मायानगरी -40


मायानगरी-40

    मायानगरी से बस निकलने के बाद अपनी गति से भागे जा रही थी अभिमन्यु के बस में चढ़ते ही रंगोली ने राहत की सांस ली थी और सुबह से हुई थकान के कारण जब खिड़की से ठंडी ठंडी हवा के झोंके उसके चेहरे पर पड़े तो वह निश्चिंत होकर सो गई ।

    माया नगरी से रंगोली के शहर के ठीक बीचोबीच एक स्टॉप पर बस लगभग आधे घंटे के लिए रुका करती थी जिससे जिसे भी फ्रेश होना है या कुछ खाना पीना है वहां पर अपने काम निपटा सकते थे,  ड्राइवर और बस कंडक्टर को भी थोड़ा आराम मिल जाता ..
  उस स्टॉप पर पहुंचकर बस रुक गई; वहां पहुंचने तक के बीच में जगह जगह पर लोग उतरते गए, चढ़ते गए लेकिन रंगोली के बगल वाली सीट खाली ही रही और उससे ठीक पीछे की बगल वाली सीट पर बैठा अभिमन्यु भी अकेले ही बैठा रहा ।
    ढाबे पर बस रुकी और कंडक्टर ने सबको उतरने का इशारा कर दिया…

” जिसको भी खाना पीना है, हाथ मुंह धोना है यहाँ उतर कर फ्रेश हो जाइए…”

एक-एक करके लोग उतरते गये और बस लगभग खाली हो गई। अभिमन्यु भी अपनी सीट के पास खड़ा होकर अंगड़ाई लेने लगा । उसकी लंबी लंबी टांगे इतनी देर से मोड़े रखने से अकड़ सी गई थी।  वह भी धीमे कदमों से चलकर बस में आगे की तरफ बढ़ गया। जहां से उसे नीचे उतरना था, बस के दरवाजे पर खड़े होकर उसने मुड़कर रंगोली की तरफ देखा रंगोली उसे ही देख रही थी। अभिमन्यु ने इशारे से उसे भी उतरने के लिए पूछा और रंगोली ने हां में सर हिला दिया….

  अभिमन्यु उतर कर ढाबे पर चला आया। वो इधर उधर देख कर एक छोटी टेबल की तरह बढ़ गया… अपनी कुर्सी खींचकर वह बैठने वाला था, कि रंगोली भी आकर उसके सामने की कुर्सी खींच कर बैठ गई..
उसे अपने सामने बैठा देखकर अभिमन्यु के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई..

“क्या हुआ ऐसे हंस क्यों रहे हो?”

“पहली बात तो यह कि मैं हंस नहीं रहा मुस्कुरा रहा हूं। दूसरी बात तुम्हें ही देख कर मुस्कुरा रहा हूं, कि कैसे तुम मुझे ढूंढते मेरी टेबल पर चली आयी..”

” ओह मिस्टर!! गलतफहमी में मत रहना, मैं तुम्हें देखकर यहां बैठने नहीं आई हूँ।
    मैं पहले बैठी हूं और उसके बाद तुमने कुर्सी खींची है..”

  “देखो कुर्सी तो मैंने ही पहले खींची, हाँ बैठ तुम पहले गई यह बात और है।”

     “मैं यहां पहले बैठी हूं, और मैं यही बैठना चाहती थी। अब अगर तुमने खुद ब खुद  सोच लिया कि मैं तुम्हारे साथ बैठना चाहती हूं तो ये तुम्हारी बेवकूफी है,  मेरी नहीं !”

अभिमन्यु मुस्कुराते हुए बैठ गया।  वहां टेबल पर पानी का जग रखा था उसमें से उसने गिलास में पानी डाला और पीने जा रहा था कि रंगोली ने उसे रोक दिया..
  अपने साथ लाए बैग से उसने एक पानी की बोतल निकाली और अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दी..

” यह पानी पी लो, हमारे हॉस्टल का फिल्टर वाला पानी है। तुमसे तो यह हुआ नहीं होगा कि लंबी यात्रा पर जा रहे हो तो पानी रख लो..”

अभिमन्यु ने मुस्कुराकर पानी की बोतल खोली और दो बड़े बड़े घूंट भरने के बाद बोतल रंगोली की तरफ बढ़ा दी…

   “थैंक्यू डॉक् पानी के लिए!  वह क्या है ना कि, तुम डॉक्टर ही साफ पानी साफ खाना इतनी सारी बातें सोचते हो.. हम इंजीनियर के दिमाग में यह सब नहीं आता।  हम तो अगर प्यास लगी और हैंडपंप सामने दिख गया तो उसमें से भी जा कर पानी निकाल कर पी लेते हैं , यह नहीं सोचते कि पानी साफ़ है उबला हुआ है या नहीं है।”..

“इसीलिए तो बीमार पड़ते हो..”

“हां!! और हम बीमार पड़ते हैं तभी तो तुम्हारी दुकान चलती है..”

“अब हमारी आजीविका लोगों की बीमारी पर निर्भर करती है, इसमें हम क्या कर सकते हैं? हम जानबूझकर तो किसी को बीमार नही करते हैं। बल्कि हम तो लोगों को बार-बार अवेयर करते हैं कि अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए..”

“अच्छा करती हैं आप!! और क्या करती हैं?”

“मतलब?”

“मतलब!! खाली समय में क्या करना पसंद करती हैं? मेरा मतलब है हॉबीज क्या है आपकी?”

एक बार को लगा कि रंगोली फिर कोई टेढ़ा जवाब देगी , लेकिन इस बार वह भी धीरे से मुस्कुराने लगी..

“मैं बताऊंगी तो कहीं मेरा मजाक तो नहीं उड़ाओगे ?”..

सवाल ही नहीं उठता, कि मैं तुम्हारा मजाक उड़ाऊ?”

“पक्का प्रॉमिस?”

“हां पक्का प्रॉमिस!

“किसी से कहोगे भी नहीं , ना झनक से और ना अपने उस अधीर से..”

अभिमन्यु के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कान चली आई। उसने अपने खुद के सर पर हाथ रखकर और दूसरे हाथ से अपने गले को छूकर कसम लेने वाली मुद्रा बनाई और फिर रंगोली से कहने लगा…

  ” सच कह रहा हूं बाबा!! ना मैं तुम्हारी झनक से कहूंगा ना अपने अधीर से अब तो बताओ..”

“मुझे कविताएं पढ़ना बहुत पसंद है। कहानियां भी पढ़ना अच्छा लगता है। उपन्यास, लेख सब कुछ पढ़ लेती हूं , पर सबसे ज्यादा कविताएं पसंद है…”

“साइंस की स्टूडेंट होते हुए आर्ट्स मे इंट्रेस्ट? तो फिर आर्ट्स ही क्यों नहीं ले लिया?”

“क्योंकि बचपन से एक ही सपना देखा था ,डॉक्टर बनने का! इसलिए उस सपने को पूरा करना भी जरूरी था..”

“ओके!! मतलब तुम आर्टिस्टिक डॉक्टर हो!
     बढ़िया है यार तुम तो टांके भी लगाओगी तो वहां खूबसूरत सी बेल बना दोगी..”

“देखा मैंने कहा था ना, तुम यूं ही मेरा मजाक उड़ाओगे।  इसीलिए मैंने आज तक किसी से नहीं कहा कि मुझे कविताएं पढ़ना पसंद है। यहां तक कि मेरे घर में भी सिर्फ मां के अलावा कोई नहीं जानता कि, मुझे कविताएं और कहानियां पढ़ना पसंद है..”

“सॉरी बाबा! तुम गलत समझ रही हो, मैं सच में तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा रहा। बल्कि मुझे तो खुशी हो रही है, कि डॉक्टर साहित्य की शौकीन है।  वैसे मैं अपनी बात कहूं तो मुझे कविता कहानी और लेख में ठीक से फर्क भी नहीं समझ में आता। मुझे तो यह भी नहीं समझ में आता कि किसी कहानी को सिर्फ कहानी कहा जाता है और किसी को उपन्यास ,आखिर अंतर क्या होता है दोनों में?”

   “जब तुम्हें इंटरेस्ट नहीं है तो यह सब जानने से क्या फायदा ? अच्छा वैसे तुम बताओ तुम्हारा इंटरेस्ट किस में है..?”

   “सच कहूं ?”

  ” हाँ!”

  ” तुम मुझे गलत तो नहीं समझ लोगी?”

   ” क्यों आखिर ऐसे क्या इंटरेस्ट है तुम्हारे?”

उन दोनों की बातों के बीच अभिमन्यु ने दोनों के लिए चाय और सैंडविच ऑर्डर कर दिया था… वेटर ला कर रख भी गया..

   ” मेरा इंटरेस्ट सिर्फ पैसे कमाने में हैं। बचपन में मैं भी सारे वही खेल खेलता था जो आम बच्चे खेला करते हैं।  अड़ोस पड़ोस के घर के अमरूद के पेड़ों से अमरूद तोड़ना, बेरियों से बेर चुराना। बारिश के मौसम में जहां जहां पानी भरे वहां कागज की नाव बनाकर तराना ।
     मोहल्ले के बाहर वाले मैदान में दोस्तों को जमा करके क्रिकेट खेलना  और कभी शर्मा अंकल तो कभी वर्मा अंकल की खिड़की का कांच फोड़ना।
     सारे वही काम करता आया हूं बचपन से जो बहुत आम है। जो हर एक बच्चा करता है। इसलिए अलग से कभी कोई शौक बन भी नहीं पाया। बचपन से अपने घर में अपने पापा को गृहस्थी की गाड़ी में जुटे हुए देखा है, कितना परिश्रम किया है उन्होंने मेरे और मेरे भाई के लिए यह मैंने देखा है। और इसलिए बस एक ही इच्छा है कि मैं खूब पैसे कमा सकूँ और उन्हीं उनकी उम्र  की साँझ मे एक बेहतरीन सुकून भरी जिंदगी दे पाऊँ ।
         कभी और कुछ सोचा ही नहीं, मुझे पता है कि पैसे कमाने के लिए मेरे पास एक अच्छी नौकरी के अलावा और कोई उपाय नहीं है..!”

“तो इंजीनियरिंग के बाद नौकरी करना है तुम्हें..?”

“नहीं एमबीए करना है! क्योंकि अगर इंजीनियरिंग के बाद नौकरी में घुस गया तो मैं वह नहीं कर पाऊंगा जो करना चाहता हूं… एक सामान्य मिडल क्लास लाइफ अब नहीं चाहिए यार।
     मेरे पापा के पास एक स्कूटर है, मैं जानता हूं इंजीनियरिंग के बाद नौकरी में घुस गया तो एक कार एक  थ्री बीएचके घर खरीदी लूंगा, अपने बच्चे को प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने लायक पैसे भी जोड़ लूंगा। हर संडे बाहर डिनर करना, मूवी देखना यह सारे आरामदायक पल मैं जी पाऊंगा, लेकिन मुझे सिर्फ यहां तक नहीं पहुंचना। मेरी मंजिल इस सबसे  चार कदम आगे है।
              नौकरी में पापा को रात दिन खटते देखा है। मुझे किसी की नौकरी नहीं करनी मुझे लोगों को नौकरी देनी है।
    जानती हो हमारा एजुकेशन सिस्टम हमें नौकरशाही सिखाता है! हम पढ़ लिखकर सब नौकर बनना चाहते हैं। हमारे अभिभावक हमें पढ़ाते भी इसीलिए हैं कि हम एक अच्छी नौकरी पा सकें। हमारी मिडिल क्लास मेंटालिटी को बदलने में अभी बहुत वक्त लगेगा। तुम खुद सोचो तुम्हारे पेरेंट्स भी यही चाहते होंगे कि, तुम पढ़ लिख कर डॉक्टर बनकर एक अच्छी सरकारी नौकरी पा सको और सुकून की जिंदगी जियो। है कि नहीं?”

रंगोली ने पहली बार अभिमन्यु के मुंह से इतनी धीर गंभीर बातें सुनी थी, चुपचाप सिर हिलाने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं था!

” मैं इस मेंटालिटी से ऊपर उठना चाहता हूं, हमारे मिडिल क्लास लोगों के विचारों को बदलना चाहता हूं और अगर आप लोगों को बदलना चाहते हैं तो या तो आपके पास इतनी ताकत हो कि लोग आपको सुन सके और या फिर इतना पैसा कि वह आपको मान सके!”

अभिमन्यु ने अपनी बात खत्म करने के बाद अपने सैंडविच उठाई और खाने लगा रंगोली कुछ देर तक उसे देखती बैठी रही और फिर उसने एक बेवकूफाना सा शगुफा छोड़ दिया…

    ” मैनेजमेंट मे हीं जाना था, तो इंजीनियरिंग करने क्यों आए? तुम भी तो मेरे जैसे लल्लू ही निकले…?”

      “क्योंकि मुझे ऐसी कोई पढ़ाई करनी थी जिससे मेरा दिमाग और ज्यादा खुल और मुझे यही लगा कि मैनेजमेंट पढ़ने के लिए पहले इंजीनियरिंग कर लेना बैटर है !”

   रंगोली को पहली बार यह महसूस हुआ था कि अभिमन्यु भी थोड़ा गंभीर लड़का है वरना आज तक तो वह उसे कॉलेज में इधर उधर घूमने वाला छिछोरा लड़का ही समझती आई थी दोनों का खाना खत्म हो चुका था और बेटर बिल लेने आ गया सौंफ की प्लेट के साथ ही वेटर ने बिल रतिया अभिमन्यु ने जैसे बिल उठाने की कोशिश की रंगोली ने उसके हाथ से वह छीन लिया….

” मेरा बिल मैं पे करूंगी!”

” हां क्यों नहीं! कर दो,  बल्कि तुम चाहो, तो मेरा भी बिल पे कर दो!”

  रंगोली आश्चर्य से अभिमन्यु को देखने लगी उसने तो आज तक फिल्मों और टीवी सीरियल्स में यही देखा था कि अगर लड़का और लड़की साथ में होटल में खाते हैं तो कर्टसी के नाते लड़के ही बिल अदा करते हैं…
   वह तो खुद की खुद्दारी का शो ऑफ करने के लिए आधा बिल पे करने को मांग रही थी लेकिन यहां अभिमन्यु ने पूरा का पूरा बिल उसी के सर पर फाड़ दिया……
       उसने पर्स खोलकर तीन सौ पचास रूपये  निकाले और प्लेट में रखने जा रही थी कि उसके पहले ही अभिमन्यु ने पैसे रख दिए…
रंगोली ने अभिमन्यु की तरफ देखा अभिमन्यु ने आंखों से ही उसे पैसे वापस रख लेने का इशारा कर दिया…

” एक ही यूनिवर्सिटी में तो पढ़ते हैं माया नगरी में कभी आगे मौका लगा तो मेरा बिल तुम पे कर देना । बस हिसाब बराबर।
    जरूरी थोड़ी ना है कि आजकल के सीरियल और फिल्मों की तरह रिबेल बनने के लिए बिल आधा आधा किया जाए…
   जिंदगी लंबी है मुलाकातों के मौके भी मिलते रहेंगे…     कभी तुम चाय पिला देना ग़ालिब कभी हम कॉफ़ी पिला देंगे…
   कैसी लगी मेरी शायरी?”

” बकवास और बेतुकी!”

” और मैं…?”

   रंगोली का दिल अभिमन्यु के इस सवाल पर धड़क उठा और फटाफट अपना पर्स उठाये वह बस की तरफ आगे बढ़ गई ….
  उसके आगे बढ़ते ही अभिमन्यु भी अपने बालों पर हाथ फेरते हुए और झूमते झूमते उसके पीछे बस की तरफ बढ़ गया…..
  
ढाबे में चलते गाने को गुनगुनाता वो भी बस में सवार हो गया ….

          हम चुप रहे, कुछ ना कहा
          कहने को क्या, बाकी रहा
    बस आँखों ही आँखों में इज़हार हो गया
   हम सोचते ही रह गये, और प्यार हो गया…
      जाने कैसे, कब कहाँ, इकरार हो गया
     हम सोचते ही रह गये, और प्यार हो गया….

क्रमशः

aparna

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Nitesh
Nitesh
1 year ago

Ma’am ye story to repeatation me chal rhi h ….. ye SB to padhi Hui h …..