जीवनसाथी- 2/68


जीवनसाथी 2/68

   अनिर्वान चला गया था लेकिन सुनील और चंद्रभान के दिमाग से नहीं जा पाया था… सुनील को खबर पहुँचाने वाला लड़का भी अनिर्वान के हत्थे चढ़ चुका था इसलिए अब सुनील के पास ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा था जिससे फ़िलहाल वो वासुकी की कुंडली निकलवा सके…

  उसने एक बार अपने शहर वापस जाने की ठान ली.. उसने इस बारे में चंद्रभान से बात की..

“अंकल मुझे उस वासुकी की सारी डिटेल्स चाहिए,  किसी भी हाल में… !”

“उसके लिए तुम्हें वहाँ जाने की क्या ज़रूरत है सुनील ? वो तो हम यहीं मंगवा देंगे… !”

“नहीं अंकल, मेरा घर तो वहीँ है.. पापा के ऑफ़िस में हो सकता है मुझे कुछ मिल जायें.. ! वैसे भी वहाँ रहने नहीं जा रहा, बस कुछ दिनों में वापस आ जाऊंगा.. !”

“अनिरुद्ध वासुकी भी वही रहता है, तुम्हारे शहर में लेकिन रानी साहेब तो यहाँ हैं… ?”

सुनील के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान चली आई…

“रानी साहब का चेहरा देख रखा है मैंने, इसलिए कोई गड़बड़ नहीं होगी… बस एक बार इस वासुकी की जानकुंडली निकलवा लूं फिर तो इसका फ़न मैं ही कुचलूँगा… !”

“बहुत ज़हरीला है वो आदमी.. उससे दूरी ही बेहतर है सुनील… उसे खुद मारने की क्यों सोच रहें, मरवाया भी तो जा सकता है.. उसे मार कर अपने हाथ क्यों गंदे करने.. ?”

“जब तक मैं उसे मार नहीं लूंगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा….

“बिच्छू का मन्त्र इसे आता नहीं है और सीधा सांप के बिल में हाथ डालने चला है.. ! ” दिल ही दिल में सुनील के लिए ऐसा सोचते चंद्रभान ने ऊपर से कुछ कहा तो नहीं लेकिन उसे सुनील के इस निर्णय पर डर ज़रूर लगने लगा…
उसने वासुकी के एक से बढ़ कर एक किस्से सुन रखे थे…

“क्या सोचने लग गए अंकल आप.. ?”

“सुनील… वासुकी राक्षस है… उसे इतने हल्के में मत लो ! मैंने सुना है एक बार उसकी गैंग का कोई लड़का उससे गद्दारी कर रहा था…
   जानते हो जब वासुकी को पता चला कि वो लड़का गद्दार है तब वासुकी ने क्या किया.. ?”

“क्या किया ?”

“उस लड़के की एक टांग रस्सी से बांध कर उस रस्सी का दूसरा सिरा अपनी जीप से बांध कर उसे पहाड़ी पर लें गया और वहाँ से लड़के को नीचे धक्का दे दिया… गिरते गिरते आधे रास्ते पर लड़का उल्टा लटक गया…
अब वासुकी कभी जीप को आगे लें जायें, कभी वापस पीछे खींच  लें…. उस जंगल के तो जानवर भी वासुकी के गुलाम है.. !
  जाने कहाँ से एक चीता चला आया था और नीचे खड़ा लार टपकाते उस लड़के के नीचे गिरने की राह देखने लगा… लड़का चीख चीख कर अपने किये की माफ़ी मांगता रहा… “

“फिर… ? फिर क्या किया उस जलील इंसान ने.. !”

“इंसान मत कहो उसे,  दानव है वासुकी दानव ! सौ रावण मरे होंगे तब ये एक पैदा हुआ है… ! उस लड़के को वैसे ही झुलाये रखा, चीता धीरे धीरे ऊपर उस लड़के की तरफ बढ़ने लगा और लड़के का डर उसकी चीखों की तेजी में बदलने लगा…
जीप को एक किनारे छोड़ वासुकी उस रस्सी को पकड़कर पहाड़ी के किनारे पर खड़ा हो गया और उस लड़के और चीते की नोकझोंक को लाइव देखने लगा… !
  वह लड़का बार-बार वासुकी से खुद को बचा लेने की मिन्नतें करने लगा लेकिन यह पत्थर दिल उसे यूं ही तड़पाता रहा, तब तक जब तक जीता उस लड़के के एकदम करीब नहीं पहुंच गया |
चीते का पंजा उस लड़के के चेहरे पर पड़ने को था कि वासुकी ने रस्सी ऊपर को खींच लीं…
लड़के की जान हलक में फसी हुई थी और वासुकी ने उन पत्थरों पर से उसे ऊपर खींच लिया… |
कटीली झाड़ियों और खुरदरे  पत्थरों पर रगड़ खाता  उसका शरीर ऊपर वासुकी के पास पहुंच गया…..
और उसे ऊपर खींचकर वासुकी ने कहा कि जा तुझे माफ कर दिया..!”

चंद्रभान की बात सुनकर सुनील ने अपने सर पर अपना हाथ मार लिया…

”  वासुकी के बदला लेने का तरीका बड़ा अजीब है सुनील | तुम नहीं जानते उस लड़के को वासुकी ने वहां तड़पते हुए मरने के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि अपनी जीप में डालकर अपने साथ ले गया और एक सरकारी अस्पताल में ले जाकर उसे पटक दिया…
उसकी इलाज का पूरा खर्चा उठाने के बाद वासुकी ने उसे छोड़ दिया…!”

” वो लड़का कहां है अब..? उसके बारे में कोई खोज खबर.. ? नाम क्या था उसका ?”

” कोई नहीं जानता कि वो कहाँ गया …! उस दिन के बाद से उस लड़के को किसी ने नहीं देखा..!  मालूम नहीं उसे जमीन निगल गई या आसमान खा गया… कुछ लोग ये भी कहते हैं कि शायद वासुकी ने हीं उसे मरवा दिया लेकिन मैं जानता हूं वह लड़का जिंदा है और कहीं छिपा बैठा है..!  वासुकी उस शहर में सारे टेढ़े  काम करने वालों से जुड़ा हुआ था लेकिन अगर तुम ध्यान से वासुकी के काम पर नजर डालो तो ऐसा लगता है जैसे वह वहां पर इल्लीगल काम करने वालों को एक-एक कर ठिकाने पर लगा रहा था..!

हो सकता है वह खुद वहां का माफिया बनना चाहता हो,  और इसीलिए दोनों गुटों को आपस में लड़वाकर एक दूसरे के हाथों ही एक दूसरे को मरवाता जा रहा हो…  वासुकी को जितना भी जान लो उतना कम है हर बार उसके बारे में एक कोई नई बात ऐसी पैदा हो जाती है कि जानने के बाद सिहरन सी पैदा होती है, शरीर में..!  उसके कारनामे, उसका टॉर्चर करने का तरीका देख देखकर यह लगता है कि क्या कोई इंसान वाकई इस हद तक सोच सकता है..!
  वैसे उस लड़के का नाम धीरू था.. ! वहाँ एक कैफे है, “ऑरेंज ” ! तुम एक बार वहाँ ज़रूर चलें जाना ! अगर ये धीरू ज़िंदा है तो इसका पता ठिकाना इसी कैफे वाले से मिल जायेगा !”

सुनील और चंद्रभान बात कर रहें थे कि सुनील के मोबाइल पर उसके लॉयर का फ़ोन आने लगा…
लॉयर से बात करते हुए सुनील पहले तो भड़क गया लेकिन फिर उसने खुद को संभाल लिया…
फ़ोन रखने के बाद भी सुनील काफ़ी परेशान लग रहा था…

“क्या हो गया सुनील.. कोई परेशानी.. ?”

“क्या बताऊँ अंकल.. ? मेरा और मेरी बीवी का तलाक का केस चल रहा है, बस सारा कुछ हो चुका है बात मुआवज़े पर आकर अटक जाती है…

“तुम्हारी माँ इस वक्त कहाँ हैं… ?”

“वो मामा जी के घर पर हैं… यहाँ वासुकी का काम तमाम करने के बाद उन्हें लेकर जाऊंगा… अभी मामा जी के घर से वो सारा काम देख रही हैं पापा का !”

चंद्रभान ने हाँ में गर्दन हिला दी….

“ठीक हैं, तुम फ्रेश हो लो मैं तुम्हारे निकलने का इंतज़ाम करवाता हूँ… !”

सुनील कुछ सोचता बैठा रहा और चंद्रभान उसके निकलने के लिए गाड़ी का इंतज़ाम करने लगा…

मंदिर से बाँसुरी और बाकी लोग महल के लिए निकल गए थे…..
उसी समय के आसपास सुनील भी चंद्रभान के घर से निकल गया…

रास्ते में बाँसुरी को गोलगप्पे खाने का मन करने लगा…

” भाभी साहब हमें गोलगप्पे खाने का बहुत मन कर रहा है..!”

रूपा ने बांसुरी की तरफ देखा और अपनी पलकें झपका कर उसे आश्वासन दे दिया..

” घर चलिए,  बनवा देंगे!”

” नहीं भाभी सा, हमें तो यह रास्ते के ठेले वाले गोलगप्पे ही पसंद आते हैं…!”

” बांसुरी यह इस वक्त तुम्हारी सेहत के लिए भी सही नहीं है..!”

” ऐसा नहीं है हम जानते हैं, हमसे हमारी डॉक्टर ने भी कहा था कि इस वक्त हम जो भी खाना चाहें,  हम सब कुछ खा सकते हैं, और कोई भी चीज हमें और हमारे बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचाएगी ! प्लीज भाभी सा प्लीज मान जाइए ना…!
   महल पहुंचने के बाद साहब हमें यह टपरी  वाले गोलगप्पे नहीं खाने देंगे हम जानते हैं..! और हमें यहीं पसंद है भाभी सा !”

” कुमार अगर कुछ भी बोलते हैं तो सोच समझकर ही बोलते हैं.. उनकी बात तो तुम्हें माननी चाहिए ना बाँसुरी…

” बस हम ही माने हर किसी की बात,  कोई हमारी बात नहीं सुनता..!”

बांसुरी रूठ कर मुंह फुला कर बैठ गई | उसकी ठीक सामने की सीट पर गाड़ी चलाते हुए अनिर्वान को वह बैक व्यू मिरर में साफ नजर आ रही थी…
अनिर्वान को रूपा की बात सही लग रही थी,  वह खुद भी नहीं चाहता था कि बांसुरी रास्ते में खड़े होकर ऐसी किसी सस्ती टपरी पर गोलगप्पे खाए लेकिन वह उन दोनों की बातों के बीच में बोल भी नहीं सकता था…
एक बार भले ही उसने राजशाही के नियमों को भंग कर लिया हो लेकिन अगर दोबारा उसने फिर ऐसा किया तो बड़ी रानी यानी कि रूपा नाराज होकर राजा साहब से उसकी शिकायत भी कर सकती थी और उसे इन बातों का विशेष ध्यान रखना था कि किसी तरीके से भी अब उसकी शिकायत राजा साहब या युवराज सा के पास ना पहुंचे…!

बड़ी कोशिशों से उसने अपनी जुबान पर ताला डाल रखा था, लेकिन बांसुरी अपनी मचलती जिव्हा पर काबू नहीं कर पा रही थी ! उसने रूपा की तरफ मिन्नत भरी नजरों से देखा और रूपा ने मुस्कुराकर गाड़ी रुकवा दी…
गाड़ी के रुकते ही किसी बच्चे की तरह मचलती हुई बांसुरी उस टपरी पर पहुंच गई..
उन लोगों की गाड़ी रुकते ही रेखा और जया वाली गाड़ी भी रुक गई..!
   रेखा ने कांच उतारकर रूपा की तरफ देखा और इशारे से ही गाड़ी रुकने का कारण पूछ लिया रूपा ने बांसुरी की तरफ इशारा कर दिया..|
रास्ते पर बांसुरी अकेली खड़ी ना रह जाए इसलिए रूपा भी गाड़ी से उतर चुकी थी | अपनी आंखों पर काले चश्मे चढ़ाये रूपा भी एक किनारे खड़ी हो गई | उनके साथ आई सहायिका उसके सर पर छतरी तान कर उसके पीछे खड़ी हो गई | दूसरी सहायिका बांसुरी के पीछे जाने वाली थी की बांसुरी ने उसे हाथ दिखा कर वापस जाने को कह दिया | रेखा ने रूपा से खुद उतरने के लिए इशारे से पूछा लेकिन रूपा ने उसे और जया को गाड़ी से उतरने मना कर दिया…

टपरी की दूसरी तरफ डली लकड़ी की बेंच पर कुछ मनचले लड़के बैठे हुए थे…..

गाड़ियां रास्ते के एक तरफ कतार में खड़ी जरूर थी, लेकिन वह टपरी से ज़रा हटकर लगी हुई थी | टपरी पर खड़ी दोनों औरतें राजसी तो लग रही थी, लेकिन उन लड़कों को जरा सा भी आभास नहीं था कि रूपा और बांसुरी वाकई महल की रानियां है….

बांसुरी टपरी वाले से अपने स्वाद के अनुसार गोलगप्पे बनाने को कहती जा रही थी और उसकी बताई बातें सुन सुनकर वह लड़के भी मुस्कुराए जा रहे थे | जिसका आभास बांसुरी को बिल्कुल भी नहीं था..

” भैया जी पानी उतना खट्टा नहीं है थोड़ा सा और खट्टा मिलाइये और ज़रा तीखा भी कर दीजिये ना..!”

” कर दो भैया कर दो तीखी चटनी तीखी लड़कियों के लिए ही तो होती है…!”

बांसुरी ने उन लड़कों की बात सुनी जरूर लेकिन अनसुना कर दिया और वापस अपने गोलगप्पों  में व्यस्त हो गई..

लेकिन वहीं बांसुरी से जरा दूर और उन लड़कों के जरा करीब खड़े अनिर्वान के कानों से उन लड़कों की आवाज छिपी ना रह सकी…

वह लड़के आपस में मस्ती करते हुए बांसुरी को देखकर छेड़ने में लगे थे |  उन दोनों का ध्यान गाड़ी से उतरते वक्त बांसुरी रूपा और अनिर्वान पर नहीं गया था… इसलिए उन लोगों को नहीं मालूम था कि अनिर्वान बांसुरी और रूपा के साथ ही है | दोनों आपस में मस्ती कर रहे थे कि उनमें से एक लड़का बांसुरी को देखकर एक गीत गुनगुनाने लगा…

आप जैसा कोई
मेरी जिंदगी में आए
तो बात बन जाए… बात बन जाए
गुल को बहार, बहार को चमन
दिल को दिल बदन को बदन
हर किसी को चाहिए तन का मिलन
काश ऐसा मुझ पे
दिल आपका भी आए…
तो बात बन जाए….

बांसुरी ने मुस्कुराकर एक नजर उस गाना गाते हुए लड़के पर डाली और वापस गोलगप्पे खाने में मगन हो गई…
रूपा ने अपने हाथ में बंधी रोलेक्स पर नजर डाली और फिर बांसुरी को टोक दिया…

“जरा जल्दी कर लो बांसुरी, घर पर बच्चे स्कूल से आ चुके होंगे..!”

”  भाभी साहब !! लीजिये बस हो गया… भैया जी एक सूखी पापड़ी भी खिला देना..
   वैसे बड़े स्वाद गोलगप्पे थे आपके.. बहुत मजा आया !  एकदम तीखे चटपटे बिल्कुल मेरे शहर… !

कहते-कहते बांसुरी अचानक रुक गई फिर उसने रूपा को देखा और धीरे से कह दिया…

” ऐसा स्वाद बिल्कुल हमारे मायके में मिलता था..!”
.
रूपा ने हां में सर हिला दिया…

अनिर्वान से वह दोनों लड़के सहन नहीं हो रहे थे लेकिन उसने अपने ऊपर काबू किया और गाड़ी की तरफ बढ़ गया…
बांसुरी और रूपा भी उसकी तरफ बढ़ रहे थे तभी सामने से एक लंबी सी गाड़ी बांसुरी के बगल से होकर निकल गई…
गाड़ी में पीछे बैठा सुनील उसी वक्त मोबाइल से अपनी नजर उठा कर बाहर रास्ते की तरफ देख रहा था, और उसकी नजर बांसुरी पर पड़ गई और उसने तुरंत अपना सर पीछे घुमाया और जब तक उसकी गाड़ी  वहां से ओझल नहीं हो गई वह बांसुरी को देखता रहा…
बांसुरी को देखते ही उसके दिल दिमाग पर एक बार फिर वह सारी बातें हावी होने लगी जो बांसुरी की कलेक्ट्री में उसके पिता को झेलनी पड़ी थी | एक तरह से उसके पिता के कारोबार का पतन तभी शुरू हो गया था जब बांसुरी उस शहर में कलेक्टर का पदभार ग्रहण करके आई थी…|
एक-एक करके उसने शेखावत के सारे काले धंधों पर लोहे का मोटा दरवाजा लगाकर ताला डाल दिया था…
शेखावत और उसके बेटे सुनील ने कभी नहीं सोचा था कि एक औरत भी उन पर इस कदर राज कर सकती है…..|

बाँसुरी  को घूर कर दिल में जलते हुए सुनील आगे बढ़ गया | क्योंकि इस वक्त उसके दिल दिमाग पर वासुकी ने पूरी तरह कब्जा जमा रखा था, और उसे तब तक चैन नहीं मिलने वाला था जब तक वासुकी को अपने हाथों से मार नहीं लेता…|

    कभी कभी किसी से लेने वाला इंतकाम जीने का मकसद बन जाता है और जब तक  इंतकाम के शोले इंसान के अंदर भड़कते रहते हैं, तब तक उस इंसान को चैन से न जीने देते हैं और ना मरने देते हैं !
   ऐसा ही कुछ हाल सुनील का भी हो चुका था उसका पारिवारिक जीवन अस्त-व्यस्त था….
सुनील ने अपने पिता जैसा ही दिमाग पाया था उसे भी खून खराबा करने में मजा आता था |  लोगों को मरते देख कर उसको सुकून मिलता था |और लोगों को मारकर उनके अंगों की तस्करी करके सुनील पैसा बनाता जा रहा था… |
       जब उसका यह ढका छुपा कारनामा लोगों की नजरों के सामने आने लगा तब उसे अपना शहर, अपना घर परिवार छोड़कर भागना पड़ा था…|
पैसे कमाने की होड़ में सुनील इस कदर पागल हो गया था कि वह सिर्फ अपनी बनाई दुनिया में मशगूल  हो गया था, उसे मालूम ही नहीं चला कि कब उसकी पत्नी का उसके ही गैंग के एक दूसरे आदमी के साथ अफेयर हो गया और जब तक उसे यह बात मालूम चली, पानी उसके सर से ऊपर गुजर चुका था ! वह अपनी पत्नी को तलाक दे देना चाहता था, लेकिन उसकी पत्नी भी एक एमएलए की बेटी थी…!
    उसी एमएलए की कृपा से सुनील बचता बचाता विदेश तक पहुंच पाया था और इसलिए उसकी बेटी को तलाक देना यानी कि एमएलए से सीधी दुश्मनी मोल लेना था और बस इसीलिए मुआवजे पर आकर बात अटक जा रही थी… सुनील की पत्नी सुनील से दस करोड़ मांग रही थी और जिसके बाद वह उसे छोड़ कर चली जाती लेकिन इतना सारा रुपया एक साथ देने के लिए सुनील राजी नहीं हो पा रहा था…!

इन सारी मुश्किलों के बीच अचानक उसके पिता का इस तरह मारा जाना वह सहन नहीं कर पा रहा था ! उसे अचानक लगने लगा था कि उसकी जिंदगी की हर एक आफत के पीछे सिर्फ एक ही नाम है, और वह है वासुकी..!!!
और इसीलिए उसने कसम खा रखी थी कि जब तक वह वासुकी को मार नहीं डालेगा चैन से नहीं बैठेगा…

बांसुरी ने गोलगप्पे खाने के बाद तृप्ति से एक बार अनिर्वान की तरफ देखकर रूपा की तरफ मुंह मोड़ लिया…

” बहुत मिर्ची थी गोलगप्पों में…  पानी चाहिए था हमें..!”

उन लोगों की गाड़ी गोलगप्पे के ठेले से थोड़ी दूर बढ़ चुकी थी… रूपा ने साथ रखे बैग में से पानी की बोतल निकाली और बांसुरी की तरफ बढ़ा दी लेकिन उसमें हल्का गुनगुना पानी था ! बांसुरी ने जैसे ही पानी देखा उसने पीने से इंकार कर दिया…

” भाभी साहेब माफ कीजिएगा लेकिन हमें ठंडा पानी पीना है !
   इस वक्त जीभ इतनी जोर से जल रही है, अगर इस पर हमने यह गुनगुना पानी पी लिया ना तो फिर हम 2 दिन तक कुछ नहीं खा पी पाएंगे…

अमूमन महल की औरतें अपना पानी अपने साथ ही रखा करती  थी …  हर किसी की सहायिका उनके साथ उनका पानी का स्टील का बोतल रखा करती थी जिसमें गुनगुना पानी भरा होता था  ! इस पानी को भी विशेष तरीके से तैयार किया जाता था! जिसमें उबालते समय कुछ पत्ते तुलसी के भी डाले जाते थे ! यह रीत दादी साहब के भी पहले से चली आ रही थी, जिसे महल की हर औरत को निभाना जरूरी था…!

बांसुरी से यह पानी पिया ही नहीं जाता था… |
आज भी उसने पानी की बोतल बंद करके वापस रख दी… लेकिन उसके मुंह में जलन बाकी थी और बार-बार अपने मुंह को खोल कर वह हथेली से हवा करते हुए उस जलन को कम करने की नाकाम सी कोशिश कर रही थी !  गाड़ी चलाते हुए अनिर्वान की नजर पीछे बैठी बांसुरी पर थी और उसने गाड़ी को धीमा कर के किनारे रोक दिया.. …
अब तक ड्राइवर को दूसरी तरफ बैठा कर अनिर्वान खुद गाड़ी चलाने लगा था….

” रानी हुकुम अगर आप इजाजत दें तो मैं पानी की बोतल लेकर आता हूं…!”
सिर झुका कर अनिर्वान ने रूपा की तरफ देखकर सवाल किया और रूपा ने भी उसे तुरंत पानी लेकर आने की इजाजत दे दी…

अनिर्वान रूपा की आज्ञा मिलते ही गाड़ी से उतरकर तेज कदमों से विपरीत दिशा में आगे बढ़ने लगा…. अनिर्वान की गाड़ी के पीछे ही एक-एक करके महल की 5 गाड़ियां रुक गई और अनिर्वान अपने लंबे-लंबे डग भरता हुआ वापस उसी पानीपुरी के ठेले तक पहुंच गया…

वहां वह दोनों लड़के अब भी बैठे हंसी ठिठोली कर रहे थे कि तभी अनिर्वान ने उनमें से एक गाना गाने वाले लड़के की कॉलर पीछे से पकड़ कर उसे सीधा ऊपर की तरफ उठा दिया…
    उस लड़के को अचानक पता भी नहीं चला और वह हवा में ज़मीन से लगभग आधे फीट की ऊंचाई पर लहराने लगा…

“अबे कौन है..?  कौन है..? छोड़ो मुझे..?

अनिर्वान ने उसे खूब ऊंचाई तक उठा कर वहां से नीचे छोड़ दिया लड़का संतुलन बिगड़ जाने से भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा..

घुटने में लगी धूल को साफ करते हुए लड़के ने गुस्से में पलट कर देखा और अपने से दुगनी लंबाई के वासुकी को अपने सामने खड़ा देख़ वह एक पल को देखता रह गया…

” सुना है इंडियन आईडल में भाग लेने जा रहे हो..?

वासुकी के धीर गंभीर व्यक्तित्व और उसकी गहरी सी  आवाज को सुनकर लड़के को अचानक वासुकी का मजाक समझ में नहीं आया..

” नहीं ऐसा तो कुछ नहीं है, आपसे किसने कह दिया भाई..?

वासुकी के डीलडौल को देख कर उसके मुंह से भाई शब्द ही निकल आया..

” तो और किसी सिंगिंग कंपटीशन में भाग लेने का इरादा है क्या..?

“नहीं तो आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं..?”

” दिल को दिल, बदन को बदन.. हर किसी को चाहिए तन का मिलन…कुछ देर पहले तो बड़े गाने फूट रहे थे अब बोलती बंद हो गई..? “

लड़के को अब भी वासुकी की बात ठीक से समझ में नहीं आई थी…

“कहना क्या चाहते हो… ?”

वो अभी बात पूरी कर पाता कि एक ज़ोर का तमाचा उसके गाल पर पड़ा और उसकी आँखों के सामने तारे झूमने लगे…

“अब मिला दिल को दिल.. ?”

वासुकी ने दूसरे गाल पर भी थप्पड़ रसीद कर दिया..

“अब मिला बदन को बदन… !

आज तक उसने अपनी ज़िंदगी में इतना ज़ोर का तमाचा नहीं खाया था… उसके कान में सनसन की  आवाज़ होने लगी…

कुछ देर के लिए उसे लगा जैसे सारी धरती ज़ोर से गोल गोल चक्कर खा रही… और वो भी उसके साथ चक्कर खा के गिर पड़ा…

उसकी कॉलर पकड़ कर उसे खड़ा करने के बाद अनिर्वान ने उसकी आँखों में देख कर अपनी जींस की  पिछली जेब से गन निकाली और उसके माथे पर तान दी…
लड़का भय से कांपने लगा…

“भाई जी मारने से पहले गलती तो बता दीजिये.. ! गाना गा देना क्या इतना बड़ा गुनाह है ?”

“गलती तो तूने जो की है, उसकी सज़ा मौत ही है… लेकिन आज अनिर्वान खुश है इसलिए तुझे तेरी  ज़िंदगी बख्श रहा हूँ… !”

  गाड़ी से उतर कर उन लोगों तक आने के बीच में अनिर्वान ने बाबूराव को फ़ोन भी घुमा दिया था… और उसका फ़ोन पहुँचते ही बाबूराव वहाँ पहुँच भी गया..

बाबूराव के वहाँ पहुँचते ही अनिर्वान ने उन लड़कों को बाबूराव के हवाले किया और वहाँ से बिसलरी की एक बोतल लेकर गाड़ी की तरफ आगे बढ़ गया….

गाड़ी में पहुँच कर अनिर्वान ने पानी की बॉटल रूपा की तरफ बढ़ा दी और गाड़ी महल की तरफ मोड़ लीं…

“मिस्टर भरद्वाज, एक बात पूछें… ?”

अनिर्वान हड़बड़ा गया.. उसे लगा ना जाने अब बाँसुरी कौन सी अनोखी बात बोल दे, वो भी रूपा के सामने..

“जी… !”

“गाड़ी में एफएम नहीं चलता क्या.. ?”

“जी… ?”

“अब आपके इस जी का क्या मतलब निकाले हम.. ? रूपा भाभी सा हमें ना लॉन्ग ड्राइव पर गाने सुनना पसंद है, और जाते वक्त भी कुछ सुनने को नहीं मिला और अब आते वक्त भी नहीं मिल रहा… आपको गाने सुनने से कोई दिक्कत तो नहीं…. ?”

रूपा ने बाँसुरी को देख मुस्कुरा कर ना में गर्दन हिला कर ड्राइवर को गाने लगाने कह दिया…

एफ एम पर कोई पुराना सा गीत बज उठा….

ये दिल और उनकी, निगाहों के साये
मुझे घेर लेते, हैं बाहों के साये….

गाने को सुन कर बाँसुरी भी साथ ही गुनगुनाने लगी.. रूपा उसे देख कर मुस्कुराती रही, उसने धीरे से ड्राइवर को इशारे से आवाज़ धीमी करने को कहा और बाँसुरी की गुनगुनाहट सुनने लगी…
वापसी में ठण्ड बढ़ने लगी थी… बाँसुरी कांच से बाहर फैले हरे भरे पेड़ों को देखती गाने का अगला हिस्सा खुद गा उठी…

लिपटते ये पेड़ों से, बादल घनेरे
ये पल पल उजाले, ये पल पल अंधेरे
बहुत ठंडे ठंडे, हैं राहों के साये…
ये दिल और उनकी निगाहों के साये…

अनिर्वान अपने कंधे सतर रखे चुपचाप बैठा था…. बीच में उसने जब ड्राइवर को हटा कर खुद चलाने के लिए गाड़ी लीं थी तब मिरर को अपनी तरफ मोड़ लिया था लेकिन अब कांच ऐसे एंगल पर था कि वो पीछे नहीं देख पा रहा था, तभी उसकी नज़र ड्राइवर के बाजू वाले कांच पर गयी… जिसमे ठीक पीछे बैठी बाँसुरी नजर आ रही थी…
  उसे देखते ही अनिर्वान के चेहरे पर एक मुस्कान चली आई और वो आराम से उसके गाने को सुनते हुए उसे देखता बैठा रहा….

******

  समर नीचे शोवन के सो जाने के बाद ऊपर अपने कमरे में चला आया…
  पिया खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी थी… बॉडी लोशन की बोतल उसके पास ही रखी थी…
ठंडी हवाएं चल रहीं थी और वो रेडियो पर पुराने गाने सुनते हुए अपने हाथों पर लोशन लगा रही थी…

उसके खुले बाल हवा से लहरा रहें थे और वो उस पुराने गाने के बोलों में खोयी हुई थी…

ये दिल और उनकी, निगाहों के साये
मुझे घेर लेते, हैं बाहों के साये….

खिड़की से बाहर लगी जूही की बेल हवा से बलखा रही थी और उसकी मदहोश करने वाली खुशबु कमरे में घुलती जा रही थी…

समर धीरे से आकर पिया के सामने बैठ गया…. उसने लोशन की बोतल से लोशन लिया और धीमे से पिया के पैरों पर लगाने लगा….

पिया ने मुस्कुरा कर समर को देखा और धीरे से उसके सीने पर अपने पैर से मार कर उसे थोड़ा पीछे धक्का दे दिया…
समर ने पिया के पैर को पकड़ वापस उसे अपनी तरफ खींच लिया…

गाने के बोलों के साथ पिया की आंखें समर के चेहरे पर टिकी थी….

पहाड़ों को चंचल, किरन चूमती है
हवा हर नदी का बदन चूमती है
यहाँ से वहाँ तक, हैं चाहों के साये
ये दिल और उनकी निगाहों के साये….

   पिया धीमे से समर के पास चली आई….

क्रमशः

aparna…

   निराश ना हों आप लोग… अगलें भाग की शुरुआत ठीक यहीं से होगी जहाँ ये भाग खत्म हो रहा है….






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