मायानगरी -35


मायानगरी  -35

    आजकल पंखुड़ी की व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी इसलिए उसका पिया से भी मिलना नहीं हो पा रहा था इसके अलावा उसकी मां उसे बार-बार फोन करके लड़कों के प्रोफाइल देखने के लिए दबाव भी डाल रही थी। आज सुबह की ओपीडी के बाद कोई खास इमरजेंसी केस नहीं होने के कारण वह थोड़ी खाली थी, और उसने अपना लैपटॉप ऑन करके मैट्रिमोनियल साइट पर चुने हुए लड़कों के प्रोफाइल देखने का अपना काम शुरू किया। हालांकि उसे यह काम कुछ खास पसंद नहीं आता था लेकिन उसकी मां का कहना था कि -“अगर हम किसी की प्रोफाइल पसंद करके हां कह देते हैं, तो फिर तुझे वह लड़का पसंद नहीं आता। इसलिए बेहतर होगा कि हमारे चुने हुए लड़कों को एक बार तू खुद देख ले और उसके बाद ही हम बात आगे बढ़ाएंगे।”
          बस अपनी मां की बात रखने के लिए ही वह दो-तीन चुने हुए प्रोफाइल पर नजर मार रही थी।
   उन प्रोफाइल्स को देखते हुए उसका ध्यान एक प्रोफाइल पर अटक गया। लड़का उसी शहर का रहने वाला था और कलेक्ट्रेट परिसर में सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर था।लड़का देखने में ठीक ठाक था और पंखुड़ी से लगभग दो साल बड़ा था। पंखुड़ी को खुद भी समझ नहीं आया कि उसे उस लड़के की प्रोफाइल में उसका पैकेज ज्यादा पसंद आ रहा था या उसका कलेक्ट्रेट परिसर में काम करना। पर जो भी हो पंखुड़ी ने उस लड़के को शॉर्टलिस्ट कर उसे अपनी तरफ से मैसेज भेज दिया..
   कुछ पांच मिनट में ही उस लड़के की तरफ से भी जवाब आ गया। लड़का भी पंखुड़ी का प्रोफाइल देख चुका था और उसे पंखुड़ी का प्रोफाइल पसंद आया था उसने अपनी तरफ से मिलने की इच्छा जताई और पूछा ही लिया….

“हम कहां मिल सकते हैं?”

” मैं आपके क्लीनिक पर आ जाती हूं!”

” या फिर मैं आपके हॉस्पिटल आ जाता हूं!”

” नहीं मैं ही आती हूं ।मैंने कभी कलेक्ट्रेट परिसर नहीं देखा, इसी बहाने कलेक्ट्रेट देखना भी हो जाएगा!”

“कलेक्ट्रेट ऐसा भी कुछ खास नहीं होता। खूब सारे सरकारी कर्मचारियों की भीड़ भाड़ इधर से उधर घूमती रहती है!”

” कोई बात नहीं, मैं मैनेज कर लूंगी। मैं ठीक आधे घंटे में पहुंच रही हूं!”

” ठीक है, मैं इंतजार करता हूं । मैं 1:30 बजे तक क्लिनिक पर रहता हूं!”

” ओके!  फिर मैं थोड़ी देर में यहां से निकलती हूं आज पेशेंट कम है!”

  पंखुड़ी के मन में उत्साह छाया हुआ था लेकिन यह उत्साह उस लड़के से मिलने का नहीं लग रहा था। शायद कलेक्ट्रेट परिसर में लड़के का क्लीनिक था इस बात से पंखुड़ी कहीं अधिक उत्साहित लग रही थी।  कुछ फाइल में पेशेंट की डेली अपडेट उतारने के बाद उसने नर्स को बुला लिया..

” सिस्टर जी, मैं थोड़ा जरूरी काम से बाहर जा रही हूं अगर कोई भी अर्जेंसी होती है तो मुझे तुरंत कॉल कीजिएगा मैं पहुंच जाऊंगी।

” ओके मैम!”
      नर्स ने मुस्कुराकर पंखुड़ी से कहा और पंखुड़ी अपना स्टैथो और एप्रन उठाएं बाहर की तरफ निकल गई वह अभी अपनी गाड़ी पार्किंग में से निकाल ही रही थी कि उसका फोन बजने लगा अंदर से नर्स का ही फोन था।

   “क्या हो गया सिस्टर? मैं तो अब तक अस्पताल से निकल भी नहीं पाई!”

“मैम कल रात जो  एंजियोप्लास्टी हुई है उस पेशेंट का पल्स डाउन हो रहा है मैम!”

” व्हाट ? ऐसे कैसे डाउन हो सकता है, वो तो स्टेबल थे। मैं तुरंत आ रही हूं।”

   पंखुड़ी उल्टे पैरों भागती हुई अस्पताल में दाखिल हो गई। अंदर जाते जाते  उसने मृत्युंजय को भी कॉल लगा लिया था!
   एक दिन पहले ही जयेश सक्सेना यानी गौरी के पिता का ऑपरेशन हुआ था और उनकी सर्जरी सफल रही थी।  उस सर्जरी में जय और पंखुड़ी ने ही कार्डियोलॉजिस्ट को असिस्ट किया था, और इसीलिए जय रात भर अस्पताल में नाइट शिफ्ट करके सुबह ही गया था।
      पंखुड़ी की सुबह की शिफ्ट थी लेकिन अब दोपहर के लगभग बारह बज रहे थे और इस समय पर मरीज को कोई भी तकलीफ होना थोड़ा घबराहट पैदा करने वाली बात थी।
    पंखुड़ी तुरंत आईसीयू में पहुंच गई और मरीज की जांच करते हुए उसे क्या दिक्कत आ रही है उस समस्या को आखिर पकड़ ही लिया।
    गौरी भी रात भर अस्पताल में बैठी थी और सुबह उसे क्लास अटेंड करनी थी इसलिए सुबह अपने पिता को ठीक-ठाक हालत में देखकर वह भी कॉलेज के लिए निकल गई थी।
    पंखुड़ी ने कुछ एक-आध दवा कम करके दूसरी कुछ दवाई मरीज को दी और उनकी हालत में काफी सुधार होने लगा उतनी देर में ही मृत्युंजय भी वहां पहुंच गया।

” क्या हुआ पंखुड़ी, एनीथिंग सीरियस?”

” अब सब ठीक है मैंने घबराहट में तुम्हें भी कॉल करके परेशान कर दिया!”

” अरे नहीं यार मैं तो वैसे भी आने ही वाला था मैं अपनी नींद पूरी कर चुका था । तुम्हारा भी जाने का वक्त हो गया है तुम निकलो, अब मैं देख लूंगा!”

” तुम खाना खाकर आए हो?”

” अरे कहां का खाना ? तुम्हारे फोन से तो नींद खुली  और बस फिर चेहरे पर पानी के छींटे मारे और तुरंत दौड़ता हुआ यहां चला आया देखो लोअर टीशर्ट में ही हूं, चेंज तक नहीं किया!”

” तो चलो कैंटीन में कुछ खा लेते हैं!”

  मृत्युंजय ने एक नजर जयेश सक्सेना पर डाली और उनके सारे वाइटल चेक करने के बाद नर्स से उनकी फाइल लेकर पंखुड़ी की लिखी दवाइयों को देखने लगा।
    पंखुड़ी ने मृत्युंजय को उन दवाइयों के घटाने बढ़ाने के बारे में बताया और दोनों ने एक साथ डिस्कस करके कुछ एकाध इंजेक्शन नर्स को लगाने के लिए सलाह दी और फाइल नर्स के सुपुर्द करके कैंटीन की तरफ निकल गए…

   वह दोनों कमरे से निकलकर कैंटीन की तरफ जा रहे थे कि सामने से आती गौरी पर उन दोनों की नजर पड़ गई। गौरी ने उन दोनों को देखते ही उन्हें नमस्ते किया और अपने पिता की सेहत के बारे में पंखुड़ी से पूछने लगी। पंखुड़ी ने उसे सब कुछ बताने के बाद उसे भी अपने साथ कैंटीन के लिए ले लिया…

” गौरी तुम भी तो सुबह अस्पताल से ही डायरेक्ट कॉलेज निकल गई थी, और अब कॉलेज से सीधा यहां आ रही हो। इसका मतलब तुमने भी कुछ खाया तो होगा नहीं। चलो हमारे साथ कैंटीन में ही खा लेना!”

गौरी ने हां में सिर हिलाया और उन दोनों के साथ कैंटीन की तरफ बढ़ गई । तीनों कैंटीन में जाकर बैठ गए और आर्डर देने के लिए वेटर का इंतजार कर रहे थे कि मृत्युंजय ने पंखुड़ी से बाकी मरीजों के बारे में पूछना शुरु कर दिया..
   बाकी मरीजों के बारे में बताते हुए पंखुड़ी को ध्यान आया कि आज मरीज कम होने के कारण ही वह शॉर्टलिस्ट किए एक लड़के से मिलने निकल रही थी, कि उसी समय उसे गौरी के पिता की तबीयत बिगड़ जाने के कारण वापस लौटना पड़ा था। यह याद आते ही वह अपनी सीट से उछल कर खड़ी हो गई…..

“क्या हो गया पंखुड़ी तुम्हारी सीट पर कॉकरोच है क्या?”

“अरे नहीं जय!  मैं भूल कैसे गई यार! मैं अस्पताल से किसी जरूरी काम से निकल रही थी, कि उसी वक्त आई सी यू वाले मरीज की तबीयत बिगड़ी और मुझे वापस आना पड़ा और देखो मैं इस सब चक्कर में यही भूल गई कि मुझे काम से जाना था!”

“मार्केट का कोई काम था क्या?”

“हां बस ऐसा ही कुछ समझ लो, मैं निकलती हूं तुम दोनों बैठो, ओके!”

“अरे कम से कम कॉफी तो पी के जाओ। सबको खाने पीने पर लेक्चर देती हो, पर तुमने खुद सुबह से कुछ खाया भी है?”

मृत्युंजय के पूछने पर उसे याद आया कि उसने वाकई सुबह से एक कप कॉफी के अलावा कुछ भी नहीं पिया था, पर इस वक्त उसे निकलने की इतनी जल्दी थी कि उसने मृत्युंजय से हां कह दिया और अपना पर्स उठाएं एक तरह से भागती हुई वहां से निकल गई ।
    तेज कदमों से आगे बढ़ते हुए उसने घड़ी पर नजर डाली दोपहर के 2:30 बज चुके थे। उसे पूरा विश्वास था कि वह लड़का क्लीनिक बंद करके अपने कमरे के लिए निकल चुका होगा। फिर भी जाने क्यों पंखुड़ी का मन नहीं माना और उसने अपनी स्कूटी कलेक्ट्रेट परिसर की तरफ बढ़ा ली।

   कलेक्ट्रेट ऑफिस में पार्किंग में गाड़ी डालने के बाद उसने देखा ऑफिस परिसर बहुत बड़ा था। बीच में गोलाकार गार्डन था जिसमें चारों तरफ कई तरह के ऑफिस बने हुए थे। सबसे किनारे पर एक बहुत ऊंची पुरानी लेकिन मजबूत बिल्डिंग थी, जो कलेक्टर ऑफिस था। लाल पत्थरों की बनी उस ऑफिस को देखकर उसे पता नहीं क्यों दिल में एक गुदगुदी सी महसूस होने लगी लेकिन तुरंत ही उसने अपने सर को झटका दे दिया…
…  ‘ “पता नहीं भगवान ने मेरे नसीब में क्या लिखा है? पहली बार तो कोई लड़का ढंग का लग रहा था, वह भी इतनी बुरी तरीके से शादीशुदा निकला कि उसकी बेटी मुझसे सिर्फ सात आठ साल ही छोटी है।   कमबख्त को क्या पड़ी थी इतनी जल्दी शादी करने की !’
   शेखर के बारे में मन ही मन सोचती पंखुड़ी इधर-उधर देखती हुई डिस्पेंसरी को तलाश कर रही थी।
     अचानक उसकी नजर दूर  बनी एक छोटी सी डिस्पेंसरी पर पड़ गई। कांच की चौड़ी खिड़कियों और लकड़ी के मजबूत दरवाजे के ऊपर उस बिल्डिंग पर शासकीय औषधालय लिखा हुआ था।
दूर से देख कर ही उसे समझ में आ गया था कि डिस्पेंसरी बंद हो चुकी है। फिर भी वह धीमे कदमों से चलते हुए वहां तक पहुंच गई, डिस्पेंसरी बंद देखकर उसके मन में क्यों लड्डू फूट रहे थे उसे खुद भी समझ नहीं आया। उसने बाहर बैठे एक चौकीदार से पूछ लिया….

” क्यों भैया डिस्पेंसरी बंद हो गई है क्या?”

हां मैडम सुबह 8 बजे से 1:30 बजे तक खुलती है और शाम को 5 से 6!”

“दोनों वक्त डॉक्टर साहब मौजूद रहते हैं?”

पंखुड़ी के सवाल पर उस पिओन ने घूर कर पंखुड़ी को देखा,

” पत्रकार हो क्या ? सरकारी डॉक्टरों के पीछे पड़ी हो? दोनों समय डॉक्टर मौजूद रहता है भाई!”

” अरे नहीं भाई मैं पत्रकार नहीं हूं। वह तो बस डॉक्टर साहब से मिलने आई थी,  पर लगता है यहां के सारे ऑफिस इस वक्त बंद हो जाते हैं..!”

” कलेक्टर ऑफिस खुला रहता है बस!”

” पर कलेक्टर साहब तो नहीं होंगे ना वह भी तो खाना खाने चले गए होंगे!”

” मेरी जानकारी में मुझे जितना पता है  कलेक्टर साहब को दोपहर का खाना खाने जाते मैंने कभी नहीं देखा। सुबह नौ साढ़े नौ बजे आते हैं उसके बाद सीधे आठ 8:30 बजे ही निकलते हैं।  हां अगर बीच में कहीं दौरा हुआ तब चले जाते हैं।”

“तो क्या अभी भी कलेक्टर साहब अपने ऑफिस में मौजूद होंगे!”

“हां होंगे मैडम ! आज तो मंगलवार है, टीएल मीटिंग रहती है ना। कलेक्टर साहब मीटिंग ले रहे होंगे!”

“कलेक्टर साहब का ऑफिस कौन सा है? और अगर उनसे मिलना हो तो कैसे मिल सकती हूं?”

“अपॉइंटमेंट पहले से ले रखा है आपने?”

“नहीं तो! नहीं ले रखा आप दिलवा दो ना भैया!”

“अरे हम नहीं दिलवा सकते मैडम! अपॉइंटमेंट तो आपको कलेक्टर ऑफिस के पी ए के द्वारा ही मिल पाएगा। जाकर एक बार देख लीजिएगा। टीएल मीटिंग से इतनी जल्दी साहब फुर्सत नहीं पाते हैं  उसके बाद आज ब्रिज का टेंडर भी निकलने वाला था ,तो कांट्रेक्टर लोगों के साथ उनकी मीटिंग होनी है। बस उसी सब में व्यस्त होंगे। शाम आठ बजे के पहले उनके दर्शन मिलना मुश्किल है, पर आप एक बार जाकर उनके ऑफिस के सामने देख लीजिए वह सामने दिख रहा है उनका ऑफ़िस।”

  “थैंक्यू भैया! वैसे कलेक्टर साहब के बीवी बच्चे तो बड़े परेशान रहते होंगे , अगर यह दिन रात इसी तरह ऑफिस में पड़े रहते हैं तो घर का क्या होता होगा?”

“कहां के बीवी बच्चे? साहब की शादी नहीं हुई है।”

  “पर मैंने तो सुना था कि इनकी सोलह सत्रह साल की बेटी है जिसका मेडिकल में एडमिशन करवाना है?”

“किसी और कलेक्टर के बारे में सुना होगा  मैडम। साहब तो खुद अभी सिर्फ इकतीस साल के हैं। इनकी कहां से सोलह सत्रह साल की बेटी हो जाएगी..

“अच्छा आर यू श्योर? मेरा मतलब पक्का?”

“हां भाई पक्का! अभी जो हमारे कलेक्टर साहब हैं, वह अखंड कुंवारे हैं, नाम है शेखर मिश्रा!”

  पंखुड़ी के मन में शहनाइयां बजने लगी उसके चेहरे पर भी बजती हुई शहनाईयों का प्रभाव नजर आ रहा था, मुस्कुराती हुई पंखुड़ी कलेक्टर ऑफिस की तरफ बढ़ गयी।

******

     पिया ने अपने सामने खुली रखी किताब बंद कर के एक तरफ़ रखी और खिड़की पर आकर खड़ी हो गयी.. उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। जैसे जैसे उसकी शादी की तारिख नजदीक आती जा रही थी एक अंजाना सा डर  उसके मन पर काबिज होता जा रहा था ।
   उसे शादी कर लेनी चाहिए या फिर उसे समर को एक और मौका देना चाहिए , वो सोच नहीं पा रही थी।
  
   मन की बेचैनी किसी सूरत कम नहीं हो पा रही थी , आखिर मन को शांत करने के लिए वो मंदिर की तरफ़ बढ़ गयी….
उसे समर से जुड़ी एक एक बात याद आ रही थी , आखिरी बार उन लोगों का झगड़ा कितनी छोटी सी बात पर हो गया था लेकिन बिल्कुल ही ध्यान ना दी जाए ऐसी भी बात नहीं थी ।
  आखिर बात एक लड़की की थी , उसकी जिंदगी और मौत की बात थी , और उस वक़्त भी समर के ऊपर अपनी स्वामिभक्ति का भूत सवार था ।
  
  उसे याद आ रही थी, वो शाम जब उस लड़की हाँ अदिति नाम था उसका ,महज बाईस साल की लड़की की लाश उसके सामने पडी थी और वो उसकी लाश देख भावुक हो उठी थी ।
सिर्फ उसका ही नहीं यही हाल उसके साथ खड़ी निरमा का भी था. …
  जब उसने निरमा से ये बात कही थी कि लड़की ने आत्महत्या नहीं की है बल्कि उसकी हत्या की गई है। तब समर ने उसे एकदम से चुप करवा दिया था , ये कह कर की ये बात अभी बाहर नहीं आनी चाहिए ।
राजा साहब के चुनाव नतीजों के बारे में सोचकर उस वक़्त वो और निरमा भी चुप रह गए थे लेकिन अब तो राजा साहब को मंत्री बने भी महीना भर बीत चुका था , और अब भी जैसे ही वो समर से उस लड़की के बारे में बात करने जाती वो किसी ना किसी बहाने उसे चुप करवा जाता था ।
   समर को उस लड़की के माता पिता से निपटना तो नहीं पड़ा था ना वो भार तो उसी के माथे पड़ा था..
  उसे आज भी वो शाम याद आकर सिहरन सी हो उठती थी जब अदिति की माँ अदिति की बॉडी देख कर गश खाकर उसी की बाहों में गिर पडी थीं। उन्हें सम्भालने में वो खुद भी कहाँ सम्भल पा रही थी ! होश में आते ही उसकी माँ का रोना उसका भी दिल दहला गया था ।
   सही कहती है उसकी माँ उसे डॉक्टर नहीं बनना चाहिए था। वो तो अपने हर एक मरीज़ के दर्द से दुखी हो उठती थी और यहीं कह कर तो उसे समर भी झिड़क गया था ..

  उस शाम जब अदिति की माँ को समझा बुझा कर उसने भेजा और थकी सी अपने केबिन में आकर बैठी ही थी कि तेज़ कदमों से चलते समर उसके कमरे में चला आया था …

“क्या कर रही हो तुम ?”

“क्या हुआ समर?”

” क्या जरूरत थी उस लड़की की रिपोर्ट को पुलिस स्टेशन भेजने की ! मैंने मना किया था ना , की अभी कुछ समय शांत रहो मैं उस लड़की की मौत जाया नहीं जाने दूँगा और उसे भी इंसाफ दिलवा कर रहूँगा पर तुम्हारे अंदर धैर्य नाम की चीज है ही नहीं । पता नहीं हर बात की इतनी हडबडी क्यों मची रहती है ।”

” हडबडी मची रहती है, वो भी मुझे । बल्कि तुम्हें राजा साहब के कामों के अलावा कोई और काम ना तो दिखाई देता है ना सुनाई देता है । और अगर कोई तुम्हारे खिलाफ जा कर कुछ कर दे तो तुम्हारी तानाशाही शुरू हो जाती है ।

” तानाशाही ? मैं वाकई तुम्हें तानाशाह लगता हूँ? और हर बात में राजा साहब को बीच में लाने की क्या जरूरत है ?”

” जरूरत है क्योंकि सावन के अंधे की तरह तुम्हें भी और कुछ दिखाई नहीं देता समर …

” तुम अपने होश में नहीं हो, उस लड़की की माँ से मिलने के बाद इमोशनल हो रही हो।  तुम्हें डॉक्टर किसने बना दिया पिया? तुम डॉक्टर बनने के लायक हो ही नहीं , इतनी भावुक डॉक्टर तो किसी दिन अपने मरीजों के दुख दर्द देखते सहते खुद ही ..

“हाँ बोल दो की एक दिन अपनी कोरी भावुकता में मेरा ही हार्ट फेल हो जाएगा और मर जाऊँगी.. बोलते बोलते रुक क्यों गए ? बोलो ना ।”

पिया की कड़ी बात सुनकर समर उठ कर जाने लगा कि पिया अपनी जगह से उठ कर उसके सामने चली आईं….

” जा ही रहे हो तो ये अपनी अंगुठी भी साथ ले जाओ।” और गुस्से में पिया ने अंगुठी निकाल कर समर के हाथ में रख दी थी ..
   गुस्से में समर भी अंगुठी अपनी जेब में डाल कर निकल गया…  ….

   उसके जाने के बाद पिया ठगी सी खड़ी रह गई थी , आज अगर वो भावुकता में बह कर कुछ ज्यादा बोल भी गईं तो समर ने उसे समझने की जगह उससे नाता ही तोड़ लिया था ….
   गुस्से में उसने समर के बाहर जाते ही उसके मुहँ पर अपने केबिन का दरवाजा जोर से बंद कर दिया था और सिसक उठी थी …..

क्रमशः

aparna..

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