
जीवनसाथी -2 भाग -84
वासुकी ने चाय का प्याला रखा और अस्पताल की तरफ बढ़ने वाला था कि समर उसकी तरफ आता हुआ दिखाई दे गया…
वासुकी के पास पहुंचते ही समर ने वासुकी की तरफ देखा और उसे अपने सीने से लगा लिया…
” बहुत-बहुत बधाई हो वासुकी.. तुम्हें बेटी हुई है..!”
समर के कहे यह वह शब्द थे जो अनिर्वान के कान में अमृत की बूँद बनकर बरसे…
उसने समर को कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया.. इस वक्त उसे किसी अपने की बाँहों की बहुत जरूरत थी..
इतनी देर से उसने अपने जज्बात काबू कर रखे थे… लेकिन ऐसे में अचानक मिली यह खुशखबरी उसके आंसुओं का बांध तोड़ गयी, और वासुकी जीवन में पहली बार किसी और के सामने आंसू बहा कर रोने लगा..
समर उसकी हालत समझता था, उसने धीरे से उसकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू कर दिया..
” अपनी बेटी को देखोगे नहीं…?”
बस पलभर अपने आंसुओं को बहने दिया और फिर उस पाषाण पुरुष ने अपने आँसू पोंछ लिए…
समर उसे अपने साथ लिए अस्पताल की तरफ बढ़ गया….
जाते जाते वासुकी ने पलट कर देखा… चाय वाली औरत की बच्ची उसे मुस्कुराते हुए देख रहीं थी..
वासुकी लौट कर उसके पास आया और उसकी माँ के हाथ में कुछ रूपये पकड़ा दिये..
“इतना सारा रुपया क्यों साहब ?”
“अपनी बेटी के लिए मेरी तरफ से कुछ तोहफे लें लेना !”
“पर ये तो बहुत ज्यादा रूपये हैं साहब.. इतने में तो मेरा छैः महीने का राशन भर जायेगा… !”
वासुकी हल्का सा मुस्कुरा उठा -” तो भर लेना, क्या बुराई है !”
वो चुपचाप पलट कर अस्पताल के अंदर चला गया…
“जिसके लिए भी इस आदमी ने हज़ारो रूपये हम गरीबों पर लुटा दिये वो ज़रूर इसका सबसे चहेता इंसान होगा !”
उस औरत ने उन बड़े बड़े नोटों को अपने माथे से छुआ कर अपने मरघिल्ले से पीले पड़े बक्से में डाल दिया…
वासुकी अंदर पहुंचा तब तक में नर्स बच्चे को साफ सुथरा कर बाहर लें आई थी….
नर्स सफ़ेद कपड़े में लिपटी नन्ही सी जान को लेकर बाहर आई और देख ही रहीं थी कि किसके हाथ में दूँ कि समर ने लपक कर उस बच्चे को गोद में लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया…
“सॉरी बड़े पापा, लेकिन हमारी नन्ही सी प्रिंसेस तो सबसे पहले चाचू की गोद में आएगी !”
समर के स्वभाव की चंचलता से वहाँ सभी परीचित थे, इस बात पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी कि राजा के बच्चे को समर पहले गोद में ले ले…
नर्स ने जैसे ही बच्चे को आगे बढ़ाया, समर ने खींच कर वासुकी की बाहें आगे ठेल दी, और बहाना सा बनाते हुए अपनी जेब से अपना फ़ोन निकाल लिया..
“भरद्वाज जी ज़रा बच्ची को पकड़िए.. मैं एक मिनट ज़रा फ़ोन देख लूँ.. !”
और वासुकी की गोद में उसकी बच्ची को डाल समर ने अपना फ़ोन कान से लगा लिया..
वहाँ खड़े सभी लोग वासुकी को घेर कर खड़े हो गए और महल की भावी राजकुमारी पर भर भर कर अपनी दुआएं बरसाने लगें…
लेकिन वासुकी के कानों में किसी की भी आवाज़ कहाँ पड़ रहीं थी…
वो तो उस नरम गुदगुदे अहसास में पूरी तरह खोया हुआ था.. उसकी गोद में उसका अपना अंश किलक रहा था..
ये बच्ची उसकी थी, उसका हिस्सा, उसका ख़ून !!
उसके और नेहा के प्यार के चरमोत्कर्ष का कितना सुंदर फल मिला था उसे… !
उसे हाथ में लेकर लगा जैसे आज उसका जीवन सफल हो गया था…. !
सही कहते हैं लोग, एक पति पत्नी के प्यार की सबसे सुंदर परिणति उनका बच्चा ही तो होता है…
भले ही एक माँ नौ महीने उस बच्चे को अपनी कोख में रख कर पालती है, लेकिन एक पिता उस बच्चे को अपने दिमाग में रख कर पालता है.. !
कितना सुंदर स्वर्गीय क्षण था ये..
उसने धीरे से अपनी ऊँगली से बच्ची का चेहरा छू लिया, उसे लगा जैसे कोई रुई का फाया उसने छुआ हो, जैसे रेशम का थान उसकी उंगलियों पर खुलकर गिर गया हो…..
ये वो पल था जिस पल में एक लड़का सही मायनो में पुरुष बन जाता है एक ज़िम्मेदार पुरुष, एक पिता !!
ऐसा अद्वितीय पल भी कभी उसके जीवन में आएगा, उसने सोचा न था !
उसे एक सिरफिरे सनकी पागल बिज़नेसमैन से एक सामान्य आदमी बनाने के लिए वो नेहा को आभार प्रकट करने को उतावला हो गया…
नेहा को अपनी बाँहों में भर कर उसे चूम लेने को उसका बावरा मन तड़प उठा !
बच्ची को गोद में लेते ही कुछ पलों के लिए तो वो अपनी नेहा को भी भूल बैठा था….
लेकिन अब नेहा की याद आते ही बेचैनी की तीव्र लहर सी उठी और उसने बच्चे पर से नजर हटा कर सामने खड़ी नर्स पर टिका दी…
वो कुछ पूछने जा रहा था कि रूपा उसे टोक कर उसके पास चली आई…
“अब हमारी प्रिंसेस को बड़ी ममा गोद में लेंगी.. !”
और रूपा ने बच्ची को वासुकी की गोद से एक तरह से छीन लिया…
हर कोई बच्ची के रूप में खोया हुआ था…
मक्खन की डली सा रंग, उस पर छोटे छोटे गुलाबी होंठ… आंखें बंद किये वो इतने प्यार से कुनमुना रहीं थी कि उसे गोद में लेने वाले हर एक का दिल उसे चूम लेने को ललचा कर रह जा रहा था.. !
लेकिन तुरंत कि पैदा हुई बच्ची को कोई कैसे ऐसे चूम लेता… ?
यहीं सोच कर सबने अपने मन पर काबू किया हुआ था..
“कुमार का क्या होगा जब वो अपनी लाड़कुंवर को देखेंगे ?”
रूपा की बात पर सभी मुस्कुरा उठे…
समर वासुकी के पास ही खड़ा था, उसने वासुकी की बेचैनी भांप ली थी…
“रानी सा कैसी है ?”
समर ने ही नर्स से सवाल कर दिया..
“अभी तक होश नहीं आया है.. !”
नर्स अपनी बात कह कर बच्ची को गोद में लिए वापस चली गयी…
रिदान के साथ खड़ी लीना ने शेखर को देखा और उसी से अपने मन की उलझन पूछ ली…
“इतनी देर बीत गयी, लेकिन राजा साहब नहीं आये…
बहुत आश्चर्य हो रहा मुझे इस बात पर… ?”
*****
इधर राजा साहब अपनी हुकुम के पास बैठे इतने दिनों का ब्यौरा दे रहें थे…..
बाँसुरी एक एक बात ध्यान से सुनती राजा के कंधे पर सर टिकाये बैठी थी…
राजा ने बाँसुरी को अपनी बाँहों के घेरे में लें रखा था..
ढ़ेर सारी बातें हो गयी थी….. और दोनों का दिल अब तक नहीं भरा था..
एक दूजे से बस यूँ ही लग कर बैठे रहना भी कितना सुकून दे रहा था..
ऐसा लग रहा था इतने दिनों बाद ज़िन्दगी वापस लौटी हो…
ऐसा ही कुछ तो उस समय महसूस किया था जब इतने दिनों की ट्रेनिंग के बाद मसूरी में दोनों मिले थे…
एक दूसरे से अलग होने का जी ही नहीं कर रहा था..
आज भी वहीं हाल था…
राजा की बातें सुन कर कहीं न कहीं बाँसुरी के मन में एक नाराज़गी तो थी ही, कि इतना सब राजा ने कर लिया लेकिन उससे एक बार बताया तक नहीं…
लेकिन राजा की आँखों का बदलता रंग देख कर वो कुछ कह नहीं पायी…
राजा इतने दिनों की दूरी का हर्ज़ाना वसूलना चाहता था, और बाँसुरी इस बात का कोई प्रतिरोध ना कर सकी…
कहीं ना कहीं वह भी तो राजा के बिना इतनी ही बेचैन थी…
उसके बाद तो एक दूजे की बाँहों में सामने के बाद ना राजा को होश रहा ना बाँसुरी को…..
उन दोनों के बिछोह के सारे पल आँखों के रास्ते बह कर दूर चले गए…
दोनों एक दूसरे में सिमटे जाने कब तक अपनी ही दुनिया में खोये रहे…
आखिर बाँसुरी ने ही राजा को झिंझोड़ कर उठा दिया..
“साहब वहाँ महल में सब कैसे हैं ? “
इस बात को सुन राजा अचानक समझ नहीं पाया कि बाँसुरी को दादी साहब के बारे में बताना सही होगा या नहीं.. ?
लेकिन आज नहीं तो कल बताना तो होगा…
क्योंकि आज अगर राजा छिपा भी गया तो कल जब बाँसुरी महल में जायेगी तब तो उसे मालूम चल ही जायेगा…
और उस वक्त बाँसुरी की नाराज़गी और भी बढ़ जायेगी यहीं सोच कर राजा ने उसे बता दिया…
“हुकुम एक बात कहना चाहता हूँ… !
मेरी बात को समझने की कोशिश करना, और प्लीज अपना ख्याल रखना..
दादी हुकुम अब हम लोगों के बीच नहीं रहीं… !”
बांसुरी के लिए यह बात किसी दुखद आश्चर्य से कम नहीं थी | उसे महल में हाथों-हाथ लेने वाली दादी हुकुम ही तो थी | जब जब राजा की मां उसे परेशान किया करती थी, तब वह दादी हुकुम के ही आंचल की छांव थी, जो बांसुरी को अपने दुख और परेशानियों को भूलने में मदद किया करती थी | अपने मायके की याद को भी वह दादी हुकुम के साथ बैठकर भुला दिया करती थी | न जाने दादी साहब ने कितनी सारी बातें उसे सिखाईं और समझाईं थी | उसके आईएएस के सिलेक्शन के समय भी सबसे ज्यादा खुश होने वाली दादी साहब ही थी | राजा के बचपन के किस्सों की पोटली वह समय समय पर बांसुरी को सुनाती रहती थी..
उन्होंने ही तो बांसुरी को यह बताया था कि राजा के दादा साहब का सपना था उनका हॉस्पिटल हो और उसी सपने को पूरा करने के लिए बांसुरी ने दादी साहब के साथ मिलकर ही तो कितनी सारी योजनाएं बना ली थी …
और जब अपने जन्मदिन के दिन राजा ने उस हॉस्पिटल को देखा था, और वहां सामने लगी अपने दादा साहब की लंबी सी मूर्ति को देखा था तो खुशी के मारे उसने बांसुरी को अपने सीने से लगा लिया था ! इन सारी खुशियों की असल हकदार उसकी बहुत प्यारी दादी हुकुम अब नहीं रही थी…
वह जानती थी कि राजा खुद भी दादी साहब से बहुत जुड़ा हुआ था ! आखिर वह उनका सबसे लाडला पोता जो था |
दादी साहब को राजा में हमेशा अपने पति की झलक दिखाई देती थी | और इसीलिए वह अपना तन मन अपने इस लाड़ले पर न्योछावर की रहती थी | उनकी याद में बांसुरी के आंसू रुक नहीं रहे थे…
वह लगातार सिसकती हुई उनके बारे में पूछती भी जा रही थी, और उसे अपनी बाहों का सहारा दिए राजा सब के बारे में उसे खैर कुशल बताते जा रहा था…!
“अच्छा सुनो बाँसुरी, तुम्हें एक और बात बतानी थी… विराट वापस आ गया है… !”
“यह तो वाकई खुशी की बात है ! बहुत सालों से वह इंडिया से बाहर चले गए थे ! अब वापस आ ही गए हैं तो, उनके लिए भी एक अच्छी सी लड़की ढूंढ कर उनकी भी शादी करवा दीजिये… !”
” उसकी वापसी हमारे लिए खुशी की बात तो है, लेकिन बात यह है कि वह शादी नहीं करना चाहता !”
“लेकिन क्यों ?”
“ये तो हुकुम उसी से पूछ लेना.. वो अपने किसी ख़ास दोस्त के साथ वापस लौटा है, और कुछ दिन यहाँ रह कर शायद वापस लौट जायेगा.. !”
“लेकिन ऐसा क्यों.. उन्हें यहीं अपने परिवार के साथ रहना चाहिए.. ?”
“हम्म… !
पर शायद हमारा परिवार और राजमहल के लोग उसकी शर्त मानने को तैयार नहीं होंगे और इसीलिए वह कुछ दिन की छुट्टियां बिताकर लौट जाना चाहता है!”
राजा ने ठंडी सी आह भरी जैसे उसके मन में कोई बोझ रखा है जिसे फिलहाल वह बांसुरी के साथ नहीं बांटना चाहता…
बांसुरी बहुत ध्यान से राजा को देख रही थी, जैसे जानने की कोशिश कर रही हो कि अब भी ऐसी कौन सी बात है जो राजा उससे छुपा रहा है !
” साहब क्या अब भी कोई ऐसी बात है जो आप मुझसे छुपा रहे हैं..?”
” नहीं बांसुरी तुमसे छुपाने वाली कोई बात नहीं है, और जहां तक तुम सोच रही होगी कि यह सारी चीजें मैंने तुमसे छुपाकर क्यों नहीं करी उसका कारण भी तुम हो..!
मैंने जब से तुमसे प्यार किया, तुम्हारे साथ रहा हूं.. इतने दिनों में जितना तुम्हें जाना, मैं यह अच्छी तरह समझ गया था कि अगर मैं तुम्हें यह बता देता कि तुम्हारी जान को या तुम्हारे कैरियर को मेरे कारण नुकसान हो सकता है तो इस बात पर तुम कभी मुझे छोड़कर नहीं जाती | तुम कभी अपने बच्चे शौर्य को छोड़कर नहीं जाती | मैं तुम्हारी त्याग और तुम्हारी तपस्या को जानता हूं बांसुरी |
पिछली बार भी जब मैंने चाहा था कि, तुम अपने पैरों पर खड़ी हो तब भी मुझे तुम्हें बहाने से ही खुद से दूर करना पड़ा था | क्योंकि अगर मैं खुद होकर तुमसे कहता तो, तुम कभी मुझे छोड़कर नहीं जाती | बस इसीलिए इस बार भी तुमसे बिना कुछ कहे मैंने खुद यह बात तय कर ली कि, हम दोनों को अलग रहना है | लेकिन अब हमारे वनवास का समय समाप्त हो गया है | और अब हम दोनों को दुनिया की कोई भी ताकत अलग नहीं कर सकती… |
बांसुरी मुस्कुराकर राजा के गले से लग गई………
” साहब आपने नेहा के बारे में नहीं बताया, वह कहां है इस वक्त…?”
” उसी की तो चिंता लगी हुई है बांसुरी..? अभी कुछ देर पहले ही समर ने प्रेम को फोन किया था और पता चला है कि उसका एक्सीडेंट हो गया है..?”
” एक्सीडेंट कैसे हो गया ? वह ठीक तो है ना ? वह तो महल में रही होगी, फिर कोई भी अनहोनी हुई कैसे ?”
“वही सब जानना है बाँसुरी ! तुम परेशान मत हो.. मैं पता करता हूँ और सुनो… तुम बस वापसी की तैयारी कर लो, क्योन्कि अब हमें घर वापस लौटना है.. तुम्हारे बगैर मेरा महल महल नहीं था, घर नहीं था…..
राजा और बांसुरी को एक दूसरे के साथ कमरे में काफी वक्त हो चला था, धीरे से दरवाजे पर किसी ने दस्तक दे दी…
दस्तक सुनते ही बांसुरी धीरे से उठकर दरवाजे तक चली आई और उसने दरवाजा खोल दिया !
सामने सारिका खड़ी थी….
” आपके खाने का वक्त हो गया रानी साहब! आप दोनों के लिए यही खाना ले आए ? या आप लोग नीचे खाना खाएंगे..!”
” नीचे ही खाएंगे सबके साथ..!”
राजा ने मुस्कुराकर सारिका से कहा और सारिका राजा की मुस्कान पर बुरी तरह से फ़िदा हो गई..
वह उन दोनों को झुककर प्रणाम करके नीचे चली गई.. इतनी देर में उसने जाने कितने तरह के पकवान बना लिए थे |
वो रसोई में जाकर महा उत्साह से खाने को गर्म करके थालियों में परोसने लगी और दर्श तैयारियाँ देखने वहीं चला आया…
” आज तो छप्पन भोग बना डाले हैं तुमने… ये जो राजा साहब को इंप्रेस करने में लगी हुई हो ना, कोई फायदा नहीं है इसका…
ये दूसरे राजाओं की तरह छप्पन रानियां रखने वाले राजा नहीं है.. एक पत्नी व्रत निभाते हैं हमेशा!”
” आपसे किसने कहा कि, हम उन्हें इम्प्रेस करना चाहते हैं… हम तो रोज रोज आपके लिए रेविओली और लजानिया बना बनाकर पक गए थे..
आज मौका मिला तो राजा साहब के लिए अपनी कलछुल तोड़ कर रख दी है..अब देखते हैं उन्हें कितना पसंद आता है हमारे हाथ का खाना.. !
हो सकता है उन्हें हमारे हाथ का खाना इतना लजीज लगे कि, वह हमें अपने महल में मास्टरशेफ नियुक्त कर दे… कम से कम आपसे और आपके अतरंगी खाने से तो छुट्टी मिलेगी..!”
” अगर सच में मुझसे छुट्टी पाना चाहती हो तो यह तो तुम कभी भी पा सकती थी ! मैंने कौन सा तुम्हें रोक रखा था !
आज वैसे भी रानी साहेब के जाने के बाद तुम्हारा यहां से काम खत्म…
उसके बाद तुम अपने रास्ते हम अपने रास्ते.. तुम वापस अपने एनजीओ लौट जाना,और मैं अपने काम धंधे पर लग जाऊंगा… !”
” हां तो हमें भी कौन सा शौक है आपके साथ पड़े रहने का !!
हमारे जाने के बाद फोन मत कीजिएगा कि सारिका आ जाओ… और एक बार अपने हाथ का रिसोतो खिला दो..!”
“मैं तुमसे कहीं ज्यादा बेटर शेफ हूं.. अब यह सब बकवास बंद करो और खाना परोस कर बाहर ले आओ राजा साहब नीचे आ गए हैं..!”
सारिका मुंह बनाकर वापस खाने की तरफ मुड़ गई… लेकिन जैसे ही उसे यह याद आया कि वह राजा के लिए खाना परोस रही है उसके चेहरे पर वापस एक भीनी सी मुस्कान चली आई..
इधर बाहर हॉल में डाइनिंग टेबल पर पहुंचने के बाद राजा ने प्रेम को इशारा किया और प्रेम ने अपनी गन से धीरे से सुनील को छू लिया..
सुनील हड़बड़ा कर अपनी जगह पर खड़ा हो गया…
” अब क्या करना चाहते हो मेरे साथ..?”
उसने प्रेम की तरफ देख कर पूछा और प्रेम धीरे से मुस्कुरा उठा
” अब तक कुछ किया ही कहां है तेरे साथ..?”
प्रेम के जवाब को सुनकर सुनील वापस सामने राजा की तरफ देखने लगा…
उसी समय ऊपर से बांसुरी सीढ़ियां उतरकर नीचे चली आई…
सुनील ने एक नजर बांसुरी को देखा और तुरंत ही अपनी पलके झुका ली !
उसे लगा कहीं गलती से भी राजा ने उसे बांसुरी को देखते देख लिया तो वह पक्का दो गरम रॉड उसकी आंखों में घुसा कर उसे हमेशा हमेशा के लिए अंधा कर देगा…
” आइए सुनील बाबू खाना खा लीजिए…!”
अपने गले की थूक निगल कर डरे हुए कदमों से सुनील डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ने लगा…
उसी वक्त प्रेम के फोन पर समर का कॉल आने लगा..
प्रेम ने फोन उठा लिया |
दूसरी तरफ से समर ने उसे खुशखबरी सुना दी… खुशखबरी सुनते ही प्रेम के चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान चली आई |
राजा ने प्रेम को मुस्कुराते देखा और इशारे से ही पूछ लिया और प्रेम धीरे से राजा के करीब चला आया..
” अनिरुद्ध वासुकी को बेटी हुई है!” यह खबर सुनते ही राजा के चेहरे पर भी एक लंबी सी मुस्कान चली आई…
” यह तो बहुत अच्छी बात है.. धीरे-धीरे सब सही होने लगा है.. !”
आंखों में सवाल लिए बांसुरी राजा की तरफ देखने लगी…
” क्या नेहा प्रेग्नेंट थी?”
“हम्म !”
राजा ने एक छोटा सा हम्म कहा और प्रेम से कुछ बातें करने लगा लेकिन बांसुरी के दिमाग में कुछ और ही विचारों की श्रृंखला चलने लगी…
क्रमशः
aparna….
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लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐