मायानगरी -29

मायानगरी-29

        हंसती खिलखिलाती वो शाम आखिर अपने अंजाम तक पहुंच ही गई…
ढेर सारे तोहफे और मीठी यादों की पोटली समेटे जूनियर जाकर वोल्वो में बैठ गए.. सबके चेहरों पर मुस्कान थी हर कोई खुश था … देखा जाए तो अब जूनियर असल में मेडिकल कोलेज के स्टूडेंट्स के तौर पर पहचान बना चुके थे …
  
   बीते वक्त के साथ खतरनाक रैगिंग की वो खौफनाक यादें अब एक मीठी सी मुस्कान दे जाने वाली जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण यादों में शुमार हो चुकी थी..
   वो सीनियर्स के प्रोजेक्ट लिखना,  उनकी ड्रॉइंग पूरी करना,  उनके सामने उनकी शान में सदा अपने एप्रन के थर्ड बटन पर निगाहें जमाए रखना , उन्हें आते जाते देख कर उन्हें “प्रणाम महोदय “, “प्रणाम महोदया ” पुकारना,  उनके किए सारे अत्याचारों को हंसते हंसते सिर माथे लगाने का आज अंतिम दिन हो चुका था …
   .. अब मेडिकल में सिर उठा कर चलने के दिन आ चुके थे..
  बस में बैठी अधिकतर जूनियर ल़डकियां
तो इन्हीं बातों में लगीं थीं कि कल से यूनीफॉर्म नहीं पहनना पड़ेगा तो सबसे पहली कौन सी ड्रेस होगी जो वो लोग कॉलेज आते वक़्त पहनना चाहेंगी, कुरता या जींस …
    सीनियर्स ने सभी  को गाड़ी में बैठाने के बाद वापसी के लिए अपनी भी गाड़ियां  निकाल ली..कुछ एक आध सीनियर मैडम जूनियर के साथ गाड़ी में ही चढ़ गईं ….
   वृंदा और भूमि शुरू से ही जूनियर ल़डकियों के साथ रहती आयी थीं, सो वहीं दोनों यहां भी चली आईं…
  वो दोनों सबसे सामने की सीट पर बैठ गईं …. उनके साथ बैठी ल़डकियाँ उन दोनों से कुछ सुनाने की फर्माइश में लग गईं.. वृंदा गाती भी थी…
  भूमि ने भी इसरार किया और वृंदा अपने बायें हाथ की अनामिका को देखते हुआ गाने लगी…

   ओ मेरे सपनों के सौदागर मुझे ऐसी जगह ले जा
मैं चाहती हूँ,मेरे हमसफ़र,मुझे परियों की दुनिया दिखा
  प्यार ही प्यार हो जिस जगह, मुझे ऐसा जहां दिखा
        चंदा के रथ पे वो आयेगा एक दिन
        मुझे साथ लेके वो जाएगा एक दिन
            मेरी मांग भर देगा तारों से वो
              बनायेगा दुल्हन मुझे….

बस अपनी रफ्तार से भाग रही थी कि ड्राईवर ने जोर से ब्रेक लगाया….. बस एक तेज झटका खाकर रुक गई सब इधर-उधर देखने लगे कि हुआ क्या? तभी बस का दरवाजा खुला और एक थोड़ा अधिक उम्र का लड़का जो लगभग सत्ताइस अट्ठाइस का लग रहा था बस में चढ़कर ऊपर चला आया….

   उसके आते ही सारे लोग उसे देखने लगे और उसे देखते ही वृंदा अपनी जगह पर खड़ी हो गई….

” तुम यहां, तुम कब आए और आने से पहले कुछ बताया भी नहीं? एक बार फोन तक नहीं किया?

लड़का मुस्कुरा उठा और उसने आगे बढ़कर वृंदा का हाथ पकड़ लिया…

” अब सब यही पूछ लोगी? भई सरप्राइज भी तो कोई चीज होती है ….अचानक मूड किया तुम्हें सरप्राइज दे दिया जाए,  और हम चले आए…
अब चलें ..?”

  वृंदा ने मुस्कुराकर उसका हाथ थामा और सभी को बाय करते हुए उसके सामने निकल कर बस से बाहर चली गई….

   सभी जूनियर उन दोनों को एक साथ जाते देखते रहे… जूनियर लड़कियां खिड़की से झांक झांक कर जहां तक देख सकती थी वृंदा और उसी लड़के को देखने लगी, वृंदा उसकी कार में उसके साथ सामने की सीट पर बैठी और उस लड़के ने कार पीछे घुमा ली….

*****

प्राची बुलेट की चाबी हाथ में घुमाते हुए पार्किंग की तरफ जा ही रही थी, कि अधिराज भी उसके पीछे भागता हुआ चला आया…

” प्राची मैं तुम्हारे साथ चलूं?”

” क्यों ? मैं अकेले भी बुलेट चला सकती हूं!”

” ठीक है फिर अकेले ही जाओ,  लेकिन फिर आज के बाद  मुझे फोन मत करना कि तुम्हें यह बैन की हुईं दवा चाहिए, वह दवा चाहिए….

  प्राची ने भौंह चढा कर चाबी उसकी तरफ बढ़ाने को आगे की ही थी, कि बाइक पर अभिमन्यु और अधीर उन लोगों तक पहुंच गए….

” चलें भाई?”
      अधिराज की तरफ देखते हुए अभिमन्यु ने सवाल किया और अधिराज प्राची की तरफ देखने लगा प्राची ने चाबी बुलेट में लगाई और एक तरफ खड़ी हो गई … अधिराज ने पार्किंग से गाड़ी निकाली और उस पर बैठने वाला था कि प्राची ने हैंडल पकड़ लिया और साड़ी संभालते हुए बुलेट पर सामने की सीट पर सवार हो गई…
   अधिराज को देख उसने पीछे बैठने का इशारा किया और सामने देखने लगी.. अधिराज ने अभिमन्यु और अधीर की तरफ देखा, दोनों ही मुस्कुरा रहे थे..इशारे से उसे चुपचाप बैठ जा, कह कर उन्होंने बाईक आगे बढ़ा दी.. अधिराज के बैठते ही प्राची ने भी गाड़ी आगे बढ़ा दी….

” अधिराज तुम तो कानपुर के हो ना?”

अधीर के इस सवाल पर अधिराज ने उसे देखा और हां में सिर हिला दिया

” हां कोई शक है इसमें”

“अरे नहीं शक की क्या बात? तुम्हें देखते ही समझ आ जाता है!”

“अच्छा क्यों?  ऐसे क्या हीरे मोती जड़े हैं हम में कि देखते ही समझ आ जाता है  कि हम कानपुर के हैं..”

” पर्सनालिटी है भाई तुम्हारी! लंबे चौड़े हो दिखने में भी हीरो टाइप दिखते हो , बात व्यवहार में भी कुशल हो.. और सबसे बड़ी बात गुटखा…

“अबे गुटखा तो हम खाते नहीं.. बाकी व्यवहार का तो ऐसा है ना कि बचपन से इतना ठुकाये हैं ना , की ये सब खुद ही आ गया ..

” तो ऐसे काम ही क्यों करते थे कि तुम्हारी ठुकाई हो?” प्राची ने अधिराज को टोक दिया..

“अब भई तुम लोगों जैसी किस्मत लेकर हम थोड़ी पैदा होते हैं ? हम पापा की परी तो हैँ नहीं उल्टा हम मम्मी के मगरमच्छ जाने जाते हैं…

“जो भी है पर तुम्हारे पास एक प्यारी फैमिली तो है..”

  प्राची के ऐसा कहने पर अधिराज मुस्कुराने लगा

” प्यारी का तो पता नहीं हाँ ढेर सारी फैमिली जरूर है। पूरा अस्सी का कुनबा है हमारा। चौधरी गली के पीछे वाला मोहल्ला हमारा ही माना जाता है आसपास लगे हुए सात घर हैं हमारे परिवार के..”

” यार तब तो मजा बहुत आता होगा, सब एक साथ जब मिल जाए तभी त्यौहार हो जाता होगा!”

“अब मजे का तो भाई ऐसा है, कि पूरे परिवार का भी हमारे एक व्हाट्सएप ग्रुप है। जिसमें दादी चाची मम्मी मामी काकी ताई, फुफु हर कोई जुड़ा हुआ है। और सुबह से जो शुरू होता है व्हाट्सएप में संदेशों का आदान प्रदान कसम से कभी-कभी लगता है व्हाट्सएप के ग्रुप से निकल कर आत्महत्या कर लूँ..
   मतलब घर की औरतों में एक तरह से होड़ लगी रहती है कि कौन सुबह सबसे पहले मुर्गा बन के गुड मॉर्निंग का अलार्म बजायेगा … और हम बच्चों में से जिसने उसका रिप्लाई नहीं किया उसको फिर हर एक घर की महिला सदस्य पर्सनली मैसेज करके पूछती है,’ ‘क्या हुआ लल्ला बीमार तो नहीं पड़ गए हो? ऑनलाइन नहीं आ रहे थे तो हमें हुआ कहीं बीमार तो नहीं पड़ गए? जिंदा तो हो?’ उसके बाद इन सारी चाचीओ मामीयों काकीयों फूफीयों को  पर्सनली जवाब देना पड़ता है ‘मैं ठीक हूं’….
….. आजकल फैशन भी क्या चल रहा है ‘मेरी बेटी मेरा स्वाभिमान’ अरे भाई वो तो होगी ही ना यार ! तुमने पैदा किया है तो तुम्हारी बेटी तुम्हारा ही तो स्वाभिमान होगी, पड़ोसी का तो होगी नहीं। अब हमारे घर में हैं 4 लड़कियां और हम सात लड़के। अब सोचो एक तो सोशल मीडिया के चक्कर में हम लड़कों की घर में वैसे ही कोई इज्जत नहीं है। दूसरा हमारी बहने हमारी इज्जत का फालूदा निकालने में भी बिल्कुल परहेज नहीं करती,  उन चारों को जब जहां मौका मिलेगा हमारी इज्जत को मच्छर समान मसल कर फेंक देती हैं…..

अधिराज की बात सुनकर प्राची का हंस-हंसकर बुरा हाल था। उसे हंसते देख अभिमन्यु और अधीर भी मुस्कुरा रहे थे। अधीर ने अधिराज की बात के बीच में ही एक फुलझड़ी छोड़ दी….

” जो भी हो बेटियां रहने से रौनक रहती घर की, तुम्हारे घर में तो खूब रौनक होगी?”

” रौनक ?अरे मेरे घर रोज दिवाली होती है भाई… बहनों को कुछ भी चाहिए पापा-काका प्यार से बोलेंगे कल लाकर देंगे बिटिया और ये बिटिया लोग मुस्कुराकर मान जाती है। और हम पूछ कर देख ले कि पापा नया क्रिकेट बैट दिलवा दो तुरंत जवाब आएगा पैसे पेड़ पर नहीं उगते ….
… कसम से उस समय ऐसा लगता है कि इंजीनियरिंग के बाद साइंटिस्ट बन जाऊं और पैसे पेड़ पर उगा ने की टेक्निक इजाद करूं जिससे…

” यू आर टू मच फन अधिराज !मैं तो यह सोच रही हूं कि तुम्हारे घर में मजा कितना आता होगा!”

          ” मजा तो बहुत आता है लेकिन हमारे घर में भेदभाव बहुत हैं। एक तरफ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा लगाया जाता है, लेकिन आज भी हमारे घरों में जिनके यहां बेटी और बेटा दोनों हों उस घर के बेटे का दर्द हम ही समझ सकते हैं..
  कोई फैमिली फंक्शन हो, होली हो दिवाली हो हमारी बहन का एक ही काम रहता है… सज धज के परिवार के साथ सेल्फी लेना। और हम इधर से उधर मेहमानों का सामान उठा कर रखना ,कमरे को सहेजना, बड़े वाले टेबल पर कुर्सी रख कर पंखें पोंछना, ऊंची दीवारों के जाले उतारना, स्टोर रूम का सामान खाली करके उस रूम में पुताई करना और वापस सामान को अंदर जमाना, घर के गद्दे कारपेट सबको धूप दिखाना धूप से वापस अंदर लाना…और इस सब के बाद अपनी बहन के पीछे-पीछे कुली बन कर घूमना, इसी में मारे जाते हैं…..उस पर तुर्रा यह कि परिवार हमारी बहन के खींचे फोटो को देखकर बोलता है कितनी प्यारी बेटी है परिवार को जोड़ के रखे और एक यह नालायक है, किसी काम के नहीं…
   अब हम क्या बताये और घर के ही लोग हैं उन्हें क्या गिनाये हम कितने काम करते हैं? मम्मी रसोई में खाना बनाती रहती है सिलेंडर खत्म हो जाए हम नीचे के स्टोर रूम से सिलेंडर की टंकी उठाकर ऊपर चढ़ते हैं… और कहीं हमारी बहन को उस सिलेंडर को फर्श पर इधर से उधर एक  इंच सरकाना  पड़ गया तो वह कुम्हला जाएगी, उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक आएंगी और मम्मी पापा दोनों दौड़ पड़ते हैं…. ‘नहीं नहीं बेटा तुम मत छूना’ और कहीं हमने कह दिया कि अगर जरा सा खींच लेगी तो क्या बिगड़ जाएगा तो हम पर दोनों ऐसे चढ़ जाते हैं, कि क्या बताएं? फिर हमें दुनिया भर का ज्ञान पेल दिया जाता है , कि बेटा वह पराई अमानत है, कल को वह दूसरे घर चली जाएगी उसको संभाल के रखना हमारी जिम्मेदारी है…
   तो भाई अगर हम पराए घर नहीं जाने वाले तो ये हमारी खोटी किस्मत है हम क्या करें…
… हमारे घर में वाकई लड़का लड़की का इतना भेदभाव है कि क्या कहें?  हर संडे छुटकी की पसंद  की कचौड़ी ही नाश्ते के लिए मंगवाई जाती है , कभी हम अगर कह भी दें कि भई मम्मी हमारे लिए समोसा भी मंगवा दो तो ऐसे आंखें तरेर के देखती हैं जैसे वह समोसा अगर हम खा लिए तो इंडिया-पाकिस्तान का वार छिड़ जाएगा फिर….
… अब छोड़ो यार क्या क्या बताएं और भी गम है जमाने में परिवार के सिवा…

अधिराज की बातों के बीच उन लोगों ने काफी सारा रास्ता तय कर लिया था। अधिराज जानबूझकर प्राची का मूड अच्छा रखने के लिए ही इधर-उधर की बातें कर रहा था, जिससे प्राची का ध्यान भटका सके और वह अपनी ड्रग्स ना ले…

रास्ते में एक ढाबे पर कॉलेज की वोल्वो को खड़ा देख अभिमन्यु और प्राची ने अपने अपनी गाड़ी वहीं एक किनारे लगा दी और गाड़ी से उतर कर वह लोग भी बाकी स्टूडेंट के पास चले गए..
… सीनियर्स ने सभी के लिए चाय मंगवा ली थी सभी लोग चाय पीते हुए आपसी गपशप में लगे हुए थे…
रंगोली झनक के साथ वॉशरूम के लिए पीछे की तरफ चली गई थी। वह वॉशरूम से लौट कर आई तो टेबल पर चाय के छोटे-छोटे गिलास रखे हुए थे..
…. उनमें से एक गिलास उसी समय अधीर ने पीते हुए उस टेबल पर रखा था और किसी का फोन आने से बात करता हुआ बाहर निकल गया था। रंगोली और झनक वही एक तरफ बैठकर बाते करने लगीं,  रंगोली उस गिलास को उठाने जा रही थी कि हाथ बढ़ाकर अभिमन्यु ने उसके हाथ से वह गिलास छीन लिया।  रंगोली ने घूर कर अभिमन्यु को देखा और अभिमन्यु अपने बालों पर हाथ फेरते हुए मुस्कुरा दिया…

“यह जूठी गिलास है , दो मिनट रुक जाओ  तुम्हारे लिए फ्रेश नयी चाय मंगवा देता हूं।”

  जूठी है यह सुनते ही रंगोली ने तुरंत ग्लास को टेबल पर छोड़ दिया… झनक ने एक नजर रंगोली को देखा और अभिमन्यु की तरफ देखकर उसने भी गुजारिश कर दी …

“जब फ्रेश चाय मंगवा ही रहे हैं तो एक मेरे लिए भी मंगवा दीजिए मेरी भी पड़ी-पड़ी ठंडी हो गई है ।”

अभिमन्यु ने हां में सिर हिलाया और ढाबे के अंदर चाय लेने चला गया…

प्राची ने अपनी चाय खत्म करके ग्लास को टेबल पर रखा, और अपने पर्स की जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल लिया अधिराज अभिमन्यु के साथ दूर खड़ा था और प्राची को ही देख रहा था …
    प्राची ने पैकेट निकाला उसमें से एक सिगरेट बाहर निकाली लेकिन फिर कुछ देर तक उस सिगरेट को देखने के बाद उसने वापस उसे पैकेट में डाल कर अपने पर्स में डाल दिया!

   अधिराज के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान छा गई उसने अपना चाय का कप अपने होठों से लगाया और साथ खड़े अभिमन्यु के कंधों पर हाथ टेक खड़ा हो गया…..
     उसे समझ में आ गया था कि प्राची की खुद से लड़ाई कि शुरुआत हो चुकी थी… और अब उसे हर कदम पर बस इसी तरह उसके पीछे खड़े होकर उसे ऐसे सहारा देना था कि प्राची को मालूम भी ना चले  और उसकी मदद भी हो जाए…

क्रमशः

aparna …..
   


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