वो उसका हाथ छुड़ा कर खड़ी हो गयी..
“खाना वापस गर्म करना पड़ेगा.. चलिए अब चुपचाप !”
अथर्व भी मुस्कुरा कर उठ गया… दोनों साथ बैठे खाना खाने लगे..
आज की रात रेशम की ज़िन्दगी में उस मनहूस शाम की यादें मिटा कर खुशहाली के दिए रोशन कर गयी…
*****
मानव अपनी कार से निकल चुका था…
वो शाम में ही निकल जाता लेकिन, उसे रेशम का इंतज़ार था, उसने अथर्व से जितनी बातचीत की उससे उसे कुछ कुछ अंदेशा तो हो गया था, लेकिन सब कुछ स्पष्ट नहीं था, जब अथर्व और रेशम वापस लौटे उस वक्त अथर्व के अंदर जाने के बाद उसने रेशम की तरफ देखा और रेशम अपने भाई के सीने से लग गयी।
उसने पुलिस थाने में बीती हर एक बात एक साँस में मानव को बता दी।
मानव की भी आँखों से आंसू बहने लगे।
उसने प्यार से अपनी बहन का सर सहला दिया।
वो समझ चुका था, अब उन दोनों के बीच किसी गलतफहमी की जगह बाकी नहीं थी और इसलिए वो भी वापस लौट गया….
हलकी हलकी सी बारिश हो रही थी, मुस्कुराते हुए वो चला जा रहा था कि तभी उसे अपने हाथों से अपने सर को पानी से बचाने की कोशिश में भीगती खड़ी एक लड़की नजर आ गयी।
उसने उस लड़की की तरफ देखा और आगे बढ़ने ही वाला था कि उस लड़की ने हाथ हिला कर गाडी रुकवाने का इशारा कर दिया..
मानव ने गाडी रोक दी…
“क्या आप आगे किसी बस स्टॉप तक मुझे लिफ़्ट दे सकते हैं प्लीज ?”
“हाँ ज़रूर, आ जाइये !”
मानव ने झुक कर अपनी बगल वाला दरवाज़ा खोल दिया, और वो लड़की अपने कुर्ते पर की बारिश की बूँदे झाड़ती हुई अंदर बैठ गयी…
उसके अंदर बैठते ही एक भीना सा हवा का झोंका भी अंदर चला आया..
कार में गाने चल रहे थे, उन गानो के साथ मानव ने गाडी आगे बढ़ा दी..
अकेला चला था मैं, था मैं
ना आया अकेला…
मेरे संग संग, हाँ संग संग
मेरे संग संग आया तेरी यादो का मेला…
क्रमशः

Very interesting and Imotional n Fantastic n Fabulous part.
देर भले ही हो गई हो पर रेशम के जीवन में जो प्रेम फुहार बरसी है ना वो जीवनपर्यंत उसे यूंही भिगोती रहेगी और उसके जीवन में हमेशा ही हरियाली बनाए रखेगी।🥰🥰🥰🥰🥰🥰
और ये चलते चलते कोन मिल गया मानव को ऐसा 🤔🤔🤔🤔🤔🤔 मुझे लग रहा है कि शायद मानव को भी कोई ख़ास ही मिला है 😊😊😊😊
Yaha is bat ki khusi to h ki resham ko uske hisse ki khusi mil gyi.. Acha lga.. Pr dil me ek tis sir uthti h ki bechaare akhand ki ky glti thi.. Wo to bin mtlb k sari jindgi akela rhega
बेहद सुकून भरा भाग 😊, देर से ही सही आज रेशम, अखंड, अथर्व और मानव की ज़िन्दगी मे सुकून लौट आया।
। रेशम अपने कड़वे अतीत से निकलकर आज पुरे मन से अपने अथर्व की हो गई,😊।
आज का भाग बस सुकून सुकून सुकून से भरा था 😊👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻।
,👌👌👌👌
Resham apni life me aage bad gai ye dekh kar khushi hui …ke ye ladki kon he??
बहुत ही सुहानी वापसी, reham अथर्व की जिंदगी भी सुहानी हो गई, अब अखंड की जिंदगी भी संवर जाए
Bahut badhiya part, andhere ka badal chhat gaya ,ab akhand ko koi mil jay..
Kon h ye ladki …jo manav ko mili …. intezaar rahega janne ka
Superb part