जीवनसाथी -2/92

जीवनसाथी -2 भाग – 92

केसर सब के सामने थी… और सब की आँखों में सवाल थे… बेतहाशा सवाल !!

शादी निपट चुकी थी और काका सबके पास आ कर उन्हें खाने के लिए बुला रहे थे.. सारे ही लोग एक साथ बाहर गार्डन में चले आये..

राजा बाँसुरी के साथ था और शौर्य तो उससे यूँ चिपका था जैसे अब कभी अपनी माँ को नहीं छोड़ेगा…
बाँसुरी उसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठा कर अपने हाथों से खाना खिला रही थी….

और राजा उन दोनों को बड़े प्यार से देख रहा था.. उन दोनों को देखते हुए जैसे उसका मन नही भर रहा था ! उसी समय ठुमकती हुई कली वहाँ चली आयी..
वो बाँसुरी के पास जाकर खड़ी हो गयी.. और मुहँ फुला कर अपनी मासी माँ को देखने लगी !
आजतक उसकी मासी माँ ने ही उसे खिलाया था, और आज उसकी जगह लेने वाला कोई और आ गया था.. |
कली ने शौर्य को देखा और उसे धक्का दे दिया.. शौर्य ने पलट कर गुस्से में कली को धक्का दे दिया.. वो नीचे गिर पाती उसके पहले राजा ने उसे पकड़ कर संभाल लिया..

“क्या हुआ बेबी… नाराज हो आप ?”.. “

“हाँ !! ये मेरी मासी माँ है.. ये लड़का कौन है ?”

कली ने शौर्य की तरफ ऊँगली दिखाते हुए पूछा और शौर्य ने गुस्से में उसकी ऊँगली मोड़ने के लिए पकड़ी और राजा ने उसे छुड़ा लिया.. उसने कली को अपनी गोद में बैठा लिया….

“आप कौन है.. ?” कली ने अपनी बड़ी बड़ी आंखें झपक के उससे पूछा और राजा मुस्कुरा उठा..

“मेरा नाम राजा अजातशत्रु है ! समझी प्यारी कली !!”

“आप अदातशत्रु हो… !”

उसकी तोतली बोली सुन राजा हंसने लगा…

“हाँ मैं अजातशत्रु हूँ… !”
.
कली धीरे से उसके चेहरें की तरफ बढ़ी और कली की हरकत समझ कर राजा उसके पास झुक गया.. कली ने राजा के गाल पर धीरे से अपने होंठ रख दिये..

“हे मेरे डैड से दूर रहो… !”..

शौर्य ने आकर उसे राजा की भी गोद से धकेलना चाहा लेकिन राजा ने मुस्कुरा का शौर्य का माथा चूम लिया..

“नो.. नो माय प्रिंस ! ऐसा नहीं करते.. तुम गुड बॉय हो ना !”

“नो… आई एम अ बैड बॉय.. !”

बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य को चूम लिया…

“हो ही नहीं सकता, तुम अपने डैड जैसे ही हो.. ! बहुत प्यारे, सबसे सरल और सबसे सच्चे !!”

बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा की तरफ देखने लगी और उसी समय केसर समर के साथ वहाँ चली आई….

“बैठो केसर !”

राजा के कहने पर केसर वहाँ बैठ गयी….
और समर के इशारे पर उसने कहना शुरू किया की कैसे वो वासुकी से मिली…

” हमारी जिंदगी में जो कुछ घटा है, वह आप लोगों से छुपा हुआ नहीं है ! आप दोनों सब कुछ जानते हैं कि, किस तरह से हमें मोहरा बनाया गया था और हम बन भी गए थे ! हमारे अंदर एक अजीब सा गुस्सा था | पूरी दुनिया को हम अपने खिलाफ समझते थे, हर व्यक्ति के सामने हम अपनी अदृश्य तलवार लिए घूमा करते थे | लेकिन फिर जल्दी ही हमारा वह भरम टूट गया और राजा साहब की सच्चाई हमारे सामने आ गई | हमें समझ में आ गया कि गलत राजा साहब नहीं हम थे..|
हमसे ठाकुर साहब ने बहुत से गलत काम करवाए, लेकिन जब सुध आई तब हमने हर उस कम से तौबा कर ली, जो हमें गलत रास्ते पर ले जा रहा था.. |
इस समय आदित्य ने हमारी बहुत मदद की थी और उस वक्त हम धीरे-धीरे आदित्य की तरफ झुकने लगे थे, लेकिन इसके साथ ही हमें यह एहसास हुआ कि अगर हम आदित्य से मोहब्बत करने लगे तो वह हमें अपने साथ महल ले जाएगा और सच कहें तो हमारी आप दोनों को फेस करने की हिम्मत ही नहीं थी |  क्योंकि हमने आप दोनों की जिंदगी में जहर घोलने का ही काम किया था |
  और बस इसीलिए हम आदित्य से भी दूर भागना चाहते थे | लेकिन वह हमें खोजने पर तुला हुआ था | हम इस सारी बातों से दूर उस एक्सीडेंट के बाद वहां से बच निकले थे और अपने पास मौजूद थोड़े बहुत पैसों से हमने एक निशुल्क ब्लड बैंक शुरू किया था, जो गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बिना पैसों के खून मुहैया करवाया करता था | हमारे प्रयास थे कि जल्दी ही कुछ बड़ी स्वायत्त संस्थाएं हमारी उस छोटी सी संस्था से जुड़ गयीं और हमें उस संस्था से आमदनी होने लगी !
कुछ बड़ी संस्थाओं के प्रभाव के कारण सरकार ने भी मदद करनी शुरू कर दी ! और इस सब के कारण हम उस ब्लड बैंक को थोड़ा और बढ़ा सके उसकी ब्रांचेज़  दूसरे शहरों में भी खोल सके !  हमारे बैंक में लगभग 10-12 एंप्लॉय हमने रख लिए थे…
हमें लगने लगा था कि जिंदगी एक बार फिर सही रास्ते पर चली आई है | अकेलापन खलता तो बहुत था, लेकिन हम अपने आपको इतना व्यस्त रखते थे कि हमारा ध्यान किसी और बात पर ना जाए | सुबह 8 बजे से लेकर शाम 8 बजे तक हम अपने ऑफिस में काम किया करते थे…|
   जल्दी ही हम रेडक्रॉस समिति के साथ मिलकर दवाइयों का आउटलेट भी शुरू करने जा रहे थे..|
लेकिन एक बार फिर हमारे साथ धोखा हुआ | हमारे साथ जुड़ी बड़ी संस्थाओं ने दवाइयों के उस काम में बहुत बड़ा षड्यंत्र किया…|
हमें हमारे आउटलेट में रखने के लिए जो दवाएं मुहैया करवाई गयी थी उनमे से एक बड़ा हिस्सा उस दूसरी संस्था द्वारा अपनी दुकान पर सजा लिया गया.. ये कोई छोटा मोटा नहीं लाखों का कारोबार था.. और हम ये समझ नहीं पाए.. |
एक शाम हम अपने दूसरे शहर में मौजूद ब्लड बैंक में बैठे अपना काम कर रहें थे तब वहाँ ब्लड की ज़रूरत के लिए वासुकी साहब पहुंचे…
वासुकी साहब को एक रेयर ब्लड ग्रुप की जरूरत थी, एबी नेगेटिव | और उसके लिए वह स्टाफ से बात कर रहे थे, जो उस समय तुरंत उतना ब्लड देने में असमर्थ था लेकिन वासुकी साहब को थोड़ा जल्दी थी और इसलिए स्टाफ  ने उन्हें मेरे पास भेज दिया !
  एक्चुअली हम अपने बैंक में इमरजेंसी के लिए थोड़ा स्टॉक जरूर रखते हैं, इसलिए स्टाफ चाहता था कि वासुकी साहब की बात हमसे हो जाए और अगर हमें सही लगे तो हम उन्हें वह ब्लड मुहैया करवा दें | वासुकी साहब से बातों के दौरान हमें पता चला कि उन्होंने 2 लड़कों की यानी गुंडों की जबरदस्त पिटाई की थी और जिसमें उन दोनों में से एक का ब्लड बहुत ज्यादा बह गया था ! वो लड़का हीमोफीलिया का मरीज था, और उसका ब्लड रुक नहीं रहा था उसे ही ब्लड चढ़ाने के लिए वासुकी साहब अस्पताल लेकर गए थे ! जहां उन्हें मालूम चला कि उसका बहुत रेयर ब्लड ग्रुप है, इसलिए वह घबराए हुए हमारे पास चले आए थे | हमें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि यह इंसान है या क्या है ? इसने जिसे सजा दी, उसे ही बचाने की कोशिश कर रहा है ! हमने तुरंत उन्हें जितना ब्लड चाहिए था वह दिलवा दिया ! ब्लड उन्होंने अस्पताल के स्टाफ के साथ भेज दिया और वहां से निकलने वाले थे कि उसी समय पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम हमारे बैंक में छापा डालने चली आई…
क्राइम ब्रांच के साथ आई पुलिस ने तुरंत ही हमारे ब्लड बैंक को चारों तरफ से सील बंद कर दिया और जितने लोग बैंक के अंदर थे वह सारे लोग अंदर ही रह गये…  इस समय वासुकी साहब भी हमारे साथ अंदर ही थे..  और तब हमें वहां पता चला कि दवाइयों का जो जत्था हमारे केंद्र के लिए निकला था उसमें से आधे से कहीं अधिक दवाइयां किसी दुकान में ले जाकर दुगनी तिगुनी  दामों में बेच दी गई हैं !
   वह दवाइयां यूनिसेफ से आई हुई दवाइयां थी ! इसी  से उन्हें बेचना अपराध की श्रेणी में आता था, और सबसे बड़ी बात यह थी कि उन सारी दवाइयों की खरीद फरोख्त वाले दस्तावेजों में हमारे दस्तखत थे !
   हम वहाँ बुरी तरह से फंस चुके थे ! हमें समझ में आ गया कि हमारा साथ देने वाली संस्थाओं ने हमें केंद्र में रखकर धोखा दिया है और वह खुद बच निकले हैं, क्योंकि उन दस्तावेजों में हमारे अलावा किसी और संस्था का नाम नहीं था..!
हम परेशान हो गए और हमारे चेहरे से ही वासुकी साहब यह समझ गए कि हमने यह अपराध नहीं किया है…!
उसके बाद पुलिस लगातार हम से पूछताछ करती रही, क्राइम ब्रांच वालों ने हमें नजर बंद करने का आदेश दे दिया ! हमारे पास उस वक्त अपनी सच्चाई साबित करने के लिए कोई प्रमाण मौजूद नहीं था, हम चाहते तो वहां पर आपका या आदित्य का नाम ले सकते थे लेकिन ये सब हम आप दोनों को बताना नहीं चाहते थे, क्योंकि हम से जुड़कर आपका नाम भी खराब ही होता ! हमने अपनी सारी मुश्किलें वासुकी साहब से शेयर की क्योंकि हम दोनों को एक ही कमरे में बैठाकर पूछताछ की जा रही थी ! हमारी टीम के लोगों से पूछताछ कर उन्हें छोड़ दिया गया था !

कुछ समय बाद जब पुलिस की टीम और क्राइम ब्रांच वाले लोग बाहर बैठे चाय नाश्ता कर रहे थे, उस वक्त भी हम इतनी परेशानी में थे कि हमें कुछ सूझ नहीं रहा था… पता नहीं कैसे वासुकी साहब ने क्या दिमाग लगाया और कैसे क्या कुछ किया हमें कुछ भी समझ नहीं आया और वह हमें लेकर चुपके से पिछले दरवाजे से बाहर निकल गये..
   पुलिस वहीं बैठी रही ! उन्हें लगा हम दोनों कमरे में नजरबंद है ! लेकिन हम वहाँ से निकल चुके थे  !

    वासुकी साहब हमें लेकर एक अलग ही जगह पहुंच गये !  हमारे पास हमारी सच्चाई का कोई प्रमाण नहीं था | यहां तक कि हमारे पास तो हमारा पहचान पत्र भी नहीं था | हमारा असली नाम, हमारी शिक्षा, हमारी डिग्री किसी चीज के बारे में हम वासुकी साहब को कुछ नहीं बता पाए बावजूद उन्होंने पता नहीं कैसे हम पर विश्वास किया और इस एनजीओ तक ले आए !
यह वह संस्था थी जो बीहड़ जंगलों में रहने वाले हद से ज्यादा गरीबों की मदद किया करती थी | ऐसे गरीब जिनके पास खाने के लिए खाना ही क्या, पहनने तक के लिए कपड़े नहीं होते थे !
   और इस पूरी संस्था को चलाते थे अकेले वासुकी ! उनके पैसों से यह संस्था चलती थी, हमने उनसे पूछा कि क्या आप सरकार की या बाकी किसी अन्य संस्थाओं की मदद देते हैं?  तब उन्होंने कहा आपने तो मदद लेकर देखा ना ! हमेशा याद रखियेगा, मदद करने वाला बदले में आपसे बहुत कुछ ले जाता है, और बस इसीलिए मैं किसी से मदद नहीं लेता !”

यह वासुकी साहब के शब्द थे और बस उस दिन से हम उनकी उस संस्था से जुड़ गए ! हमारे जुड़ने से पहले वह सारा काम खुद देखा करते थे, लेकिन हम पर छोड़ने के बाद वह काफी कुछ राहत महसूस करने लगे ऐसा लगता है…!
इस संस्था में हमारे साथ बहुत से ऐसे लोग काम करते हैं जिन्हें समाज और समाज के लोग सिरे से नकार देते हैं…
  एक ऐसी लड़की हमारे साथ जुड़ी हुई है, जिस पर उसके प्रेमी ने एसिड फेंका था उसके बाद उस लड़की का चेहरा बुरी तरह से जल गया था ! चेहरा तो प्लास्टिक सर्जरी से हम लोगों ने ठीक करवा दिया लेकिन उसके मन पर पड़े छाले ठीक करने में बहुत वक्त लगा और उसमें वासुकी साहब ने और इस संस्था ने बहुत योगदान दिया है..
उस संस्था से जुड़ने वाले, वहां काम करने वाले ज्यादातर लोग दुनिया के सताए हुए लोग हैं ! जिन्हें एकबारगी यह महसूस होने लगता है कि हमारे जिंदा रहने का कोई औचित्य नहीं ! ऐसे लोगों को वासुकी वहां लेकर आते हैं, और उस संस्था से जोड़ देते हैं ! जब हम सारे लोगों की टीम उन बीहड़ गांवो में घुसती है, जहां जंगल इतने घने हैं कि झोपड़ियों तक सूरज की रोशनी तक नहीं आती, बिजली की लाइन खींचने के लिए वहां खंबे नहीं है ! वह लोग अंधेरों में ही सालों से रहते आये है,  ऐसी जगह पर घुसने के बाद हमें समझ में आता है कि, जिंदगी कितनी कठिन है…
   अपने शहर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करना अलग होता है, लेकिन जमीनी तौर पर जमीन से जुड़कर काम करना बहुत अलग होता है ! वासुकी साहब ने ऐसे सारे बीहड़ों में बिना सरकार की मदद के बिजली पहुंचाई है ! साफ पानी पहुंचाया है !उन लोगों को खेती के लिए जमीन दिलवाई है ! और उन्हें खेती करना सिखाया है ! उन सब के लिए कपड़े कंबल और खाने पीने की चीजें ही नहीं बल्कि बच्चों के लिए स्कूल की व्यवस्था भी करवाई है ! हमारी एनजीओ की लिस्ट में लगभग 56 गांव हैं जिन पर हमें काम करना है, और अब तक 32 गांव ऐसे हैं जिनके बच्चों के लिए स्कूल की व्यवस्था हो चुकी है…!
   तो यह थी हमारी वासुकी साहब से मुलाकात की कहानी….
इन्होंने सच मायने में हमारे जीवन का मतलब ही बदल दिया, अब लगता है जैसे हां हम इसलिए पैदा हुए हैं…… और यही हमारी जिंदगी का लक्ष्य है …

” और अगर मैं ये कहूं कि मैं तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से हटाए बिना तुम्हारे इस नेक काम में तुम्हारा साथ देना चाहता हूं, तब भी क्या एक बार फिर मुझे छोड़कर भाग जाओगी..?”

आदित्य की आवाज सुन केसर को झटका सा लगा, और वह अपनी जगह से खड़ी हो गई उसने मुड़कर देखा उसके पीछे वही पुराना आदित्य खड़ा था…

” जैसे वासुकी साहब ने तुम्हारी जिंदगी को नए मायने दिए वैसे ही मेरे बड़े भाई साहब ने मेरी जिंदगी को भी मायने दिये हैं !
  मैं भी तो एक बिगड़ा हुआ बैल ही था, मुझे उस दलदल से निकाल कर पूरे धैर्य और विश्वास के साथ मेरे भाई राजा साहब ने मुझे भी सुधरने का अवसर दिया…
अब मुझे भी लगता है कि अपने बड़े भाई से जुड़  कर मुझे भी जीने के मायने मिल गए हैं, केसर हर प्यार की परिणीति शादी हो यह जरूरी नहीं, लेकिन मैं तुम्हारे साथ रहकर इस नेक काम में तुम्हारा हाथ बांटना चाहता हूं !
मैं तुम्हारे साथ रहते हुए बूढ़ा होना चाहता हूं…
तुम्हारे बालों में उतरती सफेदी को पास से देखना चाहता हूं, तुम्हारे चेहरे पर पड़ने वाली झुर्रियों को गिनना चाहता हूं..
कुल मिलाकर मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं !
तुम शादी करो ना करो यह तुम्हारी मर्जी है, लेकिन अब मुझे तुम खुद से दूर नहीं कर सकती.. !”

केसर ने आदित्य की तरफ देखा और मुस्कुरा कर रह गई केसर की बातें सुनकर बांसुरी भी भावुक हो गई थी… उसकी आंखों में आंसू छलक आए थे उसने भी आज तक वासुकी की अच्छाइयों को बहुत करीब से समझा था, देखा था…..
और इतने दिनों में उसने जो भी जाना था, वासुकी अपने आप में श्रेष्ठ था… !
उसने किसी के सामने खुद को साबित करने की कोई कोशिश कभी नहीं की थी.. |
उसने अपने खुद के लिए एक राह चुनी थी और वह अपनी आंखें खोले अपनी राह पर सतर चलता रहता था…
उसकी नजर में उन लोगों का कोई अस्तित्व ही नहीं था, जो उसके काम के महत्व को समझे बिना उसे नीचा दिखाने की कोशिश करते थे और शायद इसीलिए उसके दुश्मन कभी उससे जीत नहीं पाए थे और इसी बात की खलिश उसके दुश्मनों के मन में हमेशा रह गई थी….

” केसर आज तुमसे यह सबकुछ जानकर बहुत अच्छा लग रहा है ……
वासुकी को मैंने भी बहुत करीब से जाना है उसके परिवार से भी परिचित हूं..
उससे मिलकर आभार भी जताना चाहता हूं, लेकिन तुम्हारे वासुकी साहब है कहां..?”

केसर की बात सुनने के लिए लगभग सभी लोग वहीं आसपास इकट्ठा हो गए थे, इन सबके बीच राजा की गोद से कली कब उतर कर चली गई, किसी को मालूम नहीं चला !
   दर्श और सारिका भी वहीं बैठे हुए थे, सारिका केसर के साथ ही बैठी थी, क्योंकि वह केसर की टीम का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थी और इसलिए सारिका खुद भी अपनी केसर दीदी को बहुत माना करती थी ! केसर की बातें सुनकर सारिका की आंखें भी भीग गई थी, लेकिन जैसे ही राजा ने वासुकी को याद किया, दर्श  तुरंत अपनी जगह से उठकर चारों तरफ नजर फेरने लगा….
जाने क्यों उसे 2 दिन से वासुकी की हरकतें संदिग्ध लग रही थी, कोई ऐसी बात थी जो वासुकी दर्श से भी छुपा रहा था ! वरना यह दोनों लड़के जब से एक दूसरे से मिले थे, इन्होंने आज तक अपने जीवन की कोई बात एक दूसरे से नहीं छिपाई थी !  यह पहली बार था जब वासुकी दर्श से छुपकर कोई योजना बना रहा था और उसे क्रियान्वित कर रहा था…

राजा के वासुकी का नाम लेते ही दर्श उठकर उसे चारों तरफ ढूंढने लगा… उस गार्डन में दूर-दूर तक वासुकी के गार्ड्स फैले हुए थे, दर्श सबसे जाकर वासुकी के बारे में पूछने लगा..
सबको आश्चर्य इस बात का था की वासुकी पता नहीं कब से, वहां मौजूद नहीं था !
उसी वक्त बांसुरी का इस बात पर ध्यान गया कि कली कहां चली गई ?  लेकिन आश्चर्य की बात थी कि कली भी वहां मौजूद नहीं थी…!

इस सारी बातचीत और खाने-पीने के दौरान लोग आपस में बातों में ऐसे मशगूल हो गए थे कि वाकई उनमें से किसी को पता नहीं चला कि वासुकी कब अपनी नन्हीं सी कली को साथ लिए वहां से निकल गया था…

इधर-उधर ढूंढने के बाद दर्श भागकर वासुकी के कमरे में चला गया ! वासुकी का कमरा खाली पड़ा था ! जाने क्यों दर्श की आंखों में आंसू छलक आए..
उसने उसकी अलमारियों को खोल खोल कर देखना शुरू किया लेकिन उसे कहीं कोई ऐसी बात नजर नहीं आ रही थी जिससे उसे यह मालूम चल सके कि वासुकी कहां है ?
  उसने वहीं से सारिका को आवाज लगाई और सारिका भी  भाग कर उसके पास चली आई !
  सारिका ने बांसुरी के कमरे में जाकर कली की अलमारी खोलकर देखी….
कली का सामान भी वहां से नदारद था !!

तो क्या इसका मतलब वासुकी अपनी बेटी को लेकर वहां से हमेशा हमेशा के लिए चला गया था ?

लेकिन कहां ?और क्यों ?

दर्श सर झुकाए दुखी मन से वासुकी के पलंग पर बैठ कर अपने दोनों घुटनों पर अपने हाथ टिकाए उसमें  अपनी हथेलियों पर अपना सिर टिका कर बैठ गया….   उसकी आंखों से आंसुओं की लड़ी बहने लगी…
सारिका उसके बगल में उसके कंधे पर हाथ धरे खड़ी थी…

सारिका को ही वहाँ एक लिफाफा नज़र आया.. जिसके ऊपर एक बाँसुरी रखी थी..

सारिका ने लिफाफा उठा कर देखा…
उस पर ऊपर नाम लिखा था… “रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह “के लिए..

सारिका ने वो लिफाफा दर्श के हाथ में रख दिया..
दर्श उस लिफाफे को कुछ समय देखता रहा, उसे लगा उसके हाथ में उसके दोस्त का हाथ आ गया था..

और फिर उस लिफाफे को लेकर नीचे चला गया.. उसने राजा के हाथ में वो लिफाफा रख दिया..
राजा ने बाँसुरी का नाम देख बाँसुरी के हाथ में पकड़ा दिया…
और बाँसुरी उस लिफाफे को हाथ में लिए सामने खड़े दर्श की तरफ सवालिया नज़र से देखने लगी…

“वो चला गया रानी साहब ! यहाँ से हमेशा हमेशा के लिए !”

“लेकिन कहाँ ?”

“नहीं मालूम,  उसने कुछ नहीं बताया ! कली को भी अपने साथ ले गया है, और बस उसके कमरे से ये पत्र मिला है, और कुछ नहीं है, जिससे कुछ मालूम चल सके !”

“तुम पत्र पढ़ लो, हो सकता है उसमें कुछ लिखा हो !”

राजा ने बाँसुरी से कहा और बाँसुरी ने कांपते हाथों से उस लिफाफे को खोल लिया…

क्रमशः

aparna…..

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