जीवनसाथी -2/93

जीवनसाथी -2 भाग -93

  दर्श ने राजा के हाथ में वो पत्र रख दिया और उसपे लिखा बाँसुरी का नाम देख राजा ने उसे बाँसुरी के हाथ में रख दिया..

“रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह बुंदेला “

लिफाफे पर अपना नाम लिखा देख बाँसुरी भी पल भर को चौंक गयी..

उसने राजा की तरफ पत्र बढ़ा दिया..

“तुम पढ़ो हुकुम… तुम्हारे लिए है !”

“आप और मैं कबसे अलग हो गए.. ?”

बाँसुरी ने राजा को देखा और खत राजा ने ले लिया….

राजा ने पत्र खोला और पढ़ने लगा.. पढ़ने के बाद उसने पत्र बाँसुरी की तरफ बढ़ाया और वहीँ रखी कुर्सी पर ढह गया..

बाँसुरी ने पत्र पढ़ना शुरू किया..

मैडम जी,

    आपने आज तक मेरे और मेरे परिवार के लिए जो भी किया है, उसके लिए मेरे पास आभार प्रकट करने के लिए भी शब्द नहीं है !

   आप महारानी है, बहुत बड़ी रियासत की महारानी… आप स्वयं राजा अजातशत्रु सिंह की धर्मपत्नी है, मैंने आपके लिए जो किया वह मेरा फर्ज था |
मैं और मेरा परिवार शुरू से राजा साहब की सेवा के लिए कटिबद्ध है, मैंने जो भी किया वह ऐसा कुछ भी विशेष नहीं था…
     हां इस सब में मैंने अपनी पत्नी को खो जरूर दिया, लेकिन उसमें भी आपका या राजा साहब का कोई दोष नहीं|
   बरसों से यही होता आया है, राजा राजपाट देखते हैं ! और उनकी प्रजा उसके राजपाट में सुख से रहती है… बदले में प्रजा से भी जितना जो हो सकता है वो राजा के लिए करती है ! बहुत बार राजा को अपने राजपाट के लिए दूसरे देशों पर आक्रमण भी करना पड़ता है, और ऐसे में राजा के सैनिक उसकी तरफ से युद्ध लड़ते हैं… ऐसे युद्ध में जाने कितने सैनिक शहीद हो जाते हैं, लेकिन क्या उन सब शहीद सैनिकों की मौत की जिम्मेदारी राजा स्वयं पर लेते हैं ?  आज तक तो ऐसा कभी नहीं हुआ ? लेकिन हमारे राजा साहब और उनकी हुकुम दुनिया से निराले ही हैं..

देखा जाए तो जिंदगी के रण में मैं और नेहा भी राजा आजातशत्रु के सैनिक ही थे, और उस युद्ध में मेरी पत्नी अपने प्राण गंवा बैठी,  लेकिन यह भी उसका फर्ज था..!
    उसने महज अपना फर्ज निभाया, जिसके बदले में आप ने उसकी मौत की जिम्मेदारी महामहीम राजा साहब पर डाल दी, और राजा साहब भी ऐसे कि, आपकी इच्छा का मान रखते हुए आपको मेरी बच्ची के पास छोड़ कर चले गए…

महारानी साहब, आपकी और आपके साहब की जोड़ी निराली है, और शायद इसीलिए आप दोनों ने अपनी प्रजा के दिल पर भी राज किया है, और हमेशा करते रहेंगे..
    मैंने ऐसा कोई महान कार्य नहीं किया था, जिसके बदले में मुझे इतना कुछ दिया गया है.. !

मेरी पत्नी के साथ जो हुआ उसमें भी आप दोनों का या महल की सुरक्षा व्यवस्था की कोई गलती नहीं.. |
वो मेरी पत्नी थी, और उसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरी थी.. |
उसकी और मेरी जान को कितना खतरा है, ये जानते हुए भी हमनें ऐसा करने का मन बनाया | हमें किसी तरह से आप लोगों ने बाध्य नहीं किया, कोई लालच नहीं दिया.. |
अगर सब कुछ जानते हुए भी हम अपनी सुरक्षा नहीं कर पाए, उसके लिए आप कैसे उत्तरदायी हो गए राजा साहब !

मैडम..महारानी बाँसुरी है.. लेकिन महारानी होने से पहले वो एक स्त्री हैं… एक भावुक स्त्री !!
जो किसी की पीड़ा पर पिघल जाती है…
उन्हें जब ये मालूम चला की नेहा को उनकी जगह कुछ समय के लिए महल में रखा गया था, जहाँ उसकी मौत हो गयी तब वो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पायी..
उनके अंदर की स्त्री सुलभ भावुकता में उन्हें नेहा के पीछे बच गयी उसकी बेटी नजर आने लगी…
ये मैडम की महानता ही तो है कि, अपने बेटे को छोड़कर उन्होंने एक गैर बच्चे को पालने का निर्णय ले लिया..
सही मायनों में पति का फर्ज निभाते हुए उनकी इच्छा का राजा साहब ने भी सम्मान रख लिया..
मैडम को यह लगने लगा कि राजा साहब के कारण यह सब हुआ है, और इसीलिए वह एक गहरे पश्चाताप में डूब गई…
लेकिन मेरा दिल जानता है कि आप दोनों की वजह से कुछ भी नहीं हुआ!!
आप दोनों को ही किसी पश्चाताप की जरूरत नहीं है..!

हालांकि आपके इस निर्णय के कारण मेरी नवजात बच्ची पल गई | वह समय जो शायद मेरे लिए सबसे कठिन होता, उसे आपने बहुत आसानी से अपने ऊपर ले लिया ……
मेरी बच्ची को जिस वक्त अपनी मां की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उस समय आपने बिल्कुल एक माँ की तरह उसका पालन पोषण किया…
मैं यह नहीं कहूंगा कि किसी भी बच्चे को मां की जरूरत कब ज्यादा और कब कम पड़ती है ? हर एक बच्चा अपनी सारी जिंदगी अपनी मां की ममता की छांव में ही गुजारना चाहता है लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि बहुत से बच्चे बदकिस्मत होते हैं इस मामले में !
     और उन्हें समय से पहले ही अपनी मां को खो देना पड़ता है ! मेरी कली भी उन्हीं बदकिस्मत बच्चों में से एक है ! हालांकि उसकी बदकिस्मती की काली चादर को आपने बहुत हद तक अपने प्यार की बरसात से धो दिया है मैडम !
   इन 2 सालों में आपने जिस तरीके से मेरी बच्ची को पाला पोसा, उसके लिए मैं जिंदगी भर आपका आभारी रहूंगा…

लेकिन इसके साथ ही यह भी कहना चाहूंगा कि इन 2 सालों में हर एक दिन मैंने आपको अपने बच्चे के लिए तड़पते देखा है ! आपको अपने साहब के लिए रोते देखा है ! मैं जानता हूं कि, आपने उस वक्त भी कभी अपनी तकलीफ हम में से किसी से साझा नहीं की क्योंकि आप जानती थी कि हम में से कोई भी आपको तकलीफ में नहीं देख पाता |आप खुद जानती हैं कि, मैं हर बार किसी न किसी तरीके से आप को इस बात के लिए मनाने की कोशिश करता था कि आप अपने साहब और बच्चे के पास महल वापस लौट जाएँ, लेकिन आपने कभी मेरी बात नहीं मानी….
आपने मेरी छोटी सी बच्ची को पाल पोस कर मेरे मन से बहुत बड़े बोझ को दूर कर दिया, लेकिन अब अगर इससे ज्यादा समय तक आप मेरी बच्ची के पास रुकी रही तो मेरे मन पर एक बोझ बढ़ने लगेगा !

मैं हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थी हूं कि, मेरी वजह से दो साल आप अपने साहब से, अपनी प्रजा से, अपने बेटे से अलग रही..
आप नहीं जानती आपके द्वारा मेरी बेटी को दिये ये दो  कीमती साल उसके जीवन भर के लिए कितने अनमोल हो गए हैं..
    लेकिन ये भी जानता हूँ कि आपके बेटे के जीवन से यह दो साल हमेशा हमेशा के लिए दूर हो गए हैं..
  वह भी बहुत बड़ा तो नहीं है, उसे भी मेरी कलि की तरह अपनी मां की जरूरत है… !

आपने और राजा साहब ने मेरे और मेरे परिवार के लिए जितना किया उसके लिए धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है | और मैं जानता हूं कि मैं जब तक यहां रहूंगा, आप मेरी कलि को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगी..
  जबकि आपकी जरूरत आपके परिवार को भी है | एक बच्चे के लिए उसकी मां की जरूरत कभी कम नहीं पड़ती लेकिन, कलि को पाल पोस कर आपने उसे इस लायक तो कर ही दिया है कि अब मैं आराम से उसकी जिम्मेदारी उठा सकता हूं  |

मैडम आपसे  हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि आपने जितना मान सम्मान मुझे दिया है उसके बदले में मेरी कृतज्ञता का प्रसाद समझकर मेरी इस बात को मान लीजिएगा और अपने बच्चे के साथ महल वापस लौट जाइएगा | मेरी यह कुटिया ना आपके लिए कभी बनी थी और ना इसकी इतनी क्षमता है कि यह आपको रोके रख सके..

आपकी जिंदगी में मेरा आना, आपकी सुरक्षा के लिए हुआ था ना कि, आपकी खुशियों को आपसे दूर करने के लिए, और मैं देख रहा हूं कि इन दो सालों में आप ने भले ही कलि पर जी जान से प्यार लुटाया है लेकिन उस प्यार से आप खुद वंचित रह कर मुरझाती जा रही हैं | आपसे निवेदन करता हूं कि, अपनी खुशियों के पास वापस लौट  जाइये !

      मुझे खुद में भी यह बात समझ में आ गई है कि, मेरी परछाई आपके और आपके परिवार के लिए सही नहीं है ! और इसलिए आपसे यह वादा करके जा रहा हूं कि अब कभी आपके या आपके परिवार के किसी भी सदस्य को अपना और अपनी बेटी का मुंह नहीं दिखाऊंगा…|

मेरा दुर्भाग्य है की आप सबसे बिना मिले ही मुझे जाना पड़ रहा है… |

आशा करता हूँ कि, आप सब मेरी परेशानी को समझते हुए मेरी इस भूल को माफ़ कर देंगे…. !
मुझे ज्यादा बातें करना नहीं आता, और ना ही अपनी  भावनाओँ को शब्दों का जामा पहनना आता है.. !
मैं खुद नहीं जानता कि मैंने ऊपर क्या और क्यों लिखा है..?
बस आप सब से यहीं निवेदन है कि मेरी भावनाओँ को समझ कर लिखने में जो भूल हुई हो उसे माफ़ कर देना…

जानता हूं आपके बिना कलि को संभालना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन पूरी कोशिश करूंगा कि आपने इस बच्ची के दिमाग में संस्कारों की जो गहरी जड़ें जमाई है, उन्हें उसी तरह सींच कर एक सुंदर आकार दे सकूं… !

कलि हमेशा आपकी खुशबू से महकती रहेगी मैडम…

अनिरुद्ध वासुकी…

इस पत्र को पढ़कर बांसुरी अवाक रह गई..
तो यह किया था वासुकी ने ! और इसीलिए वह पिछले कुछ दिनों से अपनी ही धुन में मगन था | बांसुरी को अब समझ में आ रहा था कि वासुकी क्यों कलि से जुड़ी हर छोटी से छोटी बात उससे पूछने लगा था ?
वह कब किस वक्त खाना खाती है ? कितने  गर्म पानी से नहाती है ? कैसे उसे चलना सिखाना है ? कैसे उसे ठीक से बोलना सिखाना है ? रात को सोते समय वह क्या सुनकर सोती है ? इधर पिछले कुछ दिनों से वासुकी  कलि की हर छोटी-बड़ी बातों को बांसुरी से कुरेद कुरेद कर पूछने लगा था !
   इतना तो उसने बीते दो सालों में कभी जानने की कोशिश नहीं की थी जितना हफ्ते भर में उसने जान लिया था ! तो यह कारण था वासुकी के सवालों के पीछे का..

राजा और बांसुरी ने एक दूसरे को देखा और आंखों ही आंखों में सारा सबकुछ तय हो गया ! बांसुरी को अंदर से एक अनकही से पीड़ा हो रही थी, कहीं ना कहीं वो  यह सोच रही थी कि उसे तो अपने महल लौटने के लिए खुश होना चाहिए लेकिन वह पूरी तरह से खुशी क्यों नहीं थी… !

बांसुरी ने शौर्य को अपने सीने से लगाया और वहां से उठकर अंदर चली गई ! वह कुछ देर के लिए एकांत में रहना चाहती थी | कहीं ना कहीं इन दो सालों में भले ही उसने रोज अपने बच्चे को और अपने राजा साहब को हर एक पल में याद किया था, लेकिन इन दो सालों में इस घर से भी उसका थोड़ा सा मोह तो जुड़ ही गया था…

आज वासुकी और कलि के चले जाने के बाद उसका अब इस घर से कोई संबंध नहीं रह गया था ! जिस बच्ची के कारण वह यहां रुकी थी, आज जब वो ही  नहीं रही तो उसका यहां रुकने का क्या उद्देश्य ?
अपने कमरे में आकर बांसुरी अपना सामान रखने लगी !
और भागती हुई सी सारिका उसके कमरे में चली आई | बांसुरी के पीछे से आकर सारिका ने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया | आज तक सारिका हमेशा बांसुरी से एक दूरी बरतती आई थी | वह हमेशा अपने आपको बांसुरी की नौकरानी ही समझा करती थी, लेकिन आज जैसा जो सब हुआ था उसके बाद भावुकता में बहती वह लड़की अपने मन में मची उथल-पुथल को संभाल नहीं पाई और बांसुरी के गले से लग गई |
   उसकी सिसकियां रुदन में बदलती जा रही थी, और बांसुरी उसके सर को सहलाते हुए उसे चुप करवाने की कोशिश कर रही थी |
   सारिका को भी समझ में आ गया था कि,अब बांसुरी के वापस लौटने का वक्त आ गया है |
बांसुरी के समझाने पर सारिका ने अपने आंसू पोंछे और बांसुरी की मदद करने लगी | बांसुरी का सारा सामान एक साथ नीचे राजा साहब के पास पहुंच गया | बांसुरी खुद कमरे से बाहर निकल आयी !
   कमरे की चौखट पर खड़ी होकर उसने एक बार मुड़ कर देखा, इस कमरे में उसकी और उसकी कलि की बेशुमार यादें समाई हुई थी…
   उसे पता था कि अब वह मुड़कर कभी इस हवेली में नहीं आने वाली है, कभी इस कमरे में नहीं आने वाली है, और शायद अब कभी वो कलि और वासुकी से भी नहीं मिलने वाली है…
   उसने एक बार बहुत प्यार से वहां की दीवार पर हाथ फेरा पर अपने आंसू संभालती हुई नीचे उतर गई ! राजा बांसुरी का ही इंतजार कर रहा था | बांसुरी और शौर्य के आते ही राजा के गार्ड्स बांसुरी का सामान ले आगे बढ़ गए  !
      सुबह सवेरे जैसे आठ दस बड़ी बड़ी काली लंबी गाड़ियां उस हवेली के परिसर में आई थी, शाम ढ़लते ही वापस निकल गई और वह हवेली एक बार फिर सन्नाटे में बदल गई !

   हवेली के अंदर बैठे दर्श, सारिका और काका को अब कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करना है !
  ऐसा लग रहा था वासुकी के जाने के साथ ही हवेली की सारी रौनक चली गई थी… !

सारिका आंसू बहाती बैठी थी, और दर्श अपने आप में गुम कुछ सोचता हुआ बैठा था !
   काका रसोई में जाकर तीनों के लिए चाय बना कर ले आए |  चाय का कप हाथ में थाम कर सारिका को जैसे अचानक कुछ याद आया और वहां से वो उठ कर  खड़ी हो गई..

” क्या हुआ सारिका ? कहां जा रही हो?”

“बस अभी आयी.. !”

और सारिका तेज़ी से सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर अपने कमरे में चली गई | उसे याद आया कि फेरों के बाद जब दर्श ने उसके गले में मंगलसूत्र बांधकर उसकी मांग में सिंदूर सजाया था उसी समय वासुकी ने पीछे से उसके सर पर हाथ फेर कर उसे आशीर्वाद दिया था और उसके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा रख दिया था !
   उस डिब्बे को हाथ में पकड़ कर सारिका ने मुस्कुराकर वासुकी को देखा था और उस डिब्बे को वही रखें अपने पर्स में डाल दिया था |

    वह ऊपर उसी डब्बे को देखने आई थी, आखिर  जाते-जाते उसके बाद वासुकी भैया उसे क्या थमा कर गए थे ? ऊपर पहुंच कर अपनी अलमारी खोलकर उसने अपना पर्स निकाला और तुरंत उसके अंदर से गुलाबी से डब्बे को निकाल लिया |
    वह उस डिब्बे को लेकर नीचे चली गई | रेशमी कपड़े में रेशम की डोरी से बंधा हुआ वह डिब्बा अपने आप में बहुत खूबसूरत दिख रहा था | नीचे पहुंचकर उसने दर्श  के सामने वह डिब्बा बढ़ा दिया ! दर्श ने आश्चर्य से सारिका को देखा और सारिका आंसुओं के बावजूद धीरे से मुस्कुरा उठी !

“वासुकी भैया ने शादी का तोहफा दिया है | देखना चाहती हूं कि, आखिर उन्होंने जाते-जाते मुझे क्या दिया है ?”

दर्श ने भी धीरे से हाँ में गर्दन हिलाई और वापस जमीन को घूरता बैठ गया !
   सारिका ने धीरे से उस रेशमी गठान को खोल दिया… कपड़े को हटाने के बाद अंदर जो सुनहरा डिब्बा खोला उसके अंदर दो हीरे के कर्णफूल नजर आ रहे थे….
उन कर्णफ़ूलों को हाथ में उठाकर सारिका ने अपने गालों से लगा लिया…
उसकी आंखों से दो बूंद आंसू उस डिब्बे पर टपक पड़े.. डिब्बा खुला हुआ था और उसमें हीरे के टॉप्स के नीचे एक कागज रखा हुआ दिखाई दे रहा था !
आश्चर्य से सारिका ने उस कागज को निकाला !
वह एक पतला सा लिफाफा था | उस लिफाफे को खोलकर सारिका ने अंदर देखा और आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया…
उसमें दर्श और वासुकी की एक पुरानी तस्वीर थी..

उसने उस तस्वीर को दर्श के सामने कर दिया..

उस तस्वीर में दर्श और वासुकी एक दूसरे के कंधे पर हाथ डाले मुस्कुराते नजर आ रहे थे !
बहुत प्यारी तस्वीर थी | उस तस्वीर को देखकर दर्श के भी चेहरे पर मुस्कान चली आई !
   उसने  तस्वीर को पलट कर देखा, वहां पीछे लंदन कि किसी जगह का पता लिखा था |दर्श ने ध्यान से उस पते  को पढ़ा,  उसके नीचे एक टेलीफोन नंबर भी लिखा हुआ था !
     दर्श अचानक अपनी जगह से खड़ा हुआ और नीचे बने अपने ऑफिस रूम की तरफ तेजी से बढ़ गया | वहां पहुंचने के बाद उसने तुरंत अपनी टेबल की दराज को खोला जहां उसका और वासुकी का पासपोर्ट रखा रहता था | दर्श को जैसी उम्मीद थी वहां से वासुकी और कलि का पासपोर्ट गायब था |
  लेकिन दर्श सारिका और काका का पासपोर्ट वहां मौजूद था | दर्श ने तुरंत अपने तीनों के पासपोर्ट वहां से निकाले और उसे खोल कर देखा | उसमें दर्श काका और सारिका के वीज़ा इंटरव्यू की तारीख का पत्र रखा था…

दर्श के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई ……
दर्श के पीछे ही सारिका और काका भी भागते हुए ऑफिस में चले आए थे, सारिका ने दर्श का कंधा पकड़ कर उसे अपनी तरफ घुमा दिया..
दर्श ने अपने पासपोर्ट में दबा रखा इंटरव्यू का कॉल लेटर सारिका के सामने कर दिया !सारिका ने उसे देखा और आश्चर्य से दर्श को देखने लगी..

” इस लेटर के हिसाब से तो हमारा कल ही इंटरव्यू है.. !”

“हम्म.. तुरंत पैकिंग करो, हमें अभी के अभी यहां से निकलना पड़ेगा तभी हम कल इंटरव्यू तक वहां पहुंच पाएंगे…!”

उसी वक्त दर्श के मोबाइल पर मैसेज की बीप बजी….
  दर्श ने अपना मोबाइल चेक किया उसमें दो दिन बाद की लंदन की तीन टिकट की कंफर्म पोजीशन दिखा रही थी..

“साले कमीने… पल भर के लिए जान निकाल दी थी मेरी…!
   मुझे वाकई लगने लगा था कि तेरे बिना कैसे जी पाऊंगा ? पर मैंने सोचा ही नहीं कि जितना मैं तेरे लिए सोचता हूं, उससे कहीं ज्यादा तू मेरे लिए सोचता है..
तू जाने से पहले मुझे भी साथ ले जाने का सारा इंतजाम कर गया था अनिर !
    जब-जब मुझे लगता है कि मैं तुझे बहुत कुछ जान गया हूं, तब तब तू मेरी उस हद से एक और कदम आगे बढ़ जाता है और एक बार फिर मुझे आश्चर्य में डूबा जाता है… !”

दर्श ने  मुस्कुरा कर अपने आंसू पोंछ लिया..

“चलिए काका.. फटाफट पैकिंग करते है.. हम लोग दिल्ली के लिए अपनी गाड़ी से ही निकल जायेंगे.. !”

सारिका और काका ने हाँ में सर हिलाया और वहाँ से बाहर निकल गए.. काका के चेहरें पर हल्का सा असमंजस वाला भाव नज़र आ रहा था.. उन्होंने सारिका को रोक लिया
सारिका जाते जाते रुक गयी..

“कहिये काका !”

“हम ये सोच रहें हैं की अगर सारिका ने अभी ये डिब्बा नहीं खोला होता तो हमारा लंदन जाना नहीं हो पाता.. ?!”

“काका.. अनिर हम लोगों के बस का नहीं है.. उसने सब कुछ सोच रखा था.. उसने ये डब्बा देते वक्त ही सारिका से कहा था की सबसे पहली फुरसत में इसे ही खोल कर देखना और वो भी सिर्फ दर्श के सामने !”
क्योंकि शायद वो भी महल वालों को ये नहीं बताना चाहता था की वो लंदन जा रहा है..
अगर उसका पत्र पढ़ कर भी महल वाले तुरंत वापस नहीं निकलते तब भी सारिका मेरे अलावा और किसी के सामने ये डब्बा नहीं खोलती..
और उसके लिए उसने वीज़ा की एक और तारीख भी मुकर्रर करवा रखी थी.. !”

“बहुत दूर की सोचता है ये लड़का !”

काका की बात पर दर्श मुस्कुरा उठा..

“लड़का कहाँ, अब तो खुद बाप बन गया है.. !”

दर्श ने मुस्कुरा कर सारिका की तरफ देखा.. और सारिका वहाँ से बाहर चली गयी..

लगभग डेढ़ घंटे बाद वो तीनों ही लोग उस हवेली से दिल्ली के लिए निकल गए….

एक नए सफर पे.. एक नयी शुरुवात के लिये……

क्रमशः

aparna….

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