जीवनसाथी -2/90

जीवनसाथी -2 भाग -90

वासुकी ने मुस्कुरा कर दर्श की बात पर हामी भर दी…
बात करते हुए वो लोग बाहर चले आये थे |  वासुकी का आदमी सुनील की बॉडी बाहर लेकर आ रहा था की छत पर खड़ी बाँसुरी पर नज़र पड़ने से वासुकी ने उन लोगों को टोका और दूसरी तरफ से उन्हें ले जाने को बोल कर बाहर निकल आया…

अब उसे जल्द से जल्द दर्श और सारिका की शादी निपटा कर अपना यहाँ का आखिरी काम पूरा करना था…

  लेकिन सिर्फ दर्श की मंजूरी से कुछ होना जाना नहीं था, सारिका की मंजूरी भी चाहिए थी !
कुछ सोच कर वासुकी अंदर चला गया..
बाँसुरी कली के साथ ऊपर थी, वासुकी ने अंदर आने के बाद काका को आवाज़ लगायी, और वासुकी की आवाज़ सुन सारिका चली आई..

“आपको कुछ चाहिए था भैया ?”.

वासुकी ने कभी किसी बात के लिए किसी को भी ऑर्डर नहीं दिया था.. खाने नाश्ते के वक्त खुद आकर टेबल पर बैठ जाता था और सारिका परोस देती थी, यहाँ तक की आज तक काका या सारिका को ये भी नहीं मालूम था की उसे खाने में सबसे ज्यादा क्या पसंद था !

उसके चाय कॉफ़ी के वक्त उसे चाय दे दी जाती… खाने पीनेे में वासुकी का ये हाल था की अगर उसे बिना चीनी की चाय और बिना नमक के पकौड़े भी दे दिये जायें तो वो बिना शिकायत के खा पी लेता..!
फिर आज उसका डायनिंग पर बैठ कर काका को आवाज़ देना सारिका के मन को गुदगुदा गया..
हो सकता है भैया अपने पसंद की कोई चीज़ बनवा कर खाना चाहते हो.. ?
वैसे भी काका और उसके बीच एक अदृश्य सी प्रतियोगिता हमेशा चलती रहती थी कि कौन ज्यादा स्वाद खाना बनाता है…. ?

“एक कप चाय पिला सकती हो ?”

वासुकी के मुहँ से ये सुन कर झूमती हुई सारिका रसोई में चली गयी.. !
सारिका जब से दर्श और वासुकी के साथ रह रही थी, उसकी ज़िन्दगी लगभग सामान्य हो चली थी…|
कॉलेज के समय पर उस पर हुआ अत्याचार वो लगभग भूल चुकी थी,  ये दोनों ही लोग ना उस पर कभी तरस खाते थे ना उसे नीचा दिखाते थे, उसके साथ इन दोनों का व्यवहार बिल्कुल सामान्य सा था और शायद किसी भी रेप विक्टिम को यही समान्य व्यवहार चाहिए होता है, खुद सामान्य होकर सब भूलने के लिए…|

हाय रे बेचारी ! अब इसका क्या होगा ? कौन इससे शादी करेगा जैसे जुमले सुनने वाली की अंतरात्मा तक छलनी कर जाते हैं लेकिन यहाँ ऐसा कुछ नहीं था.. दर्श तो बराबरी से उसे डांट भी दिया करता था, सारिका भी उससे पलट कर बराबरी से लड़ लेती थी…..|

और धीरे धीरे ही सही वो उस हादसे को भूलने लगी थी..|

सारिका चाय लेकर आई और वासुकी के सामने रख दिया.. चाय के साथ ही कोकोनट कुकीज़ भी थी..|

” ये सही है.. मैंने सिर्फ चाय मांगी और तुम कुकीज़ भी लें आयी ?”

“तो क्या हुआ भैया,  आप वैसे भी बहुत नपा तुला खाते हैं, कभी कभी एक्स्ट्रा भी खा लेना चाहिए !”

“हम्म… अच्छा सारिका,  मैं सोच रहा हूँ, बल्कि मैं क्या दर्श सोच रहा है की…

” आज रात डिनर में रेड थाई करी खाने की… ? है ना ?”

सारिका का उतावलापन वासुकी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान ले आया.. और उसने ना में गर्दन हिला दी..

“दर्श शादी करने की सोच रहा है, और आज इसी सिलसिले में कुछ मेहमानो को बुलाया भी है !”

सारिका के चेहरे का रंग बदलने लगा…
हालाँकि उसने कभी नहीं सोचा था की दर्श के साथ उसकी शादी हो जाये, लेकिन उसे अपनी यही ज़िंदगी बड़ी प्यारी लगने लगी थी..
ना किसी से कोई उम्मीद उसने रखी थी ना घर भर में किसी ने उससे उम्मीद रखी थी.. !
बस सुबह से शाम तक अपना काम निपटाना, रानी साहेब के साथ वक्त गुज़ारना और छोटी सी कली को ख़ूब प्यार करते हुए उसके साथ खेलना.. !

ज़िन्दगी परफेक्ट तो नहीं थी, लेकिन अच्छी चल रही थी, उसे लगा नहीं था की उसकी ज़िंदगी की गाड़ी में स्पीड ब्रेकर भी आ सकता है.. !
उसने नहीं सोचा लेकिन बात में दम तो था..
आखिर दर्श की शादी वाली उम्र हो चुकी थी, बिना शादी किये वो क्यों बैठेगा भला ?
तो क्या हुआ ना करे शादी ? क्या शादी ही सबकुछ है ?

अपने विचारों में उलझी सारिका को गहरी नज़र से घूरते वासुकी ने धीमे से कह दिया..

‘”नहीं शादी सबकुछ नहीं है ! दर्श तो करना भी नहीं चाहता !”

“फिर.. ? जब वो नहीं करना चाहते तो आप क्यों पीछे पड़े हैं ?”

“दोस्त है मेरा, मैं चिंता नहीं करूँगा तो कौन करेगा ?”

“चिंता किस बात की ? बड़े मजे में तो हैं ?”

“ना मुझे तो नहीं लगता,  आजकल कुछ परेशान सा रहने लगा है, इसलिए उसे देख मुझे लगा शायद अब वो भी अपना परिवार चाहता है.. !
जब जब कली को खिलाते हुए उसे देखता हूँ, तब तब लगता है कि शायद कहीं न कहीं वो उसमें अपनी बेटी को देखता है, और उस वक्त लगता है कि क्या वो भी अपनी खुद को बेटी की चाह नहीं रखता होगा ?
और रखता भी होगा तो उसमें क्या बुराई है ? अपनी बीवी अपना बच्चा, अपना परिवार, हर इंसान को सुकून ही देता है.. है ना ! हर समय इस तरह भटक तो नहीं सकता ना ?”

“कहाँ भटके हैं, मुझे तो नहीं लगा की कभी भी अपनी राह से भटके होंगे.. !”

“ये सब तुम्हें मुझे कैसे मालूम चलेगा, खैर ये सब छोड़ो.. मैं बस ये कहने आया था की आज शाम मेहमान आने वाले हैं, अच्छे से खाने पीने की तैयारी कर लेना, लगभग चार पांच लोग रहेंगे.. हो सकता है सब जम गया तो तुरंत ही सगाई कर के चले जायें और फिर दस पंद्रह दिन में शादी भी निपटा जायें.. !”

“दस दिन में शादी ?”

“हाँ.. कर लोगी ना सारी तैयारी… अगर दिक्कत हो तो बताना,  वैसे तुम्हें बस सब मैनेज करना है.. घर पर काम करने वालों की कमी तो है नहीं !”

सारिका ने सूखे मुहँ से वासुकी की तरफ देखा..

” क्या दर्श जी तैयार है शादी के लिए  ?”

“वो क्यों तैयार नहीं होगा भला ? “

“नहीं हमारा मतलब, आपने उनसे बात तो कर ली है ना ?”
.”वहीं तो जानना चाहता हूँ, उससे क्यों पूछूं… वो तो वैसे भी भरा बैठा है… !”

“मतलब आप बिना उनसे पूछे ही उनकी शादी तय किये दे रहें !”

“मैं जानता हूँ वो मुझे कभी मना नहीं करेगा और हाँ तुम्हें भी तो यहाँ रहते बहुत वक्त बीत गया है.. तुम भी कब तक हमारे साथ यहाँ खटती रहोगी ? तुम्हारी माँ भी तो तुम्हें याद करती रहती हैं, आखिर उनके लिए भी तुम्हारा कोई फ़र्ज़ है की नहीं..?
मै तो बिल्कुल स्वार्थी होकर तुम्हारी तरफ से आंखें मूंद बैठा था, लेकिन दर्श ने ही इस बात पर ध्यान दिलाया की अब तुम्हें भी वापस भेज देना चाहिए !”

“वापस भेज देना चाहिए ? लेकिन फिर रानी साहब की सेवा कौन करेगा ?”

“सारिका… तुम्हें बहन माना है मैंने.. कभी भी तुम्हें सिर्फ सेवा के लिए नहीं बुलाया था..!
बल्कि रानी साहेब को कम्पनी देने बुलाया था, अब तो ऐसा है की तुम्हारी रानी साहेब पूरा वक्त कली में ही डूबी रहती हैं..

“इसका मतलब ये तो नहीं है की उन्हें हमारी ज़रूरत नहीं रह गयी ?”

“देखो सारिका, ज़रूरते कभी किसी की ख़त्म नहीं होती लेकिन हर इंसान का अपना व्यक्तिगत जीवन और ज़िम्मेदारियाँ भी होती है.. |
और मैं तुम्हें तुम्हारी ज़िम्मेदारियों से अलग नहीं कर सकता ! “

“लेकिन मैं यहाँ से नहीं जाना चाहती भैया !”

“क्यों ? और अब तो दर्श की पत्नी भी आ जायेगी, तो वो तुम्हारी जगह ले ही लेगी, इसलिए हम सब की चिंता मत करो !”

वासुकी मन ही मन मुस्कुराता भी जा रहा था, उसी समय दर्श भी वहाँ चला आया..

“सारिका एक कप चाय देना !”

“खुद बना लीजिये, हमारे सर में दर्द है !”

दर्श को टका सा जवाब देकर वो वहाँ से चली गयी…

दर्श ने वासुकी को देखा.. -” इसे क्या हुआ ? सुबह तक तो ठीक थी !”

“पता नहीं.. मुझसे भी ऐसा ही कुछ बोल गयी !”

दर्श ने वासुकी के सामने रखा खाली कप देखा और उठ कर रसोई में चला गया..
रसोई से दो कप चाय लिए वो बाहर चला आया..
वासुकी उसे ही देख रहा था |
दर्श सारिका के कमरे की तरफ बढ़ गया..

“सर दुःख रहा है बोल कर गयी है, इसलिए सोचा उसे भी चाय दे दूँ !”

वासुकी ने हाँ में गर्दन हिला दी…

दर्श के वहाँ से जाते ही बाँसुरी नीचे उतर आयी, उसकी गोद में कली थी..
कली अब चलने और बोलने लग गयी थी..

“मिस्टर वासुकी कली की वैक्सीन कल ही लगी है, और ये उसकी फाइल है ! आपने सारिका से कह कर मंगवाई थी ना.. वैसे ये क्यों चाहिए थी आपको ?”

बाँसुरी को देख वासुकी अपनी जगह पर खड़ा हो गया..

“बस ऐसे ही मैडम.. देखना था क्या और कितना बाकी है ?”

“हम्म कली दो साल की हो गयी है… अब इसका अगला बूस्टर पांचवे साल में लगेगा, तब तक इस फाइल को संभाल कर रखना होगा ! इसे आप रखेंगे या मैं रख लूँ ?”

“मैं रखूँगा मैडम ! चिंता ना करें, गुमने नहीं दूंगा !”

“इसमें चिंता की क्या बात ?आप कली के पिता है आखिर ?”

कली अपनी तोतली सी बोली में बहुत कुछ बोलने लगी थी…
बाँसुरी को वो मासी माँ बुलाती थी और वासुकी को डैडा..
दर्श को चाचू और सारिका को सरु…
काका को वो बाबा बुलाया करती थी..
पूरे घर को उस मनमोहिनी ने मोह लिया था, उस पर बाँसुरी की खुशबू में रची बसी कली कभी कभी उसी के जैसी लगने भी लगती थी…

पैरों में बंधी पायल खनकाती वो पूरे घर में भागती फिरती थी…
बाँसुरी के अलावा किसी के हाथ की नहीं थी वो शैतान की नानी..
रोज़ बाँसुरी के ही हाथ से खाना और सोते समय अपनी प्यारी लोरी सुनना उसे बेहद पसंद था… !
उस लोरी के साथ साथ और भी कुछ था जो वो अपनी मासी माँ से रोज़ सुना करती थी और वो थी राजा अजातशत्रु की वीरता शौर्य और पराक्रम की अद्भुत कहानियाँ…
उनके भलमनसाहत के किस्से, उनके अपरूप सौंदर्य और बाहुबल का आँखों देखा वर्णन और उनकी अपूर्व बुद्धिमत्ता की कभी ना खत्म होने वाली दास्ताँ….

और रोज़ रोज़ यहीं किस्से सुनते सुनते उस छोटी सी बच्ची के दिमाग में ये कहानियां पत्थर की अमिट लकीर सी बैठ गयी…

बाँसुरी से फाइल लेकर वासुकी ने अपने पास रख ली.. बाँसुरी को अचानक इस तरह से उसका फाइल लेना समझ में नहीं आया..
फिर उसे लगा की वासुकी वैसे भी उसके साथ बहुत औपचारिक रहा करता था.. उसे हमेशा यही लगता था की वो बाँसुरी को किसी तरीके से कष्ट ना होने दे.. |
कई बार तो हफ़्तों वो बाँसुरी के सामने भी नहीं आता था.. दोनों की बातचीत सिर्फ कली को लेकर होती थी !
वैसा ही कुछ सोच कर बाँसुरी ऊपर चली गयी..|

इधर दर्श चाय के कप लिए सारिका के कमरे में चला गया.. सारिका अपना सामान सूटकेस में डालती जा रही थी..

“अरे ये क्या कर रही हो ?”

“सामान बांध रहीं हूँ !”

“लेकिन क्यों ?”

“क्यों मतलब ? कब तक यहाँ पड़ी पड़ी मुफ्त की रोटियां तोडूंगी ? और फिर मेरी माँ भी तो मेरी ज़िम्मेदारी है.. उन्हें भी देखना मेरा काम है !”

“माँ को यहीं बुला लो !”

“और कहाँ रखूं ?”

“रखने के लिए कमी है क्या ? इतना बड़ा घर है, चाहें जहाँ रह लेंगी !”

“मेरे लिए तो जगह है नहीं, उन्हें और बुला लूँ !”

सारिका धीमे से गुनगुना गयी….

“कुछ कहा तुमने ?”

“नहीं… और ये समझ आ गया है की बिना कहे किसी को कुछ समझ नहीं आता !”

“किसी बात पर नाराज़ हो क्या ?”

सारिका ने घूर कर दर्श को देखा और वापस सामान जमाने लगी..

“ये लो तुम्हारे लिए चाय लाया हूँ.. पी लो !”

“नहीं पीनी… अब उसे ही पिलाइयेगा जिससे शादी करने वाले हैं ?”

“तुमसे किसने कहा की मैं शादी करने जा रहा हूँ !”

“आप नहीं कहेंगे तो पता नहीं चलेगा क्या ? मुझे बेवकूफ समझ रखा है ? “

“अरे तुम्हें बेवकूफ क्या समझूँ… तुम हो !”

बोल कर दर्श हॅंस पड़ा और सारिका उसे घूर कर देखने लगी..

“हाँ हाँ आपको तो हंसी ही आएगी… अब जो आने वाली है उसी से अपने लिए इटालियन और स्पेनिश खाना बनवा लीजिएगा मेरा सिर खाने की अब आपको जरूरत नहीं है..!”

” अब मेरी बीवी को तो मेरी चॉइस का खाना बनाना ही पड़ेगा!”

” ऐसा कोई जरूरी नहीं है मिस्टर दर्श, क्योंकि आजकल की लड़कियां इन मान्यताओं के खिलाफ हैं !
पति की सेवा करना, उनकी पसंद का खाना बनाना इन सब बातों को भूल जाइए..!”

” लेकिन ऐसी एक लड़की को तो जानता हूं जो आज के जमाने की है लेकिन पुरानी मान्यताओं को मानती है!”

” अच्छा तो लव मैरिज करने जा रहे हैं आप ?
बड़ी अनोखी बात है, आज तक इतनी बार आपने हमारे काम के लिए हमें लताड़ लगाई है, भर भर के कोसा है.. डांटा है, लेकिन कभी यह नहीं बताया कि आपका किसी लड़की के साथ अफेयर चल रहा है..!”

” तुम्हें क्या बताऊं, तुम कोई मेरी दोस्त हो..?”

” सही कहा आपकी दोस्त नहीं हैं…
वासुकी भैया नहीं मानते तो क्या हुआ लेकिन आपने कहीं ना कहीं हमें नौकरानी ही माना है..!”

दर्श मुस्कुराते हुए सारिका के पास चला आया और उसकी दोनों बांहों को पकड़कर उसे अपनी तरफ घुमा लिया, उसका चेहरा अपनी दोनों हथेलियों में लेकर वह उसकी आंखों में देखने लगा…

“मुझसे शादी करोगी ? झेल लोगी मुझे,  एक सारा सारा दिन लैपटॉप में डूबा रहने वाला लड़का, इटैलियन खाना खाने वाला लड़का, दो दिन में एक बार नहाने वाला लड़का,और तुमसे पूरे सात साल बड़ा लड़का चलेगा तुम्हें.. ?”

सारिका ने धीरे से अपनी पलकें उठायीं… आंसुओं से भीगी उसकी पलकें कहना तो बहुत कुछ चाह रहीं थी लेकिन आंसुओं का गोला सा गले में अटक गया था… !

उसने बस धीरे से हाँ में गर्दन हिला दी..
और दर्श ने उसे खींच कर अपने सीने से लगा लिया…

“लेकिन दर्श जी… आप मुझसे शादी कैसे… मतलब आप सब जानते.. !

अटक अटक कर अपनी बात कहती सारिका के होंठो पर दर्श ने ऊँगली रख दी…

“बस अब और कुछ नहीं कहना है ! “

******

वासुकी फ़ोन पर किसी को इंतज़ाम के लिए कुछ कह रहा था.. और तभी बाँसुरी वहाँ चली आई..
घर में शादी की तैयारियां चल रहीं थी…
एक सारिका को छोड़ कर बाकी सब व्यस्त थे.. सारिका कली के साथ ऊपर कमरे में थी..

बाँसुरी ने वासुकी को आवाज़ लगा दी..

“मिस्टर वासुकी… सुनिए !”

“कहिये मैडम !”

वासुकी सर झुका कर खड़ा हो गया…

“इस बार असली पंडित लाइयेगा… पिछली बार जैसा ना हो जायें क्योंकि शादी ब्याह के मन्त्र मुझे भी नहीं आते !”

वासुकी ने धीरे से हाँ में गर्दन हिला दी…

बाँसुरी मुस्कुरा कर ऊपर सारिका को तैयार करने चली गयी और वासुकी समर को फ़ोन लगाने चला गया…

उसने इन दो सालों में जो सोच रखा था उसे पूरा करने का सही वक्त आ गया था…

क्रमशः

aparna…

दिल से…

आज लिखना बहुत कुछ था, लेकिन पार्ट ज़रा छोटा हो गया.. कोशिश है की Valentine’s Day पर आपको एक स्पेशल राजा बाँसुरी पार्ट दे पाऊँ…
   कोशिश रहेगी कल ही कहानी का अगला भाग दे दूँ..

तब तक पढ़ते रहिये, हँसते रहिये, खुश रहिये..

aparna….

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