
भिखारी :
” माँ जी!”
दोपहर होते होते उस भिखारी की आवाज़ घर की बाहर से गूंजने लगी। बड़बड़ करती मकान मालकिन अंदर से ही फटकार लगा कर उसे झिड़कने लगी
” अभी जाओ बाबा! देने के लिए कुछ नही है!”
लेकिन मकान मालकिन का झिड़कना शायद उस अभागे के कान तक नही पहुंचा, वो एक बार फिर माँ जी की गुहार लगा उठा।
सारे काम निपटा के खा पीकर अभी तो लेटने आयी थी सुगणा और इसी वक्त ये भिखारी आ धमका।
वैसे इसका रोज़ का यही वक्त है आने का। वो भी घर भर का का काम निपटा कर पिछली रात की बासी रोटियाँ इसे डाल जाती है। लेकिन आज ये अपने वक्त से ज़रा देरी से आया और उसी वक्त सुगणा की आँख लगने ही जा रही थी।
एक बार फिर माँ जी की पुकार पर वो झल्लाती हुई एक रुपये का सिक्का लिए बाहर निकल आयी
” ये लो! जब तक कुछ ले नही लेते चैन नही है ना तुम्हें”
” नही नही माँ जी मैं तो आज देने आया था। दो दिन पहले आपका बेटा मेरे झोले में दस रुपये का नोट डाल भाग गया था, आश्चर्य से मैं नोट देखता बच्चे को आशीर्वाद देना ही भूल गया था, आज तो बस उसी दिन का आशीर्वाद देने आया था। आज कुछ नही चाहिए।
सुगणा मुहँ बाये उस दोनों हाथों से लाचार अपाहिज भिखारी को देखती खड़ी थी….
सही मायनों में आज भीख कौन दे रहा था यही सुगणा नही समझ पायी….
aparna…

Bahut hi achhi lagi
हमेशा की तरह बेहतरीन कहानी👌👌👌👌
👌👌👌👌👌👌👌👏👏👏👏
Very nice story 👏👏👏👏
👌 super
कभी कभी हमारे मुंह से अनजाने में जो वचन निकल जाते हैं वही हमें कभी-कभी पछताने पर मजबूर कर जाते हैं अपनी जरा सी झल्लाहट में हम यह भी नहीं देखे कि सामने वाला क्या कहना चाह रहा है और फिर वही बात हमारी शर्मिंदगी का कारण बन जाती है।
छोटी सी पर बहुत खूबसूरत रचना
👌👌👍🙏
बहुत ही सटीक कहानी👏👏
हमेशा की तरह बेहतरीन कहानी
आपकी तरह ही बेहतरीन होती हैं आपकी कहानी
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻