
मायानगरी -31
कांच के दरवाजे के बाहर खड़े वो लोग अंदर मृत्युंजय और पंखुड़ी को भैया जी के बारे में कुछ बातेँ करते बस देख पा रहे थे, उन्हें सुनाई कुछ भी नहीं दे रहा था और अब उन सबका गुस्सा उफान पर था ….
“इस डॉक्टर को तो जिंदा नहीं छोड़ना है मैंने!”
उनमें से वहीं थप्पड़ खा चुका चेला गुस्से में चिल्लाया और बाकी लोगों ने उसके कन्धे पर हाथ रख उसका समर्थन कर दिया…
भुवन अब आराम से सो रहा था लेकिन बाहर खड़ी उसकी चंडाल चौकड़ी को पल भर का आराम नहीं था..
उसकी हालत की ख़बर उसके घर भी पहुंच चुकी थी ..
कुछ देर में ही वेदांत अपनी सिरफिरी टोली के साथ वहाँ पहुँच गया ..
“अच्छा हुआ वेद भैया आप चले आए , ये अस्पताल वालों की लापरवाही का क्या बताएं आपको ?”
“तुमको कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है, हम खुद पता कर लेंगे ।”
वेदांत गुस्से में डॉक्टर केबिन की तरफ़ बढ़ गया …
गुस्से में अंदर जाकर वो पंखुड़ी और मृत्युंजय के सामने की कुर्सी खिंच कर बैठने जा रहा था कि मृत्युंजय गरज उठा …
“जब तक बैठने ना कहा जाए, चुपचाप खड़े रहो! ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं ..”
मृत्युंजय की बात सुनकर वेदांत का गुस्सा और भड़क गया, और पंखुड़ी आश्चर्य से जय को देखने लगी , उसे एकाएक समझ नहीं आया कि अचानक उसे हुआ क्या जो वो इतना ज़ोर से वेदांत को डपट रहा है …पर तुरंत ही उसे समझ आ गया कि ये फ़िल्मी डायलॉग है।उतने में ही जय भी हंसने लगा ….
” अरे मूवी का डायलॉग बोल रहा था यार तुम बैठो -बैठो किसके साथ हो?”
वैसे तो वेदांत को पूरी मायानगरी पहचानती थी लेकिन मृत्युंजय को अपने बाप के पैसों के दम पर रौब झाड़ने वालों से हमेशा ही चिढ़ होती थी इसलिए जानबूझकर उसने ऐसा अभिनय किया कि जैसे वह वेदांत को पहचान नहीं पाया…
पहले ही मृत्युंजय का डायलॉग सुनकर वेदांत खीझा हुआ था उस पर मृत्युंजय का यह पूछना कि वह किसके साथ है उसके गुस्से को और भड़का गया उसने कुर्सी जोर से खींच कर पीछे हटाई और टेबल पर हाथ पटकते हुए उस कुर्सी पर बैठ गया…
” हमें नहीं पहचानने की कीमत कभी-कभी बहुत भारी पड़ जाती है लोगों को ।
पर वह छोड़ो, हम भुवन भैया के छोटे भाई हैं, वो जो वहां आईसीयू में पड़े हैं ना हमारे भैया हैं वो! तो जरा उनका ठीक से ध्यान रखा जाए, वरना आप लोग यह तो जानते ही होंगे कि मायानगरी को डोनेशन देने वालों में हमारे फादर साहब का भी बहुत अहम रोल है! राजा साहब की बनाई यूनिवर्सिटी है इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा फंड राज महल से आता है बहुत से और तरीकों से भी माया नगरी में पैसे पहुंचते हैं। और अगर एक बार हमने अस्पताल और आप लोगों की लापरवाही के बारे में अपने बाबू जी को बता दिया ना तो याद रखिएगा आप लोगों को ऐसे सस्पेंड किया जाएगा कि फिर किसी और अस्पताल में नौकरी करने लायक नहीं रह जाएंगे…”
वेदांत की खरी-खोटी सुनकर मृत्युंजय का भी पारा उबलने लगा..
“धमकी किसको दे रहा है बे? तू होगा बड़े बाप की बिगड़ी औलाद, लेकिन मैंने आज तक जो भी कमाया है अपनी मेहनत से कमाया है और इस नाते मैं तुझ से कहीं ज्यादा ऊपर हूं समझा? तेरी इन टुच्ची धमकियों से वो डरते होंगे जो तेरे पीछे पीछे हाथ बांधे घूमते हैं और ये भी जान ले की ये मन ही मन तुझे गालियां भी देते होंगे.. तेरे आगे पीछे इनके घूमने का कारण तू या तेरा अपना व्यक्तित्व नहीं तेरे बाप का पैसा है!”
“तू कुछ ज्यादा ही बक रहा है डॉक्टर! अपने आप पर इतना घमंड मत कर। साला तुम लोग हो किस काम के डॉक्टर ? एक तो भर भर के टेस्ट करवाते हो, उसके बाद भी तुम लोगों को कुछ समझ ही नहीं आता है । पढ़ाई क्यों कर रहे हो, इससे अच्छा तो घर बैठकर डिग्री खरीद लेते।
और उस पर अकड़ देखो इनकी, साले मारकर कहां तेरी लाश फेंक देंगे पता भी नहीं चलेगा तुझे समझा! और तेरे मां-बाप ढूंढते रह जाएंगे कि, उनका स्मार्ट हैंडसम डॉक्टर बेटा अचानक गायब कहां हो क्या?”
“तेरे जैसों की धमकियों से मैं नहीं डरने वाला हूं, जा जो सब कर सकता है, कर ले। एक तो तुम लोग हमें हमारे मरीजों का ट्रीटमेंट चैन से करने नहीं देते हो हम कुछ भी करने जाए तो तुम तरह तरह के इल्जाम लगाते हो। कहते हो हम बार-बार टेस्ट इसलिए करवाते हैं कि हमें उसका कमीशन मिलता है, अरे बेवकूफ शरीर को ऊपर से देख कर हम नहीं समझ सकते कि अंदर उसमें क्या तकलीफ है ? हम भी तुम लोगों की तरह इंसान हैं, डॉक्टरी पढ़ने से इंसान डॉक्टर बनता है जादूगर नहीं…
डॉक्टरी में हम शरीर रचना पढ़ते ज़रूर है , लेकिन अंदर की छोटी-छोटी नसों के बारे में जानने के लिए हमें भी टेस्ट करवाने की जरूरत होती है। लेकिन तुम लोगों को लगता है कि हमारी आंख में ही एक्स रे फिट है और हम सिर्फ ऊपर से देख कर सब कुछ जान जाए..
एक तरफ तो कहते हो खर्चे की चिंता मत कीजिए आप बस इलाज कीजिए। और जब हम तुम्हारे कहे अनुसार खर्चे की चिंता किए बिना इलाज करते हैं और बिल तुम्हारे हाथ में थमाते हैं तो तुम लोगों के तन बदन में आग लग जाती है!”
“जाने दो मृत्युंजय इन जैसे लोगों के मुंह लगने का कोई मतलब नहीं है । ये सब फोकट लोग है और हमारा भी समय बर्बाद कर रहे हैं..”
वेदांत अभी कुछ और भी जलीकटी सुनाता की तभी एक लड़का भागता हुआ उस तक चला आया…
“वेदांत भैया चलिए भैया जी को होश आ गया है !”
उसकी बात सुनकर वेदांत बिना जय और पंखुड़ी की तरफ़ देखे ही भाग कर भुवन के कमरे की ओर चला गया ….
वेदांत वहाँ से तेज़ी से निकल ही रहा था कि सामने से आती गौरी से टकरा गया , टक्कर इतनी तेज़ी हुई कि गौरी का संतुलन बिगड़ गया और वो गिरने को थी कि वेदांत ने उसे पकड़ कर जमीन पर गिरने से रोक लिया ….
“देख कर नहीं चला जाता क्या, अंधी हो?”
उसे सीधा खड़ा कर वेदांत उसी पर बरस पड़ा और उसकी बात को नजर अंदाज कर आगे निकल गया….
वो तो गौरी को नजरअंदाज कर आगे बढ़ गया लेकिन उसके साथ चल रहे दूसरे लड़के ने गौरी को देख लिया और थोड़ा आगे बढ़ने के बाद चुपचाप वहीं खड़ा रह गया। गौरी आगे बढ़कर मृत्युंजय के केबिन में चली गई , जहां से कुछ देर बाद ही मृत्युंजय और गौरी बात करते हुए बाहर निकल आए दोनों अपने में मगन बात करते हुए हॉस्पिटल कॉरिडोर से होते हुए हॉस्पिटल के गार्डन की तरफ यानी अस्पताल से बाहर निकल पड़े..
तब तक मे वह लड़का अपने बाकी साथियों के पास पहुंच गया, वह उनका ध्यान गौरी की तरफ दिलवा चुका था। उस लड़के के दिमाग में क्या चल रहा था यह सिर्फ वह जानता था, लेकिन उसके साथ-साथ उसके दोस्त भी गौरी को मृत्युंजय के साथ देख कर एक शातिर मुस्कान देते हुए आपस में कुछ बातों में लग गए…
” तुम यहां कैसे गौरी?”
” फाइनल ईयर की क्लासेस हॉस्पिटल में ही तो लगती हैं सर तो बस इसीलिए..!”
” लेकिन क्लासेस तो मेरे ख्याल से सुबह होती है?”
” हां सर मोस्टली तो क्लासेस सिर्फ सुबह ही होती हैं। आज एक सर्जिकल केस था जिसके कारण हमें शाम की क्लास के लिए भी बुलाया गया था बस वही निपटा कर इधर से जा रही थी तो ध्यान आया कि आपकी ड्यूटी अभी इमरजेंसी में लगी हुई है, तो सोचा जाते-जाते आप से भी मिल लूं। और यह भी पूछ लूँ कि मुझे अभी दवाई कंटिन्यू करनी है या एक छोटा ब्रेक ले सकती हूं।”
” अगर पिछले 10 दिन से तुम्हें कोई भी ऐसे डरावने सपने नहीं आ रहे और किसी भी तरह का कोई पैनिक अटैक नहीं है तो 2 दिन का ब्रेक ले कर देख लो, अगर कोई दिक्कत होती है तो दवा शुरू करेंगे वरना 2 दिन का और ब्रेक ले लेना.
यह दवाई हम अचानक से विड्रॉ नहीं कर सकते वरना तुम्हें दिक्कत हो सकती है। तो वन वीक के ब्रेक के बाद तुम्हें दो-चार दिन के लिए मेडिसिन लेनी होगी उसके बाद फिर एक छोटा ब्रेक लेना होगा और इसी तरह धीरे-धीरे करके ही हम इन दवाओं को विड्रॉ कर सकते हैं…”
” ओके सर थैंक यू!”
” वैसे अभी कैसा फील कर रही हो? अई मीन रिजल्ट की सैडनेस तो अब दूर हो चुकी होगी!”
” सैडनेस तो उसी दिन दूर हो गई थी सर जिस दिन आपने बहुत देर तक मुझे समझाया था की वह सिर्फ एक एग्जाम है और आगे आने वाला फाइनल एग्जाम मेरे लिए ही है, जिसमें मैं अच्छा करके आगे बढ़ सकती हूं। एक और बात मैं सोच रही थी सर । तीन महीने बाद ही हमारे फाइनल एग्जाम है, उसके बाद लगभग महीने डेढ़ महीने की छुट्टियां मिल जाएंगी और फिर इंटर्नशिप शुरू हो जाएगी तो मैंने सोचा है कि क्यों ना मैं अभी पी जी के लिए प्रिपरेशन शुरु कर दूं।
” बहुत बढ़िया सोच है इससे अच्छी बात तो कोई हो नहीं सकती , तुम बिल्कुल शुरू कर दो!”
“सर मुझे पता चला है कि आप भी ट्यूशन लेते हैं।”
“हां लेता तो हूं। कुछ स्टूडेंट्स मेरे रूम पर ही आते हैं पढ़ने के लिए और जो दूसरे स्टेट के बच्चे हैं उनकी ऑनलाइन क्लास लेता हूं!”
“मैं भी आपकी क्लासेस जॉइन करना चाहती थी।”
“ओके! नो प्रॉब्लम फाइनल एग्जाम होते ही तुम क्लासेस ज्वाइन कर लेना, वैसे भी फाइनल ईयर वाले कुछ स्टूडेंट्स ने मुझसे बात कर रखी है वह सब एग्जाम के बाद से शुरू करने वाले हैं, तो उसी बैच में तुम भी आ जाना। वैसे तुम्हें रूम पर आने में अगर दिक्कत है तो तुम ऑनलाइन जाकर भी ज्वाइन कर सकती हो।”
“ओके सर थैंक यू। अब मैं निकलती हूं, अंधेरा हो चुका है हॉस्टल पहुंचने में देर ना हो जाए..”
“तुम अकेली चली जाओगी ना ,या मैं छोड़ दूँ ? वैसे दो मिनट रुको, मेरा टाईम भी ओवर हो गया है , मैं तुम्हें छोड़ देता हूं ..!:”
मृत्युंजय ने फोन निकल कर पंखुड़ी को फोन लगा लिया ..
” पाखी मैं गौरी को छोड़ने हॉस्टल जा रहा हूं वहीं से अपने रूम निकल जाऊँगा ,तुम नाईट वाले को ड्यूटी रोस्टर हैंडओवर कर लोगी?”
“ओके जय , तुम निकलो, मैं देख लूँगी।”
फोन रख कर जय ने गाड़ी निकाली और गौरी को साथ लिए हॉस्टल के लिए निकल गया ….
थोड़ा सकुचाते हुए गौरी ने जय के कन्धे पर हाथ रख दिया…जय कि गाड़ी भुवन के चेलों के मुहँ पर धूल का गुबार सा उड़ाती निकल गयी…
****
फ़ाइनल इम्तेहान के लिए बस दो तीन महीनों का समय बचा था और रंगोली अच्छे नंबर लाने के लिए अपना सब कुछ झोंक देना चाहती थी …
वो सुबह जल्दी ही अपनी एनाटमी लैब पहुंच जाया करती थी ….
आज भी और दिनों की तरह वो लैब में रखी इंग्लिश राइटर्स की एनाटमी की किताब पढ़ते हुए अपने नोट्स तैयार कर रही थी कि सुबह की जॉगिंग से लौटते हुए दूर से ही अभिमन्यु की नजर रंगोली पर पड़ गयी …
जॉगिंग ट्रैक वैसे तो मायानगरी में बिल्कुल बाहरी तरफ़ यानी बाउंड्री से लगा हुआ बना था पर उसका एक हिस्सा एनाटमी लैब की तरफ़ से भी गुजारता था।
वहीं गुलमोहर के नीचे एक बेंच थी , अभिमन्यु वहीं बैठा रंगोली को देख रहा था कि एक एक कर लड़कियाँ आने लगी और रंगोली से बातों में लग गईं ..
उसी वक्त अधीर भी भागता दौड़ता अभिमन्यु तक आ पहुँचा…
“आज उठाए क्यों नहीं , अकेले ही निकल गए दौड़ने!”
‘”तू बहुत गहरी नींद सो रहा था अधीर , मुझे लगा कोई मीठा सा सपना देखा रहा है क्यों जगाउ ?
“बेटा अकेले अकेले अपनी उन्नती कर लो बस, और भाई को सोते रहने दो ।
खैर मेरे बगैर तू कितनी उन्नति करेगा ये मालूम है मुझे? जब से हॉस्टल से निकला होगा यहीं टिका होगा? समाधि लगाए तपस्यारत होंगे आप और आपकी मेनका अंदर हड्डियों से डांडिया खेल रही होंगी…”
” देख तू नहीं था तो मेरा अंदर जाने का मन भी नहीं कर रहा था, अब तू आया तो हिम्मत आईं, जाऊँ एक बार गुड मॉर्निंग बोल कर आ जाऊँ?
“हाँ बेटा सब समझता हूं , मय से मीना से ना साकी से ना पैमाने से, दिल बहलता है तेरा मेरे आ जाने से।
मेरे आ जाने से हिम्मत इसलिए आईं की कहीं लड़कियाँ तेरी टांगे तोड़ दे तो हॉस्टल तक ले जाने वाला एक मालवाहक गधा तुम्हारे साथ हो, वर्ना अकेले टूटने फूटने के बाद भागते कैसे ..
वैसे अभि एक बात सोच कर देख, डॉक्टर लड़की से पिटाई का भी एक अलग ही मज़ा है, नहीं ?
पहले खुद ही मारेगी , हड्डियों का कचूमर बनाएगी और फिर जब तू उसके अस्पतालों जाएगा तब तेरे ज़ख्मों पर मरहम लगाएगी और टूटी हड्डियों में प्लास्टर..
अधीर अपनी बात पूरी कर हंसने लगा, और अभिमन्यु अपनी गरदन को झटक कर आगे बढ़ गया , उस हिस्से की फेंस को जरा नीचे कर कुद कर अभिमन्यु अंदर पहुंच गया ..
इधर उधर देखते हुए धीमे कदमों से वो लैब की ओर बढ़ गया …
दरवाजे को जरा अंदर की ओर उसने धक्का दिया कि दरवाजा हल्की सी आवाज के साथ खुल गया , और ठीक सामने एक ह्यूमन स्केलेटल खड़ा देख उसकी बोलती बंद हो गई ….
वो उसे आंखें फाड़े देख रहा था कि, एक जोड़ी हाथों ने उसे पकड़ कर अंदर खिंच लिया और “आपके लिए गिफ्ट है” कह कर उसके हाथ में एक बड़ा सा लिवर पकडा दिया …
काले भूरे से रंग के लिजलिजे से उस सैंपल से आती तीखी फर्मेंलिन की गंध से अभिमन्यु को ऊबकाई सी आने लगी , लाचारगी से उसने चेहरा ऊपर कर देखा तो सभी लड़कियाँ एक साथ उस पर हंस रही थी , रंगोली भी उनमें शामिल थी..
अभिमन्यु ने उसे देखा फिर अपने हाथ में पकड़ रखे लिवर को देखा और उसका गंदा सा मुहँ बन गया। रंगोली ने हंसी को रोक कर आगे बढ़ उसके हाथ से वो सैंपल ले लिया और जाकर ट्रे में वापस रख दिया …..
“क्या हुआ इंजीनियर साहब, सारी हीरोगिरी निकल गयी ? “
अभिमन्यु खुद को सम्भालने की कोशिश कर रहा था कि एक लड़की ने छोटी आंत रखी हुई ट्रे उसके सामने कर दी और उस गिली सी चिपचिपी गंदी आकृति को देख अभिमन्यु को वाकई ऊबकई आने लगी…
उसकी हालत देख सब हंसते गिरते पडते इधर उधर होने लगी, उसी समय झनक तेजी से भागती हुई लैब में चली आईं..आज उसे देर हो गई थीं वो नाश्ता भी नहीं कर पायी थी! सुबह वो रंगोली से पहले ही कमरें से निकल कर कहीं जा चुकी थी इसलिए रंगोली ने उसक नाश्ता टिफिन में रख लिया था ..
उसके आते ही एक लड़की ने रंगोली का लाया टिफिन झनक के सामने खोल दिया ….
” ले ब्रेकफास्ट कर ले , आज तुने खाया नहीं है ना , तेरी रूमी यानी रंगोली ने बनाया है ऑमलेट..
अभिमन्यु अपनी उबकाई रोकता वहां से बाहर भागा और सीधे अधीर के पास जाकर रुका , वहाँ ट्रैक पर जगह जगह पानी के नल लगे थे , वहाँ के पेड़ पौधों को सींचने के लिए । उन्हीं से पानी लेकर उसने हाथ मुहँ धोया और एक तरफ़ बैठ गया …
“अबे क्या देख लिए मेरे भाई , भूत दिख गया क्या ….?”
“वो सब छोड़ यार ,क्या देखा क्या नहीं वो तो बाद में बताऊँगा पर एक और बुरी खबर है “
” अब क्या हुआ “
“तेरी भाभी नॉनवेज भी खाती है .”.
“हो गया कबाड़ा…”
“मम्मी को कैसे मानूँगा यार, वो तो घर पर हर महीने सत्यनारायण की पूजा करती है !”
“अबे तू तो ऐसे बोल रहा जैसे हम नॉनवेज खाने वालों के घर सत्यनारायण पूजा नहीं होती क्या ?
“मेरे कहने का मतलब ये है कि मम्मी को मनाना कठिन होगा ..”
“बेटा माहौल रहेगा तुम्हारे घर पर । रोज शाम को भाभी जी अपनी क्लिनिक से आने के बाद कमरें में दारू सिगरेट सजा कर बैठेंगी और तुम बढ़िया रसोई से अंडे और पकौड़े तल कर लाना , और फिर सुनी है ना वो कहावत जब मियाँ बीवी राजी तो क्या करेंगी माँ जी “
“तुम साले मजाक उड़ा लो बस “
” बल्कि मैं तो खुश हूं कि अब भाभी जी के आने से मुझे तेरे घर पर भी कुछ खाने लायक मिल जाएगा वर्ना तो तू बस घास-फूस में ही निबटा देता है …चल अब हॉस्टल चलें, कॉलेज भी जाना है … इम्तिहान नजदीक है अब तो कॉलेज जाने की बनती है ।”
दोनों साथ साथ वहाँ से अपने रास्ते निकल पड़े…
इधर लैब में रंगोली ने उस लड़की को घूर कर देखा ..
” रिंकू इसे ऑमलेट क्यों कहा? मैंने इतना टेस्टी बेसन का चीला बनाया था ।”
“हाँ तो !! हम लोग इसे वेज ऑमलेट ही कहते हैं , फीलिंग आती है कहने में । वर्ना वहीं बोरिंग बेसन का चीला …
वैसे क्यों तेरा वो हॉट पंडित गलत ना समझ ले, इसलिए परेशान हो रही है क्या ?”
“उससे मुझे फर्क़ नहीं पड़ता, उसे जो समझना है समझ ले…
रंगोली और उसकी सहेलियाँ अभिमन्यु का घबराया चेहरा याद आते ही वापस ज़ोर से खिलखिला कर हंस पडी….
क्रमशः
aparna…
