मायानगरी -36

मायानगरी-36

    उस आदमी से बात करने के बाद पंखुड़ी के चेहरे की मुस्कान गायब होने का नाम ही नहीं ले रही थी वह मुस्कुराते हुए  कलेक्टर ऑफिस की तरफ बढ़ने लगी ।कलेक्टर ऑफिस के सामने बैठे पियोन के पास जाकर उसने पूछा-

” कलेक्टर साहब अंदर हैं..?

उस के सवाल पर पियोन ने उसे ऊपर से नीचे घूर कर देखा और धीमे से हां में सिर हिला दिया।

“क्या मैं उनसे मिलने अंदर जा सकती हूं?”

इस बार पीयून ने ना में सिर हिला दिया…

“क्यों ? क्यों मिलने नहीं जा सकती ? “

  उसने मुहँ में भर रखें गुटखे को थोड़ा एडजस्ट किया और चेहरा ऊपर कर गुटखे को गिरने से बचाते हुए कहा ..

” व्यस्त हैं !”

” कहाँ व्यस्त हैं ? मुझे तो खुद ही बुलाया था मिलने,  और अब आप कह रहे वो व्यस्त हैं ?”

एक बार फिर पीओन ने फ़िर उसे घूर कर देखा …और अपने गुटखे को बचाते हुए उसी तरह सिर ऊपर किए पूछा..

” काम ?”

काम क्या है पूछने में कहीं मुहँ का अनमोल गुटखा बह ना जाए इसलिए वो बेचारा जितने कम शब्दों की जरूरतों पड़े उतना ही बोल रहा था औऱ पंखुड़ी उससे जानबूझ कर फिजूल सवाल जवाब किए जा रही थी …
  उसी समय कलेक्ट्रेट गेट के ठीक बाहर चाय की टपरी पर रेडियो पर गाना बजने लगा ..

  ” मेरे सवालों का जवाब दो , दो ना !”

  इधर पंखुड़ी का सोचना य़ह था कि -” कलेक्टर से ज्यादा ताव तो उसके मातहत का होता है! कलेक्टर ऑफिस में कलेक्टर के अलावा हर कोई खुद को कलेक्टर ही समझने लगता है….

     पंखुड़ी के समझ से बाहर था कि ये सामने बैठा मिथुन का डुप्लीकेट ठीक से कुछ बोल क्यों नहीं रहा तब उसका ध्यान गया कि सामने बैठा पियून इतनी देर से अपने मुंह में गुटका दबाए उसके स्वाद में मगन था और ऐसे अमृत स्वाद के बीच में आकर वह फिजूल सवाल पूछ पूछ कर उसका दिमाग खराब कर रही थी।
    उसी समय उसका फोन बजने लगा ..” मेरे बाबु  प्रॉमिस करो ना ” किसी भोजपुरी गीत के बोल की रिंग टोन बजते ही  किसी तरह खुद को मना कर उस आदमी ने वहाँ से एक और जाकर गुटखा थूका और वापस आ कर फोन उठा लिया ….
  फोन में बात करने के बाद उसने फोन रखा और वापस पंखुड़ी को घूर कर देखा…

” यूपी से हो क्या भैया जी?” पंखुड़ी का इतना व्यक्तिगत सवाल उसे कतई पसंद नहीं आया ..

“गोरखपुर जिल्ला से हैं ! काहे आप भी वहीं की हैं क्या ?”

पंखुड़ी सुनकर मुस्करा उठी….
हालांकि पंखुड़ी के परिचय से उसे कुछ खास फर्क़ नहीं पड़ना था,  इसलिए शायद पंखुड़ी ने कोई जबाव नहीं दिया औऱ उसने उतने ही बिगड़े मिजाज से जवाब दिया….

“साहब की मीटिंग चल रही है !”

” कब तक खत्म होगी ?” पंखुड़ी के सवाल से उस के चेहरे पर अब नाराजगी दिखने लगी थी, कि कलेक्ट्रेट ऑफ़िस का लंबा चौड़ा सा दरवाजा खुला और एक एक कर लोग बाहर निकलने लगे । पंखुड़ी ने उन लोगों को देखा और चपरासी की तरफ़ देख इशारे से ही पूछ लिया कि क्या इन्हीं लोगों के साथ मीटिंग थी , उसने भी हाँ में सिर हिला दिया कि अंदर से बेल की आवाज सुनाई दी और वो भाग कर अंदर चला गया.. बाहर खड़ी पंखुड़ी इंतजार करने लगी ..कुछ देर में ही वो भागता हुआ बाहर आया और आते ही पंखुड़ी को अंदर जाने का इशारा कर दिया ..

वो मुस्करा कर अंदर की तरफ़ बढ़ गयी …

” क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”

शेखर ने उसे देखा और झटके से अपनी सीट पर से उठते उठते रह गया …

” हाँ आ जाइए!”

मुस्करा कर पंखुड़ी अंदर दाखिल हो गई …. शेखर के ठीक पीछे की दीवार पर गांधी जी की तस्वीर लगी थी । एक बड़ी सी टेबल जिस पर उस शहर के कितने जरूरी कागज़ात फैले पड़े थे के पीछे बैठा जिलाधीश उसे देख कर मुस्करा रहा था ..

“आज यहाँ कैसे आना हुआ डॉक्टर साहब ?”

वो मुस्करा कर नीचे देखने लगी …

” मेरे तो सारे काम आजकल एक ही वज़ह से होते हैं !”

” हाँ फिर भी , मतलब मेरे ऑफ़िस में आपका कोई काम फंस रहा था क्या ?”

” नहीं आपके ऑफ़िस में नहीं आपके परिसर में फंस रहा था , बस उसी काम से आईं थी पर काम हो नहीं पाया । फिर सोचा जब यहाँ तक आईं हूँ तो आपसे भी मिलती चलूँ,  वैसे आपकी बेटी का एडमिशन हो गया ना ?”

पंखुड़ी के सवाल पर शेखर चौंक गया लेकिन उसने खुद को सम्भाल लिया …” जी हाँ! हो गया !”

  अब वो क्या बताता कि मायानगरी मेडिकल में मरी लड़की के बारे में चिंतित निरमा ने बांसुरी की दोस्त होने का फायदा उठा कर बिना बाँसुरी को बताये ही उसे फोन घुमा दिया था ! और बस उसी लड़की के बारे में जानने और तफ्तीश करने ही वो मायानगरी के चक्कर लगा रहा था .. हालांकि उसे काफी कुछ मालूम चल चुका था लेकिन बिना किसी ठोस सबूत के अभी आगे बढ़ने का कोई मतलब नहीं था ।
  उसे चुप बैठा देख पंखुड़ी ने ही वापस शुरुआत की…

” आपका घर कहाँ हैं?”

” घर भी पास ही है !”

” अच्छा,  मुझे लगा इसी परिसर  में होगा !”

“नहीं , यहाँ केवल ऑफ़िस है…. आप मेरा घर देखना चाहती हैँ?”

” नहीं! वो तो मैंने बस ऐसे ही पूछ लिया था !”

शेखर मुस्करा उठा …

” मैं वैसे घर ही जा रहा था , सुबह से बहुत सारा काम था , निपटाते हुए देर भी हो गई ..

“हाँ और आपने शायद लंच भी नहीं किया होगा ?

” हाँ लंच तो नहीं किया ? क्या आप भी साथ चलना चाहेंगी ?”

मुस्करा कर पंखुड़ी खड़ी हो गई …

” नहीं , आप घर जाइए मैं भी मेरे रूम पर जाती हूँ , मैंने भी लंच नहीं किया है !”

शेखर भी उसके साथ ही चलते हुए बाहर आ गया , उसे लगा कि शायद ऐसे उसके घर जाने में पंखुड़ी को संकोच सा हो रहा होगा ।
   वाजिब भी है भले ही उसने खुद को शादीशुदा बताया है पर ऐसे थोड़े ना कोई भी लड़की उसके साथ उसके घर चली जाएगी …
  दोनों साथ चलते हुए ऑफ़िस के बाहर के कॉरिडोर में चले आए ….
   वहीं से रास्ते के दुसरी तरफ़ घने पेड़ पौधों से ढकी एक जगह की तरफ़ इशारा कर शेखर ने पंखुड़ी को दिखा दिया …

” वो रोड के उस तरफ़ मेरा घर नजर आ रहा है , चलिए एक एक कप कॉफ़ी ही हो जाए ..!

” पर आपके घर पर तो इस वक़्त कोई नहीं होगा , कॉफ़ी कौन बनाएगा?”

पंखुड़ी के सवाल पर शेखर हंस पड़ा …” सरकारी शेफ यानी खानसामा मिला हुआ है, गज़ब का खाना बनाता है !”

” ओह! मुझे लगा आपकी वाइफ तो मायके गई हुई है ना इसलिए सोचा हमें कॉफ़ी…

” आप चलिए तो सहीं, कॉफ़ी मिल जाएगी ।!”

  वो दोनों बात करते हुए काफी दूर तक निकल आए थे, शेखर की जीप के पास पहुंच कर शेखर ने उसमें बैठने का इशारा किया ..
    ” मेरी गाड़ी तो यहीं खड़ी हैं!”

पंखुड़ी के ऐसा कहते ही शेखर ने अपने पीओन को इशारा किया और वो भागता हुआ उसके पास पहुंच गया , पंखुड़ी से गाड़ी की चाबी लेकर उसने उसके हाथ में रख दी.. ” मैडम की गाड़ी हमारे घर पर ला कर  पार्क कर दो , चाबी वहीं दे देना !”

  और पंखुड़ी को बैठने का इशारा कर खुद गाड़ी में बैठ गया …
  पंखुड़ी ने मुस्करा कर शेखर को देखा और पीओन को देख धीमे से उसे कहा…-” हम जिला देवरिया से हैं , वहीं आपके पड़ोस से!  लेकिन पापा का नौकरी दिल्ली लग गया था, तो पढ़ाई लिखाई वहीं से किए हैं !”

पंखुड़ी की बात सुन इतनी देर में पहली बार पीओन के चेहरे पर असली मुस्कान दिखाई दी और शेखर की गाड़ी पंखुड़ी को ले आगे बढ़ गई ….

   शेखर के घर के बाहर लगा बड़ा सा गेट खुला और ड्राइवर गाड़ी को लिए अंदर दाखिल हो गया। ड्राइवर ने एक तरफ ले जाकर गाड़ी रोक दी, शेखर और पंखुड़ी नीचे उतर आए। पंखुड़ी को साथ लिए शेखर घर की तरफ बढ़ रहा था कि एक तरफ रखी बुलेट देख पंखुड़ी को कुछ याद आ गया और वह मुस्कुरा कर आगे बढ़ गई..
   घर उसकी सोच से कहीं ज्यादा बड़ा था। इस शानदार लिविंग रूम में महंगा सा फर्नीचर लगा हुआ था।  ज्यादातर इंटीरियर लकड़ी से किया गया था जो घर को एक अलग सा है एलिट लुक दे रहा था..
  घर देखते हुए पंखुड़ी खो सी गई थी…

” आपका घर बहुत खूबसूरत है!”

” जी शुक्रिया! आप बैठीये मैं कॉफी के लिए बोलता हूं!”

” आपकी फैमिली फोटो नजर नहीं आ रही, आई मीन आपकी वाइफ और बच्चों को देखने का मन है!”

” जी अक्सर ऑफिस से जुड़े लोग भी घर पर मिलने आते रहते हैं,  इसलिए इस कमरे में कोई फैमिली फोटो नहीं लगाया! वैसे यह देखिए, यह मेरी मां की तस्वीर है और यह साथ में पापा है! “

पंखुड़ी उस तस्वीर को देख कर मुस्कुराने लगी उसके साथ ही एक दूसरी तस्वीर रखी थी जिसमें शेखर के हाथ में गिटार थी..

” आप गिटार भी बजाते हैं?

” हां मैं गिटार ही बजाता हूं, कॉलेज टाइम पर मुझे चस्का चढ़ा हुआ था आपने दो-तीन साथियों के साथ मिलकर अपना रॉक बैंड खोलने का! गाता भी बहुत अच्छा हूं, लेकिन पापा का सपना था कि मैं कलेक्टर बनूँ तो बस इसीलिए इस फील्ड को चुन लिया।”

” इसका मतलब गिटार आपका पहला प्यार है!”

‘हाँ वैसे कह सकते हैं कि गिटार मेरा पहला प्यार हैँ, हालांकि किसी के आने के बाद ये मेरा दूसरा प्यार बन गया?”

” ओह ओ , इसका मतलब कलेक्टर साहब की लव मैरिज है?”

“नहीं जिस से प्यार हुआ, उससे शादी नहीं हो पाई। क्योंकि मैं उसका प्यार नहीं था। उसका प्यार कोई और था। “

” मतलब?”

” मतलब ये कि मुझसे मिलने से पहले ही उसकी जिन्दगी में कोई और आ चुका था , वर्ना..

” ओह इसका मतलब अगर उनकी जिंदगी में वो कोई नहीं आता तो आप से ही उनकी शादी…

” वो सब छोड़िए आप कॉफ़ी लीजिए..!”

  शेखर की बात सुन पंखुड़ी का मन खट्टा हो चुका था। भले ही उसके साथ उसके घर आते तक वह बहुत खुश थी क्योंकि आज ही उसे पता चला था कि शेखर की शादी नहीं हुई लेकिन शेखर के मन में कोई लड़की बसी हुई है यह सुनकर पंखुड़ी को अच्छा नहीं लग रहा था।  उसने चुपचाप कॉफी का कप उठाया और बैठ कर पीने लगी…

” क्या हुआ कॉफी अच्छी नहीं लगी क्या?  आप बिल्कुल ही शांत हो गई!”

” एक्चुअली सुबह से निकली हुई हूं । और अब थकान सी लग रही है।  बस कॉफी खत्म करके घर जाना है। “

  ” आपके मेट्रोमोनियल्स के क्या हाल है?”

शेखर का सवाल पंखुड़ी को और भी ज्यादा चिढा गया..

” ठीक-ठाक चल रहा है! मम्मी ने दो-तीन लड़के शॉर्टलिस्ट करके रखे हैं, आज फ्री रही तो उनसे बातचीत करके देखूंगी। वीकेंड पर मिलने का प्लान करती हूं। अब मम्मी का दबाव बढ़ता ही जा रहा है, यूं लग रहा है दो-चार महीने में वह मेरी शादी करवा कर ही मानेंगी । “

  शेखर गहरी नजरों से पंखुड़ी को देख रहा था, उसे समझ में आने लगा था कि पंखुड़ी को उसकी कोई बात बुरी लग गई है…..

“क्या आज रात का खाना आप मेरे साथ खाना पसंद करेंगी? “

  शेखर ने जिस ढ़ंग से पूछा, पंखुड़ी से ना नहीं किया गया उसने धीमे से हां कहा और उठकर बाहर निकल गई…
  शेखर भी उसके पीछे चलते हुए बाहर चला आया..

   “शाम 8 बजे मैं आपको आपके कमरे से पिक कर लूंगा”
   हां में सर हिला कर पंखुड़ी बाहर निकल गई उसने अपनी गाड़ी निकाली और अपने हॉस्टल की तरफ बढ़ गई…..

*****

     फर्स्ट ईयर के फाइनल एग्जाम की डेट आ चुकी थी इम्तिहान होने में तीन हफ्तों का समय बाकी था और रंगोली अपनी पैकिंग कर रही थी…
  झनक उसकी पैकिंग में उसकी मदद कर रही थी, और प्राची वही एक किनारे अपने काउच पर उदास बैठी सिगरेट फूंक रही थी….
   पिछले दो तीन दिनों से लगातार अस्पतालों का चक्कर लगाने के कारण अब उसे थकान सी लगने लगी थी .. लगभग चार पांच सिगरेट फूंकने के बाद वो अगली जलाने जा रही थी कि रंगोली ने जाकर उसके हाथ से सिगरेट छीन ली..

” मैम बस कीजिए , कुछ ज्यादा ही हो गई है आज के लिए..!”

” हाऊ डेयर यू? तुमने मेरे हाथ से सिगरेट ली कैसे ? “

” मैम क्यों अपना कलेजा ऐसे फूंक रही हैं आप ? ये बहुत नुकसान करती है शरीर का !”

” मेरा जितना नुकसान होना था हो चुका  अब और बचा क्या है नुकसान के लिए … वो अपनी बात कह रही थी कि प्राची का फोन बजाने लगा …
  उसने धीमे से फोन उठा लिया …

” हैलो.. “
  कुछ देर  खामोशी से सुनने के बाद प्राची फट पडी…

” मैंने कितनी बार कहा है, मैं घर पर पढ़ाई नहीं कर पाती हूं ।  मैं घर नहीं आऊंगी। मेरी चिंता मत कीजिए,  मैं यहाँ आराम से हूं।”

” ठीक है प्राची, तुम शुरू से ही जिद्दी रही हो। तुम्हें समझाना यानी दीवार पर अपना सिर फोड़ना है । “

” तो आपको अपना सिर फोड़ने का इतना शौक क्यों है?”

” हम्म ! अब क्या कहूँ तुम्हें! मैंने तुम्हारे एकाउंट में रुपये डलवा दिए हैं , चेक कर लेना !”

” थैंक्स पर मैंने इतनी बार कहा है, कि मैं ट्यूशन से अपनी जरूरत भर के लिए कमा ही लेती हूं,  फिर आप क्यों अपने रुपये मुझ पर बर्बाद करती हैं ।”

” अपने दिमाग का कुछ ज्यादा ही घमंड है ना तुम्हें, स्कॉलरशिप मिलती है ना इसलिए इतना उड़ रही हो।  वैसे तुम्हारे पापा जो तुम्हारा खर्चा भेजते हैं वहीं रुपये भेजे है तुम्हें..”

प्राची ने बिना कुछ कहे फोन रख दिया… उसकी गहमागहमी वालीं बाते  रंगोली भी सुन चुकी थी , वो चुपचाप प्राची के सामने अपनी हथेली फैलाए खड़ी हो गई। उसमें रखी सिगरेट देख प्राची ने उठाई और फिर बिना सुलगाये ही फेंक कर बाहर बाल्कनी में निकल गई..
   रंगोली ने झनक को देखा , वो उतनी देर में प्राची के लिए डार्क कॉफ़ी बना कर ले आईं थी, वो दोनों साथ साथ प्राची के पास पहुंच गए…
  रंगोली ने कॉफ़ी का कप प्राची की तरफ़ बढ़ा दिया …
  प्राची ने उन दोनों को देख कर झटके से अपने आंसू पोंछ लिए और कॉफ़ी का कप पकड़ कर वहीं रखी कुर्सी पर बैठ गई ..
माहौल को ठीक करने का सोच कर झनक ने रंगोली से बात करनी शुरू कर दी ..

” तेरी घर पर पढ़ाई हो जाएगी जो तू परीक्षा के पहले घर जा रही है !”

” हाँ और नहीं तो क्या ? घर पर कुछ करना नहीं पड़ता ना।  मम्मी सब कर के देती है, मैं बस आराम से पढ़ाई करती हूं । उससे भी जरूरी बात ये है की मम्मी की बहुत याद आ रही है , इससे ज्यादा दिन मैं बिना मम्मी पापा से मिले नहीं रह सकती।”

बातों बातों में उन दोनों को ध्यान नहीं रहा कि ये बातेँ प्राची की तकलीफ बढ़ा सकती है। हालांकि प्राची की सबके सामने अपना दुख दिखाने की आदत नहीं थी। इसलिए वो अपनी कॉफ़ी पीती चुपचाप बैठी रही ..
  कुछ देर बाद ही तीनों अंदर आ कर रंगोली की पैकिंग में मदद करने लगे …….

क्रमशः

aparna

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