
जीवनसाथी -2 भाग -87
बाँसुरी जैसे तैसे खुद को संभाल रहीं थी… प्रेम राजा के पास चला आया..
“अब हमें चलना चाहिए हुकुम ! वहाँ भी इस वक्त आपकी ज़रूरत होगी !”
प्रेम ने बाँसुरी की तरफ देखा, लेकिन बाँसुरी अब भी वैसी ही अशक्त सी बैठी थी.. राजा ने आकर बाँसुरी के कंधे पर हाथ रख कर उसे चलने का इशारा किया..
“चलो बाँसुरी.. अब तुम्हारी वापसी का समय हो गया है !”
बाँसुरी ने बोझिल सी पलकें उठा कर राजा को देखा, वो कुछ कहने जा रहीं थी कि दर्श की आवाज़ उन सभी के कानों को भेद गयी..
“यहाँ से कोई कहीं नहीं जायेगा राजा साहब !!”
राजा प्रेम के साथ काका और सारिका भी आश्चर्य से उसकी तरफ देखने लगे..
दर्श ने अपनी गन निकाल कर उन सब की तरफ तान रखी थी और दरवाज़े पर खड़ा वो उनके बाहर जाने के लिए रास्ता रोके खड़ा था..
प्रेम ने तुरंत अपनी गन निकाल कर उसकी तरफ तान दी.. ये सब देख कर सारिका चीख उठी..
“ये क्या कर रहें है आप दर्श जी !”
दर्श ने एक नजर उसे देखा और राजा से मुखातिब हो गया…
“माफ़ कीजियेगा राजा साहब, लेकिन मेरे दोस्त से आपकी जो बातचीत हुई थी उसके हिसाब से हमें रानी बाँसुरी का ध्यान रखना था तो आपको भी नेहा का ध्यान रखना था…
लेकिन अपने वो किया नहीं !!
मेरा दोस्त आपका गुलाम हो सकता है, मैं नहीं.. मैंने काका ने और सारिका ने ये सब जो भी किया सिर्फ वासुकी के लिए किया.. हमारा तो आपसे ना कोई परिचय था ना घनिष्ठता !!
उसके बावजूद जिस दोस्त के कहने पर मैं इतना बड़ा कांड कर सकता हूँ उस दोस्त की ख़ुशी के लिए क्या नहीं कर सकता ?
आप खुद भी नहीं जानते कि वासुकी ने इस सारे मसले में आपका साथ देना क्यों स्वीकार किया ? और ना आपने जानने की कोशिश की !
मानता हूँ डील आप दोनों के बीच हुई थी, आपने उसे रानी बाँसुरी की ज़िम्मेदारी सौंपी और उसकी नेहा को महल में लें गए लेकिन आप खुद देखिये कि उसने रानी बाँसुरी को कितना संभाल कर रखा और आपने ?
“इसमें हुकुम की क्या गलती ? वो तो उस वक्त वहाँ थे भी नहीं ?”
प्रेम ने दर्श की बात का प्रतिवाद किया..
“वहीं तो जानना चाहता हूँ कि राजा साहब वहाँ क्यों नहीं थे ? और नहीं भी थे तो उनकी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगा कर इतना बड़ा अनर्थ कैसे हो गया ? “
“दर्श, ये राजा साहब के हाथ की बात ही नहीं थी.. नेहा के लिए हर तरह की सुरक्षा के सारे इंतज़ाम थे, लेकिन वो अपने सुरक्षा गार्ड्स को साथ ही नहीं लें गयी !”
“लें भी जाती तो उस ट्रक से कैसे बचती ? आप लोगों ने सुरक्षा का यहीं इंतज़ाम कर रखा था बस ! यदि उसके गार्ड्स साथ जाते तो, वो भी इस एक्सीडेंट में मारे जाते…. मरना तो सबका तय था !
बस ये हुए कि नेहा के अकेले जाने की ज़िद के कारण बाकी दो ज़िंदगियाँ बच गयी !”
“दर्श तुम्हारी ज़िद फ़िज़ूल है.. इस सब में हुकुम की कोई गलती नहीं है | जो होना था उस पर किसी का वश नहीं है.. उन्हें रोक कर तुम्हें क्या मिल जायेगा ? आखिर चाहते क्या हो तुम ?”
“बस मेरे दोस्त के आने का इंतज़ार ! उसी ने रानी बाँसुरी की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी थी | अब उसके आये बिना मैं किसी को भी रानी साहब को ले जाने की इजाज़त नहीं दे सकता.. !
एक बार वो आ जाये और अपने मुहँ से कह दे कि आप लोग रानी बाँसुरी को ले जा सकते है, फिर आप लोग ले जाइएगा !
लेकिन अब उसके आदेश के अलावा मैं किसी का आदेश नहीं मानूंगा !”
प्रेम ने गुस्से में अपना पैर पटका और राजा की तरफ देखने लगा.. तब तक राजा भी शांति से बाँसुरी के पास बैठ गया था..
“प्रेम !! कोई बात नहीं… हम लोग रुक कर चलते है !”
“पर हुकुम..! वहाँ इस वक्त आपकी ज़रूरत है..! वहाँ महल वालों को ये लग रहा होगा की रानी बाँसुरी नहीं रहीं…! वहाँ तो कोई इस बात को नहीं जानता है ना..! यहाँ तक की युवराज सा से भी आपने इस बार उनकी तबियत को ध्यान में रखते हुए कुछ नहीं बताया था.. |
समर के अलावा वहाँ किसी को कुछ नहीं मालूम.. | पता नहीं सबका क्या हाल होगा ?”
प्रेम की चिंता भी जायज़ थी.. उसे महल भर की चिंता थी, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता उसे निरमा की ही थी….|
वो इस वक्त निरमा के लिए सबसे ज्यादा बेचैन था, उसे मालूम था निरमा के लिए बाँसुरी क्या थी? और बाँसुरी का जाना निरमा को कैसे तोड़ गया होगा.. ! !
उसने राजा को शांति से बैठे देखा और अपना फ़ोन निकाल लिया..
वो अभी निरमा को फ़ोन लगाने ही जा रहा था कि दर्श ने उसके हाथ से फ़ोन छीन लिया..
“आपको अब तक समझ नहीं आया कि आपको यहाँ नज़रबंद रखा जा रहा है..!
अगर आप फ़ोन कर सकेंगे तब तो आप पुलिस भी बुला सकेंगे.. | ये कोई चोर सिपाही का खेल नहीं चल रहा है प्रेम साहब !
बैठ जाइये आप भी.. ! मुझे मजबूर मत करें कि मैं अपनी मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर आप या किसी और पर हाथ उठाने को मजबूर हो जाऊं !”
प्रेम ने गुस्से में एक नज़र दर्श को देखा और एक गहरी सी फूँक छोड़ कर बैठ गया…
वक्त बीतता जा रहा था.. …
कुछ देर बाद दर्श के इशारे पर सारिका सबके लिए चाय बना कर लें आई..
प्रेम ने लेने से इंकार कर दिया, और दर्श के इशारा करने पर सारिका आगे बढ़ गयी.. |
राजा ने चाय का प्याला उठा लिया.. |
बाँसुरी अब भी सुबक रहीं थी, उसने भी चाय लेने से इंकार कर दिया..
सुनील ने दो प्याले उठा लिए.. उसे प्रेम की फ़ज़ीहत देख कर दिल से ख़ुशी हो रहीं थी लेकिन इस सब के बावजूद उस पर प्रेम का डर इस तरह काबिज़ था कि, वो अब भी सामने से होकर उसे कुछ भी बोलने में असमर्थ था…|
पर जो भी चल रहा था इस सारी नौटंकी में अब सुनील को मज़ा आने लगा था और कहीं ना कहीं उसे अपने बच निकलने का मार्ग भी दिखने लगा था…
थोड़ा और वक्त बीत गया….
और दरवाज़े पर दस्तक हो गयी…
एक साथ सभी के दिल धड़क उठे…
सब को एक नज़र देख कर दर्श दरवाज़े की तरफ बढ़ गया..
उसने दरवाज़ा खोला सामने लुटा पिटा सा वासुकी खड़ा था.. |
उसकी गोद में उसकी नन्ही सी जान उससे चिपकी पड़ी सो रहीं थी.. |
उसे बाहरी दुनिया में क्या चल रहा से क्या लेना देना था ? वो तो दुनिया की सबसे महफूज़ जगह पर सुकून से सोई पड़ी थी.. !
एक पिता की गोद से ज्यादा सुरक्षित एक बेटी के लिए और क्या हो सकता है भला ?
वासुकी और उसकी बेटी को देखते ही बाँसुरी अपनी जगह पर खड़ी हो गयी और उसके चेहरें को देखते ही पिक्चर की रील की तरह उसे वासुकी से हुई सारी मुलाकातें याद आती चली गयीं…
तो कदम कदम पर उसे मुसीबतों से निकालते चलने वाला आदमी ये था !
उसके हिस्से की परेशानियों को ख़ुशी से अपने सर माथे लगाने वाला आदमी ये था !
उसकी किस्मत में लिखी मौत का भी जिसने रास्ता बदल दिया वो आदमी ये था !!
बाँसुरी से कुछ कहा नहीं जा रहा था…
वासुकी ने एक बार राजा को देख कर हलके से झुक कर उसे प्रणाम किया और बिना बाँसुरी की तरफ देखे ही अंदर आ गया..
उसके अंदर आते ही प्रेम गरज उठा…
“तुम्हारे दोस्त ने तुम्हारे आते तक हम लोगों को कैद कर रखा था, वह तुमसे इजाजत लेना चाहता है कि हम अपने साथ रानी बांसुरी को ले जाएं या नहीं?”
वासुकी ने भारी पलकों से दर्श की तरफ देखा क्योंकि अचानक आने के बाद उसे प्रेम की यह आधी अधूरी बात समझ में नहीं आई और दर्श ने वासुकी को अपना मंतव्य बताना शुरू कर दिया…
” नेहा….! उसे कहां छोड़ आए..?”
दर्श के ऐसा पूछते ही वासुकी ने पीड़ा से अपनी आंखें मूंद ली…
” तुम्हारी यही पीड़ा यही दुख मैं नहीं देख सकता था | बस इसीलिए तुम्हारे आने के पहले राजा साहब को जाने से रोक दिया जिससे एक बार यह भी तुम्हारी इस तकलीफ को देखें कि, इनकी जिंदगी को बचाने के लिए तुमने कितना कुछ कुर्बान कर दिया है |
प्रेम साहब मैंने आप में से किसी को नजरबंद नहीं किया था, मैं बस आप लोगों को वासुकी के आने तक रोकना चाहता था……
अब आप लोग चाहे तो जा सकते हैं…!
लेकिन अब भी अगर वासुकी ने यह कह दिया कि रानी साहब यहां से नहीं जाएंगी तो मैं वादा करता हूं कि, आप लोग अपनी मर्जी से रानी साहब को यहां से मेरे जिंदा रहते नहीं ले जा पाएंगे..|
आपका वादा सुरक्षा के बदले सुरक्षा का था..|
सुरक्षा के बदले जान का नहीं !
लेकिन हुआ वही है, हम लोगों ने तो अपने सीमित संसाधनों में भी आपकी रानी को यहां पर भी सारी सुविधाएं देते हुए पूरी हिफाजत से रखा, लेकिन आप अपने महल में इतने सारे सुरक्षाकर्मियों के बावजूद नेहा को नहीं बचा सके |
अब ऐसे में जवाब दीजिये असली राजा कौन हुआ..? राजा अजातशत्रु या अनिरुद्ध वासुकी..?
इस बात का जवाब दे दीजिए राजा साहब और अगर आप खुद अपने जवाब से संतुष्ट हो जाते हैं, तो ले जाइए अपनी रानी को वापस ! “
प्रेम भावुक तो था लेकिन उसके लिए सबसे ऊपर राजा अजातशत्रु थे, उनके खिलाफ कुछ भी सुनना उसके लिए जहर था वह गुस्से में दर्श को घूर रहा था..
वासुकी से कुछ कहने के लिए उसने अपना चेहरा वासुकी की तरफ घुमाया के वासुकी ने दर्श पर एक नज़र डाल कर राजा को देखा और अपनी बात कहनी शुरू कर दी…
” दर्श की गुस्ताखी के लिए मैं माफी तो नहीं मांग पाउँगा, क्योंकि जिंदगी ने जो मेरे साथ किया है उसके बाद अब जिंदगी को मुझ से माफी मांगनी चाहिए…
मैं अब किसी के सामने झुकना नहीं चाहता ! लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि, जब इतने दिनों तक मैंने आपकी रानी को पूरी हिफाजत के साथ रखा है तो आज भी मेरी वजह से उन पर आंच नहीं आएगी..
आप पूरे सम्मान के साथ अपनी रानी को लेकर अपने महल वापस जा सकते हैं!”
वासुकी ने एक हाथ से दरवाजा खोल दिया और दूसरी तरफ को खड़ा गया..
वासुकी के ऐसा बोलने के बाद दर्श के पास बोलने के लिए और कुछ नहीं रह गया था..
वह भी वक्त का मारा था, और उस वक्त नेहा की मौत की खबर सुनकर दहल गया था.. उसकी नाराजगी थी, जो राजा अजातशत्रु और प्रेम पर निकल गई ! लेकिन जब वासुकी को उसने शांत और संयमित देखा तो वह भी चुप होकर सर झुकाये वासुकी के पास जाकर खड़ा हो गया…!
वासुकी की हालत देखकर राजा अजातशत्रु खुद दुखी थे लेकिन इस वक्त उनके हाथ में कुछ बाकी नहीं बचा था…
थके हारे कदमों से राजा अजातशत्रु अपनी जगह से उठे और कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ चले..!
उनके साथ ही प्रेम ने भी बाहर का रुख किया.. !
उसने जाते जाते सुनील को भी साथ ले लिया था !
दरवाज़े तक पहुँच कर राजा ने मुड़ कर देखा, बाँसुरी अब भी अंदर ही खड़ी थी..
“आओ हुकुम !”
राजा ने बाँसुरी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया…
बाँसुरी ने राजा को देखा और कुछ सोच कर वहीँ खड़ी रह गयी..
“क्या हुआ बाँसुरी ? आओ, महल में सब तुम्हारे आने का इंतज़ार कर रहें हैं !”
“नहीं साहब ! महल के लोगों के लिए तो बाँसुरी मर चुकी है ना.. फिर कैसे मेरा इंतज़ार कर रहे !”
“उन सब को अभी सच्चाई मालूम जो नहीं है ! उन्हें सब सच बताना भी तो है !”
“और आपको क्या लगता है जब उन सब को सच मालूम चलेगा तो वो लोग आपसे सहमत हो पाएंगे.. ?
साहब मैं मानती हूं, आपने जो भी किया वह मेरी सुरक्षा के लिए किया..
लेकिन इस सब में नेहा का क्या कसूर था, जो वह मारी गई !
आखिर मौत तो मेरी होनी थी !
मेरी किस्मत को उस लड़की ने अपने सर ले लिया, लेकिन उसकी मौत मेरे सर लगी है.. !
आज अगर मैं नेहा की बेटी को यूं ही छोड़ कर चली जाती हूं तो, ज़िंदगी भर खुद को इस गलती के लिए माफ़ नहीं कर पाऊँगी साहब !
आज तक आपसे आपकी पूरी जिंदगी में कभी कोई गलती नहीं हुई, आपने जानबूझकर कभी कुछ भी गलत नहीं किया..
लेकिन आज आप से अनजाने ही सही लेकिन गुनाह हुआ है ! मेरी सुरक्षा के लिए, अपने परिवार की सुरक्षा के लिए, अपने आप के लिए, आपने एक हंसता खेलता परिवार उजाड़ दिया |
आप अपनी पत्नी को नहीं खोना चाहते थे, लेकिन आपकी इस चाहत की वजह से आज एक आदमी ने अपनी पत्नी, अपनी प्रेमिका को खो दिया |
आप शौर्य की सुरक्षा करना चाहते थे, शौर्य की मां की रक्षा करना चाहते थे, लेकिन आपके इसी प्रयास में एक नवजात बच्ची से उसकी मां छिन गयी !
साहेब आज तक आपके माथे पर कभी कोई कलंक नहीं लगा, जबकि राजशाही में रहते हुए ऐसा संभव नहीं है ! बावजूद आप निष्कलंक आज तक अपनी प्रजा पर ही नहीं उनके दिलों पर भी शासन करते आये हैं | लेकिन अगर आज नेहा की मौत के बाद उसकी बच्ची को छोड़कर मैं आपके साथ महल वापस चली गई तो, आपके माथे पर नेहा की मौत का कलंक जिंदगी भर के लिए छप जाएगा!
आपके कमल जैसे खिले प्रफुल्लित चेहरे को देखने की आदी हूं मैं ! आज तक आपकी नजरें कभी मेरे सामने नहीं झुकी, लेकिन नेहा के जाने के बाद, आज अगर मैं आपके साथ चली गई तो आप भी इस बोझ से उबर नहीं पाएंगे… कभी नहीं !
नेहा की मौत का पाप अपने सीने पर लेकर क्या आज के बाद आप कभी भी अपनी उन्हीं ओजस्वी आंखों से मुझे देख पाएंगे ?
नहीं.. ! आपकी पलके हर बार मुझे देख कर खुद ब खुद झुक जाएंगी ! यह याद करके कि मेरे ही लिए आपने एक बेगुनाह को मरने के लिए छोड़ दिया |
मैं जानती हूं साहब नेहा की मौत का असली कारण आप नहीं थे, लेकिन कहीं ना कहीं किसी न किसी तरीके से उस मौत के पीछे आप और मैं ही हैं | अगर मेरी सुरक्षा के लिए नेहा को महल में नहीं भेजा गया होता तो आज नेहा अपने पति और बच्चे के साथ अपने घर में सुख से रह रही होती…|
” बांसुरी तुम गलत समझ रही हो..!
” नहीं साहब ! गलत मैं नहीं समझ रही, बल्कि मैं यह नहीं चाहती कि दुनिया आपको गलत समझे | मैं जानती हूं कि, आपने जानबूझकर कुछ भी नहीं किया | लेकिन अनजाने में ही सही जो पाप आपके और मेरे माथे लिखा गया है, उसका प्रायश्चित भी हम दोनों को ही करना होगा | आज तक आपने मेरी सुरक्षा के लिए मुझे अपने आप से दूर रखा था और आज उस प्रायश्चित के लिए मैं आपसे दूर रहने का निर्णय लेती हूं | आप मुझे यहीं छोड़कर चले जाइए, मैं आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हूं कि अब जब तक…
बांसुरी की बात बीच में ही काट कर दुख से राजा बोल पड़ा…
” क्या यही हम दोनों की नियति है बांसुरी ? क्या मेरे बिना तुम यहां रह पाओगी ? मुझे मालूम था कि छह से सात महीनों में मैं तुम्हें वापस ले जाऊंगा… और उसी आस में एक-एक पल गिन गिन कर काटता रहा कि, मैं कब तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, लेकिन अब..
बांसुरी ने राजा की बात आधे में ही काट दी..
” आपको तो मालूम था कि, कितने समय के बाद आप मुझे लेने आएंगे..
लेकिन उस वक्त भी मुझे तो नहीं मालूम था !
मेरे लिए तो मैं तपते रेगिस्तान में बिना पानी की बूंद के रह रही थी | और मुझे अपने उस कठिन समय से इतना तो यकीन हो गया है कि, आपको दोबारा देखने की आस में मैं अब भी जिंदा रह लूंगी साहब !
आप यह मत सोचें कि मेरा प्यार कभी भी आपके लिए कम होगा, लेकिन अब मैं इस बच्चे को छोड़कर आपके साथ नहीं जाऊंगी…!
नेहा की बेटी आज से मेरी जिम्मेदारी है…!
मेरे कारण ही इस बच्चे ने अपनी मां को खोया है, और अब मैं उसकी मां की जगह उसकी परवरिश करूंगी | और जब तक यह बच्ची अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने में समर्थ नहीं हो जाती, तब तक मैं महल वापस नहीं आऊंगी साहेब ! मैं यह नहीं कह रही कि मैं महल या आपको हमेशा के लिए छोड़ रही हूं !
बस मेरी वापसी तब होगी, जब यह बच्ची बड़ी हो जाएगी, समझदार हो जाएगी !
इसका अपना एक घर बार हो जाएगा !
उसके बाद आप की बांसुरी हमेशा हमेशा के लिए आपके पास लौट आएगी | क्योंकि जब मुझे यह लगेगा कि अब इसकी जिम्मेदारी मैंने एक जिम्मेदार हाथों में सौंप दी है तब मैं निश्चिंत होकर वापस लौट पाऊंगी ! और उस दिन हमारे माथे से यह पाप भी धुल जाएगा..!”
” तुम उस बच्ची को ही तो पालना चाहती हो ना..? . तुम्हें किसने मना किया है बांसुरी? तुम मेरे महल की महारानी हो, तुम इस बच्ची को हमारे साथ भी तो लेकर चल सकती हो ! जैसे शौर्य है, वैसे ही यह बच्ची भी हमारे महल का एक हिस्सा बनेगी ! हमारे साथ रहकर पलेगी..
तुम्हारी छत्रछाया में बढेगी.. !
बताओ क्या इस बात पर भी तुम्हें एतराज है?”
” एतराज है साहेब ! बहुत ऐतराज़ है ! क्योंकि वह आदमी जिसने अभी कुछ समय पहले अपनी पत्नी को खोया है, आज मेरी जिद के कारण अपनी बेटी को भी खो देगा ?
उसकी बेटी ही तो अब उसके जीने का सहारा है..
क्या मैं उससे उसकी बच्ची को भी छीन कर ले जाऊं ? क्या आपको यह सही लगता है ?
आप एक बार यह बात मिस्टर वासुकी पर नहीं अपने ऊपर ले कर देखिए, फिर आपको समझ में आएगा..!
क्या आप तैयार हो जाएंगे अपने छोटे से बच्चे को किसी और के हाथ में सौंप देने के लिए ?
नहीं.. कभी नहीं !!
यहां तक कि अगर मैं आपसे आज यह कहूं कि शौर्य को भी लाकर मुझे दे दीजिए..
तब भी आप शायद ही तैयार हों ! क्योंकि आपको कहीं ना कहीं लगेगा कि आपके राजकुमार की परवरिश आपके महल में ही बेहतर हो पाएगी | हालांकि मैं आपको इस दुविधा में डालूंगी भी नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं आपका मेरे बिना रहना ही बहुत बड़ा प्रायश्चित है | अब अगर ऐसे में मैं आपसे शौर्य को भी छीन लूंगी तो यह आपके साथ भी गलत हो जाएगा… |
हमारा प्रारब्ध, हमारी नियति ऐसी थी जो नेहा की मौत का पाप हम दोनों के सर माथे लिखा गया और अब यही एक रास्ता है प्रायश्चित का साहेब !
आप शौर्य को संभालिए और मैं यहां इस बच्चे को संभाल लूंगी !
मैं जानती हूं कि यह मैं आपको अकेले को सजा नहीं दे रही, मैं अपने आप को भी सजा दे रही हूं !
और शायद यही सजा मेरे आगे जीने की वजह बन पाएगी ! क्योंकि मैं अच्छे से जानती हूं कि, अगर आज मैं इस बच्ची को अकेली छोड़कर आपके साथ महल चली गई तो मैं घुट घुट कर मर जाऊंगी…!”
” नहीं आपको ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है रानी बांसुरी ! आप अपने साहब के साथ अपने महल वापस जाइये, यह मेरी किस्मत थी जो मुझे नेहा को खोना पड़ा और अब मैं अपने कारण आपको किसी और कष्ट का भागीदार बनने नहीं दूंगा…!”
” आप कौन होते हैं मिस्टर वासुकी मुझे आदेश देने वाले ? अगर मेरे साहेब हमारी रियासत के राजा हैं तो मैं भी उसी रियासत की महारानी हूं | और मुझे मेरे निर्णय लेने का पूरा हक है …… क्यों साहब..?”
थकी हुई नजरों से राजा ने बांसुरी को देखा और धीमे से अपनी पलकें झुका दी !
वह बांसुरी के स्वभाव को, उसकी ज़िद को जानता था ! यह वही लड़की थी जो बड़ों के मान सम्मान में उनकी गलत बातों को भी सर झुकाए चुपचाप सुन जाया करती थी |
लेकिन आज जब वास्तविकता में सही और गलत के चुनाव का समय आया तब उसने उसी बात का चुनाव किया जो उसके दिमाग को सही लगा.. |
राजा जानता था कि आज भी इस निर्णय को लेते हुए बांसुरी का दिल टूक टूक रो रहा था | वह खुद राजा के बिना जी नहीं सकती थी, लेकिन राजा यह भी जानता था कि, अगर बांसुरी ने यह सोच लिया है तो अब वह यही करके रहेगी !
राजा वापस अपने कदम बांसुरी की तरह बढ़ाकर उसके पास चला आया.. !
“तुम्हारे निर्णय से कोई आपत्ति नहीं है बांसुरी, लेकिन मैं भी तो तुम्हारे साथ यहां रह सकता हूं ना ! इसकी अनुमति तो दोगी कि मैं भी अपना महल छोड़कर अपने बच्चे के साथ यहां रह जाऊं..!
इस बात पर तो तुम्हें एतराज नहीं करना चाहिए!”
” अगर आप अपना महल और रियासत छोड़ कर यहां मेरे साथ रहने चले आए तो इसमें आपकी और मेरी सजा कहां हुई साहेब ? यह तो फिर आप की रियासत की जनता के लिए सजा हो गई ना ! और मैं अपने कारण किसी और को दुख नहीं देना चाहती !आशा करती हूं कि आप मेरी बात समझ गए होंगे, इसलिए जितनी जल्दी हो सके आप अपनी रियासत को संभालने अपने महल में चले जाइए |
शौर्य के पास आज तक उसकी मां ना सही मां की परछाई तो थी, लेकिन अब वह परछाई भी उससे छिन गई है | मैं जानती हूं मेरा शौर्य मेरे बिना अकेला पड़ जाएगा, लेकिन जैसे यहां मेरे पास यह नन्हीं सी परी है जिसे देखकर, जिसे अपनी बाहों में भर कर मैं शौर्य को प्यार करने का भूलावा सह लूंगी.. |
वैसे ही मेरी जगह उसके पास रूपा भाभी साहब, रेखा और नीरु है | और इन सभी पर मुझे पूरा भरोसा है कि

बहुत बेहतरीन भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐💐💐