जीवनसाथी -2/82

जीवनसाथी -2 भाग – 82

   अनिर्वान बेसुध सा खड़ा खाली खाली आँखों से खिड़की से बाहर देख रहा था कि ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा खुला और बदहवास सी नर्स बाहर भागती चली आई…

उसके बाहर आते ही सब उसकी तरफ बढ़ गए…

उसकी आंखें जैसे किसी को ढूँढ रहीं थी…

लेकिन युवराज सामने चला आया..

“कैसी है बाँसुरी की तबियत ?”

युवराज की आवाज़ सुनते ही दूर खड़ा वासुकी भी उनकी तरफ चला आया…

“पेशेंट का ख़ून बहुत ज्यादा बह चुका है.. डॉक्टर्स लगातार रोकने की कोशिश में है लेकिन ख़ून नहीं रुक रहा.. उन्हें ब्लड चढ़ाना पड़ेगा !!
आप लोगों को दो यूनिट ब्लड देना पड़ेगा और उसके बदले में आपको ब्लड बैंक से दो यूनिट ब्लड मिल जायेगा..
फ़िलहाल आप लोग इस ब्लड ग्रुप का दो यूनिट ब्लड यहाँ लाकर दें दीजिये, उसके बाद आप लोग वहाँ ब्लड जमा कर दीजियेगा !”

युवराज के साथ ही बाकी सभी ने भी हामी भर दी….

कोई और नर्स के हाथ से पर्ची लें पाता उसके पहले अनिर्वान ने वो पर्ची ली और तेज़ कदमो से आगे बढ़ गया…

रूपा ने युवराज की तरफ देखा, वो जानना चाहती थी कि ये है कौन, लेकिन युवराज ने उस वक्त बिना कुछ कहें सिर्फ आँखों से ही आश्वस्त कर दिया….

अनिर्वान जिस तेज़ी से गया था उसी तत्परता से वापस लौट आया.. उसके साथ आए लड़के के हाथ में जो ब्लड पैक था वो उसने ओटी के बाहर खड़ी नर्स के हवाले कर दिया..

और ऐसा होने के बाद अनिर्वान वापस उस लड़के के साथ ख़ून देने जाने लगा कि शेखर भी उसके साथ हो गया..

अनिर्वान ने एक नज़र साथ आते शेखर पर डाली और फिर बिना कुछ कहें आगे बढ़ गया…

बहुत बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि बिना कुछ कहें अनजान हृदय भी एक दूजे कि व्यथा समझ लेते हैं..
ऐसे ही किसी पीड़ा के स्त्रोत में दोनों ही डूबे बैठे थे,  लेकिन दोनों ही एक दूसरे से सांत्वना के बोल भी नहीं बोल सकते थे…

शेखर के पीछे रिदान और लीना भी बढ़ गए…

ब्लड बैंक के एक कमरे में अगल बगल के बेड पर अधलेटे से अनिर्वान और शेखर का ब्लड बाकी सारी जाँच के बाद निकाल लिया गया…

लीना बाहर इधर से उधर परेशानी में टहल रहीं थी..

रिदान ने उसे इस तरह परेशान देखकर पूछ लिया…

” क्या हुआ लीना ? बहुत ज्यादा परेशान लग रही हो?”

” परेशान यह सोचकर हो रही हूं कि, बांसुरी अगर ऐसी मरणासन्न अवस्था में है तो, राजा साहब कहां है ? वो अब तक यहां क्यों नहीं पहुंचे ?”

”  कहीं शहर से बाहर होंगे ? उन्हें भी बता दिया गया  होगा और वह पहुंच रहे होंगे.. !”

“हम्म ! लेकिन अब तक उन्हें यहाँ पहुँच जाना चाहिए था ना !”

अपनी बात बोल कर लीना की आंखें फिर परेशान हाल अनिर्वान पर टिक गई….
जाने क्यों लेकिन लीना इस वक्त जो सब कुछ बाँसुरी के पति राजा साहब में देखना चाहती थी वो उसे अनिर्वान की आँखों में दिख रहा था… और शायद यहीं उसकी बेचैनी का सबब बन रहा था.. !!

  उसने एक नजर शेखर पर डाली और वापस बाहर कॉरिडोर के ग्लास विंडो पर खड़ी हो गयी…

कुछ देर में ही निरमा भी वहाँ पहुँच गयी…
वो भी परेशान थी, उसके आँसू नहीं थम रहे थे !! वो बार बार ऑपरेशन थियेटर के दरवाज़े तक जा जाकर लौट रहीं थी..
इसकी बेचैनी का कारण कुछ अलग ही था..
इधर कुछ दिनों से निरमा को बांसुरी के स्वभाव में फर्क नजर आने लगा था और बस इसी बात पर वह अपनी प्राणप्रिय सखी से रूठी हुई थी…
उसे लगने लगा था कि बांसुरी आजकल उससे कटी कटी रहने लगी है | ना ही वह उसे अपने से मिलने के लिए बुलवाती थी, और ना ही पहले की तरह कभी भी किसी भी वक्त उसके घर उससे मिलने चली जाती थी !
    उसे  मीठी के लिए भी बांसुरी के स्वभाव में फर्क दिखने लग गया था | पहले बांसुरी जब भी निरमा से मिलने उसके घर आती, अक्सर वह मीठी को अपनी गोद में बैठाकर ढेर सारी कहानियां सुनाया करती थी, उसके लिए कुछ ना कुछ तोहफे लाया करती थी, लेकिन अब बांसुरी ने एक तरह से निरमा के घर आना ही बंद कर दिया था…

कभी महल से बुलावा आने पर निरमा अगर मीठी को लेकर जाती भी थी तो, बस एक बार उसे प्यार से पुचकारने के बाद बांसुरी मीठी की तरफ दोबारा देखती भी नहीं थी….

ऐसे ही छोटे-मोटे कारणों के कारण निरमा और बांसुरी के बीच एक अनजान अबोला सा होने लग गया था…

निरमा अपनी तरफ से आगे बढ़कर बांसुरी के साथ मामला सुलझाना चाहती थी, लेकिन उसे कोई मौका ही नहीं मिल रहा था..!
आज अचानक समर  का फोन चला आया की बांसुरी का भयानक एक्सीडेंट हो गया है, और वह अपने मन के सारे गिले शिकवे भुला कर भागती हुई बांसुरी को देखने यहां चली आई थी…!

बांसुरी दोबारा मां बनने वाली थी और ऐसे में औरतों के मन का कोई हिसाब किताब नहीं होता ! उन्हें होने वाले मूड स्विंग कभी तो उन्हें अचानक खुशी से लबरेज कर देते हैं, और कभी दुख के अथाह सागर में डूबा कर रख देते हैं |
   ऐसे में अगर बांसुरी के स्वभाव में कुछ थोड़ा बहुत फर्क दिख भी रहा था तो, उस पर निरमा को क्या इतनी सारी आपत्ति होनी चाहिए थी ? बस यही सोच सोच कर निरमा पश्चाताप में घुलती जा रही थी और वही पश्चाताप आंसू बनकर उसकी आंखों से बहता चला जा रहा था..

इसी सबके बीच अचानक उसे लगा कि अगर बांसुरी जीवन और मौत के बीच लड़ रही है तो राजा भैया कहाँ है ?

उसे मालूम था कि प्रेम और राजा किसी काम से 2 दिन पहले से कहीं बाहर गए हुए हैं, लेकिन राजा कहीं भी जाए अगर उसे बांसुरी के बारे में ऐसी कोई भी खबर मिलेगी तो वह उड़कर अपनी बांसुरी के पास पहुंच जाएगा…

यह विचार दिमाग में आते ही वह तुरंत रूपा के पास पहुंच गई और उसके पहुँचते ही रूपा ने उसे यह बताकर आश्वस्त कर दिया कि, राजा को भी खबर दे दी गई है निरमा ने अपनी तरफ से प्रेम को भी फोन घुमा दिया….

*****

निरमा का फोन आते ही प्रेम ने फोन उठाया और हॉल में एक तरफ को बढ़ गया…

निरमा फोन पर रो रही थी और उसका रोना सुनकर प्रेम विचलित हो गया..

” क्या हो गया निरमा ?”

” बांसुरी का बहुत भयानक एक्सीडेंट हो गया है..?  आप और राजा भैया कितनी देर में पहुंचेंगे यहां..?”

”  हाँ मालूम चल गया है ! बस हम यहां से निकलने ही वाले हैं, शाम तक पहुंच जाएंगे.. तुम खुद को संभालो निरमा..! और सुनो… !”

लेकिन कहते कहते ही जाने क्यों प्रेम बीच में ही रुक गया..

“हाँ कहिये !! अच्छा सुनिए आप राजा भैया का ख्याल रखिएगा..!”

” हम्म.. ! बाद में फोन करता हूँ !”

प्रेम ने फोन रख दिया और निरमा आश्चर्य से अपने फोन को देखती रह गई !
   ना ही प्रेम ने एक्सीडेंट के बारे में कुछ पूछा और ना बाँसुरी की हालत के बारे में, उसे बड़ा अजीब लगा..! लेकिन फिर उसे लगा कि शायद रूपा और युवराज से प्रेम और राजा की पहले ही बात हो चुकी है और इसलिए वह भी थके कदमों से आकर वही बेंच पर बैठ गई…

बाहर मौजूद सभी लोग बांसुरी की जान बचाने के लिए दुआएं कर रहे थे….

और इधर उस अस्पताल से बहुत दूर हवेली में नीचे हॉल में बैठा सुनील अपने खुद के लिए दुआ कर रहा था…

वो बस किसी तरह वहाँ से जान बचा कर निकल जाना चाहता था, लेकिन उसे ये भी समझ आ गया था कि यहाँ से निकलना आसान नहीं था… !
वो अब बस राजा साहब के नीचे आने के इंतज़ार में था…

राजा साहब ऊपर बाँसुरी के कमरे में पहुँच चुके थे… दर्श के इशारे पर सारिका दो कप में कॉफ़ी लिए ऊपर पहुँच गयी…

उधर अब तक राजा कमरे के बाहर ही खड़ा था, उसने अपनी हुकुम को आवाज़ लगायी और उसकी आवाज़ पर पलट कर खड़ी बाँसुरी राजा को देखती रह गयी थी..

कितना सुख था ऐसे देखने में भी..

जाने कितने महीनों की तरसी आंखें थी, आज बाँसुरी की पलकें झपकना भूल गयी थी..
उसे लग रहा था वो बस आँखों ही आँखों में अपने साहब को देखती अपने अंदर उतारती रहें…

वहीं रौबदार चेहरा, वहीं चौड़ा माथा, माथे पर एक तरफ कट का निशान, एक तरफ को सिमटे बाल,  वहीं सफेद कमीज़, वहीं कुहनी तक फोल्ड की हुई बाहँ और उस पर कलाई पर बँधा सोने में मढ़ा हुआ रुद्राक्ष !!

  वहीं खुशबू….!
उस खुशबू ने तो बाँसुरी को ऐसे अपने मोहपाश में बाँधा था कि कई कई बार रातों में नींदो में उस खुशबू को महसूस कर वो चौंक कर जाग जाती थी..
और फिर रात रात भर खिड़की पर बैठी सूनी आंखें जाग कर गुज़ार देती थी…

राजा और बाँसुरी एक दूसरे को देखते खड़े थे, जैसे आँखों ही आँखों में सारी बातें हो जा रहीं हो..

बांसुरी की आंखों में आंसू उमड़ रहे थे, वहीं राजा भी खुद को रोने से रोकने की असफल कोशिश कर रहा था..
आज महीनों बाद उसने बांसुरी को अपने सामने प्रत्यक्ष देखा था !!
बांसुरी के गालों पर आंसू ढुलकने लगे थे, उसी समय सारिका चली आई…!
उसने धीमे से उन दोनों के लिए कॉफ़ी वहीँ टेबल पर रखी और नीचे चली गयी. उसे इस राजा रानी की जोड़ी बड़ी भली सी लग रहीं थी…

इतनी सुंदर राजसी जोड़ी उसने पहली बार देखी थी, इसलिए उसका मन नहीं भर रहा था लेकिन दर्श ने उसे साफ साफ कहा था कि कॉफ़ी रख कर तुरंत वापस आ जाना..

सारिका चली गयी और उसके जाते ही राजा ने अंदर जाकर कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया..

राजा बाँसुरी की तरफ दो कदम बढ़ा और बाँसुरी भाग कर उसके सीने से लग गयी…

राजा ने उसे कस कर खुद में भींच लिया…

“आप कहाँ चले गए थे साहब ? मै यहाँ… अकेले… शौर्य कैसा है.. ?”

बाँसुरी की बेकरारी ऐसी थी कि उसके मुहँ से शब्द नहीं निकल पा रहें थे..
आज तक कैसे कर के उसने खुद को संभाला था, ये वही जानती थी..!  लेकिन आज अपने पति को देखते ही उसके संयम का दुर्ग ढह गया था, अब एक माँ अपने बच्चे के लिए तड़प उठी थी…

“तुम्हारा बेटा भी तुम्हारे जैसा ही है… ज़िद्दी !!”

और राजा मुस्कुरा उठा…
उसने बाँसुरी को खुद से दूर कर उसका चेहरा देखना चाहा लेकिन बाँसुरी उसी तरह उससे चिपकी रहीं..

“मत कीजिये खुद से दूर… अभी महसूस कर लेने दीजिये कि मै अपने साहब की ही बाँहों में हूँ… ! जाने कितनी बार यहीं सपना देख कर जागी हूँ और फिर दुबारा सो नहीं पायी.. आज भरोसा कर लेने दीजिये कि ये सपना नहीं है.. !

राजा ने बाँसुरी को वैसे ही थामे हुए आगे बढ़ कर उसके पलंग पर बैठा दिया और खुद उसके बगल में बैठ गया..
बाँसुरी वैसे ही राजा के सीने से लगी बैठी रहीं..

“ये सब कुछ क्या था साहब ? मै यहाँ क्यों थी ? ये लोग कौन है ? क्या आप इन्हें जानते थे या अभी आप मुझे ढूंढते हुए यहाँ तक आये हैं ? नीचे कौन रहता है और इन लोगों ने मुझे आपसे अलग क्यों रखा ? इस सब के पीछे का कारण क्या है ?”

एक गहरी सी साँस भर कर राजा ने बांसुरी को अपनी बाँहों में और कस लिया और उसे बताना शुरू किया…

“हुकुम… !! मै तुमसे कुछ भी नहीं छिपाना चाहता हूँ… सब कुछ सच सच बता दूंगा…!
इस सब के पीछे मै और मेरी टीम ही थी..! और मेरी टीम के लोगों को तुम अच्छे से जानती हो, प्रेम समर के अलावा एक और है जो मेरी इस टीम का अहम हिस्सा है.. उसका नाम है अनिरुद्ध वासुकी !!

देखो तुम शुरू से जानती हो कि, मेरे दोस्त कम और दुश्मन ज्यादा है…
बस इसी सब से बचने के लिए मैं एक आम आदमी बनकर रहना चाहता था | मुझे वाकई कभी भी ना रियासत का लोभ रहा और ना सत्ता का | लेकिन मेरी किस्मत ऐसी थी कि मुझे इन दोनों के बीच ही जिंदगी भर जूझना पड़ा..|
रियासत तो फिर भी मेरी अपनी है, मेरे पूर्वजों की धरोहर है वो मेरे लिए… |
लेकिन सत्ता में जाना मैंने कभी नहीं चाहा था, और एक बार फिर मेरा प्रारब्ध मुझे उस ओर धकेल गया जहाँ से मै अक्सर दूर भागा करता था… !

राजनीति एक ऐसा दलदल है जहां घुसने के बाद निकलना बेहद मुश्किल है | आपके पैर इस कदर उलझते चले जाते हैं, और आपको उस दलदल में खींचते चले जाते हैं कि, आप दोनों हाथ मार कर भी उस दलदल से बाहर नहीं निकल सकते…|

मेरी विरोधी पार्टी मेरे विरोधी नेताओं ने मुझसे बदला लेने के लिए तुम्हें चुना था..!
मेरा 5 साल का कार्यकाल पूरा होने को है, और जिस तरीके से लोगों का रुझान प्रशंसा मेरी पार्टी के पक्ष में थी अभी भी अगले चुनाव में मेरी पार्टी का जीतना तय है | और इसीलिए विरोधियों ने अपनी जीत और मेरी हार के लिए तैयारियां काफी पहले से शुरू कर दी थी.. |

मुझे हराने के लिए इस बार उनका निशाना तुम थी..! तुम जबसे सचिवालय आई, यह लोग तुम्हारे पीछे लग गए थे.. 
और यह बात बहुत जल्द ही समर को समझ में आ गई थी इसलिए साल डेढ़ साल बीतते ही तुम्हें सचिवालय से हटाकर किसी दूसरी जगह भेजने की उसने तैयारी शुरू कर ली थी..
मैं चाहता था, तुम आस पास ही रहो,  लेकिन समर का कहना था कि तुम्हें मुझसे ज्यादा दूर रखने में ही तुम्हारी सुरक्षा और भलाई है | और बस इसीलिए तुम्हें इतनी दूर पोस्टिंग देकर भेजना पड़ा..
   लेकिन वहां पर भी तुम्हारी सुरक्षा की चिंता तो थी ही, क्योंकि यह लोग तुम्हारे काम पर लांछन लगाकर तुम पर जबरदस्ती  के झूठे रिश्वत वगैरा के इल्जाम लगाकर तुम्हें तुम्हारे पद से हटाना चाहते थे |
   यह लोग जानते हैं कि तुम्हारे लिए तुम्हारी नौकरी और ईमानदारी कितनी ज्यादा महत्वपूर्ण है, अगर तुम पर इस तरह का कोई लांछन लगता तो जाहिर है तुम टूट जाती और तुम्हारा टूटना मुझे सहन नहीं होता..|

  इसीलिए तुम्हें शहरी क्षेत्रों से दूर रखने के लिए एक सुदूर जंगल में भेज दिया | समर को लगा था कि वहां तुम यहां की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित रहोगी, लेकिन मैं तब भी चाहता था कि तुम्हारे साथ मेरा कोई आदमी हर वक्त मौजूद रहे..

अनिरुद्ध वासुकी को मैंने ही तुम्हारे साथ भेजा था…!!”

बांसुरी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और राजा को देखने लगी | राजा ने उसके मासूम से चेहरे को अपनी हथेलियों में थाम लिया, और उसके होठों पर अपनी मुहर लगा दी..

” एक तो इतने पास बैठकर वैसे ही मेरे दिल की धड़कन बढ़ा रही हो, उस पर ऐसी मासूम आंखों से देखोगी तो मैं पूरी बात सुना नहीं पाऊंगा..!”

“फिर.. क्या करेंगे.. ?”

“वो तो मै कर के ही बताऊंगा !!”

“आगे बताइये कि ये वासुकी आपको मिला कहाँ ?”

“वासुकी….. !!
   ये नाम ऐसे ही इतना विशाल नहीं बना है.. बहुत सारी बातें हैं इसके पीछे,  लेकिन जो सबसे जरूरी बात थी कि  मैंने वासुकी को क्यों चुना, उसके पीछे थी उसकी इमानदारी और निर्भीकता ! उसने अपने बचपन में बहुत कुछ झेला था, लेकिन उसके पिता के लिए मेरे बाबा हुकुम ने बहुत कुछ किया था, इसलिए वासुकी को मैं शुरू से जानता था..

” लेकिन मैंने तो वहां पर काम करते समय वासुकी के बारे में कुछ बहुत ही अलग सी बातें सुनी थी..!”

”  हां तुमने जो सुना था वह सब भी कहीं ना कहीं सच है..
मैं नहीं चाहता था कि वहां किसी को भी यह मालूम चले कि वासुकी मेरा आदमी है |
   इसलिए तुम्हारे वहां पहुंचने से पहले वासुकी को वहां पूरी तरह से स्थापित कर दिया..|  एक से डेढ़ साल में वासुकी वहाँ इस तरह जम गया था कि, वहां के लोगों को किसी तरह भी यह शक नहीं हुआ कि वो यहां क्या करने आया है?
   वासुकी को हम लोगों ने यह तो बताया था कि हमें उस से काम है, लेकिन क्या काम है यह उसे भी तब तक नहीं मालूम था, जब तक तुम उसके शहर पहुंच नहीं गई.. |
      वो तुमसे मिला जरूर, लेकिन उस समय तक उसे मालूम नहीं था कि उसे तुम्हारी सुरक्षा के लिए चुना गया है..!
उसके बाद उसे महल में भी इस बहाने से बुलाया गया कि वह हमारी कोठी खरीदना चाहता है, क्योंकि मैं और समर जानते थे कि मेरे विरोधी हर वक्त मुझ पर नजर रखे हुए हैं | उन्हें कहीं से भी कुछ भी मालूम चल जाता तो समर का बनाया यह सारा प्लान खत्म हो जाता | बस इसीलिए यह सब कुछ बहुत खुफिया तरीके से किया गया | तुम्हें भी अगर पहले से बता देते तो तुम कभी भी मुझे और शौर्य को छोड़ कर अकेले जाना पसंद नहीं करती |
   तुम्हें उस वक्त यही लग रहा था कि यह तुम्हारी नौकरी का एक चैलेंज है और जिसे तुमने खुशी से एक्सेप्ट किया और वहां बीहड़में रहने चली गई | वासुकी हर वक्त तुम्हारी सुरक्षा में तैनात था, और उसने जाने कितनी बार तुम्हें कितनी सारी मुश्किलों से बचा कर निकाल लिया |  बहुत बार तो तुम खुद नहीं समझ पाई कि तुम्हारे साथ क्या होने वाला था..?

यह लोग इतनी आसानी से मानने नहीं वाले थे और यह लोग वहां भी पहुंच चुके थे |
    तुम्हारे ऑफिस में सेंध लगाकर कई कागजों की अदला-बदली करने की कोशिश की गई, लेकिन जब तक तुम्हें इस गड़बड़ के बारे में मालूम चलता उसके पहले ही वासुकी उन कागजों को सही कर देता था..
इसके साथ ही तुम्हारे ऑफिस में मौजूद तुम्हारे दुश्मनों को भी चुन चुन कर उसने हमारे हवाले कर दिया था..

हमारा यह सारा प्लान सिर्फ चुनाव होने तक का ही था.. इलेक्शन के समाप्त होने के बाद हम लोगों को पूरा विश्वास था कि हमारी पार्टी में फिर से सत्ता में आ जायेगी, और तब तुम्हें वापस बुला लिया जाएगा, लेकिन इसी बीच तुम्हारी मुलाकात शेखावत से हो गई..

इस बात का हम लोगों को जरा भी इल्म नहीं था कि शेखावत भी वहीं मौजूद था..
यहां तक कि मुझे यह भी नहीं मालूम था कि ठाकुर साहब की बड़ी बहन शेखावत की धर्मपत्नी थी और वह बहुत पहले से मुझसे बदला लेने के लिए मेरी पत्नी और मेरे बच्चे यानी तुम पर नजर गड़ाए हुए थे..
तुम्हारे उस शहर में पहुंचते ही उसकी तो लॉटरी लग गई थी और उसने अपने स्तर पर तुम पर नजर रखनी शुरू कर दी थी….|

इसी बीच तुम्हारी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा शेखावत के काले धंधों के आड़े आने लगी और शेखावत से तुम्हारी मुठभेड़ हो गई…
शेखावत को भी यह मालूम था कि उसकी पत्नी के भाई को मेरी वजह से मरना पड़ा था, और वह मेरा बहुत बड़ा दुश्मन था | इसलिए एक तरह से देखा जाए तो शेखावत भी मुझ से दुश्मनी पाले बैठा था, ऐसे में जब मेरी पत्नी ने उसके काले कारनामों को दुनिया के सामने लाने का बीड़ा उठाया तो वह तुम्हारा भी दुश्मन बन गया और उसने तुम्हारी जान लेने के मंसूबे बनाने शुरू कर दिए….
वासुकी हर कदम पर तुम्हारे पीछे था और तुम्हारी रक्षा कर रहा था..

तुम्हें शायद याद ना हो हुकुम लेकिन शेखावत की एक पार्टी में तुम गई थी जहां वासुकी भी मौजूद था, उस पार्टी में शेखावत की पत्नी से तुम्हारी मुलाकात भी हुई थी..

” बहुत अच्छे से तो याद नहीं है साहब लेकिन.. हां कुछ थोड़ा बहुत याद तो है..!”

” वासुकी हर कदम पर तुम्हारे पीछे खड़ा था..! तुम्हारी सुरक्षा के लिए मैंने एक बहुत सही बंदे को चुनाव किया  था.. और मुझे उस पर गर्व है !
    उस दिन पार्टी में वासुकी ने इस बात पर गौर किया कि शेखावत से कहीं ज्यादा उसकी पत्नी की आंखों में तुम्हारे लिए द्वेष नजर आ रहा था..
वासुकी ने उसकी पत्नी के बारे में समर से फोन करके चर्चा की जिसके बाद समर ने उसकी पत्नी की जन्म कुंडली निकलवा ली..
तब जाकर हमें मालूम हुआ कि शेखावत की पत्नी असली में ठाकुर साहब की बड़ी बहन थी, और बस हम सब को यह सारा माजरा समझ में आ गया | उसके बाद वासुकी को हम लोगों ने एक बार फिर मिलने के लिए बुलाया..
  और तब हम चारों ने मिलकर यह तय किया कि, जब तक चुनाव नहीं हो जाते तुम्हें किसी अज्ञातवास में छुपा कर रखना होगा वरना तुम्हारी जान को बहुत बड़ा खतरा था !
    वैसे तो मेरी भी जान को खतरा था लेकिन प्रेम और समर के साथ रहते हुए मैं बहुत सुरक्षित था, लेकिन साथ ही मैं यह भी जानता था कि तुम्हारा मेरे साथ रहना सुरक्षित नहीं था..!
तुम्हें किसी ऐसी जगह रखना था जहां तुम दुनिया की नजरों में ना आओ, लेकिन दुनिया से इस बात को छुपाना मुश्किल होता कि तुम्हें हम लोगों ने छुपा कर रखा है और तब समर ने कहा कि तुम्हारी जैसी दिखने वाली किसी लड़की को तुम्हारा रूप देकर महल में कुछ दिनों के लिए रखा जा सकता है, जिससे मेरे विरोधियों को यह लगे कि तुम महल में मौजूद हो और इसलिए वह तुम पर से अपना ध्यान हटाकर तुम्हारी उस हमशक्ल पर अपना ध्य

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