
जीवनसाथी -2 भाग – 95
महल की सवारी महल की तरफ निकल गयी……
प्रेम निरमा राजा बाँसुरी और दोनों बच्चे एक साथ एक गाड़ी में थे, बाकी की गाड़ियों में गार्ड्स थे..
समर आदित्य और केसर एक गाड़ी में थे… ..
शौर्य बाँसुरी को छोड़ना ही नहीं चाहता था… बाँसुरी का भी वहीं हाल था..
निरमा ने बाँसुरी की तरफ देखा..
“बहुत मुश्किल रहा होगा ना बाँसुरी ?”
बाँसुरी ने निरमा को देखा..
“पूछ मत नीरू… रोज़ रात में जब कलि मेरी गोद में सो जाया करती थी, तब अक्सर उस में शौर्य को देख कर उसे चूम लिया करती थी लेकिन उसके बाद साहब की याद में आधी आधी रात जागकर काट देती थी। मुझे खुद नहीं पता था कि मेरा यह पश्चाताप कितने दिनों का है ? और कब मैं वापस अपने साहब के पास लौट पाऊंगी!”
” अच्छा! तो इसका मतलब राजा भैया वहां आते थे तो, तुझसे मिले नहीं..? मतलब इन 2 सालों में तुम दोनों का मिलना हुआ ही नहीं..?”
निरमा ने आश्चर्य से राजा की तरफ देखा और फिर बांसुरी की तरफ देखने लगी बांसुरी ने ना में गर्दन हिला दी..
राजा हल्के से मुस्कुराने लगा उसने निरमा की तरफ देखा और उसके संशय को दूर करने बोल पड़ा…
” मैं हुकुम के सामने कभी आया ही नहीं ! जब भी आता था बस दूर से इनकी झलक देखकर वापस लौट जाता था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि, बांसुरी अपने निर्णय पर कमजोर पड़े। मैं जानता हूं, जब मैं बिना बांसुरी के को देखें रह नहीं पा रहा था तो बांसुरी कैसे मुझे देखे बिना रह पाती ?लेकिन मैं यह भी जानता था कि, अगर मैं उसके सामने आ गया तो वह अपने निर्णय में कमजोर पड़ जाएगी..!”
“धन्य है आप और धन्य है आपकी हुकुम ! आज के ज़माने में भी ऐसे निस्वार्थ लोग होते हैं ? जो दूसरों के लिए अपना जीवन व्यर्थ कर दे !”
निरमा ने राजा की बात पर अपने विचार रखे और धीरे से अपने आंसू पोंछ लिए…
” राजा भैया वहां महल में तो किसी को भी बांसुरी के बारे में कुछ भी नहीं पता था !
वह लोग तो नेहा को ही असली बांसुरी माने बैठे थे… फिर अब.. ?”
अबकी बार राजा की जगह जवाब दिया प्रेम ने…
” नेहा के जाने के बाद पूरा महल दुख में डूब गया था,। आज जब हुकुम ने युवराज सा को फोन करके सारी बात बताइ तो उनकी खुशी की चमक मुझे भी फोन पर सुनाई दे गई । जाहिर है हर कोई बांसुरी को याद तो करता ही था, और यह सब के लिए डबल बोनस जैसी बात हो गई है निरमा.. पूरा महल अपनी महारानी के इंतजार में पलक पावडे बिछाए बैठा है…।
निरमा ने मुस्कुरा कर हामी भर दी..
गाड़ी आगे बढ़ती जा रहीं थी…
दूरी बहुत थी…
कुछ देर को बाँसुरी की ऑंख लग गयी.. और उसे लगा कलि उसके गालों से अपने गाल रगड़ कर उसे उठाने की कोशिश कर रहीं है… बाँसुरी नींद में मुस्कुरा उठी..
उसने आगे बढ़ कर कलि को चूम लिया और तभी उसकी नींद खुल गयी…
अचानक उसे अपनी नन्ही सी कलि की याद सताने लगी…
उसका हंसना खिलखिलाना, ठुमक ठुमक कर चलना, रात में कहानी सुनते हुए उसी की गोद में सो जाना… सब कुछ याद आने लगा और बाँसुरी की आंखें भीग गयी..
औरत का दिल वाकई मोम का बना होता है…
हर एक बात पर पिघल जाता है.. कलि से देखा जाये तो उसका कोई रिश्ता नहीं था, लेकिन एक अनजान नाज़ुक सी डोर में बांध गयी थी वो उसे..
पता नहीं अब कभी वो कली से मिल भी पायेगी या नहीं?
अब कभी ज़िंदगी में दुबारा वो उसे देखेगी या नहीं ? लेकिन इतना तो तय था की कलि कहीं भी रहे उस तक बाँसुरी की दुआएं हमेशा पहुचेंगी…
अपने स्नेह आशीर्वाद की बरसात से वो उसे हमेशा तृप्त रखेगी..
कलि के बारे में सोचते सोचते उसने शौर्य की तरफ देखा.. वो उसकी गोद में सर रखे सो रहा था.. उसके बालों पर हाथ फेरते हुए वो हलके से मुस्कुरा उठी..
बाहर हलकी सी बारिश शुरू हो गयी थी…
कांच से अपना सर टिकाये बैठी बाँसुरी ने सामने बैठे राजा को देखा, उसी वक्त राजा ने भी पलट कर उसे देखा..
दोनों एक साथ मुस्कुरा उठे..
“कुछ याद आ गया क्या ?”
“हम्म !” बाँसुरी मुस्कुरा उठी..
“तो सुनाओ फिर !”.
राजा और बाँसुरी दोनों को ही बाँसुरी का पहली बार राजा के साथ महल जाना याद आ गया था…
राजा के ज़ोर देने पर बाँसुरी धीमे से गुनगुना उठी..
चांदनी रातें हो तो चकोरी
पागल-सी क्यों होती है
जंगल में कोयल की कू-कू
तू जाने या मैं जानूँ
प्यार में होता है क्या जादू, तू जाने या मैं जानू…
रात भर गाड़ियां चलती रहीं…
भोर की किरणों के साथ ही विजयराघवगढ़ की सीमाएं नज़र आने लगी…
भोर हो रहीं थी… सूरज क्षितिज पर उगता नज़र आ रहा था.. पंछी चहचाहट के साथ उड़ रहें थे..
ठंडी पुरवैया बह रहीं थी..
बाँसुरी की ऑंख लगी हुई थी की राजा ने उसके कंधे पकड़ उसे धीरे से थपकी सी दी और जगाने का प्रयास करने लगा..
बाँसुरी आंखें मलते सामने देखने लगी..
उसकी आंखें आश्चर्य से फ़ैल गयी…
उसने राजा की तरफ देखा और राजा उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा उठा..
सामने फ़ैला जन समुदाय बाँसुरी को आश्चर्य में डाल रहा था..
इतनी भीड़ तो उसने तब देखी थी जब वह पहली बार राजा के साथ राज महल आई थी। उस वक्त भी रियासत में प्रवेश करते साथ रियासत के लोग अपने राजकुमार को देखने के लिए इसी तरह इंतजार करते खड़े थे…।
तो क्या आज की यह भीड़ उसके खुद के लिए थी? बांसुरी ने एक बार फिर सवालिया नजरों से राजा की तरफ देखा और राजा ने मुस्कुराकर गर्दन हां में हिला दी। प्रेम ने कुछ आगे बढ़कर गाड़ी रोक दी।
लोगों के इस भारी जन समुदाय के बीच प्रेम के गाड़ी रोकते ही राजा अपनी तरफ का दरवाजा खोलकर उतर गया ,उसने बांसुरी को भी गाड़ी से उतरने का इशारा कर दिया । बांसुरी जैसे ही अपनी तरफ से उतरी उस जन समुदाय में हर्ष मिश्रित ध्वनि शुरू हो गई। सभी तरफ राजा अजातशत्रु की जय ,रानी बांसुरी की जय के नारे लगने लगे….
बाँसुरी उस भीड़ को देख रहीं थी कि उनमे से कुछ बुज़ुर्ग औरतें हाथ में आरती की थाली लिए आगे चली आई…
उन लोगों ने अपने पास रखी माता की चुनार बाँसुरी के कंधे से लपेटी और उसकी आरती उतारने लगी…
बाँसुरी पहले भी ऐसा होते देख चुकी थी वह जानती थी कि रियासत की जनता अपने राजा और रानी से बहुत प्रेम करती थी। वह भी समझती थी कि उसका सम्मान इसीलिए हो रहा है क्योंकि वो राजा अजातशत्रु की पत्नी है ।इसलिए वह भी मुस्कुरा कर उन औरतों के बीच खड़ी हो गई। एक-एक कर काफी सारी औरतों ने उसकी आरती उतारी, उसके माथे पर छोटा सा तिलक किया और उसके बाद जो हुआ उसने बांसुरी के ह्रदय को रियासत के लोगों के प्रेम से अभिभूत कर दिया…
उन बुजुर्ग औरतों को एक तरफ करते हुए एक युवा महिला हाथ में एक बड़ी सी परात ले चली आई और उस परात को उसने बांसुरी के ठीक सामने जमीन पर रख दिया। परात में आलता घुला हुआ था..।
बांसुरी आश्चर्य से उन सभी लोगों की तरफ देखने लगी कि आखिर वह लोग चाहते क्या हैं? तभी उनमें से एक महिला ने धीरे से कहना शुरू किया..
” महारानी बांसुरी की जय हो। महारानी बांसुरी आपने जो किया है उसके बारे में हम सारी जनता को मालूम चल चुका है ।आपके त्याग और तपस्या की कहानी कल रात ही बड़े राजा साहब के मुंह से हम सबको सुनने को मिली और हम सब उसको सुनने के बाद आप को दंडवत प्रणाम करते हैं ।
एक औरत में ममता जरूर होती है ,लेकिन जब बात किसी और बच्चे की आए तो हर एक मां अपने बच्चे को पहले चुनती है। लेकिन आप एक साधारण मां नहीं है, आपने अपने बच्चे के सामने दूसरे के बच्चे के पालन पोषण को चुना और इसलिए आप अपनी सारी प्रजा की और हमारी नजर में तो इस संसार की मां हो गई है। आपसे करबद्ध निवेदन है कि, आप इस आलता के परात में पैर रखें और इसके बाद हम सब औरतें अपनी चुनरी रखती जाएंगी ,आप उन पर पैर रखते हुए आगे बढ़ जाए।
हमारी रियासत की हर एक औरत आपकी चरण धूलि अपने घर में रखना चाहती है…।
वृद्धा के मुंह से इतनी भारी-भरकम बातें सुनकर बांसुरी का गला भर आया, उसने पलट कर राजा की तरफ देखा जैसे पूछ रही हो कि यह सब करने की क्या जरूरत है ? लेकिन राजा ने हमेशा से अपने रियासत के लोगों की भावनाओं को समझ कर उनका मान रखा था, आज भी राजा ने बांसुरी की तरफ देख कर उसे आगे बढ़ने का इशारा कर दिया..
भरे गले और भरी आंखों से बांसुरी ने औरतों के सामने अपने हाथ जोड़ दिए..
” क्या यह करना जरूरी है अम्मा जी!”
उन वृद्धा ने अपने दोनों कांपते हुए हाथ बांसुरी के सामने जोड़ दिए और बांसुरी ने उन कांपते हाथों को अपने माथे से लगा लिया।
वह धीरे से उस आलते की परात में अपने दोनों पैर रखकर उतर गई।
इसके बाद बड़े धीमे से उसने अपना पैर आगे बढ़ाया कि ठीक सामने जमीन पर बैठी औरत ने अपना आंचल आगे फैला दिया ,बांसुरी को उस आंचल पर पैर रखना अच्छा तो नहीं लग रहा था लेकिन वह सारी औरतें जितनी भावुकता से बांसुरी को आमंत्रित कर रही थी उनके उस आमंत्रण को ठुकराना भी बांसुरी को अच्छा नहीं लगा…।
वह धीरे-धीरे एक-एक कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़ गयी..
रियासत के लोगों का इतना सारा प्यार देखकर अभिभूत थी वो।
उसके मन में आ रहा था कि काश रास्ते से उसने इन सब को देने के लिए तोहफे ले लिए होते तो कितना अच्छा होता ? उसे याद आ गया वह समय, जब अपनी शादी के लिए वह महल आ रही थी और उस वक्त उसे लेने के लिए आए हुए समर और युवराज भाई साहब ने उसके हाथ से रियासत के लोगों को तोहफे बंटवाए थे। वह बात याद आते ही उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई और तभी सामने खड़े समर पर उसकी नजर पड़ गई।
समर उसे देख कर मुस्कुरा रहा था, आखिरी आंचल पर पैर रखते ही समर ने उसके सामने हाथ बढ़ाया और वो अपने देवर कम भाई जैसे समर का हाथ थाम कर आगे बढ़ गई…..
महल वासियों में किसी के मन में कुछ आए और वह पूरा ना हो पाए तो फिर समर के रहने का मतलब क्या हुआ ? बांसुरी के मन में यह बात आई थी कि उसे इन लोगों को तोहफे बांटने है, और समर ने पहले ही युवराज सा के साथ मिलकर इस बात की भी तैयारी कर ली थी।
असल में उन लोगों को पहले ही आभास हो चुका था कि इसी तरह का जन कोलाहल राजा और बांसुरी के स्वागत के लिए मिलेगा, और इसीलिए युवराज सा अपनी गाड़ियों में बांसुरी के हाथों बंटवाने के लिए भर भर कर तोहफे लेकर आए थे।
समर से उनकी बातचीत चल रही थी और समर लोगों के रियासत में पहुंचने के वक्त पर ही युवराज सा भी पहुंच गये।
बांसुरी ने जैसे ही उन गाड़ियों को अपनी तरफ आते देखा, उसे आभास हो गया ।
उसने समर की तरफ देखा और समर अपना एक हाथ अपने पेट पर रखकर अदब से झुक गया…
” आप किसी बात की ख्वाहिश करें और वह पूरी ना हो पाए क्या यह संभव है..? आखिर आप राजा अजातशत्रु की पत्नी है ,इस रियासत की महारानी है रानी बांसुरी..!”
बांसुरी के चेहरे पर मुस्कान चली आई। युवराज की गाड़ी के साथ ही बाकी गाड़ियां भी वही एक तरफ को आकर ठहर गई और युवराज के इशारे पर उसके गार्ड एक-एक कर सामान नीचे उतारने लगे। युवराज मुस्कुराते हुए बांसुरी की तरफ बढ़ आया…
बाँसुरी ने आगे बढ़ कर उसके पैर छूने चाहें लेकिन युवराज ने उसे इशारे से मना कर दिया…
लेकिन इतनी देर में समर राजा और प्रेम आगे बढ़कर युवराज के पैर छूकर एक तरफ खड़े हो गए। युवराज ने एक-एक कर तीनों को अपने गले से लगा लिया। शौर्य और मीठी अब भी गाड़ी में सो रहे थे।
निरमा भी वही खड़ी थी उसने भी युवराज की तरफ देख कर अपने दोनों हाथ जोड़ दिए, युवराज ने मुस्कुरा कर उसे और बाँसुरी को आशीर्वाद दिया और समर और अपने बाकी गार्ड के साथ रियासत के लोगों में बांसुरी के हाथ से उपहार बंटवाने में लग गये…
रियासत के लोगों की ख़ुशी और उत्साह उनके चेहरें पर नज़र आ रहा था..
वो लोग जितनी ख़ुशी से बाँसुरी से उपहार ले रहें थे.. साथ ही साथ अपनी क्षमता के अनुरूप कुछ ना कुछ बाँसुरी को दे भी रहे थे..
बाँसुरी के मना करने के बावजूद वो लोग कुछ न कुछ उसके हाथ में पकड़ाते जा रहें थे…
होते होते ये सिलसिला भी खत्म हुआ और गाड़ियां महल की ओर बढ़ गयी…
महल के भव्य द्वार को फूलों और मोतियों की लड़ो से बेहद खूबसूरत तरीके से सजाया गया था…
मुख्य द्वार से अंदर जाने तक के रास्ते पर मोतियों की झालर और चांदी की ज़रदोज़ी का चंदोबा टंगा था…
बिजली के लट्टू जगमगा रहें थे, हालाँकि दिन का वक्त होने के कारण उनकी रौशनी नज़र नहीं आ रहीं थी, लेकिन उनके रंगबिरंगे कलेवर देखने वालों को आकर्षित कर रहें थे…
रानी बाँसुरी अपने राजा साहब के साथ जैसे ही गाड़ी से उतर कर आगे बढ़ी, रास्ते के दोनों ओर खड़े सहायक सहायिकाओं के द्वारा उन पर गुलाब के फूलों की पंखडियाँ फेंकी जाने लगी…
उनके चलने वाले मार्ग में पहले ही इतने फूल बिछा दिये गए थे की चलने पर पैर धंसे जा रहें थे..
ऐसे राजसी सत्कार के लिए तो बाँसुरी ने सोचा तक नहीं था..
वो सीढियों तक पहुंची की महल की परम्परा के अनुसार काकी साहब रूपा रेखा और जया सामने चली आई..
काकी ने आगे बढ़ कर बाँसुरी की आरती उतारी और उसके माथे पर लम्बा सा तिलक खींच कर उसमें भीगे हुए अक्षत चिपका दिये..
रूपा ने आगे बढ़ कर बाँसुरी और राजा को तिलक कर पानी के कलश से सात बार दोनों की नज़र उतार कर पास खड़ी सहायिका को पकड़ा दिया..
रूपा ने उस नज़र उतराई वाले जल कलश के साथ ही अपने गले से सोने का एक हार उतार कर बाँसुरी के सर से उतार कर सहायिका को दे दिया….
रूपा की आंखें भीगने लगी थी..
“हमारी देवरानी की सारी अला बला उतर जायें और अब इनकी ज़िन्दगी में खुशहाली ऐसे आये की कभी वापस ना जायें… !”..
बाँसुरी भी रूपा को देख भावुक हो गयी थी… रूपा ने आगे बढ़ कर बाँसुरी को गले से लगा लिया…
उसके बाद एक एक कर रेखा जया और पिंकी भी चले आये..
राजा और बाँसुरी के बाद निरमा और प्रेम को भी तिलक किया गया..
इन सभी के साथ ही बाँसुरी की माँ उसकी दीदी भी वहाँ मौजूद थे..
ससुराल वालों के निपटते ही बाँसुरी की माँ और दीदी ने उसे गले से लगा लिया…
उसके पिता अपनी तबियत की वजह से नहीं आ पाए थे…
लेकिन अपनी माँ और दीदी को देख कर भी बाँसुरी बहुत खुश थी.. ।
रास्ते भर उसके मन में कलि को लेकर जो बेचैनी भर गयी थी अपने महल में वापस पहुँच कर शांत हो गयी थी…
सब से मिलते जुलते बांसुरी प्रसन्नता के सागर में डूबती उतरती महल के अंदर प्रवेश कर गयी…
आखिर एक बार फिर महारानी बांसुरी अपने महल में वापस लौट आई।
महल पहुंचने के बाद वहां मौजूद सारे बच्चों से मिलकर बांसुरी की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। मीठी और हर्ष काफी बड़े हो गए थे और ढेर सारी बातें करने लग गए थे। वहीं रेखा का बेटा यश भी काफी शैतान हो गया था..।
जया की बेटी परिधि जहां दिखने में बिल्कुल परी थी वही समर और पिया का बेटा शोवन भी अपने भोलेपन से बांसुरी को बांध गया था ।
इस बच्चे के बारे में बांसुरी को कुछ भी नहीं पता था, उसने शोवन को अपने पास बुलाया और उसके हाथ मे चॉकलेट पकड़ा दी।
शोवन ने भी ठेठ ब्रिटिश अंदाज में उसे धन्यवाद कहा और वहां से चला गया ।
इस नीली आंखों वाले सुंदर से अंग्रेज बच्चे को देखकर बांसुरी निरमा से उसके बारे में पूछ बैठी…
निरमा ने रेवन और समर की सारी कहानी बांसुरी को कह सुनाई । शोवन के बारे में जानकर बांसुरी की भी आंखें भीग गई ,लेकिन पिया का निर्णय उसके चेहरे पर एक बार फिर एक दर्द भरी मुस्कान ले आया…
कुछ देर बाद ही समर घर जाकर पिया को भी वहां ले आया उस दिन दोपहर में सारे महल वासियों का खाना एक साथ था और शाम के वक्त युवराज और रूपा ने महल के ही उद्यान वाटिका में रियासत के लोगों के लिए एक भव्य आयोजन करके सबको बाँसुरी के दर्शन करवाने का कार्यक्रम रख लिया था…
वह पूरी दोपहर सब से मिलने जुलने और खाने-पीने में ही निकल गई। बांसुरी अपने कमरे में आराम करने के लिए जा ही रही थी कि, सामने से आते विराट पर उसकी नजर पड़ी और वह वहीं ठहर कर उसका रास्ता देखने लगी…
विराट ने उसे देखते ही मुस्कुरा कर उसका अभिवादन किया और उसके पैर छूकर खड़ा हो गया..
“कैसे हैं विराट सा ?”
“ठीक हूँ.. आप कैसी हैं भाभी साहब ?”
“मैं भी ठीक हूँ.. आपके भैया से पहले ही पता चल गया था की आप वापस आ गये हैं..
अच्छी बात है अब वापस लौटने के बारे में मत सोचिएगा..!”
“वो तो अभी कह नहीं सकता लेकिन हाँ अभी कुछ दिन यहाँ रुकूंगा ! आप सब की वहाँ बहुत याद आती थी… !स्पेशली भाई की !”
विराट बात कर ही रहा था की उसका फिरंगी दोस्त भी वहाँ चला आया..
बाँसुरी से थोड़ी औपचारिक बातचीत के बाद वो वहाँ से निकल गया और उसे रोकते हुए विराट भी चला गया…
बाँसुरी उन दोनों को देख पल भर को सोच में पड़ गयी और फिर अपने कमरे की ओर बढ़ गयी…
क्रमशः
aparna….
