
जीवनसाथी -2, भाग -91
कोई बहुत तामझाम तो होना नहीं था, सादी सी शादी होनी थी और बस उसी की तैयारी में लगा था अनिरुद्ध वासुकी !!
वो दूर के मंदिर से पंडित जी को अपने साथ ले आया…
उसके सारे गार्ड्स काले कपड़ों में सज्जित इधर उधर घूम कर गेंदे के फूलों की लड़ियाँ लगा रहें थे…!
बाहर के बड़े से गार्डन में गुलाबी शामियाना टांग दिया गया था… !
बीच बीच में लगे पिलर पर सफ़ेद गुलाबी चूनर लगा कर उस पर भी ऑर्किड के फूलों के गुलदस्ते टाँगे जा रहें थे..
ज़रा ज़रा सी दूरी पर गोल टेबल पर सफ़ेद चुनरी डाल कर कुर्सियां चारों ओर लगा दी गयी थी और हर एक टेबल पर एक बहुत सुन्दर सा ऑर्किड का गुलदस्ता रख दिया गया था…
खुशबू वाली कैंडल्स से घिरे ऑर्किड के फूल बेहद खूबसूरत लग रहें थे !
वासुकी के लड़के इधर से उधर भागते हुए ये सारी साज सज्जा कर रहें थे..
उन लोगों को भी इस काम को करने में मज़ा आ रहा था.. हर वक्त गन गोला बारूद की संगत में रहने वाले लड़के आज फूलों की खुशबू में मस्त थे..
वो सभी भी दर्श को देख देख कर मुस्कुरा रहें थे…!
और दर्श अपने कमरे में तैयार होता हुआ परेशान हो रहा था..|
माना की उसकी और सारिका की शादी वासुकी करवाना चाहता है लेकिन इतनी जल्दबाज़ी में क्यों.. ?
आखिर वासुकी चाहता क्या है ?
उसने अपनी तरफ से एक आध बार पूछा भी, लेकिन वासुकी की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला और इसलिए वो अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा रहा था… |
तैयार होकर वो वासुकी के कमरे में गया, वासुकी उस समय किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था..| दर्श को देखते ही वासुकी ने बाद में बात करने को कह कर फ़ोन रख दिया…
वासुकी दर्श को देख कर मुस्कुरा उठा…
“दर्श… मैं कहीं ज्यादती तो नहीं कर हूँ तुम दोनों के साथ ? मेरा कहने का ये मतलब है कि तुम सारिका की सारी सच्चाई जानते हो… कहीं तुम्हारे मन में पल भर के लिए भी ये तो नहीं आया की मैंने उसे तुम पर थोपा..
दर्श ने वासुकी की बात को बीच में ही टोक दिया…
“तू भूल गया है शायद लेकिन मुझे सब याद है… उस वक्त भी मैं तेरे साथ ही था… |
जब पुलिस स्टेशन में तूने सारिका के हाथ उस लड़के को मरवाया था..|
उस वक्त सारिका की आँखों से बहते आँसू और उसकी चीख, उसका आर्तनाद मुझे अंदर तक भीगा गया था..|
उसी वक्त लग रहा था कि मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिससे इस बेगुनाह की कुछ मदद हो सके..! उसके बाद जब तुमने उसे और उसकी माँ को उस एनजीओ में भेजा जो खुद लोगों की मदद करने वाली संस्था थी, तब एक बार को मैं इस बात पर चौंक भी गया कि, अभी उस लड़की को खुद मदद की ज़रूरत है और तुमने उसे काम पर लगा दिया | लेकिन जब जब तुम्हारे साथ वहाँ गया हर बार सारिका को पिछली बार से अधिक स्वस्थ और खुश पाया… |
ये तुमने जानबूझ कर किया था ना अनिर…. |
सारिका को सिर्फ ये समझाने के लिए उसके साथ जो हुआ उसमें उसका कोई कसूर नहीं और वो अब भी पूरी तरह सक्षम है..| इतनी सक्षम कि वो खुद दूसरों की मदद कर सकती है !
उस एनजीओ में काम करते हुए सारिका को पिछड़े से पिछड़े गाँव में जाना पड़ता था, ऐसे गाँव जहाँ लोगों के पास दो वक्त का खाना भी नसीब ना हो, उन गाँवो में जाकर उन्हें अपने भरण पोषण के लिए कुशलता देना, उन्हें जीने का कायदा सिखाना, उनके बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना.. कई बार तो उन्हें स्कूल तक खींच कर भी लाने का काम इन लोगों ने किया है.. और इन सब कामों में खुद को झोंक कर धीरे धीरे सारिका खुद के साथ हुई सारी ज्यादती भूल गयी..|
शुरुवात में मुझे लगा भी कि तुम उस पर बहुत सारा बोझ डाल रहें हो ! क्या अपने साथ हुए हादसे के बाद वो इतना सारा काम कर पायेगी, लेकिन तुमने उस पर बोझ डाल कर उसके मन के बोझ को उससे दूर कर दिया…!
मैं तो उसी समय से उसकी लगन और सहनशक्ति का कायल हो गया था…
और फिर बाद में तुम उसे यहाँ घर ले आये…!
अपने मन से इस बात को निकाल दो, कि मैं किसी तरह के दबाव में ये शादी कर रहा हूँ… !
मैं खुश हूँ अनिर.. बस ऐसा लग रहा जैसे तुम मुझसे कोई बात छुपा रहे हो..!
आज तक हमनें हर काम एक साथ किया है, लेकिन आज लग रहा जैसे कोई तो ऐसी बात है जो तुम मुझसे काका और सारिका हम तीनों से छुपा रहे हो.. !”
“ऐसा कुछ नहीं है.. इतना मत सोचो ! और सुनो समर से बात हो गयी है, महल के लोग आते ही होंगे !”
“महल के लोग ? लेकिन उन्हें बुलाने का प्रयोजन ?”
“इतनी ख़ुशी का मौका है, उस मौके पर मैडम को भी खुश रहने का हक़ है ना, और उनकी ख़ुशी उनके साहब और बेटे में ही तो है.. !”..
“हम्म !” मुस्कुरा कर दर्श ने हामी भर दी और वो दोनों दोस्त बाहर निकल गए…..
वासुकी बहुत शिद्द्त से महलवासियो का इंतज़ार कर रहा था…
और उसकी प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई….
हवेली के बाहर एक के पीछे एक लम्बी गाड़ियां आकर खड़ी हो गयी…
कुछ देर बाद ही हवेली के अंदर राजा अजातशत्रु के साथ प्रेम निरमा और समर दाखिल हो गए…
उन लोगों के साथ मीठी और शौर्य भी थे…
बाँसुरी अब भी ऊपर थी..
वो खुद तैयार होने के बाद कली को तैयार कर रहीं थी…
लाल रंग की छोटी सी नेट की झालर वाली फ्रॉक में कली बहुत प्यारी लग रहीं थी…
बाँसुरी ने सारिका को आज अपने हाथों से सजाया था..
सारिका पहली बार शरम से संकुचित हो बाहर नहीं निकल पा रहीं थी..
वो भी कली के पास बैठी उससे बातें कर रही थी…
उसी समय बाँसुरी के दरवाज़े पर दस्तक हुई…
सारिका और बाँसुरी ने एक दूजे को देखा और बाँसुरी मुस्कुरा कर दरवाज़ा खोलने चली गयी…
दरवाज़ा खोलते ही बाँसुरी थम कर रह गयी…
सामने निरमा खड़ी थी…
निरमा पर नज़र पड़ते ही बाँसुरी की आंखें बहने लगी…
उसे मालूम नहीं था की वासुकी ने महल वालों को भी बुला रखा है…
निरमा बाँसुरी के गले से लग गयी…
दोनों सखियाँ जाने कब तक एक दूसरे के गले से लगी बिसूरति रहीं…..
निरमा बाँसुरी से अलग हुई और सामने बिस्तर पर खेलती कली को देख उसके पास पहुँच गयी…
“अच्छा तो ये है वो जिसने मेरी सखी को मुझसे छीन लिया !”
निरमा ने उस गोलगुथनी को अपनी गोद में उठा लिया और उसके गालों को प्यार से चूम लिया….
“नाम क्या है इस गोला शोना का !”
“नामकरण करवाया तो था लेकिन अब भी सब इसे अपने अपने नाम से ही बुलाते हैं… मैं कली बुलाती हूँ.. !”
“है भी तो ओस की कली सी… !”
बाँसुरी ने निरमा की तरफ देखा, उसकी आँखों का सवाल निरमा ने बिना पूछे ही पढ़ लिया…
“हाँ आया है… तुम्हारा शौर्य भी अपने पिता के साथ आया है !”
बाँसुरी ने पल भर को आंखें मूंद ली… कैसा दिखने लगा होगा उसका शौर्य.. ? उसका बेटा, उसका राजकुमार !
हालाँकि साहब उसकी तस्वीरें उसके वीडियो सब समय समय पर उसे भेजा करते थे लेकिन पूरे दो साल बाद उसे सामने से देखना था…
उसका बेटा, उसका अपना हिस्सा, उसका अंश… जाने अनजाने ही शौर्य भी तो उस सजा को भोग रहा था, जिसे उसने अपने और साहब के लिए तय किया था…
लेकिन उसे अपनी परवरिश अपने ख़ून पर पूरा भरोसा था.. वो भागती सी नीचे पहुँच गयी…
शौर्य अपने पिता की ऊँगली पकडे खड़ा अपनी बड़ी बड़ी आँखों से सब तरफ देख रहा था…
शौर्य बिल्कुल अपने पिता की प्रतिछाया ही था.. वहीं तीखी सी नाक, बड़ी बड़ी घुमावदार पलकें और चौड़ा माथा !!
इतना सुंदर की देखने वाला कुछ पलों को उसे देखते हुए पलक झपकना भूल जाये …
लेकिन जहाँ राजा के चेहरे में सौम्यता थी, शौर्य के चेहरे पर एक दर्प था…
बस यही छोटा सा अंतर था, बाकी तो शौर्य के बड़ा होने पर लोग आराम से दोनों बाप बेटे को जुड़वाँ भाइयों की संज्ञा दे सकते थे !
इधर उधर ताकते शौर्य की नज़र एक तरफ जाकर अटक गयी…
उसी समय सीढ़ियों पर से उसे अपनी माँ दिखाई दी…
वहीं माँ जिनकी तस्वीर उसके महल में सजी थी..
पीली साड़ी में एक पैर पर दूसरा पैर रखे, चमड़े की ऊँची सी कुर्सी पर दोनों हाथों पर अपना हाथ रखे बैठी उसकी माँ यूँ लगता था अभी बोल पड़ेगी… !
उस तस्वीर के सामने वो इन दो सालों में जाने कितनी बार खड़ा रह जाता था..
रानी माँ उससे कहती थी उसकी मॉम कहीं दूर चली गयी है.. !
लेकिन उसके डैड हमेशा कहते थे एक दिन तुम्हारी मॉम वापस आएंगी..!
अपूर्व मामू हमेशा कहा करते थे की उसकी माँ भगवान के पास चली गयी है.. इतना दूर जहाँ से कोई नहीं लौट सकता..!
लेकिन आज सबकी बातों से अलग उसकी माँ उसके सामने खड़ी थी.. !
कुछ देर को वो अपनी माँ को देखता रह गया.. और पलक झपकते उसकी माँ उसके पास पहुँच गयी और उसे अपनी बाँहों में भर लिया…
बाँसुरी की आँखों से आंसूओं की अविरल धारा बह निकली…
एक माँ और बेटे का मिलन ही ऐसा था कि, वहाँ मौजूद हर किसी की ऑंख भीग गयी..
शौर्य भी अपनी माँ से चिपक कर रो पड़ा…
राजा अपलक अपने दो प्रियजनों को देख रहा था जिनमे उसके प्राण बसते थे…
वो उन दोनों के बिना जी नहीं सकता था..
बाँसुरी ने उसे शौर्य से उसकी सच्चाई बताने मना ही किया था, उसे लगा था सच्चाई जानने के बाद शौर्य अपनी माँ के बिना नहीं रह पायेगा… |
कुछ हद तक ये सही भी था, इसलिए उसे अपने तरीके से राजा ने बहला रखा था !
लेकिन आज सब कुछ व्यर्थ हो गया था…. | क्या आज अपनी माँ से मिलने के बाद ये बच्चा वापस उसके बिना रहने को सम्भल पायेगा… |
लेकिन अभी देवकी और कान्हा के इस सुंदर मिलन पर्व पर और कुछ सोचने का राजा का मन नहीं कर रहा था..
उसने आगे बढ़ कर अपनी जान के टुकड़ों को अपने अंक में समेट लिया…
समर और प्रेम ने धीरे से अपनी आँखों की कोर पोंछ ली….
कुछ देर बाद बाँसुरी ने धीरे से शौर्य को खुद से दूर किया और उसे ऑंखें भर कर देखने लगी…
“कितना बड़ा हो गया है मेरा लड्डू !”
“बट आई हेट लड्डू मॉम !”
उसकी बात सुन बाँसुरी मुस्कुरा उठी, उसी वक्त निरमा कली को गोद में लिए नीचे चली आई…
“शौर्य इससे मिलो…. ये कली है, तुम्हारी दोस्त !”
बाँसुरी ने शौर्य से कली का परिचय करवाया और कली को गोद में ले लिया, ये बात शौर्य को नागवार गुज़र गयी..
शौर्य ने कली को देखा और मुँह बना लिया…
“मुझे ये दोस्त नहीं चाहिए !”
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“फिर कौन चाहिए ?” उसके समर चाचू उसके पास चले आये…
“ओनली मॉम… मुझे मॉम चाहिए… प्लीज़ डैड !”
शौर्य ने मासूमियत से अपने पिता की तरफ देखा और उन्होने धीरे से उसके बालों में हाथ फेरते हुए बाँसुरी की तरफ देख लिया ..
जैसे उससे पूछ रहें हो की बोलों अब इसका क्या जवाब दूँ ?
बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ लेकर एक तरफ बढ़ गयी…
एक कुर्सी पर बैठ कर उसने अपने बाजू में शौर्य को बैठाया और गोद में कली को बैठा लिया…
राजा भी आकर उसके पास बैठ गया..
पंडित जी ने मुहूर्त की पुकार लगायी और दूल्हा दुल्हन गठबंधन के लिए चले आये…
एक एक कर सारी रस्में निपटती चली गयीं……
आसपास बैठे राजा और बाँसुरी उन रस्मो को देखते हुए अपनी शादी की यादों में खोये जा रहें थे.. वहीँ हाल निरमा और प्रेम का था…
सब मुस्कुराते हुए दर्श और सारिका को रस्में निभाते हुए देख रहें थे…
एक एक कर रस्में निपटी और दर्श ने सारिका की मांग में सिंदूर भर दिया…
इस मौके के लिए वासुकी ने पहले ही सारिका की माँ को बुला लिया था…सारिका की माँ तो आ गयी थी लेकिन एनजीओ की संचालक व्यस्तता के कारण एक दिन पहले सारिका की माँ के साथ नहीं आ पायी थी…
अपनी बेटी का घर बसता देख उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.. रह रह कर उनकी भी पलकें भीगी जा रहीं थी..
सारी रस्में लगभग समाप्त होने को थी कि बाहर किसी के आने की आहट सी हुई, आगंतुक महिला को देख सारिका की माँ बड़े आदर से उनके पास चली गयी और उनका हाथ पकड़ कर उन्हें अपने साथ बाकी लोगों के पास ले आयी…
उसके आते ही वहाँ बैठे समर प्रेम राजा के साथ ही बाँसुरी भी चौंक गयी…
चंदन के रंग के खादी के कुर्ते के साथ जींस पहने आँखों पर धूप का चश्मा लगाए सामने केसर खड़ी थी….
एक हाथ में मर्दानी घड़ी और दूसरे में मौली बांधे अपने कंधे पर टंगे गाँधी झोले से वो अपना फ़ोन निकाल रही थी कि उसकी नज़र सामने बैठे महलवासियों पर पड़ी और वो ठिठक कर रह गयी…
एक बार बहुत पहले जब बाँसुरी के पिता की तबियत अचानक ख़राब हुई थी तब ब्लड बैंक में केसर से आमना सामना हुआ था उसके बाद उसके बारे में राजा ने पता करवाने की बहुत कोशिश करी लेकिन उसका कुछ पता नहीं चल पाया था… !
राजा को लगा था कि शायद आदित्य ये जानता है की केसर कहाँ है..?
बीच में आदित्य से मिलने के बाद एकाएक केसर जाने कहाँ गायब हो गयी थी… ?
आदित्य ने भी उसे ढूंढने की भरसक कोशिश की लेकिन वो कहीं नहीं मिली…
और फिर आदित्य भी चुपचाप बैठ गया था…
कहीं न कहीं आदित्य भी ये चाहने लगा था कि केसर अब अपना प्रयश्चित भूल कर घर वापस आ जाये…
लेकिन जाने क्यों केसर महल से दूर भागने के चक्कर में आदित्य से भी दूर चली गयी थी…
आज उस एनजीओ की संचालिका के तौर पर केसर को अपने सामने देख कर सभी हतप्रभ रह गए थे..
“केसर तुम ?” समर ने ही सबसे पहले सवाल कर दिया
“हाँ…. बहुत समय से इस एनजीओ से जुड़ गयी हूँ.. ! अब तो लगता है ये एनजीओ मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बल्कि ज़िंदगी ही हो गया है !”
समर ने वासुकी की तरफ देखा…
उसे ये मालूम था कि सारिका को उस एनजीओ से वासुकी ने रानी साहब के लिए बुलाया था ! उसी वक्त सारिका कौन है ? कहाँ काम कर चुकी है ? कहाँ रहती थी आदि सवालों के जवाब में वासुकी ने सारिका की थोड़ी बहुत आपबीती बताने के साथ ही उसका एनजीओ में काम बताया था…
तो क्या वासुकी केसर को जानता था ?
लेकिन कैसे ? वासुकी और केसर एक दूजे को कब कैसे मिले ? इनमें परिचय कैसे हुआ.. ?
समर के मन को ये सवाल मथने लगे और उसने केसर से सवाल कर लिया…
उसके सवाल सुन कर केसर मुस्कुरा उठी…
“जानती थी, बाकी लोग एक बार फिर भी थोड़ी तसल्ली रख लेंगे लेकिन समर नाम के प्राणी को धैर्य कहाँ ? इस संसार में ऐसी कोई बात हो सकती है जो समर को ना मालूम हो भला ? और अगर ऐसी कोई बात होगी भी तो समर उसे जाने बिना रहेगा नहीं…
क्यों समर ?”
समर मुस्कुरा उठा…. उसने वासुकी की तरफ देखा…
वासुकी किसी से फ़ोन में बात करता हुआ हॉल से बाहर की तरफ निकल गया था….
क्रमशः
aparna….
जानती हूँ आज का भाग छोटा हो गया, पर कुछ नहीं से कुछ भला सोच कर पोस्ट कर दिया…
आप सबको आदित्य और केसर के बारे में भी तो जानना था ना…
वासुकी केसर से कैसे मिला ये जानना भी रोचक रहेगा… बने रहिये अगले भाग के साथ…
क्योंकि राज़ तो अब खुलने शुरू हुए हैं…
aparna….
