
जीवनसाथी -2 भाग-61
“तुमसे कुछ बात करनी है पिया !” भीगी हुई सी आवाज़ में आखिर समर ने अपनी सारी हिम्मत समेट कर पिया की तरफ देख कर कहा और उसी वक्त पिया भी समर की तरफ देखने लगी…
“मुझे भी…. !”
“तुम ही कह दो… क्या कहना है… ?”
“इसके स्कूल एडमिशन का कुछ सोचा.. ?”
समर ने वाकई अब तक इस बारे में कुछ नहीं सोचा था…
उसने ना में गर्दन हिला दी…
व्यंग से पिया के होंठ तिरछे हो गए…
“शुरू से ही ज्यादा सोचने की आदत नहीं रही है ना तुम्हारी, कोई भी काम कर जाना है बिना परिणाम की चिंता किये… !
यहीं तो सोचने वाली बात है, दुनिया भर के मसले चुटकियों में सुलझा जाने वाला आज अपने ऊपर आई तो कैसा निरुपाय हो गया… खैर !!
इन बातों को कहने का भी कोई खास फायदा तो है नहीं…
मुझे लगा ये बच्चा अब स्कूल जाने की उम्र में पहुँच चुका है.. और इसलिए मैंने पूछा…
समर अपने माथे पर ऊँगली रगड़ते हुए शोवन की तरफ देखने लगा…
“देखता हूँ, शहर के दो चार अच्छे स्कूल में कल बात कर के देखता हूँ.. !”
ये बात सुन कर पिया की भौंह में वापस तनाव आ गया…..
“किसी और स्कूल में क्यों? महल वालों के लिए तो उनका अपना स्कूल है ना डायनेस्टी स्कूल ! क्या ये वहाँ नहीं जायेगा.. ?”
समर ने इस बारे में भी नहीं सोचा था… वो पिया की तरफ देखने लगा… पिया अपनी लय में बोलती चली गयी…
“मैंने कल निरमा और रेखा बाई सा से बात की थी… वह दोनों भी बोर्ड मेंबर्स हैं ना… उन्होंने कहा कि किसी भी दिन आकर एडमिशन की फ़ॉर्मेलिटीज़ पूरी कर लीजिये…
तुम्हें इसलिए बता रही कि मेरी छुट्टियाँ आज खत्म हो रही हैं, तो मैं तो हॉस्पिटल चली जाउंगी, तुम देख लेना एडमिशन वाली बात !”
पिया ने बिना समर की तरफ देखें ही अपनी बात कह दी…. समर ने इस तरीके से अब तक कुछ सोचा नहीं था…
उसने बस हाँ में सर हिला दिया…
पिया वहाँ से उठी और अपना बैग टँगाये अस्पताल के लिए निकलने लगी…
“रुक जाओ, मैं भी तो निकल रहा, तुम्हें छोड़ दूंगा.. !”
“नहीं.. मैं चली जाउंगी.. ! वैसे भी इन छोटी मोटी बातों के लिए किसी पर निर्भर रहना मुझे पसंद नहीं… !
तुम अपने बेटे को साथ लेकर जाना मत भूलना… “
एक विषबुझा बाण समर पर छोड़ वो निकल गयी…
शोवन छोटा सा बच्चा था, लेकिन उसे भी कहीं न कहीं ये समझ आ रहा था कि उसका यहाँ होना यहाँ के बहुत से लोगों को पसंद नहीं आ रहा है… !
वो चुपचाप पिया को जाते देखता रहा…
समर भी उदास आँखों से उसे जाते देखता रहा… पिया के जाने के बाद समर उदास आँखों से वापस अपने नाश्ते की प्लेट पर झुक गया लेकिन अब उससे कुछ खाया नहीं जा रहा था…
उसने शोवन की प्लेट पर नजर फिराई…
शोवन ने भी कांटे छुरी से जितना पराठे का कत्ल हो सकता था कर के छोड़ दिया था…
समर ने मुस्कुरा कर उसकी प्लेट अपने पास सरका ली, और अपने हाथ से तोड़ तोड़ कर उसे पराठा खिलाने लगा… पहले एकबारगी शोवन को संकोच सा हुआ लेकिन फिर समर उससे बातें करता उसे खिलता गया और उस छोटे से बच्चे ने पूरा एक पराठा खत्म कर लिया…
अपना मोबाइल टेबल पर भूल कर निकल चुकी पिया आधे रास्ते से वापस लौटी और बाप बेटे की जोड़ी को यूँ हँसते हुए खाते देख कुछ पल को सन्नाटे में डूबी देखती रही और फिर किनारे से आकर अपना मोबाइल उठा कर वापस बाहर चली गयी…
समर ने सोच लिया था कि, अब वो पिया से बात कर के रहेगा इसलिए इस बार पिया के इस तरह जाने से वो ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ और शोवन को नाश्ता करवाने के बाद उसे अपने साथ लिए उसकी एडमिशन की बात करने स्कूल की तरफ निकल गया…
शोवन का हाथ पकड कर चलता समर उससे बातें भी करता जा रहा था…
समर की गाड़ी में बैठा ड्राइवर उसकी ही प्रतीक्षा में था, समर ने ड्राइवर को उतार दिया और शोवन को अपने साथ ही बैठा कर खुद ड्राइव करने लगा…
समर उससे उसके पुराने दोस्त, उसका स्कूल सब के बारे में बातें भी करता जा रहा था, और आज इतने दिनों बाद ये सब बातें करते हुए शोवन के चेहरे पर एक हलकी सी चमक नज़र आ रही थी… !
बीच बीच में वो समर के मजाक पर धीमे से हॅंस भी देता.. बातों बातों में समर उसे हिंदी भी सिखाने लगा…
इन्हीं सब बातों के बीच शोवन ने कुछ ऐसा कहा की समर का दिल भर आया..
“अंकल.. ! ! आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं… !”
शोवन की इस बात पर समर मुस्कुरा उठा… मुस्कुरा कर उसने पास बैठे शोवन के बालों पर हाथ फेर दिया..
“तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो शोवन…. .. !”
“आई विश, आप मेरे डैड होते… ?”
उसकी ये बात सुन समर के गले में कुछ अटक सा गया…
“तुमने कभी अपने डैड को देखा है… ?”
अपने मन का सवाल पूछते ही समर खुद कट कर रह गया…
उसे रेवन सब कुछ बता चुकी थी फिर जाने कैसे उसके मुहँ से ये सवाल निकल गया… ?
शोवन ने ना में गर्दन हिला दी…
“पर मैं उनसे मिलना चाहता हूँ ! मेरी मॉम कहती थी कि मॉम के जाने के बाद मैं डैड के साथ रहूँगा….
अंकल.. ! क्या.. आप ही मेरे डैड हैं… ?” बड़े धीमे से अटक अटक कर शोवन ने समर से पूछ लिया..
समर तेज़ था बुद्धिमान था, चालक भी बहुत था लेकिन बेहद भावुक भी था… ! उससे उस अबोध के इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया गया… !
वो दोनों स्कूल पहुँच चुके थे.. वहाँ गाड़ी खड़ी करने के बाद समर ने शोवन की तरफ का दरवाज़ा खोल कर उसे बाहर निकाला और गोद में लेकर उसका माथा चूम लिया…
“हाँ.. ! मैं ही तुम्हारा डैड हूँ… ! और अगर तुम चाहो तो….
समर कुछ कहते कहते रुक गया… नहीं ऐसे वो अभी से शोवन से खुद को डैड नहीं बुलवा सकता… पहले एक बार पिया से बात तो हो जाये… यहीं सोच कर समर चुप रह गया… और गोद में उठाये ही उसे अंदर एडमिशन के लिए लें गया…
महल का स्कूल था, महल वालों के लिए था, इसलिए बिना किसी हील हुज्जत के शोवन का आराम से एडमिशन हो गया…
स्कूल से ही किताबें और यूनिफॉर्म लें कर वो लोग वापसी के लिए निकल गए…
समर ने राजा को पहले ही बता दिया था कि आज उसे ऑफ़िस आने में कुछ देर हो जाएगी…
वो शोवन को साथ लिए उसकी शॉपिंग करवाने चला गया… अपनी पसंद के ढ़ेर सारे कपडे, खिलौने, छोटी सी सायकल, बॉल,गन,रेसिंग कार, निफ गन, चॉकलेट्स लेकर भी समर का मन नहीं भर रहा था…
दोनों मॉल के प्ले जोन में चले गए…. शोवन वहाँ पहुँच कर एक अलग ही बच्चा बन गया….!
इधर से उधर भागता दौड़ता शोवन आज पहली बार अपनी उम्र का बच्चा लग रहा था…
उसके चेहरे की रौनक देख समर भी खुश था.. उसके साथ कार रेस करनी हो या दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाली फाइटिंग हो हर एक गेम में उसका साथ देता समर भी बच्चा बन गया था… !
ख़ूब सारा खेल लेने के बाद समर ने उससे खाने के लिए पूछा और संकोच से शोवन ने ना में सर हिला दिया….
लेकिन समर के ज्यादा ज़ोर देने पर उसने बेल्जियम चॉकलेट आइसक्रीम की फरमाइश कर दी…
और बिना मौसम का हाल जाने समर ने उसे आइसक्रीम दिलवा दी… !
आज बड़े दिनों बाद शोवन ने अपनी मनपसंद आइसक्रीम खायी थी…
दोनों बड़े मन से वापस लौट कर घर चलें आये…
शोवन को घर पर छोड़ कर समर जाने लगा और पहली बार ऐसा हुआ कि शोवन ने जाते हुए समर की कलाई पकड़ ली…
“आप नहीं रहते हैं तो मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता.. !”
समर ने मुस्कुरा कर उसके गाल प्यार से खींच कर थपथपाये और “मैं जल्दी वापस आ जाऊंगा ” कह कर निकल गया…
शोवन का सारा सामान उसने काम वाली मेड को बुला कर पकड़ा दिया था.. वो सब कुछ लेकर अंदर चली आई…
“अम्मा जी ये सब कहाँ रखना है.. ?”
उसने समर की माँ से सवाल किया, वो उस वक्त अपनी ननंद के साथ बैठी बातों में लगी थी…
उन्होंने एक नज़र सामान पर डाली और वापस भिड़ गयी…
“अम्मा जी बता दीजिये तनिक, ये बाजार समेटें, तब तो दूसर काम करेंगे जाकर.. आप ही के कमरे में सलटा दें का.. ?”
“हमारे ही माथे पर दें मार सब कुछ…!
अरे गेस्ट रूम में रख दें ना… इतना बड़ा गेस्ट रूम किसलिए बनवा रखें हैं.. !”
बुआ जी की नज़र पूरी तरह उस सामान पर थी… उन्होंने उसे आवाज़ लगा दी…
“लाली जरा इधर आना… हमें भी दिखा, क्या क्या लें आया है समर इसे गोरे के लिए… !”
लाली पहले ही इतना सामान समेटने की फ़िराक में थी उस पर ये दिखा दिखा का चक्कर उसका दिमाग घुमा रहा था… !
जाने क्यों उसे अपने घोर श्यामवर्ण के कारण इस बच्चे के गोरे सफ़ेद रंग से बेइंतिहा चिढ होती थी…!
वो अपने मन के इस बैर की कोई कैफियत नहीं पा पाती थी, वो खुद को समझाना भी नहीं चाहती थी… !
उसे इस बच्चे के लिए किसी तरह की कोई ममता नहीं थी…
उसे सदा ही लगता कितना किस्मत वाला बच्चा है… माँ के मरते ही समर जैसा रईस आदमी इसे उठा लाया…. अब धन दौलत सब कुछ है इसके पास.. !
लाली ने एक नजर वहीँ खड़े शोवन पर डाली और मुहँ बना कर सारा सामान बुआ जी तक लें गयी…
सारे सामान को उलट पलट कर देखती बुआ जी हर एक वस्तु का मूल्य भी बड़े आराम से देखती परखती जा रही थी…
“भाभी भगवान झूठ ना बुलवाये, पर एक अनाथ बालक के लिए समर की इतनी ममता समझ ना आवे है… !”
“अब क्या कहें जिज्जी.. ! समर तो बचपन से ऐसा ही है… सात आठ बरस का था जब जाने कहाँ से एक कुत्ते का पिल्ला उठा लाया था, और जब मैंने फेंकने को कहा तो रो रो कर घर सर पर उठा लिया था… ऐसा ही है मेरा बेटा.. अब क्या ही कहूं उसे.. !”
एक ठंडी सी आह भर कर बुआ जी ने बड़ी ममता से उस सारे सामान पर हाथ फेर कर मुहँ फेर लिया…
“लाखों फूँक दिये समर ने वो भी एक अँगरेज़ पिल्ले के लिए… हमारे गुड्डू के लिए कितना कुछ सोचा था, अब तक कुछ न लें पायी.. !”
गुड्डू बुआ जी का पोता था… बुआ जी का ब्याह काफी ऊँचे राजपूतों में हुआ था.. और आज तक उन्होंने अपने दोनों बेटा बहु को अपनी उँगलियों पर ही नचाया था….
लेकिन समय बदलने के साथ अब बहुएं ठेठ राजसी पोषाक छोड़ कर धीरे से पहले चूड़ीदार कुरते पर आयी फिर जींस कुर्ती पर और धीरे से घटते घटते कुर्तियों कि लम्बाई घट कर टॉप में बदलने लगी थी ..
बुआ जी कलह क्लेश मचाने वाली औरत थी और बहुएं भी सारी चुन चुन कर वैसी ही मिली थी… दोनों बहुओं के बीच सदा मेरा पति ज्यादा कमाता है कि होड़ मची रहती…. हर नए त्यौहार पर गहनों की लकदक से एक दूसरे को नीचा दिखाने की जद्दोजहद में दोनों बहुएं कई कई बार सास को भी तानों के बाण मार के छलनी कर जाती हालाँकि बुआ जी गज़ब की जठ्ठर थी….
नाती पोतों का मोह ना होता तो वो अपनी कुलक्षिणी बहुओं का मुहँ नहीं देखती… लेकिन दोनों बहुओं ने मिला कर जितने बच्चे जने उसमे कुल जमा एक बालक हुआ जो बुआ जी के नैनन का तारा था.. गुड्डू !!
कहने को उसे भी कोई कमी ना थी, लेकिन एक बाहर के अँगरेज़ लड़के पर ममता लुटाता समर उनका कलेजा फूंका जा रहा था…
बस घर का पैसा ऐसे व्यर्थ ना बह जाये इसलिए आज ये खिलौने देख उन्हें अपने पोते की याद आ गयी थी… !
वर्ना समर के ब्याह में अपनी इकलौती कन्या के साथ पधारी बुआ जी को आज तक ना पोते के लाड़ और ना गृहस्थी की चिंता ने वापस लौटने को बाध्य किया था…
वो तो अंगद के पैर सी अपने भाई के घर जमी बैठी थी…
वैसे उन्हें पिया भी फूटी ऑंख ना भाती थी…. उनके अनुसार अगर लड़की ज्यादा पढ़ लिख जाये तो फिर उसके हाथ पांव खुल जाते हैं….
ऐसी लड़कियां ना अपने पति को कुछ मानती है ना सास ससुर को…
ऐसी लड़कियां अपनी नौकरी के घमंड में सदा चूर रहती है… पिया का सबसे मिलने जुलने का स्वभाव अपनी ऑंख से देखने के बावजूद वो अपनी पहले की विचारधारा पर अटल थी…
“अरे जिज्जी कुछ पसंद आ रहा तो, गुड्डू के लिए रख लीजिये ना… “!
“अभी कौन सा हम चली जा रहीं हैं भाभी ! जब जायेंगे लिए जायेंगे.. !”
“हाँ तो उस वक्त और भी सारे खिलौने आ जायेंगे, अभी आप इनमे से भी छांट लीजिये.. !”
“भाभी आप भी ना.. हमसे ज्यादा तो हमारे गुड्डू को आप लाड़ करती है.. हम नई रखेंगे तो आप मानेंगी थोड़े ही.. !”
और बुआ जी ने उन खिलौनों में से कुछ दो चार खिलौने और कुछ अच्छे कपडे भी निकाल लिए…
शोवन चुप खड़ा देखता रहा..
समर की माँ को भी शोवन से ऐसा कोई खास मोह नहीं था..
उन्होंने उसे वहीँ खड़े देखा तो टोक दिया…
“क्या हो गया… यहाँ यूँ खड़े खड़े हमें यूँ घूर क्यों रहा है.. जा बाहर जाकर खेल.. !”
शोवन टूटी फूटी हिंदी समझने लगा था और भाषा भले ही उसे न समझ आये लेकिन भाव तो समझ ही सकता था…
प्यार और दुत्कार की बोली ऐसी होती है कि उसे एक अबोध बालक भी समझ सकता है…
शोवन भी समझ गया… वो चुपचाप बाहर निकल गया… !
बाहर बगीचे में एक तरफ पत्थरों का सुंदर सा झरना बना हुआ था, वो वहीँ जाकर बैठ गया… पानी को देखते हुए जाने उसके मन में क्या आया वो अपने पैर उस झरने के ठन्डे पानी में डाल कर बैठ गया…
शाम गहराने लगी और हलकी सी ठण्ड बढ़ने लगी…. शोवन भी उठ कर अंदर चला गया…
उसे भूख भी लग रही थी, लेकिन कहता किससे.. ?
समर की माँ और बुआ जी मंदिर चली गयीं थी… बुआ जी की बेटी अपना टकाटक विडिओ बनाने में लगी थी..
शोवन एक तरफ चुप बैठा था.. उसी समय पिया अस्पताल से चली आई…
वो ऊपर अपने कमरे में जा रही थी कि काम वाली ने उसे आवाज लगा दी…
“भाभी चाय बना दूँ.. आपके लिए ?”
हाँ में सर हिला कर वो तेज़ी से ऊपर चली गयी…
नीचे शोवन का सारा सामान पहले तो समर की माँ के कमरे में ही रखा था, लेकिन आज धीरे से समर की माँ ने उसका सामान गेस्ट हॉउस में रखवा दिया था…
उस कमरे को साफ सुथरा करवा कर उसके सोने की व्यवस्था भी वहाँ करवा दी थी…
कुछ देर में लाली चाय लेकर पिया के कमरे में चली आयी…
आज एक के बाद एक केस होने के कारण पिया को टिफिन खाने की भी फुर्सत नहीं मिल पायी थी…
चाय का कप पकड़ कर पिया के चेहरे पर मुस्कान चली आई..
“लाली सुबह टिफिन में क्या दिया था… आज तो मुझे खाने का भी वक्त नहीं मिला.. ? रात का खाना जल्दी बना देना.. !”
“रात का खाना भी तैयार ही है भाभी, भरवां बैगन और मटर पनीर बना है… आप जब बोलेंगी फुल्के निकाल दूंगी… !”
पिया ने हाँ में सर हिला दिया…
समर अब तक आया नहीं था, और शोवन नीचे पिया को कहीं नज़र नहीं आया था…
शोवन कहाँ है ये जानने को पिया उत्सुक थी….
फ्रेश होकर कपड़े बदल कर वो नीचे चली आई… उसने रसोई में झांक कर देखा तुलसी कुछ काम कर रही थी….
तुलसी पिया को शुरू से बहुत मानती थी, पिया को भी लाली से ज्यादा तुलसी ही भली लगती थी ! तुलसी और लाली चचेरी बहने थी, लेकिन दोनों के स्वभाव में जमीन आसमान का फर्क था! दोनों ही समर के घर पर सुबह से लेकर रात तक रहती थी, और पूरी रसोई का काम यह दोनों बहने ही मिलकर संभाला करती थी…
पिया को रसोई में देखकर तुलसी मुस्कुरा उठी…
” कुछ चाहिए था क्या भाभी..?
ना में गर्दन हिलाकर पिया ने वहीं से बाहर की तरफ झांक लगा दी …
” मम्मी जी दिखाई नहीं दे रही है तुलसी और बुआ जी कहां है…?”
” मंदिर में आज कुछ समारोह हो रहा है, वही गए हुए हैं ! उन लोगों को वापस आते रात हो जाएगी..!”
पिया ने वक्त देखा रात के 8 बज चुके थे लेकिन अब तक समर का कोई पता नहीं था…
शोवन के खाने का वक्त हो चुका था….
” तुलसी शोवन के लिए चीज सैंडविच बना दो, मैं उसे डिनर दे कर आती हूं..!”
” अम्मा जी ने जाते-जाते कहा था उसे खाना खिलाने के लिए इसीलिए लाली अभी उसका खाना परोस कर लेकर गई है…!”
“लेकिन वह बच्चा है क्या..?”
पिया को शोवन की चिंता भी थी लेकिन वह किसी को यह दिखाना भी नहीं चाहती थी…
” आज अम्मा जी ने उसका सारा सामान गेस्ट हाउस में डलवा दिया है ! उनका कहना था कि फॉरेन में तो वैसे भी बच्चे बचपन से अलग ही सोते हैं, इसलिए शोवन भी सो जाएगा… अम्मा जी को पैरों में तकलीफ है ना इसलिए उन्हें बच्चे को साथ लेकर सोने में दिक्कत होती है…!”
आश्चर्य से पिया तुलसी की बात सुनती खड़ी थी…. वैसे देखा जाये तो समर की माँ ने कोई ऐसी अनहोनी नहीं की थी, उनका कहना भी सही था विदेशों में तो बच्चे अलग ही सोने लगते हैं बचपन से ही, फिर यहाँ अगर उन्होने उसका कमरा अलग कर भी दिया तो क्या दिक़्क़त ?
वो ये देखने की शोवन का सारा सामान ठीक से कमरे में लग गया या नहीं गेस्ट रूम में चली गयी… उसी वक्त लाली शोवन का खाना वहाँ रख कर गयी थी…
और खुद से ही अपने गले में नैपकिन फंसा कर शोवन टेबल पर रखी अपनी प्लेट के खाने से जूझ रहा था…
पिया चुपके से जाकर खड़ी हो गयी… वो शोवन के पीछे खड़ी थी… इसी से उसे शोवन नहीं देख पाया था…
पिया ने शोवन की प्लेट देखी और उसकी भौंह गुस्से में चढ़ गयी…
शोवन की प्लेट में अभी का ताज़ा बना कुछ भी नहीं रखा था…
वो तुरंत उसके सामने से प्लेट उठा कर पलट कर दनदनाती हुई रसोई में दाखिल हो गयी…
” तुलसी, अभी तुमने रोटियां सेंकी हैं या पराठे… ?”
“भाभी अभी तो बस आटा माड़ा है, अभी तो कुछ नहीं सेंका.. ना रोटी ना पराठा.. !”
“तो क्या लाली ने सेंका था.. ?”
“नहीं भाभी.. ! रात का तो सारा खाना मैं ही बनाती हूँ, वो तो बाकी ऊपर के काम देखती है.. !”
“लाली…. ” पिया ज़ोर से गरजी…
और रसोई से लगे स्टोर रूम से अगले दिन के लिए रसद निकालती लाली पिया के सामने चली आई…
“तुमने सुबह का खाना परोसा है बच्चे को.. ?”
पिया का सवाल सुनते ही लाली के चेहरे का रंग उड़ गया…..
“अभी शाम में तो अंडा बना ही नहीं है… फिर क्या सुबह की सब्जी रोटी लड़के को परोस दी तुमने.. ?”
पिया के पूछने के ढंग से लाली डर गयी…. उसे शोवन पसंद नहीं था इसलिए वो अक्सर उसके साथ ऐसा ही टालू व्यवहार किया करती थी… कभी उसकी बाँह झटक दिया करती तो कभी उसे बासी खाना परोस दिया करती थी…
“भाभी… वो… अम्मा जी ने कहीं थी कि इसे जल्दी खाना दें देना… अंग्रेज़ो को जल्दी खाने की आदत होती है ना… बस इसलिए… हमारी कोई गलती नहीं भाभी… वो ताज़ा खाना बन ही न पाया था.. !”
पिया ने उसे घूर कर देखा और हाथ में पकड़ी प्लेट वहीँ उसके सामने पटक दी…
“तुमसे मैंने पहले भी कहा था, और आज वापस कह रही हूँ, अगर तुम्हें तमीज़ से काम करना है तो रहो वर्ना अपना सामान बांधो और निकलो यहाँ से… !
तुम्हें इतनी सी अक्ल नहीं है कि वो बच्चा सिर्फ पांच साढ़े पांच साल का है.. इस उम्र में जब बच्चे का सिस्टम अभी तैयार हो रहा, उस समय तुम उसे कुछ भी खिला दें रही हो.. तुम्हारा खुद का बच्चा होता तब भी यहीं करती क्या…?
एक तो उसका खान पान यहाँ से वैसे ही अलग था, वो जैसे तैसे यहाँ के खाने से संतुलन बैठाने कि कोशिश में है, और उस पर तुम जैसी निरी गंवार लड़की उसे सुबह का शाम को खिला कर बीमार कर देगी….
एक तो तुम्हारी सब्जी में मिर्चें भरी नजर आ रही उस पर सुबह की सब्जी… पता नहीं उस बच्चे को कितना नुकसान कर जाती…!
वो तो अच्छा हुआ मैं समय पर पहुँच गयी, वर्ना जाने उसका क्या हाल होता… ?
आइंदा तुम्हें शोवन के खाने पीने का ख्याल रखने की जरूरत नहीं है…!
और अब अगर तुम्हें शोवन के साथ ऐसा कोई भी दुर्व्यवहार करते हुए मैंने देखा तो मैं सीधे समर से तुम्हारी शिकायत करके तुम्हें यहां से काम से ही हटा दूंगी… आई बात समझ में..!”
लाली का चेहरा तमतमा गया था… क्योंकि पिया के पीछे ही शोवन भी रसोई में चला आया था और उस बच्चे के सामने जब लाली को पिया ने इतनी जोर की डांट लगाई तो लाली का शोवन के ऊपर का गुस्सा और भी ज्यादा बढ़ गया…!
उसने शोवन को घूर कर देखा और फिर पिया के सामने जाकर हाथ जोड़कर खड़ी हो गई…
” माफ कर दीजिए भाभी, आज के बाद ऐसा कभी नहीं होगा!”
” ध्यान रहे..!”
पिया ने उसे घूर कर देखा और खुद ब्रेड का पैकेट खोलकर शोवन के लिए सैंडविच बनाने लगी… उसे गुस्से में काम करते देख तुलसी ने उसके हाथ से ब्रेड छीनी और खुद बनाने लगी…
पिया पलट कर रसोई के पीछे वाले दरवाज़े से बाहर चली गयी… इधर हॉल और रसोई के बीच के दरवाजे के बाहर खड़ा समर सब कुछ अपनी आंखों से देख और सुन रहा था….
उसके चेहरे पर राहत के भाव चले आए…
. उसने शोवन की तरफ देखा ! शोवन ने जब पिया को बाहर निकलते देखा तो वह भी धीमे कदमों से पिया के पीछे दरवाजे से बाहर निकल गया….
चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए समर ऊपर अपने कमरे में चला गया….
*****
सुबह धूप की हलकी किरणे चेहरे पर पड़ी और बाँसुरी की नींद खुल गयी….
मुस्कुरा कर वो पलंग पर उठ बैठी…
उसने उठ कर अपनी तरफ की खिड़की का पट खोल दिया… एक ठंडी हवा का खुशबु से भरा झोंका अंदर चला आया….
वो मुस्कुरा कर सामने दूर दूर तक फ़ैले पहाड़ देखती खड़ी रह गयी….
उसी वक्त दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी… और बाहर से आवाज़ भीतर चली आई….
“रानी हुकुम आपके लिए कॉफ़ी लाये हैं… !”
“लें आइये… !”
बाँसुरी ने जवाब दिया और वापस बाहर के नज़ारे देखने में व्यस्त हो गयी….
क्रमशः
aparna….
