जीवनसाथी -2/83

जीवनसाथी -2 भाग 83..

ऑपरेशन थिएटर में लाने के पहले डॉक्टर ने कंसेंट फॉर्म साइन करवा लिया था, लेकिन अब मरीज के बेहोश रहते हुए उसका ऑपरेशन शुरू करने का कंसेंट भरवाने का वक्त आ गया था और इसीलिए पंखुड़ी अपने हाथ में वह फॉर्म लिए बाहर चली आई…

और उसने युवराज के हाथ में वह फॉर्म पकड़ा दिया..

पंखुड़ी को देख अनिर्वान तुरंत युवराज के पास चला आया…

“ये क्या है ?

पंखुड़ी ने अनिर्वान की तरफ कागज़ घूमा दिया..

“कंसेंट फॉर्म है.. रानी साहेब को अब तक होश नहीं आया है.. ऐसे में उनका ऑपरेशन शुरू करना ज़रा रिस्की है.. उनकी जान को खतरा भी हो सकता है… |
असल में सच कहूं तो उनकी जान को बहुत खतरा है.. वो बिल्कुल रिस्पॉन्ड नहीं कर रहीं हैं !!
  लेकिन अब हम उनके होश में आने का इंतज़ार नहीं कर सकते.. क्योंकि बच्चे की धड़कन धीमी पड़ने लगी है ! अगर ऑपरेट नहीं किया तो बच्चे को बचाना भी मुश्किल हो जायेगा !”

अनिर्वान के चेहरे पर लाचारगी नज़र आ रहीं थी… उसे इस वक्त कुछ नहीं सूझ रहा था..

“वैसे तो राजा साहब यहाँ होते तो उन्हीं से ये फॉर्म साइन करवाया जाता, क्योंकि वो उनके पति है…
  लेकिन उनके बिहाफ में उनके घर का कोई भी जिम्मेदार सदस्य इस कंसेंट फॉर्म को भर कर दे सकता है !
इस फॉर्म में यह लिखा है कि हम डॉक्टर्स मरीज को बचाने के लिए सारे संभव प्रयास करेंगे, लेकिन अगर किसी कारणवश मरीज नहीं बच पाता है तो, उसकी जिम्मेदारी डॉक्टर नर्स हॉस्पिटल स्टाफ या इस अस्पताल की नहीं मानी जाएगी ! आप अपनी जिम्मेदारी पर अपने मरीज को हमारे द्वारा की जाने वाली चिकित्सा के लिए हमें सौंप रहे हैं ! आपको इस चिकित्सा के परिणाम और दुष्परिणाम दोनों बता दिए गए हैं, और मरीज की किसी भी हालत के ज़िम्मेदार पूरी तरह से आप होंगे !”

पंखुड़ी ने कंसेंट फॉर्म में लिखी सारी चीज वहां मौजूद लोगों को पढ़ कर बता दी..

अनिर्वान धीरे से उस फॉर्म की तरफ हाथ बढ़ा रहा था कि तभी लीना ने अनिर्वान को टोक दिया…

” यू नीड नॉट टू बी कंसर्न अबाउट दिस फॉर्म मिस्टर  भारद्वाज, लेट हैंडल दिस टू हर हाइनेसेस फैमिली !”

अनिर्वान का बढ़ता हुआ हाथ रुक गया और युवराज ने उस कंसेंट फॉर्म को लेकर उस पर दस्तखत कर दिए….

अनिर्वान भारी कदमों से वहां से बाहर निकल गया उसका इस जगह पर दम घुट रहा था..
यहां के लोगों से वह सीधे तौर पर नहीं जुड़ा हुआ था… यह सभी लोग दुखी थे, क्योंकि इनके लिए इनकी रानी साहेब अंदर जीवन और मृत्यु से लड़ रही थी..
  यह सारे लोग एक दूसरे को ढांढस बंधा रहे थे, एक दूसरे का सहारा बनकर खड़े हुए थे ! लेकिन उसके पास इस वक्त कोई नहीं था….

वो वहाँ से बाहर निकल गया..

बाहर बगीचे की गीली सी मिट्टी जाने क्यों उसे अपनी सी लग रहीं थी..
वहीं एक किनारे लोहे की बेंच पड़ी थी.. कुछ देर पहले हुई बारीश से भीगी उस बेंच पर वो बैठने जा रहा था कि एक बच्ची ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक दिया..

“अरे भैया रुको !! यहाँ बैठोगे तो आपके कपड़े भी गीले हो जायेंगे !”

और उस आठ नौ  साल की बच्ची ने अपने छोटे से दुपट्टे से उस बेंच को पोंछ दिया.. -” अब बैठ जाइये !”

उस बच्ची की मीठी सी बोली अनिर्वान को यूँ लग रहीं थी जैसे तपती धरती पर पानी की बुँदे हो..

वो वहीँ बेंच पर अपने दोनों हाथ बेंच की पिछली दीवार पर टिकाये बैठ गया…
उसके ठीक सामने से मुड़कर पार्किंग थी..
और उसके सामने एक तरफ एक छोटा सा शिव मंदिर था..
उस मंदिर को देखते ही अनिर्वान को कई सारी बातें याद आने लगी…

ऐसे ही एक शिव मंदिर में उसने पहली बार बांसुरी को देखा था..

मंदिर से नीचे अपनी गाड़ी में बैठा वो वसूली के लिए किसी ठेकेदार का इंतजार कर रहा था…
उसकी नजरें गाड़ी में बैठे रहने के बावजूद मंदिर की सीढ़ियों पर टिकी हुई थी, तभी तेजी से सीढ़ियां उतरती हुई वह नजर आ गई थी…

अपने धानी दुपट्टे को बार-बार कंधों पर संभालती वह उसकी गाड़ी के पास से गुजर कर आगे बढ़ गई थी…

  अनिर्वान उस वक्त बांसुरी के बारे में कुछ भी नहीं जानता था, उसने पहली बार किसी ऐसी लड़की को देखा था जिसे देखते ही वह खुद को भुला बैठा था..
वरना आज तक उसने अपने सामने और किसी को कुछ  समझा ही नहीं था..

इसके बाद दोबारा उसे कलेक्टर ऑफिस में मिलने के लिए बुलाया गया था, जहां उसने अपने सामने बैठी कलेक्टर साहिबा को देखा और चौंक गया था…

बांसुरी को ही कलेक्टर के रूप में देखकर वो किस बुरी तरह प्रभावित हुआ था ये वो किसी से नहीं कह सकता था…

बाँसुरी की खूबसूरती से इतर जब बाँसुरी ने उसे उसके दुश्मनो की चालों के बारे में पहले से बता कर सतर्क किया और उसकी जान बचाई, उस घटना के बाद तो वो बाँसुरी में डूब कर रह गया था..

   लेकिन उसके जैसे बेपरवाह मलंग मनमौजी ने कभी ऐसा सोचा ही नहीं था कि कभी उसके जीवन में भी कोई लड़की आएगी और वो भी इस तरह कि सावन की  बदलियों की तरह उसके जीवनाकाश में छा जायेगी….

बाँसुरी वैसे ही उसके जीवन में छा गयी थी कि तभी उसे राजा अजातशत्रु ने मिलने बुला लिया था…

उनसे मिलने से पहले उसे कहाँ कुछ भी मालूम था कि उसे राजा साहब क्यों याद कर रहें हैं..?
    हालाँकि अपने माता पिता से उसने राजा अजातशत्रु के दादा साहब के अनगिनत किस्से सुन रखें थे, और ये भी सुन रखा था कि उन सबका जीवन राजा साहब का गिरवी है और अगर कभी राजा साहब उसे किसी कार्य के लिए याद करें तो बिना सोचें उसे उनके लिए अपने प्राण तक उत्सर्ग करने के लिए तैयार रहना होगा !!

बचपन से एक तरह से घुट्टी में मिलाकर उसे ये बात पिला दी गयी थी, कि राजा साहब के अगर किसी भी तरीके से वो लोग काम आ पाए तो इससे बढ़ कर सौभाग्य उनके लिए दूसरा नहीं होगा…
राजा साहब का काम यानी स्वर्ग की सीढ़ी !!

अब तक वो, दर्श और काका के साथ अपने छोटे से साम्राज्य का स्वयंभू राजा था..!
उससे टकराने की हिम्मत वहाँ आसपास किसी में नहीं थी, लेकिन जब राजा साहब ने उसे याद किया तब दर्श और काका से सलाह कर वो राजा साहब से मिलने निकल पड़ा था..

तब उसे कहाँ मालूम था कि जिसे वो अपना सौभाग्य द्वार समझ कर खोलने जा रहा है,वो उसके जीवन का काल सिद्ध होगा..

महल में पहुँचते ही जब उसे सामने बाँसुरी और शौर्य दिखाई दिये तभी वो अपने आधे प्राण खो चुका था..
और जब बातों बातों में राजा साहब ने उसे अपनी हुकुम की ज़िम्मेदारी सौंप दी तब उनकी आज्ञा के सामने वो नतमस्तक खड़ा रह गया था…

उस दिन के बाद से उसने कभी बाँसुरी को भर ऑंख  नहीं देखा.. !
  वो सामने पड़ भी जाती तो खुद ब खुद उसकी आंखें नीचे झुक जाती.. !

बाँसुरी के लिए अपने मन में आई दुर्बलता के लिए जाने कितनी बार उसने खुद को कोसा था..

एक ऐसा परिवार जिनके कारण आज उसका परिवार जीवित था, उस परिवार की पीढ़ी राजा अजातशत्रु की पत्नी के लिए उसके मन में ऐसे विचार आये भी तो कैसे ?

उसने जाने कितनी बार बाँसुरी से हुई मुहब्बत के लिए खुद को दण्डित किया था, और उसके इसी पागलपन से उसे दूर करने के लिए उसका दोस्त दर्श कुछ भी कर जाने को तैयार हो गया था..

अपने मन को सौ बार रोकने के बाद भी जब कभी बाँसुरी अपने जन दर्शन कार्यक्रम में होती तो वो चोरी चोरी दूर से ही उसे देखता खड़ा रह जाता था, और फिर घर लौटने के बाद अपनी आँखों को सज़ा देने के लिये खुद ही कभी नींबू का रस आँखों में झोंक लेता तो कभी लाल मिर्च का पाउडर..

उसका यहीं पागलपन कहीं ना कहीं  दर्श और काका को त्रस्त करने लगा था…

और उसी बीच समर ने नेहा को बाँसुरी की जगह देने का नया फरमान पेश कर दिया था…

नेहा से पहली मुलाकात भी उसे अच्छे से याद थी…
पहली बार उसे देख कर वो पल भर को ठिठक कर रह गया था,
   उसे देख कर वो सोचने पर मजबूर हो गया था कि, कैसे किन्हीं दो लोगों के चेहरें में इतनी समानता हो सकती थी .. ?

एक झलक देखने पर नेहा बाँसुरी सी ही लगती थी…

वही कद काठी, वही चेहरा मोहरा, वही रूप रंग…

लेकिन बांसुरी की आंखों में जहां गंभीरता का समंदर हिलोरे लेता था, वही नेहा की आंखें चंचल झरने की तरह बहती चली जाती थी…
बाँसुरी की मुस्कान जहाँ देखने वाले को शीतलता से ओत प्रोत करती थी वहीँ नेहा की खिलखिलाती हंसी अपनेपन की ऊष्मा से भर देती थी..

   इसके बावजूद बाँसुरी की सौम्यता और सादगी के सामने नेहा की चंचलता और चपलता ने उसे पहली बार में आकर्षित नहीं किया था…

लेकिन किस्मत को ये मंजूर नहीं था, और एक के बाद एक ऐसा कुछ होता चला गया कि, ना चाहते हुए भी वो नेहा में उलझता चला गया…

  एक मुकम्मल औरत में वाकई वो ताकत होती है कि वो चट्टान जैसे पुरुष के मन में भी उसके पत्थर दिल को तोड़ फोड़ कर प्रेम का झरना बहा जाती है..

ऐसे ही थोड़े ना इंद्र ने मेनका को पृथ्वी पर विश्वामित्र की तपस्या भंग करने भेजा था !!

वैसा ही कुछ नेहा के साथ था..
वो थी भी तो मेनका सी…

वो जैसी भी थी लेकिन इतना तो था कि उसके साथ रहने वाला उसके जादू से ज्यादा दिन अछूता नहीं रह सकता था…

उसने वासुकी से टूट कर प्यार किया था.. इतना प्यार जितना इस संसार में सम्भव नहीं हो सकता…
वो सच में वासुकी के प्यार में खुद को भुला बैठी थी.. उसने अपने वजूद को भी नकार दिया था..!
सिर्फ वासुकी से प्यार के कारण वो बाँसुरी बन कर महल में रहने चली आई थी..
लोगों की नज़र में वो रानी बाँसुरी थी, वो चाहती तो इस बात का फ़ायदा उठा कर कुछ भी कर सकती थी..!
राजा और रानी का बेटा उसके पास था ! शौर्य का इस्तेमाल कर वह अपने लिए मनचाही मुराद पूरी करवा  सकती थी |
   राजा अजातशत्रु उसे कभी भी कुछ भी देने से मना नहीं करते, लेकिन उसका इन सब बातों पर ध्यान ही कहाँ  था ?
    वह तो बस अपने वासुकी की दीवानी थी और उसी के लिए यह सब कर रही थी..|
महल में उसे भेजने के पहले एक बार दर्श ने उसे बैठाकर सारी सच्चाई समझा दी थी कि, उसकी जान पर भी बन आ सकती है…
         बावजूद वो प्रेमदीवानी वासुकी के प्रति अपनी प्रेम परीक्षा देने को इतनी उतावली थी कि उसने हर एक बात अपने सर माथे से लगा ली थी….

और उस बावली का वहीं दीवानापन वासुकी को धीरे धीरे उसकी तरफ झुकाता चला गया था..
और अंतत: वो भी उसी की तरह उसका दीवाना बन गया था..
जिस शाम वो महल से कोई ना कोई बहाना बनाकर उसके ऑफ़िस चली आती थी, वो शाम फिर सतरंगी हो उठती थी.. !
     एक बार की दिखी उसकी झलक अगले चार दिनों का ईंधन उसके लिए जुटा जाती थी.. !
  ऑफ़िस केबिन में किसी के ना होने पर वो उसके करीब आकर उसे ज़बरदस्ती चूम लिया करती थी, आज नेहा की उसी करीबी के लिए वो तरस कर रह गया था…

नेहा की बचकानी हरकतों पर ऊपर से वह भले ही कितनी भी नाराजगी दिखाएं दिल ही दिल में वह भी उन अदाओं पर वारा जाता था..!

उसे याद आने लगी वो शाम जब शादी के अगले दिन वो ज़बरदस्ती उसे अपने साथ मंदिर लें गयी थी…

अपनी चूड़ियों से भरी कलाई से उसने लपक कर वासुकी की मज़बूत कलाई थाम ली थी…
वासुकी ने मंदिर में अंदर जाने से मना कर दिया था और वो बच्चों सी रूठ गयी थी…

“बिना बात हमें गुस्सा मत दिलाइये मिस्टर हस्बैंड !! यहाँ  तक साथ आए हैं तो, आगे भी चलिए !
   देखिए आपने हम से शादी की है और अब जब तक हमारी शादी का बंधन मौजूद है आपको हमारी बात माननी पड़ेगी..!”

    एक तरह से जबरदस्ती खींचकर वासुकी को अपने साथ मंदिर ले गई थी, मंदिर से निकलने के बाद उसने उसे वही सीढ़ियों पर खींचतान कर बैठा दिया था..

” कुछ देर मंदिर में बैठना भी चाहिए | यह नहीं कि बस आए, दर्शन किये और चले गए..
अरे कोई औपचारिकता निभाने थोड़ी ना आ रहे हैं हम!
   अपने आराध्य के घर आ रहे हैं तो, कुछ देर उनके साथ बैठना तो बनता है | और कहते हैं कि भगवान का दिया प्रसाद भी मंदिर में ही बैठकर खाना चाहिए, जानते हैं क्यों..?”

” तुम बताए बिना मानोगी तो हो नहीं..!”

वासुकी के ऐसा कहते ही नेहा मुस्कुराकर ना में गर्दन हिला उठी…..

” अच्छा बताइए मिस्टर हस्बैंड जब आप किसी के घर जाते हैं, और कोई आपके सामने चाय और नाश्ता रखता है तो क्या आप नाश्ता बिना खाए, उस प्लेट को उठाकर पॉलीथिन में उस नाश्ते को भरकर उनके घर से बाहर निकल जाते हैं ? नहीं ना, बल्कि उनके घर पर बैठकर नाश्ता करते हैं, उनसे बातें करते हैं, उसके बाद निकलते हैं ! बस वैसा ही कुछ मंदिर आने का भी है….!

हमारी दादी कहा करती थी कि, जब भी कभी मंदिर जाओ तो दर्शन और परिक्रमा करने के बाद प्रसाद लेकर दो घड़ी मंदिर में बैठ जाओ | प्रसाद वहीं खाओ और उसके बाद कुछ देर तक मंदिर में शांति से बैठे रहो..
और हम अक्सर ऐसा करते हैं.. क्योंकि जब मंदिर में बैठे होते तो ऐसा लगता है मंदिर की सारी सकारात्मक ऊर्जा हमारे अंदर भर रही है, और हमारे अंदर की सारी नकारात्मकता हमारे अंदर से निकलकर सुदूर अंतरिक्ष में समाती जा रही है..!….
… मिस्टर हस्बैंड एक बात और कहें.. ..?”

“कहिये… !”

” जब आप इतने ध्यान से हमारी बातें सुनते हैं ना तो, हमें बहुत अच्छा लगता है !
  क्योंकि, जब हम आपसे पहली बार मिले थे तो, आपकी यह इमेज हमारे ऊपर बनी थी कि, आप किसी की सुनते नहीं है.. सिर्फ अपनी सुनाते हैं और अपने ही मन की करते हैं !”

” तुम्हें चाहे जितना सुन लूँ,  करता तो अब भी मै अपने मन की ही हूँ.. !”

“हो सकता है… लेकिन अभी आपकी इस बात पर एक गाना याद आया.. इजाज़त हो तो सुनाऊँ ?”

नेहा की बात पर वासुकी चौंक कर इधर-उधर देखने लगा और नेहा ने इशारे से उसे आश्वस्त कर दिया कि आसपास कोई भी उसका गाना नहीं सुन पाएगा और नेहा एक बार फिर गाने में मगन हो गई…..

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा

दीवारों से टकराओगे,जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा…
मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा…..

हर बात गवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगे
तावीज़ें भी बँधवाओगे, जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा….

वासुकी की आंखें बंद थी, उसे मालूम भी नहीं था कि उसकी आँखों से चुगलखोर आँसू बाहर निकल कर दुनिया को उसका दुःख बता देना चाहते थे…
    कि तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया….

उसने आंखें खोली, उसके बाजू में साधारण से कपड़ों में एक औरत खड़ी थी, उसके हाथ में चाय का प्याला था..
वासुकी ने गौर से देखा वो औरत उसी बेंच से कुछ हट कर अपनी चाय की टपरी लगाए हुए थी…

इसने इतने प्यार से चाय वासुकी की तरफ बढ़ाई कि वो मना नहीं कर सका..

“चाय पी लीजिए साहब… चाय की गर्माहट आपके मन को थोड़ी ठंडक देगी..! यहां बैठने वाले सभी लोग अपने किसी करीबी के ठीक होकर बाहर आने के इंतजार में ही बैठते हैं | और वह सामने मंदिर दिख रहा है ना , वहां पर मन्नत का नारियल भी बांधते है….
   चाय पी कर आप भी मन्नत का नारियल बांध दीजिए यहां बंधा नारियल कभी निष्फल नहीं होता साहब…!”

जाने उस औरत की बात में ऐसा क्या था, चाय के प्याले को एक तरफ रख वासुकी अपनी जगह से उठ गया और मंदिर की तरफ बढ़ गया…
वह आगे बढ़ा चला जा रहा था कि, एक बार फिर वही लड़की उसके सामने से हंसकर गुजर गई..
   उसे देखकर वासुकी के दिल में एक भीनी सी मासूमियत खिल उठी…

उसने वही एक किनारे से नारियल और लाल चुनरी ली और एक साथ लेकर मंदिर के पंडित जी के पास पहुंच गया…

उसने बिना कुछ कहे वह नारियल पंडित जी के सामने बढ़ा दिया !
पंडित जी भी कई सालों से अस्पताल के उस मंदिर में पूजा करते आ रहे थे, वह भी इस बात को समझते थे  की सबसे ज्यादा निस्वार्थ भाव से अगर कहीं पूजा और प्रार्थना की जाती हैं तो वह अस्पताल होते हैं | पंडित जी ने भी चुपके से नारियल और चुनरी ले ली और उन्हें एक कपड़े में लपेटकर मंदिर में लें गए….

हवा के खुशबूदार झोंके की तरह एक बार फिर वही बच्ची वासुकी के करीब चली आई…-” अरे भैया आप खुलकर जिनके नाम पर पूजा करवानी है वह तो बता दो..! वरना पंडित जी को कैसे पता चलेगा कि, किसके लिए पूजा करवा रहे हैं..?”

     उस पल में वासुकी का दिल दिमाग एकदम से शांत हो गया था ! उसने हाथ जोड़े और मन ही मन प्रार्थना करने लगा…

” नेहा तुमसे बहुत प्यार करने लगा हूं, मैं जानता हूं मैंने तुम्हें बहुत सताया है…|
तुम्हें सिर्फ मेरे पास रहना था, इससे ज्यादा कभी तुमने मुझसे कुछ नहीं चाहा और मैंने भी पूरी कोशिश की कि जब से तुम मेरी जिंदगी में  आई, तुम्हें पल भर के लिए भी अकेला नहीं छोडूं.. !
तुमसे पहले मैंने अपनी जिंदगी में किसी और से प्यार जरूर किया था, लेकिन यकीन मानो तुमसे प्यार करने के बाद मैं खुद को भूलने लगा और जैसा तुम चाहती थी तुम्हारे ही रंग में रंग गया हूं !
जैसा तुम मेरी लंबी जिंदगी के लिए मन्नत के धागे बाँधा  करती थी, आज मैं भी तुम्हारे लिए मन्नत का धागा बांधने आया हूं….
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जो तुम्हारी इच्छा हो वह पूरी कर दे !”

वासुकी ने आंखें खोली और शांति से वापस उस बेंच की तरफ मुड़ गया..

उसकी चाय वहां पड़े पड़े ठंडी हो गई थी, इसलिए उस औरत ने उस चाय को हटाकर उसके वहां पहुंचते ही दूसरी चाय का प्याला उसकी तरफ बढ़ा दिया…

” वह बच्ची कौन है?”

” मेरी बच्ची है साहब..!  इसका बाप इस भरे संसार में हमें छोड़कर चला गया ! बस इस अस्पताल में चाय की छोटी सी टपरी चला लेती हूं | दिन भर में हम दोनों के गुज़ारे लायक बिक जाती है, मेरा और मेरे बच्ची का गुजारा चल जाता है साहब … !”

” प्यारी बच्ची है, इसे खूब पढ़ाना..!”

” ईश्वर सबको उनका कर्म फल जरूर देता है साहब..!  आप भी विश्वास रखें आपके साथ बुरा नहीं होगा..!”

वासुकी ने चाय का प्याला रखा और  अस्पताल की तरफ बढ़ने वाला था कि समर उसकी तरफ आता हुआ दिखाई दे गया…

वासुकी के पास पहुंचते ही समर ने वासुकी की तरफ देखा और उसे अपने सीने से लगा लिया…

क्रमशः

aparna…

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Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

बहुत बेहतरीन भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐

Manu Verma
Manu Verma
1 year ago

खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻