
जीवनसाथी -2 भाग -85
नेहा के बारे में सुनकर जहां प्रेम और राजा खुश नजर आ रहे थे वही बांसुरी के मन में एक अजीब सी उलझन घर करती जा रही थी..
वह सभी लोग खाने के लिए एक साथ बैठे थे, लेकिन जाने क्यों बांसुरी से अब कुछ खाया नहीं जा रहा था….
उसने एक नजर राजा पर डाली, राजा बहुत प्रसन्न नजर आ रहा था.. वह प्रेम से बातों में लगा हुआ था… !
दर्श को भी राजा ने खाने के लिए अपने साथ ही टेबल पर बैठा लिया था ! राजा तो शुरु से ही दरिया दिल था उसने कभी ये बात सोची ही नहीं कि उसके सामने या उसकी बराबरी में कोई और बैठ नहीं सकता ! उसकी नजरों में हर एक इंसान उसके बराबर था… |
सुनील ने देखा कि राजा और प्रेम अपने आप में व्यस्त हैं, वह अपनी जगह से खड़ा हो गया | उसके खड़े होते ही दर्श और प्रेम दोनों की नजर एक साथ सुनील पर पड़ गई ! सुनील ने अपनी एक उंगली उठाकर बाथरूम की तरफ जाने का इशारा कर दिया | दर्श उसके साथ खड़ा होकर उसे वॉशरूम की तरफ लेकर आगे बढ़ गया..|
उसी हॉल में एक तरफ एक गलियारा बना था, उस गलियारे के दरवाजे से बाहर निकलने पर एक वॉशरूम था, जहां सुनील को अंदर भेजकर दर्श बाहर ही खड़ा रह गया !
वाशरूम के अंदर पहुंचते ही सुनील ने एक गहरी सी आजादी की सांस भरी, और तेजी से नजर दौड़ाते हुए उस वॉशरूम से बाहर निकलने का कोई रास्ता ढूंढने लगा | उसे समझ आ गया था कि इस सनकी राजा और सेनापति की जोड़ी के बीच उसका टिके रहना मुश्किल है| उसे लगने लग गया था कि, किसी तरीके से उसे अगर जिंदा रहना है तो यहां से भागना ही होगा | क्योंकि यह लोग अगर उसे जान से नहीं भी मारेंगे तो इस लायक तो नहीं ही छोड़ेंगे कि वह आगे कोई और काम कर सके…
इधर-उधर देखते रहने के बाद उसे एक खिड़की नजर आई, लेकिन खिड़की के पीछे लोहे का भारी सा जंगला था | लेकिन उस खिड़की के ठीक ऊपर एक छोटा सा एग्जॉस्ट फैन लगा था…
सुनील का दिमाग तेजी से काम कर रहा था, उसने वहीं पड़े टूलकिट में से एक छोटी सी चिमटी निकाल ली और एग्जॉस्ट फैन का स्क्रू खोलने लगा..
इस वक्त उसका दिमाग जितनी तेजी से काम कर रहा था, उससे तेजी से उसकी उंगलियां काम कर रहीं थी… उसने फटाफट उस एग्जॉस्ट के चारों ओर लगे स्क्रू खोल दिए और उसने एग्जॉस्ट उतार कर नीचे रख दिया..
उस फैन के ठीक पीछे दीवार पर एक बड़ा सा होल था, जिससे सुनील बड़ी आसानी से बाहर निकल सकता था ! उसने वहाँ से बाहर झांक कर देखा, उसे खुला आसमान साफ नजर आ रहा था ! अपने आप को जरा और ठेल कर वह उस खिड़की से बाहर निकल गया..
उस रोशनदान से बाहर बगीचे में कूदकर उसने गहरी सी सांस भरी और आंखें बंद कर अपने आप को समझाने लगा कि वह आजाद हो गया है…
उसने मुस्कुराकर जैसे ही आंखे खोली ठीक सामने प्रेम को खड़ा पाया..
” बहुत-बहुत बधाई हो !! आप बिना दरवाजे के ही हवेली से बाहर निकल आए..!”
सुनील के चेहरे पर लाचारी के भाव चले आए वह एकदम से प्रेम के पैरों पर गिर गया..
” प्लीज मुझे माफ कर दो ! मुझे जाने दो, मैं कान पकड़ता हूं ! आज के बाद तुम्हारे राजा साहब की तरफ भूल कर भी नहीं देखूंगा | और मैं क्या मेरी सात पुश्तें राजा अजातशत्रु के परिवार की तरफ देखने से पहले सौ बार सोचेंगी ! बस मेरी जान बख्श दो !”
” यह सब तो राजा साहब के खिलाफ खड़े होने से पहले सोचना चाहिए था ! क्या तुम्हें राजा अजातशत्रु के बारे में पता नहीं था..?”
” अगर पता होता तो मैं इतना बड़ा कदम ही क्यों उठाता..?”
” लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता..!”
प्रेम की गहरी सी आवाज सुनकर सुनील ने उसके पैरों को कस कर पकड़ लिया | अगर ऐसा ही है तो, एक बार में मुझे गोली मार दो, कम से कम अपनी मौत के डर से तो बाहर निकलूंगा | एक बार में मर जाऊंगा, तो सारा काम तमाम |
जब तक तुम लोगों के बीच बैठा रहूंगा, मेरा दिल बस धक धक करता रहेगा कि कब यह सनकी राजा मुझे गोली मार देगा..|”
” हुकुम की इजाजत के बिना मेरी गन से गोली भी नहीं निकलती..!”
प्रेम ने नीचे झुक कर सुनील की गर्दन पकड़ी और उसे खींचकर ऊपर उठा लिया.. अपनी गर्दन नीचे झुकाए लाचारगी से थके हुए कदमों से सुनील प्रेम के साथ एक बार फिर हवेली की तरफ बढ़ गया…
****
अस्पताल में जैसे रौनक चली आई थी !
रानी बांसुरी अब भी बेहोश पड़ी थी, लेकिन उनकी बेटी उस पूरे अस्पताल परिसर में रोशनी बनकर चमक रही थी..
आनन-फानन में रूपा ने पंडित जी को भी बुला लिया महल के नियमों के अनुसार पंडित जी के हाथों तुरंत के पैदा हुए बच्चे के माथे पर स्वर्ण की कलम से पंडित जी कोई शुभ अक्षर लिखा करते थे…
हालांकि बच्चे के पैदा होने के बाद 6 दिन बाद शुद्धि मानी जाती थी ! बावजूद पंडित जी इस एक काम को करने के लिए हमेशा महल में स्वयं प्रस्तुत हुआ करते थे ! महल के सभी बच्चों के माथे पर पंडित जी ने अपनी सोने की कलम से माथे पर शुभ अक्षर लिखा था…
बच्चे को गोद में लिए रूपा पंडित जी का ही इंतजार कर रही थी | सारे लोग मोहित हो कर बच्चे को देख रहे थे, और उसे अलग-अलग प्यारे नामों से पुकार रहे थे… लेकिन इन सब से दूर खड़ा वासुकी बस एकटक अपनी बच्ची को देख रहा था…
पंडित जी आए और अपने मंत्रोच्चारण के बीच उन्होंने अपने कंधे पर टंगे झोले में से एक छोटी सी डिबिया निकाली, जिसके अंदर से उन्होंने खालिस सोने की पतली सी सींक निकाली, उसे चंदन में डूबा कर उन्होंने बच्ची के माथे पर एक निशान सा बना दिया…
बच्ची ने किलकारी लेते हुए धीरे से अपनी आंखें मिचमिचा दी.. !
बच्ची के मुस्कुराने पर उसके गालों पर एक हल्का सा गड्ढा बन गया, पंडित जी उस बच्ची के रूप को देखते हुए खो से गए…
“महा प्रतापी कन्या निकलेगी.. सोने जैसे गुणों की खान रहेगी..! धन संपदा ऐश्वर्य सुख समृद्धि सौभाग्य सब कुछ इसके माथे पर लिखा हुआ है ! यह कन्या राज करेगी आगे चलकर महारानी बनेगी ये.. !”
“महारानी नहीं, पंडित जी यह हमारे महल की राजकुमारी बनेगी..! अब बाकी तो ऐसे राजपरिवार, राजसी खानदान रह नहीं गए जहां इसका ब्याह करके हम इसे रानी बनाकर भेजें….!
लेकिन हमारे महल की तो यह सबसे लाडली राजकुमारी बनेगी!”
रूपा ने पंडित जी की बात का जवाब मुस्कुरा कर दे दिया !
पंडित जी ने एक औषधि “लक्ष्मणा” से सिद्ध घृत में शुद्ध सोने को घिस कर उसे मधु में मिलकर बच्ची के जीभ में चटा दिया…
और खुद ही इस विधि का बखान करने लगे.. -” सुवर्ण प्राशन कहते हैं इस विधि को.. कई हज़ार साल पहले हमारे ऋषि मुनियो की सिद्ध की हुई विधि है…ऐसा करने से बच्चा मेधा बुद्धि युक्त हो जाता है.. !! ये बालिका भी प्रखर बुद्धिमान होगी !”
रूपा ने प्यार से उस बच्ची को अपने गले से लगा लिया… अपने गालों से उसके गाल सहलाते हुए रूपा उसकी सूरत में खोई जा रही थी, उसी वक्त नर्स बाहर चली आई…
” बच्चे के पीने के लिए दूध का इंतजाम करना पड़ेगा… रानी साहब को अब तक होश नहीं आया है ! और अगर बच्ची को तुरंत दूध नहीं पिलाया तो, बेबी को डिहाईड्रेशन हो सकता है!”
रानी साहब को होश नहीं आया यह सुनकर वासुकी के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी…
लेकिन वहां मौजूद औरतों को शायद पहले से इस बात का अनुभव था कि, बच्चे के पैदा होते ही उसे दूध की जरूरत होती है | और इसीलिए जया पहले ही दूध का डिब्बा मंगवा कर रखे हुए थे..|
उसने वह सारा सामान नर्स के हाथों में सौंप दिया…
नर्स ने अपनी सहयोगी के साथ वह सारा सामान और बच्ची को गोद में लिया और अंदर चली गई ! दूर खड़े वासुकी के दिल में एक राहत सी महसूस हुई ……
महल के लोग जो भी हो उसकी बच्ची का ध्यान बहुत प्यार से रख रहे थे…..
थोड़ा समय बीतने के बाद अंदर से डॉक्टर बाहर चले आए, डॉक्टर के बाहर आते ही युवराज वासुकी समर रूपा सभी लोग डॉक्टर के पास चले आए ! डॉक्टर ने उन लोगों को देखा और धीरे से आश्वस्त कर दिया..
” होश तो उन्हें अब भी नहीं आया है, लेकिन अब उनकी स्थिति पहले से थोड़ी सुधर रहीं है…. !
बड़े राजा साहब ! आप सब से विनती है कि, आप लोग भी अब आराम करें | आप सब भी कल से ही यहां परेशान हो रहे हैं, आप लोग कहे तो आप सभी के लिए अस्पताल के वीआईपी रूम खुलवा देते हैं..!’
” नहीं डॉक्टर साहब, ऐसी कोई बात नहीं है | मैं बाकी लोगों को महल भिजवा देता हूं, लेकिन यहां पर हम में से किसी का रुकना तो जरूरी है..!
” आप सब जाइए, मैं यहां रुक जाऊंगा!”
समर की बात सुनकर युवराज ने धीरे से हां में सर हिला दिया क्योंकि कहीं ना कहीं डॉक्टर की कही बात सही थी | रानी बांसुरी को होश नहीं आया था, और अब भी उनकी तीमारदारी में पूरा अस्पताल एक पैर पर खड़ा था | ऐसे में महल के सारे लोग बाहर उपस्थित रहकर भी बांसुरी की किसी तरह से कोई मदद नहीं कर पा रहे थे | ऐसे में इतने सारे लोगों का अस्पताल में रहना भी उचित नहीं था | अस्पताल में भीड़ बढ़ाकर वह सभी लोग बाकी मरीजों को कहीं ना कहीं डिस्टर्ब कर रहे थे, और इस बात को युवराज अच्छी तरह से समझता था..|
वह जानता था कि कर्टसी के कारण ना डॉक्टर और ना वहां का स्टाफ उनसे जाने के लिए कहेगा, लेकिन यह बात भी थी कि महल के इतने सारे लोगों के वहां रहने पर बाकी लोगों को आने-जाने और बाकी चीजों में दिक्कत हो सकती थी | दूसरी बात महल के सारे बच्चे घर पर नौकरों के साथ अकेले थे, ऐसे में उन सब का वापस लौट जाना ही ठीक था…|
युवराज ने डॉक्टर का बातों बातों में किया गया इशारा समझ लिया और रूपा और बाकी औरतों को समझा-बुझाकर अपने साथ वापस ले गया | अब वहां सिर्फ समर शेखर रिदान लीना के साथ वासुकी ही रह गया था… |
निरमा और पिया को भी रूपा अपने साथ ले गयी थी..
कुछ देर बाद ही अंदर से पंखुड़ी बाहर चली आई ! पिछली रात से अब तक उसे लगभग 36 घंटे से ज्यादा का समय अस्पताल में हो चुका था, और वह बुरी तरह थक चुकी थी | वह जैसे ही बाहर आई उसने बाहर खड़े शेखर को देखा और आश्चर्य से उसे देखती रह गई..
शेखर के साथ ही उसके दोनों दोस्त रिदान और लीना भी वहां थे और तभी अचानक पंखुड़ी को ध्यान आया कि बांसुरी भी तो इन सब के साथ इनकी कलीग रह चुकी है !
और तभी उसे समझ में आ गया कि रिदान और लीना यहां क्या कर रहे हैं ? वह उन सब को अपने साथ अपने केबिन में ले गई….
उसने वासुकी और समर से भी साथ चलने को कहा… समर भी उन लोगों के पीछे निकल गया लेकिन वासुकी वहीँ रह गया…
उसकी आंखें अपनी बेटी पर और साँसे नेहा पर अटकी हुई थी…
उसकी बेटी फ़िलहाल रानी बाँसुरी की बेटी के तौर पर वहाँ मौजूद थी, वो भी वहाँ के लिए राजसी ख़ून थी | ज़ाहिर है, उसकी अलग ही पूछ परख होनी थी और इसलिए निओनेटल केयर यूनिट में वहाँ के डॉक्टर्स और स्टाफ उसका कुछ विशेष ध्यान रख रहें थे… |
वासुकी वहीँ एक बेंच पर बैठ गया..
पिछली रात से ही वो अस्पताल में मौजूद था… कल रात से ही वो लगातार जाग रहा था, लेकिन अब थकान से उसकी ऑंखें भारी होने लगी थी..
दिमाग में नेहा ही चल रहीं थी, लेकिन पलकें मूंदने लगी थी…
उसे मालूम ही नहीं चला की कब उसकी आंखें बंद हो गयी… और वो गहरी नींद सो गया !!
******
यूँ लगा एक सदी बीत गयी…
एक पूरा वर्ष बीत गया…
वासुकी के चेहरें पर खिड़की से पड़ती सुबह सुबह की धूप खिल रहीं थी, उसके माथे पर बल पड़ने लगा, और वो चादर को मुहँ तक खींच कर ओढ़ने को था की एक गोल गुदबुदी सी बच्ची आई और उसकी चादर में जगह बना कर उसके पास घुस गयी…
उसने वासुकी को अपनी छोटी छोटी बाँहों में जकड लिया.. !
उसे देखते ही वासुकी के चेहरें पर हलकी सी मुस्कान चली आई..
“मेरा शोना बेटा, इतनी जल्दी क्यों उठ गया ?”
“आप भूल गए डैडा ? आज आपने कहा था, हम लोग फिशिंग करने लेक पर जायेंगे.. !”
“ओह्ह हाँ, डैडा तो वाकई भूल गए.. ! सॉरी प्रिंसेस !”
और वासुकी ने अपनी दोनों बाँहे लपेट कर अपने सर के नीच रख ली..
उसके पेट पर बैठ कर फुदकती उसकी नन्ही राजकुमारी उससे फिशिंग के लिए जाने की रट लगाए थी की तभी कमरे में नेहा चली आई…
हाथ में कॉफ़ी का कप पकडे नेहा आई और कप को बेड के किनारे रखें टेबल पर रख कर उसने साथ वाली खिड़की पर से पर्दा खींच कर हटा दिया.. और सूरज की रौशनी से कमरा भर गया..
नेहा को अपलक देखता वासुकी मुस्कुरा रहा था, और उसे इस तरह खुद को घूरता देख कर नेहा शरमा रहीं थी..
“ऐसे क्या देख रहें हैं मिस्टर हस्बैंड ?”
“देख रहा हूँ की हमारी प्रिंसेस के लिए भाई लाने का वक्त हो गया है.. !”
“पागल हो गए हैं क्या ?”
“हाँ थोड़ा सा…. !”
नेहा ने वासुकी की गोद से शोना को उतारा और उसकी आया को बुला कर उसे आया के हाथ में सौंप दिया…
आया जैसे ही बेबी को बाहर लेकर गयी.. नेहा वासुकी के बगल में बैठ गयी..
“उठिये और कॉफ़ी पी लीजिये.. !”
“पहले तुम्हें तो पी लूँ.. !”
और वासुकी ने नेहा की बाँह पकड़ कर उसे खुद पर खींच लिया…
“क्या कर रहें है आप ? कोई आ गया तो ?”
“हमारे कमरे में कौन आएगा ? और जो भी आएगा पहले नॉक करेगा तब अंदर आएगा !”
“आपकी प्रिंसेस के पास ये सारी तमीज़ नहीं है.. समझे ! वो धडधडाती हुई अंदर चली आती है… और अपने साथ अपनी आया को भी लें आती है….!”
“तो जाओ दरवाज़ा लगा दो.. !”
“उफ़.. हमारे कहने का ये मतलब नहीं था.. चलिए उठिये… पहले तो उसके साथ ढ़ेर सारे प्लान्स बना लेते हैं और फिर आलस में पलंग तोड़ते रहते हैं.. !”
नेहा ने धीमे से झुक कर वासुकी के होंठो को चूमा और बाहर की तरफ मुड़ गयी…
जाते जाते वो एक बर फिर वासुकी को हड़काती चली गयी, जो उसके जाने के बाद अपनी चादर अपने चेहरें तक खींचने की कोशिश कर रहा था..
“सोचना भी मत, कि दुबारा सोने मिलेगा ! आज तो बिल्कुल नहीं वरना आपकी राजकुमारी यहीं आपसे युद्ध शुरू कर देगी… !
और लाकर दीजिये उसे बाहुबली की तलवार !! आजकल सबके नाक में दम किये रहती है.. पता नहीं क्या होगा उसका.. !
अरे हाँ महल से आपके लिए फ़ोन आया था, उनका कहना था आप उनका फ़ोन उठा नहीं रहें है.. ऐसा क्यों ? और हाँ एक शादी का कार्ड भी आया है.. डेस्टिनेशन वेडिंग है, इटली में होने वाली है.. !
अगर आप हाँ बोले तो आज ही से पैकिंग शुरू कर देंगे हम.. !”
“नेहा सुनो तो.. !”
वासुकी ने उसे आवाज़ दी और नेहा दरवाज़े पर खड़े हुए पलट कर उसे देखने लगी…
“क्या… !”
“मेरे पास तो आओ… क्या सुबह से कमरे में इधर से उधर घूम घूम कर तांडव मचा रही हो ? दो घड़ी सुकून से बैठो तो सही !”
“तांडव तो आप और आपकी लाड़ली मचाते हैं.. हम बस समेट समेट के परेशान होते है और आप लोग धमाचौकड़ी कर के थकते नहीं है.. !”
खुद में और भी कुछ बड़बड़ाती हुई नेहा कमरा समेटती रहीं और वासुकी अपने बिस्तर पर बैठे उसे मुग्ध दृष्टी से ताकता रहा…
क्रमशः
aparna…
दिल से…
आज का भाग छोटा था क्योंकि अगला भाग कुछ ऐसी घटनाओ के साथ आएगा की कहानी एक नए मोड़ में मुड़ जायेगी…
कहानी को जैसा सोचा था, वैसा ही अब तक लिखा और आप लोगों ने पसंद भी किया, लेकिन इसके आगे आप सब पाठकों की राय के हिसाब से चलूँ तो कहानी को एक सुखांत देकर अगले भाग में ख़त्म कर दूंगी…
लेकिन मैंने जो सोच रखा है वैसा लिखूंगी तो कहानी का अंत अभी दूर है..
सोचा आज यहीं पूछ लूँ…
कहानी आप मेरे हिसाब से पढ़ना चाहते है या कहानी का अंत कर दूँ.. ?
जीवनसाथी राजा अजातशत्रु की कहानी थी, उसके गर्व गौरव मान सम्मान उसके सपनों, उसकी ख्वाहिशों उस के प्रेम और उसके दोस्तों की कहानी…
उसके राजसी इतिहास की कहानी !!
उसके निस्वार्थ और बेशर्त प्रेम की कहानी !!
उसके उस प्रारब्ध की कहानी जिसने उसे उस के राजसी ख़ून से अलग नहीं जाने दिया.. वो भले ही एक समान्य आदमी बन कर सामन्य सी जिंदगी जीना चाहता था, लेकिन उसकी डेस्टिनी उसे राजा बना गयी और एक ऐसा राजा जो सिर्फ अपनी रियासत नहीं बल्कि लोगों के दिलों पर राज करने लगा… !
जीवनसाथी 2 वासुकी की कहानी है !
अनिरुद्ध वासुकी जिसका बचपन उपेक्षाओं और परेशानियों में कटने के बावजूद उसने खुद को सिद्ध किया और अपने आप को खड़ा किया उस संसार के खिलाफ जिस संसार ने उससे उसके माता पिता, उसके बचपन को छीन लिया.. !
जीवनसाथी 2 वासुकी के अभूतपूर्व प्रेम की कहानी है, जिस प्रेम में कोई कलुषता नहीं थी.. ! वासना का ज्वर नहीं था, थी समर्पण की उष्णता !
उसका प्रेम उस अग्नि की तरह पवित्र था जिसमे होम कर देवी देवताओ को भोग लगाया जाता है.. !
उसी धधकती अग्नि को अपने अंदर समेटे वो अपने प्रेम से विमुख हो भी जाता लेकिन उसके कर्तव्य ने उसे एक बार फिर अपने प्रेम के सामने ला खड़ा किया..!
और अपने कर्तव्य की परीक्षा में उसने अपना जीवन ही नहीं अपनी प्रेयसी का भी जीवन होम कर दिया… !
*****
कहानियाँ ऐसे ही नहीं लिखी जाती… लिखने से पहले उन्हें लेखक जीता है, और पढ़ते समय पाठक !!
लेखक पाठक के बीच के संबंधों की गहराई वो कहानी ही तय करती है !!
लेकिन आज पहली बार मैं सोचने पर मजबूर हूँ की, मैंने जो सोचा है वैसे कहानी को बढाऊं या रोक दूँ…
अब आप ही समाधान करें…
जैसा आप लोगों की समीक्षा होगी, कहानी वैसे ही आगे बढ़ेगी…
aparna….

खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️💐💐💐💐💐♥️♥️💐💐
बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐💐💐💐💐♥️♥️♥️♥️