
मायानगरी- 34
गौरी के पिता जयेश अंदर आराम कर रहे थे और इसलिए गौरी आईसीयू में उनके कमरे के बाहर बैठे उनके जागने का इंतजार कर रही थी। पंखुड़ी ने उससे कहा भी कि वह भी अपने कमरे में जाकर आराम कर ले, जैसे ही उसके पिताजी को उसकी जरूरत महसूस होगी पंखुड़ी उसे फोन करके बुला लेगी लेकिन गौरी का वहां से जाने का मन ही नहीं किया और वही बाहर बेंच पर बैठी रही।
वह वहां बैठी मन ही मन कुछ सोच रही थी कि कॉरिडोर में बाहरी दरवाजे से आती हुई दो औरतें उसे दिखाई दी। उन दोनों ही औरतों ने भारी-भरकम साड़ियां पहन रखी थी इसके साथ ही सोने के झिलमिलाते जेवर भी पहन रखे थे। उन दोनों को देख कर ही समझ में आ रहा था कि दोनों खानदानी रईस औरतें हैं। उन दोनों औरतों के पीछे दो लड़कियां भी साथ साथ चलती हुई आ रही थी। उनमें से एक लड़की जिसने जींस के ऊपर लंबी सी कुर्ती जैसी टॉप पहन रखी थी वह लगातार अपने मोबाइल में किसी से चैटिंग करती चल रही थी, और साथ वाली दूसरी लड़की जिसने सलवार कुर्ता डाला हुआ था दोनों हाथों में मोटे मोटे झोले पकड़ी हुई थी जिनमें तरह तरह के फल और खाने पीने की चीजों से भरे डब्बे नजर आ रहे थे।
देख कर ही समझ में आ रहा था कि वह दूसरी लड़की जिसने सामान पकड़ रखा हैं वह उन दोनों औरतों के घर पर काम करने वाली नौकरानी थी।
वह दोनों ही औरतें आई और गौरी के सामने एक पल ठहर कर उन्होंने भुवन के कमरे की ओर देखा और दरवाजा खोलकर भीतर चली गई।
दरवाजा खुला ही था और वह चारों लोग अंदर चले गए! मोबाइल पकड़ी लड़की एक किनारे लगी कुर्सी पकड़ कर बैठ गई और मोबाइल में ही डूबी रही।
” सुमि वो सारा सामान उधर किनारे टेबल पर जमा दो समझी?”
जिस औरत ने सुमि को सामान जमाने का आर्डर दिया वही भुवन के पलंग के पास से खड़े खड़े ही बाहर गौरी को देखकर आवाज लगाने लगी..
” ए लड़की क्या नाम है तुम्हारा? यहां कोई डॉक्टर नहीं है क्या अभी?”
गौरी को लगा कि भुवन की ड्रिप में या किसी और चीज में कोई समस्या है, गौरी उठकर उनके कमरे के दरवाजे तक पहुंच गई
” कहीं कोई प्रॉब्लम है आपको?”
“तुम डॉक्टर हो?”
” हां लेकिन अभी पढ़ाई कर रही हूं, पर अगर यहां अभी कोई समस्या है तो मैं जांच कर देख सकती हूं !”
“अरे नहीं तुम्हें थोड़ी ना पूछ रहे थे हम, हमारे पूछने का मतलब यह था कि हमारे बच्चे को अकेले कमरे में छोड़ा किसने? यहां इस वक्त कोई डॉक्टर मौजूद काहे नहीं है?”
गौरी ने धीरे से हां में सिर हिलाया और उस औरत को समझाने लगी
” मैं अभी इनकी डॉक्टर को बुला कर ले आती हूं आप आराम से बैठे, वैसे इनकी हालत पहले से काफी ठीक है बस अभी सो रहे हैं!”
इतनी देर में दूसरी औरत जो एक किनारे बैठे यह सारा सब कुछ देख रही थी थोड़ा तीखी आवाज में गौरी से बोल पड़ी…
“पढ़ रही हो ना अभी, तो फिर ज्ञान काहे झाड़ रही हो? जाओ चुपचाप इनकी डॉक्टर को बुला कर ले आओ। तुम शांत रहो छोटी, डॉक्टर आ जाए तब बात करना किसी भी ऐरे गैरों से बचुआ के बारे में पूछोगी तो कुछ थोड़ी ना पता चलेगा!”
उन औरतों के मुंह लगना बेकार है यह समझ में आते ही गौरी चुपचाप वहां से निकल कर डॉक्टर केबिन की तरफ बढ़ गई और कुछ देर में पंखुड़ी को साथ लिए वहां चली आई..
पंखुड़ी ने आते ही उन दोनों औरतों की तरफ देखा और फिर भुवन की तरफ देख कर उसकी फाइल उठाकर जांचने लगी इतनी देर में भुवन की नींद भी खुल चुकी थी और वह अपने पलंग पर पीछे टेक लगाएं बैठ चुका था।
” मैं इनकी डॉक्टर हूं पंखुड़ी, मेरे ख्याल से भुवन अब पूरी तरह स्वस्थ है और आप लोग इन्हें घर लेकर जा सकते हैं।”
” अरे नहीं ऐसे कैसे घर ले जाएं अभी , अभी तो बिना सहारे के चल फिर भी नहीं पाता हमारा बेटा , क्यों जिज्जी, का कहती हैं आप?”
“ए डॉक्टर तुम हमको ये सब ना बताओ की हमको लड़के को कब तक यहां रखना है और कब घर ले जाना है ? तुम बस इलाज करो समझी! पैसा जमा कर रहे हैं ना, उस पर यूनिवर्सिटी का भी मोटा चंदा देते हैं फिर हम कित्ते भी दिन अपने बच्चे को यहाँ रक्खें?, तुम्हारे पेट में काहे जलन हो रहीं है?.”
“ये क्या तरिका है आपके बात करने का , देखने में तो सभ्य घर की लग रहीं है आप , और आपको आपके बेटे की डॉक्टर से बात करने की तमीज नहीं है !”
पंखुड़ी की तीखी आवाज सुनते ही वो औरत कुछ ढीली पड़ गई ..
” अरे आप गुस्सा मत करिए डॉक्टर साहब, बात ये है की जवान जहान लड़का ऐसे बिस्तर पर पड़ा रहे अच्छा नहीं लगता ना । हम नेता जी की धर्मपत्नी हैं अम्बर ! और ये हमारी देवरानी सुरेखा है, भुवन इसी का बेटा है। और वो सामने इसकी बेटी बैठी है देवयानी।
हमारा लड़का यहीं पढ़ता है…
पंखुड़ी के तेवर देखते ही नेता जी की धर्मपत्नी सीधे रास्ते पर चलती उसे पूरे घर का पात्र परिचय करवाने लगी उसी सब में वेदांत भी वहाँ पहुँच गया ..
“अम्मा अब तुम लोग तो यहां रुकोगी ना? हम कॉलेज के लिए निकलें ?”
वेदांत के साथ ही उसकी अम्मा और चाची अस्पताल आईं थीं और उन लोगों को गेट पर उतार कर वो बाहर मिल गए अपने दोस्तों के साथ पास की टपरी पर सिगरेट फूंकने चला गया था.
वहीं से वापस आकर कॉलेज की तरफ़ निकलने से पहले वो उन लोगों से एक बार मिलने चला आया था , उसने सोचा था इसी बहाने एक बार भुवन को भी देख लेगा ..
भुवन के कमरे में ही पंखुड़ी के साथ खड़ी गौरी को देख वो आश्चर्य में डूब गया …” तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
चुपचाप खड़ी गौरी उसके सवाल पर हड़बड़ा गई..
” मेरे पापा भी यहाँ एडमिट है!” उसने हाथ की उंगली से सामने के कमरें की तरफ़ इशारा कर दिया !
वेदांत ने एक नजर उस कमरें पर डाली और अपनी अम्मा और चाची के पैर छू कर बाहर निकल गया ..
उसके निकलते ही गौरी को अचानक याद आया कि उसके पापा को अस्पताल पहुंचाने वाला वेदांत ही था , वो भाग कर उसके पीछे कमरे से बाहर निकल गयी …
” सुनो !” उसने पीछे से वेदांत को आवाज लगा दी , उसकी आवाज सुन वो रुक कर उसकी तरफ़ पलट गया ।
” क्या है ?”
” थैंक्स! कल रात तुम मेरे पापा को सही समय पर अस्पताल ले आए , उसके लिए थैंक्स!”
” हम्म !”
अपने खड़ूस अंदाज में जवाब देकर वो जाने को मुड़ गया कि अचानक कुछ सोचकर वो रुक गया …
” तुम्हारा घर जब यहाँ है तो तुम हॉस्टल में काहे रहती हो?”
“यहाँ हमारा एक फ्लैट है, जिसमें मैं बचपन में रहा करती थी, फिर पापा का ट्रांसफर हुआ और हम दूसरे शहर चले गए। कल पापा अपने किसी ऑफ़िस के काम से यहाँ आए थे ,रात देर हो गई इसलिए फ्लैट पर रुकने चले गए..वैसे अब उसमें कोई नहीं रहता । मुझे अकेले रहने में डर लगता है इसलिए पापा ने मुझे हॉस्टल में रखा है। “
“हम्म!” छोटा सा जबाव देकर वो तेज़ कदमों से बाहर निकल गया। वो जा रहा था कि सामने से आते मृत्युंजय पर उसकी नजर पडी और उसका मुहँ कसैला हो गया , ऐसा ही कुछ मृत्युंजय ने भी उसे देख कर महसूस किया और एक उपेक्षा भरी नजर वेदांत पर डाल कर आगे गौरी की तरफ़ बढ़ गया । उसके हाथ में एक छोटा सा पैकेट था , वो अपने कमरें से गौरी के लिए नाश्ता बना कर लाया था ।
गौरी मृत्युंजय को देख मुस्करा उठी ..
“आप बहुत जल्दी वापस आ गए सर !’
” हाँ रूम पर जाने के बाद सोचा था दो चार घंटे की नींद पूरी कर के आऊंगा लेकिन नींद ही नहीं आ रही थी , फिर दोपहर के वक़्त जो ऑनलाईन क्लास लेता हूं उसे सुबह के समय पर शेड्यूल किया और एक घंटे पढ़ने के बाद सोचा अब अस्पताल का चक्कर लगा लिया जाए , वैसे तुम्हारे लिए नाश्ता बना कर लाया हूं , खाकर देखो कैसा है !”
गौरी की मुस्कान के पीछे छिपा दर्द झलक उठा ..
” सर इस वक़्त बिल्कुल भूख नहीं है , एक बार पापा ठीक हों जाएं तभी ठीक लगेगा !”
” कैसी बेवक़ूफ़ सी बात है ये गौरी! , तुम डॉक्टर हो कर ऐसी बात कैसे कर सकती हो ? तुम अच्छे से जानती हो कि उनका इलाज एंजियो ही है और उसमें अभी कल तक का वक्त तो लगेगा ही , और उसके बाद भी दो चार दिन पोस्ट ऑपरेटिव केयर में लग जाएगा तो क्या तुम पांच सात दिन कुछ नहीं खाओगी । बचपना छोड़ कर चुपचाप खा लो ।
उनकी सेवा करने के लिए भी तुम्हारा स्वस्थ होना जरूरी है ना । “
मृत्युंजय ने टिफिन बॉक्स खोल कर सैंडविच निकाला और गौरी के मुहँ के पास ले गया, गौरी ने धीमे से एक निवाला लिया और सैंडविच अपने हाथ में ले लिया!
भुवन के दोनों परम मित्र वहाँ से एक तरफ़ दीवार की ओट में खड़े ये सारा नजारा देख रहे थे …
उन दोनों के चेहरे पर एक शैतान सी मुस्कान उभर आईं…
उनमें से एक कोई फिल्मी गाना गुनगुनाने लगा….
” मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को
बेला महका रे महका आधी रात को..
किसने बँसी बजाई आधी रात को…
वह लड़का शरारत से गौरी मृत्युंजय को देखते हुए इस गीत को गुनगुनाते हुए पीछे मुड़ा ही था कि उसकी नाक पर एक जोर का घूंसा पड़ा..
ठीक नाक के बीचो-बीच पड़ने के कारण वह एकदम से तिलमिला कर रह गया लेकिन छटपटाहट इतनी थी कि वह अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा संभाले नीचे की ओर झुक गया तभी दूसरे लड़के के गाल पर एक जोर का करारा तमाचा पड़ा और उसे वीणा के सातो सुर अपने कान में बजते सुनाई देने लगे…अपने कान को इधर उधर टटोलता वो सही करने की कोशिश में था कि प्राची उन पर बिफर उठी…
“आइन्दा उसकी तरफ़ आँख उठा कर देखा भी ना तो आंखों फोड़ दूंगी ।”
दोनों लड़के आंखों फाड़े सामने खड़ी उस लड़की का गुस्से से तमतमाया चेहरा देख रहे थे …
उन दोनों को ऐसे देख प्राची को हंसी आ गई , और हंसते हुए उसने उस लड़के के गाने के आगे की पंक्ति पूरी कर दी….
“रात गुनती रहेगी आधी बात को
आधी बातों की पीर आधी रात को।।
रात पूरी हो कैसे आधी रात को
रात होती शुरू है आधी रात को……
अब रात रात भर जग कर ये जो पीर मैंने तुम दोनों को दी है उसे सहना और गुनगुनाते रहना ..
रात गुनती रहेगी आधी बात को
आधी बातों की पीर आधी रात को….
एक बार फिर गुनगुनाते हुए वो स्थिर कदमों से चलती बाहर निकल गयी …..
क्रमशः
aparna…
