
मायानगरी-37
रंगोली की पैकिंग लगभग पूरी हो चुकी थी , कुछ किताबें जो उन्हें पढ़ने के लिए सीनियर्स की तरफ़ से मिली हुई थी वो उन दोनों के बीच कॉमन थीं, उनका बंटवारा कैसे किया जाए , यही उन दोनों के मन में चल रहा था ! रंगोली के मन में था कि उसे किताबें ले जाने को मिल जाए और झनक चाहती थी किताबें उसके पास रहें….
रंगोली ने किताबों को देखा और बिना रखे ही अपना बैग बंद करने लगी …
” क्या हुआ ? ये बुक्स नहीं रखी तुमने?” प्राची के सवाल पर रंगोली झनक की तरफ़ देखने लगी …
” तुम ले जाओ, झनक मेरे पास रखी फर्स्ट ईयर की किताबों से पढ़ लेगी , क्यों झनक?”
प्राची की बात सुनकर उसने हाँ में सिर हिला दिया , रंगोली ने एक बार झनक से वापस पूछ कर फटाफट किताबें डाल ली…
रंगोली और झनक कमरें से निकलने लगे कि रंगोली प्राची के पास जाकर खड़ी हो गई …
” मैम आपके भी इम्तेहान हैं ना , आप तो खैर पढ़ने में अच्छी हैं… अच्छे से तैयारी कीजिएगा, मैं भी पढ़ने ही जा रही हूं, मुझे भी आशीर्वाद दीजिए…
” आशीर्वाद !! अबे मैं कोई बुजुर्ग हूं क्या ? “
प्राची उसकी बात सुनकर हंसने लगी ….
“सॉरी मैम , ब्लेसिंग कहते कहते आशीर्वाद कह गयी …”
प्राची की बात पर रंगोली और झनक भी हंसने लगी और बाहर निकल गईं….
हॉस्टल गेट के थोड़ा आगे ही बस स्टॉप था ,वहीं से उसे बस पकड़नी थी….
” झनक तू घर क्यों नहीं जा रही , घर जैसी पढ़ाई यहां कहाँ होगी?”
” मेरी हो जाएगी रंग, तू फ़िक्र ना कर…!”
दोनों बातेँ करती रिक्शा की तलाश में कुछ दूर पैदल ही बढ़ गईं की उसी वक़्त अधीर उधर से निकला उसने रंगोली के हाथ में बैग देख लिया था …
.. उसने बाईक की स्पीड बढ़ा ली और अपने हॉस्टल निकल गया …
वो तेजी से कमरें में दाखिल हुआ …
सामने अभिमन्यु बैठा ज्ञानी जी को कुछ पढ़ा रहा था …
” अरे भाई तू यहां किताबों में माथा फोड़ रहा है वहां भाभी जी का विदाई कार्यक्रम चल रहा है वहां …
” मतलब , बोलना क्या चाहते हो ?”
” मतलब मेरे रणवीर तेरी दीपिका अपने घर जा रही है , शायद पीएल के लिए ..”
” अच्छा!! बताया नहीं उसने ..! अभिमन्यु अपनी जगह से कूद कर खड़ा हो गया …
” ये तो सरासर बदतमीजी है !” ज्ञानी भाई थोड़ा तैश में आ गए …
” अरे शांत हो जाओ ज्ञानी भाई , अब तक भाभी सेट नहीं न हुई हैं तो, काहे इनसे कुछ भी बता कर जाएंगी भला !”
इतनी देर में टीशर्ट ऊपर से डाल कर अभिमन्यु दरवाजे से बाहर भाग गया …. अधीर भी उसके पीछे भागा
दोनों के बाईक से बस डिपो पहुंचते में रंगोली की बस निकल चुकी थी..
बस में बैठी रंगोली ने चारो तरफ़ नजर डाली, इत्तेफाक से बस में कोई महिला यात्री नहीं थी । बस बहुत ज्यादा भरी हुई भी नहीं थी लेकिन जितने थे सारे के सारे पुरुष यात्री ही थे …
रंगोली को घबराहट सी होने लगी , उसे लगा उसने कहीं निकलने में हडबडी तो नहीं कर दी। वो अगली सुबह भी तो जा सकती थी .. सुबह सात बजे भी एक बस थी , जिसमें बैठ कर वो ग्यारह तक आराम से अपने घर पहुंच जाती , लेकिन उसे घर पहुंचने ki जल्दबाजी थी .. अब रात में दस बजे वो पहुंचेगी… और उस पर भी उसने अपने घर पर किसी को बताया भी नहीं है , वो सबकों सरप्राइज देना चाहती थी ..
हे भगवान कितनी बड़ी बेवकूफी कर आईं है वो …क्या पडी थी उसे इतनी जल्दबाजी करने की …
रात दिन अखबारों में कैसी कैसी ख़बरें आती हैँ और वो खुद हादसे को न्योता दे आईं है वो भी बाकायदा निमंत्रण-पत्र छपवा कर …
उसने अपना पर्स खोल कर देखा , लेकिन पर्स में ऐसी कोई चीज नहीं थी जिससे वो अपनी रक्षा कर सके..उसे एक आध छोटा मोटा चाकू या मिर्ची स्प्रे तो रख ही लेना था …
बस डिपो से छुट चुकी थी , और बस के ड्राईवर ने बस में गाने भी चला दिए थे …
रात नशीली मस्त समा है ,
आज नशे में सारा जहाँ है..
हाय शराबी मौसम बहकाये …
“नहीं नहीं आप यहां बैठ कर नहीं पी सकते..!”
एक तो गाना अजीब सा चल रहा था उस पर कंडक्टर जाने किसे कह रहा था कि यहाँ बैठ कर पी नहीं सकते , उसका मतलब वहाँ कोई बैठ कर शराब पी रहा था , ये सोचते ही रंगोली के रोंगटे से खड़े होने लगे …
रात की बस उसने क्यों ली , यही सोच सोच कर उसका दिमाग फटा जा रहा था …
” हे भगवान! बस मुझे सुरक्षित घर तक पहुंचा दो, आइन्दा कभी ये वालीं बस नहीं लूँगी , पक्का प्रॉमिस! बस किसी तरह जिंदा घर पहुंच जाऊँ, भगवान जी इसके बाद कभी कुछ नहीं मांगूंगी”
हालांकि ये सब उसी के दिमाग का फितूर था क्योंकि बस में बैठे किसी भी व्यक्ति का ध्यान उस पर नहीं गया था , लेकिन फिर भी वो खुद से जूझ रही थी ….
अभिमन्यु अधीर के साथ बस स्टॉप पहुंचा लेकिन तब तक बस निकल चुकी थी ….
” अबे यार, निकल गई बस ? अब क्या करें ?”
” झाड़ू लगा लो डिपो पर!”
” यार अधीर गुस्सा दिलाने वाला जवाब देने में पीएचडी कर रखी है क्या बे!”
” हम हाँ बोल देंगे तो तुम मान लोगे !”
अभिमन्यु ने घूर कर अधीर को देखा…
” साले हमारी शराफत का फायदा ना उठाओ, किसी दिन मार देंगे और मर जाओगे ..!
” अरे मरें तुम्हारे दुश्मन , अभी तो ऐसा करो बाईक पर बैठो तुम्हें उड़ा कर भाभी जी की गाड़ी तक पहुंचा देते हैं…
” हाय सच!”
” अब यार अभिमन्यु ये हाय हाय ना तुम्हारा लंबे चौड़े डीलडॉल पर सूट नहीं करता, ये “परण सोहर” डायरेक्टर जैसे हाय फाय मत कर, बस बैठ जा गाड़ी में…
अभिमन्यु के बैठते ही गाड़ी हवा से बातेँ करते रोड पर दौड़ने लगी….
बस में बैठी रंगोली ने फोन उठा कर सोचा झनक से बात कर ली जाये, जिससे डर थोड़ा तो कम होगा लेकिन उसने सुबह से पैकिंग करने की धुन में ध्यान ही नहीं रखा की फोन उसका डिस्चार्ज हो गया था … और बैट्री की एक अकेली लाइन देख वो और भी ज्यादा घबरा उठी …
उसने अपने आसपास देखा , उसे लगा आसपास सारे विलेन ही बैठे हैं … उसकी सांसें अटकी हुई थी कि तभी एक जोर का ब्रेक लगा और गाड़ी खच से रुक गईं ….
दरवाजा खुला और अभिमन्यु अपने कंधे पर एक बैग टांगे अंदर चला आया … उसे देखते ही रंगोली के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैर गई …
अभिमन्यु रंगोली के सीट के पीछे वालीं सीट पर बैठ गया .. और उसी वक़्त बस में गाना चलने लगा …
” आए हो मेरी जिन्दगी में तुम बहार बन कर
मेरे दिल में यूँ ही रहना तुम प्यार प्यार बन कर !”
रंगोली खिड़की से बाहर देखती मुस्कराती बैठी रही , कुछ देर में ही उसे नींद लग गई और वो निश्चिंत सो गई…..
*****
भुवन के पास रात में वैसे तो उसका कोई न कोई दोस्त ही रुक जाता था पर पिछली रात उन सारे लोगों को पार्टी कार्यालय ने किसी काम से बाहर भेजा था इसलिए वेदांत ही अस्पताल में रुक गया था …
उसे अस्पताल में पसरी मनहुसियत से चिढ़ हो रही थी , अस्पताल के अंदर लाकर पीना भी मुश्किल हो रहा था , इसलिए भुवन को सोता देख कर वो गाड़ी उठाए बाहर निकल गया …
क्लब में पीने खाने के बाद जब उसे लगा अब उसे नींद आ जाएगी वो वापस अस्पताल चला आया …
वो पार्किंग में गाड़ी लेकर जा ही रहा था कि उसका फोन बजने लगा , बाजू वाली सीट पर पड़ा फोन वो उठाने जा रहा था कि फोन नीचे गिर गया , उसे उठा कर जैसे ही वो सीधा हुआ कि सामने हल्के अंधेरे में उसे दिखा नहीं और सामने से गुजरती एक लड़की से गाड़ी टकराती की उसने जोर से ब्रेक लगा दिया …
उसका गुस्सा सातवे आसमान पर था … गुस्से में वो जीप से उतर उस लड़की के पास पहुंच गया .. उसकी बांह जोर से पकड़ कर उसने उसे अपनी तरफ़ घुमाया और उसे गुस्से में एक तमाचा मरने जा रहा था कि उसने देखा सामने गौरी खाड़ी थी और उसका हाथ हवा में ही रुक गया …
उसने अपना हाथ नीचे कर लिया लेकिन उसका गुस्सा कम होने की जगह बढ़ता ही गया …
” मेरी ही गाड़ी मिली है, आत्महत्या करने के लिए …
अरे मरना ही है तो कहीं और जाकर मरो ना… इस पूरी दुनिया में और कोई जगह नहीं मिलती क्या, जब देखो तब मेरे सामने चली आती हो..”
गौरी पहले ही परेशान थी , वेदांत की बिना सिर पैर की बात सुन उसका दिमाग और खराब हो गया . वैसे तो वो शांत ही रहा करती थी पर आज वो भी बिफर पडी…
” मुझे कोई शौक नहीं है आपके सामने आकर मरने का । और ध्यान से देख लीजिए मैं मेरी लेन में ही चल रही थी , नशे में आपको दिखाई नहीं दे रहा कि गाड़ी किस तरफ़ लगानी चाहिए तो उसमें मेरा क्या क़ुसूर ?
बड़े बाप की औलाद हैं तो इसमे आपका कोई योगदान नहीं है, आपकी किस्मत है बस … और किस्मत कब पलट जाए ये कोई नहीं जानता !”
” अरे बाप रे ! तुम्हारे भी मुहँ में ज़बान है ! मैं तो डर गया डॉक्टर गौरी!”
वेदांत गौरी के सामने हाथ जोड़ उसे चिढ़ते हुए बोल रहा था कि आधी ही बात सुनकर गौरी वहाँ से भीतर चली गई , गौरी ने नहीं देख देखा था की मृत्युंजय उसके पीछे आ कर खड़ा था …
वेदांत की बात का जवाब उसी ने दिया …
” डरना भी चाहिए , क्योंकि एक डॉक्टर की ही जात ऐसी होती है जिसे खून कर देने का लीगल अधिकार प्राप्त है … तेरे मरीज को एक इंजेक्शन देने की देर है उसके बाद उसका क्या होगा तू भी नहीं समझ पाएगा! तुम लोगों के पास कोरी धमकी होती है और हमारे हाथ में ताकत, लेकिन फिर भी हम सिर्फ मरीजों के लिए जो सबसे अच्छा हो वहीं करते हैं और तुम जैसे बेवक़ूफ़ो की गालियां सुनते हैं ….
” अबे चल हट, ये सब तुम लोग जो करते हो उसकी मोटी तनख्वाह भी तो पाते हो ?”
” तो उस मोटी तनख्वाह के लिए आ ना , बन जा तू भी डॉक्टर! अरे लेकिन तू कैसे बनेगा , डॉक्टर बनने के लिए पढ़ाई करनी पड़ती है ना ! सिर्फ़ दारू पीकर गुंडागर्दी करने से अगर डॉक्टर बना जा सकता तो आज तेरे घर परिवार का हर गुंडा डॉक्टर बन गया होता और नेता जी के पार्टी ऑफ़िस की जगह तुम कमीनों ने अस्पताल खोल लिया होता ..
वेदांत ने मृत्युंजय की बात सुन उसका कॉलर पकड़ लिया … दोनों में हाथापाई शुरू होने ही जा रही थी कि रात के राउंड के लिए सीनियर डॉक्टर वहां चले आए …
” ये क्या हो रहा है यहां? ये अस्पताल है तुम लोगों की यूनिवर्सिटी नहीं की तुमने यहाँ भी कोहराम मचा दिया ..तुम जाओ यहां से ..!
उन्होंने वेदांत को अंदर जाने का इशारा किया और उसके वहाँ से हटते ही मृत्युंजय की ओर घूम गए ….
” एंड यू डॉक्टर मृत्युंजय! तुम एक डॉक्टर हो और ये सब तुम्हें सूट नहीं करता, किसी भी मरीज़ के परिजन से बदतमीजी से बात करने की तुम्हें परमिशन नहीं है ! आम लोगों और डॉक्टर के लिए बने प्रोटोकॉल में अन्तर होता है । अगर तुम्हारी तरह हर डॉक्टर पैनिक कर जाएगा तो मरीजों के परिजन का जीना दूभर हो जाएगा .. तुम जैसे डॉक्टर जो खुद को इंसान कम और सुपर हीरो ज्यादा समझते हैं आए दिन बिना किसी लॉजिकल रीजन के ही हाथापाई में उतर आयेंगे तब तो चल चुका अस्पताल!
कल सुबह आकर डीन केबिन में मुझसे मिलों, हफ्ते भर का सस्पेंशन मिलेगा ना तो सब समझ में आ जायेगा ..”
” सर लेकिन गलती उसकी थी !”
” तो गोली मार दोगे उसे ! जिस प्रोफेशन में हो उसकी तो लाज रखो , मेडिकल की पढ़ाई में क्या सिर्फ बीमारियो और उनकी ट्रीटमेंट के बारे में पढ़ा है तुमने .. तुम्हें ये नहीं सिखाया गया कि हर हाल में डॉक्टर को सबसे ज्यादा पेशंस रखना होता है .. तुम जैसे दो चार डॉक्टर और हो जाए तो अस्पताल कुरुक्षेत्र बन जाएगा और तुम लोग यहाँ महाभारत रच दोगे । कल भी रात किसी डॉक्टर ने दो लोगों को थप्पड़ मारा है , सीसी टीवी में दिखा है पर फुटेज क्लियर नहीं है , वो डॉक्टर पहचान में नहीं आ रही …
ये सब यहाँ बंद करो , इससे अस्पताल का नाम खराब होता है ..समझे..
” सर अगली बार से ध्यान रखूँगा !”
मृत्युंजय ने सिर झुकाए ही अपनी बात कही और फिर उन डॉक्टर के पीछे अस्पताल के अंदर चला गया … इतनी डांट सुनने के बाद अब उसका राउंड पर जाने का मन नहीं था लेकिन , उन डॉक्टर साहब का राउन्ड भी करवाना था , वो नर्स के साथ उन डॉक्टर के पीछे राउंड पर निकल गया …
गौरी अपने पापा के कमरे में बैठी थी कि हडबडी में एक औरत घबराई सी अंदर चली आईं और आते ही गौरी के पिता को देख रोने लगी ….
उनके पास बैठी वो कुछ बोलती भी जा रही थी और रोती भी जा रही थी ……
उनके रोने की आवाज सुन वो भी जाग गए, उन्होंने एक नजर उस औरत पर डाली फिर पीछे बैठी अपनी बेटी की तरफ़ देखने लगे …
गौरी उठ कर बाहर जाने को थी कि दरवाज़ा खुला और सीनियर डॉक्टर के साथ मृत्युंजय भी अंदर चला आया ….
डॉक्टर ने सारी रिपोर्ट देखने के बाद गौरी की तरफ़ देखा …
” सर्जरी तो हो गई है , अभी सब क्लियर भी है , कल एक और दिन इन्हें रखते हैं, कोई रिवर्स चेंज नहीं दिखा तो कल रात तक डिस्चार्ज कर देंगे …डॉक्टर मृत्युंजय आपको बाकी डिटेल्स समझा देंगे..
डॉक्टर ने उसके बाद वहीं बैठी उस औरत को देखा …
” आप कौन..?”
” इनकी पत्नी है ..!
गौरी ने कहा और सिर झुका लिया , जय को समझ आ गया था कि आज सुबह से गौरी का चेहरा ऐसे लटका हुआ सा क्यों है .. उसने कुछ नहीं कहा और दवा के बारे में नर्स को समझा कर सीनियर डॉक्टर के पीछे बाहर निकल गया ..
क्रमशः
aparna….
